प्रतिद्वंद्विता भरे जीवन में अवसाद है आम






अवसाद के शिकार होने की कोई निश्चित उम्र नहीं होती। वह कोई भी हो सकता है। चाहे वह बच्चा हो, युवा हो या फिर बुजुर्ग। दरअसल दिक्कत उसी दिन से शुरू हो जाती है जब हम जीवन के हर पहलू पर नकारात्मक रूप से सोचने लगते हैं। जब यह स्थिति चरम पर पहुंच जाती है तो व्यक्ति को अपना जीवन निरूद्देश्य लगने लगता है। यह नौबत तब गंभीर हो जाती है जब ऐसा व्यक्ति किसी जटिल रोग का शिकार हो या फिर जीवन की कोई बाजी हार गया हो। पिछले कुछ समय से भारतीय युवाओं को देखें, तो उनमें हताशा साफ दिखाई दे रही है मगर आश्चर्य की बात यह है कि कोई इसे नोटिस नहीं कर रहा और न ही गंभीरता से ले रहा है।
पिछले दिनों कनाडा में हुए एक शोध के हिसाब से युवाओं और टीनेज में होने वाला डिप्रेशन उनके रिश्तों पर भी बुरा असर डालता है। ऐसे हालात में उनके सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो जाती है। ये अपनी भावनाओं को ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते और कभी-कभी आक्रामक भी हो जाते हैं। अवसाद व्यक्ति के जीवन के हर पहलू पर असर डालता है। छोटी-छोटी बातें भी ऐसे में परेशानी का कारण बनने लगती है।
दरअसल भारतीयों ने सुख-सुविधा के प्रति इतनी आसक्ति बढ़ा ली है कि वह उसे हर हाल में पाना चाहता है। अगर वह सुख भोग रहा है तो उसे बनाए रखने के लिए बेइंतिहा मशक्कत करता है। दुर्भाग्य से समृद्धि खत्म हो जाए तो वह पागल हो उठता है। इसका दोष उदारीकरण को दिया जा सकता है जिसने भारत में चकाचौंध तो पैदा कर दी है मगर गरीबों का भला नहीं किया। दो जून की रोटी के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे सामान्य मध्य वर्ग के लिए तो हर तरफ मुश्किलें हैं। अवसाद वाली स्थितियां उन्हें घेरने के लिए हर दम तैयार बैठी रहती हैं।
यह अवसाद जब चरम पर होता है तो क्या गरीब और क्या अमीर, कोई भी आत्मघाती कदम उठा लेता है। बेहतर जीवन और लालसा और अस्तित्व का सवाल बड़ा होने पर व्यक्ति के कदम खुद को खत्म करने के लिए बढ़ने लगते हैं। ऐसे वर्ग में इन दिनों किसानों के साथ-साथ युवाओं की संख्या भी कम नहीं है। सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि खुदकुशी करने वाले युवाओं की संख्या जो कुछ बरस पहले घट गई थी, वह अब तेजी से बढ़ रही है। हालांकि कुछ मनोचिकित्सक 'एंटीडिप्रेशन ड्रग' के इस्तेमाल को भी जिम्मेदार ठहराते हैं।
हालांकि सरकारी आंकड़े कई बार सही नहीं होते। वैसे ही खुदकुशी करने वालों की संख्या पर भी यह बात लागू होती है। मगर भारतीय महानगरों में अखबारों की सुर्खियों पर नजर दौड़ाए तो यह बात बिल्कुल साफ है कि युवा हताश है। उसे हार मंजूर नहीं। परीक्षा अच्छा न जाए तो वह फांसी लगा लेता है। नौकरी छूट जाने पर बेकारी का शिकार हो जाए तो वह खुदकुशी कर लेता है। कर्ज के बोझ तले दबा व्यक्ति खुद को तो खत्म करता ही है, साथ में पूरे परिवार को भी मार देता है। यहां तक कि प्रेम संबंध में विफल युवा जहर खा लेता है। यानी असफलता किसी भी सूरत में मंजूर नहीं।
अवसाद से बचने के लिए अपने दिशा-निर्देश खुद तय करने होंगे। यह समय हैं अपनी चिंताओं को छोड़ अपने आप को खुश रखने का। जीवन में सफल होने के लिए खुश रहकर मेहनत करना सीखें। हमेशा पॉजिटिव सोचें। अपने दोस्तों और परिवार के संपर्क में रहें, उनके साथ समय बिताएं। ऐसा व्यक्ति जो अपने चेहरे पर स्माइल ला दें, आपके लिए 'परफेक्ट' है। याद रखें खाली दिमाग शैतान का घर होता है इसलिए अपने-आप को हमेश अपनी पसंद अनुसार किसी न किसी काम में व्यस्त रखें। ड्रग्स, अल्कोहल, सिगरेट व दूसरी नशीली चीजों से युवाओं को दूर रखने के लिए परिवार और समाज की भी अहम भूमिका है।

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