कबूतरों व पशु-पक्षिों के जरिए संदेशों के आदान-प्रदान वाले ुग से मौजूदा दौर तक के इलेक्ट्रॉनिक ुग का सफर बेहद दिलचस्प व उपलब्धिों भरा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिा मसलन, टी.वी., रेडिो व अन् माध्मों के लिए पत्रकारिता का र्का ग्लैमर व चुनौती से परिपूर्ण होने के साथ ही भारी धनार्जन का स्त्रोत भी है। आज के शिक्षित ुवक-ुवतिों का इलेक्ट्रॉनिक मीडिा के प्रति बढ़ता आकर्षण इस क्षेत्र की महत्त्वता को उजागर करता है। आप भी विधिवत प्रशिक्षण, प्रतिभा व परिश्रम के बलबूते टी.वी. पत्रकारिता की दुनिा के कामाब हस्ताक्षर बन सकते हैं।
तकनीकी व सूचना तंत्र के क्षेत्र में विस्तार ने एक नए रोजागारोन्मुखी विकल्प को जन्म दिा है। आधुनिक ुग में इलेक्ट्रॉनिक मीडिा से जुड़े तकनीकी पदों के लिए कुशल व दक्ष टी.वी. पत्रकारों व अन् सहोगिों की मांग में तेजी से इजाफा हुआ है। सैटेलाइट चैनलों की भरमार व प्रसारण संसाधनों के विस्तार ने इलेक्ट्रॉनिकत मीडिा के क्षेत्र में कैरिर की रोमांचक संभावनाओं को जन्म दिा है। आज दूरदर्शन के अलावा अन् चैनल, समाचार-विश्लेषण, समीक्षा, मनोरंजन व विज्ञान से जुड़े अनेक मामलों पर अपने र्काक्रमों का निर्माण व प्रसारण र्का कर रहे हैं। ऐसे में हिंदी तथा अंग्रेजी के अलावा अन् क्षेत्री भाषाओं में भी र्काक्रमों का निर्माण तीव्र गति से जारी है। फलस्वरूप इलेक्ट्रॉनिक मीडिा में प्रशिक्षित ुवक-ुवतिों की 'पूछÓ ही नहीं 'पूजÓ भी है।
मौजूदा दौर सूचना क्रांति का दौर है। आज वह सुविधाएं उपलब्ध हैं जब किसी भी राष्टï्री अथवा अन्तर्राष्टï्री महत्त्व की घटना की तत्काल जानकारी पूरी दुनिा में प्रसारित हो सकती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिा इस सबके लिए एक सशक्त व प्रभावी माध्म साबित हुआ है। ही कारण है कि अपनी सजीवता, तथत्मकता, प्रामाणिकता व समबद्धता के चलते सूचना संसाधनों की दौड़ में इलेक्ट्रॉनिक मीडिा ने परम्परागत प्रिंट मीडिा को लगबग पछाड़-सा दिा है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिा मसलन दूरदर्शन, रेडिो, वीडिो पत्रिकाओं व सैटेलाइट चैनलों के र्काक्रमों में कैरिर का ह ना क्षेत्र नब्बे के दशक से अस्तित्वमान हुआ और देखते-ही-देखते भारतभर में इलेक्ट्रॉनिक सूचना तंत्र का जाल बिछता चला गा। आज न केवल सम्पन्न शहरों अपितु सुदूरवर्ती ग्रामों तथा अविकास की पीड़ा से छटपटा रहे देहाती क्षेत्रों में भी इस तरह के र्काक्रम काफी लोकप्रि हैं।
वैसे तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिा के क्षेत्र में कई प्रकार के कैरिर स्थापित हैं। उदाहरणार्थ ग्राफिक आर्टिस्ट, तकनीकी डारेक्टर, पेंटर, सीरिल, फिल्म निर्देशक, फिल्म वीडिो संपादक, मेकअप सहाक, फ्लोर सहाक, कैमरामेन जैसे दर्जनों पद हैं परन्तु टी.वी. जर्नलिस्ट (संवाददाता-समाचार संपादक) बनना चुनौती से परिपूर्ण कैरिर क्षेत्र है। इस क्षेत्र की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात ह है कि इसमें सामाजिक व मानवी सरोकारों से जुडऩे का बेहतर अवसर उपलब्ध होता है।
सहनशील प्रवृत्ति, सकारात्मक सोच तथा कड़े परिश्रम का जज्बा रखने वाले ुवाओं के लिए इस क्षेत्र में प्रगति त है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिा के लिए र्का के अनिमित सत्र, खानपान में असंतुलन तथा अत्धिक तनाव होना लाजिमी है। अत: इन सबसे बचकर काम करने की इच्छा रखने वाले लोगों का हां सफल होना असंभव है। निर्माण पक्ष से जुड़े लोगों को तो कई मर्तबा र्काक्रम प्रसारण के वक्त तक रुके रहना पड़ता है। ही नहीं करेंट अफïेर्स तथा महत्त्वपूर्ण मामलातों की पड़ताल में जुटे रिपोर्टिंग स्टाफ को भी विशेष रूप से सक्रि रहना पड़ता है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिा के क्षेत्र में कैरिर बनाने के लिए अब सार्वजनिक सरकारी व निजी क्षेत्र में अनेक प्रशिक्षण केंद्र खुल चुके हैं। े संस्थान विभिन्न तरीके के सर्टिफिकेट तथा डिप्लोमा कोर्स संचालित करते हैं। स्नातक कर चुके ुवक-ुवतिां इस पाठï्क्रम में प्रवेश की पात्रता रखते हैं। प्रखत भारती जनसंचार संस्थान प्रिंट तथा ऑडिो-विजुअल में डिप्लोमा पाठï्क्रम संचालित करता है। इसके अतिरिक्त जामिा मिलिा इस्लामिा (नई दिल्ली) द्वारा भी दोनों माध्मों के लिए पाठï्क्रम संचालित किए जा रहे हैं।
हिंदी और अंग्रेजी भाषा में समाचार वाचन तथा एंकरिंग के पाठï्क्रम भी कुछेक संस्थान संचालित कर रहे हैं। कुछ संस्थान रेडिो पत्रकारिता के लिए प्रशिक्षण कोर्स चला रहे हैं। पत्रकारिता में डिप्लोमा अथवा अनुभव रखने वाले व्क्ति भी इस क्षेत्र में सफल हो सकते है। फिर भी साउंड, कैमरा और एडिटिंग जैसे तकनीकी र्काों के लिए ववसाकि प्रशिक्षण अति आवश्क होता है। टी.वी. तकनीक तथा निर्माण संबंधी र्काों के लिए विशिष्टï प्रशिक्षण देने वाले कई संस्थान देश में मौजूद हैं। इस क्षेत्र के लिए फिल्म एवं टी.वी. संस्थान, पुणे की भी खासी प्रतिष्ठïा है।
इसके अतिरिक्त दिल्ली स्थित निजी क्षेत्र के कई संस्थान भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिा के लिए बेहतर प्रशिक्षण उपलब्ध करा रहा हैं। मारवाह स्टूडिो, ड्रामा-सिने लिंक तथा टी.वी.-18 भी टी.वी. तकनीक से जुड़े अनेक पाठï्क्रमों को चला रहे हैं। इससे जुड़े अनेक पाठï्क्रमों की अवधि एक माह से लेकर एक साल तक है।
इन विधाओं में प्रशिक्षित व्क्ति दि नौकरी नहीं भी करना चाहें तो अनुबंध के आधार पर ा फ्रीलांसर के रूप में अपना काम करके भारी नाम व दाम कमा सकते हैं। आप अपना प्रॉडक्शन हाउस भी खोलकर बाकी लोगों के लिए नौकरी का जरिा साबित हो सकते हैं। ऑल इंडिा रेडिो, विदेशी रेडिो नेटवर्क, दूरदर्शन, प्राइवेट टी.वी. चैनल्स तथा स्वतंत्र टी.वी. प्रॉडक्शन कंपनिों में रोजगार की प्रचुर संभावनाएं होती हैं।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिा का कोर्स संचालित करने वाले विभिन्न संस्थानों के निदेशकों का दावा है कि इस सम कोई भी प्रशिक्षित ुवक-ुवती बेरोजगार नहीं है। सभी कहीं-न-कहीं र्का कर रहे हैं।
प्रशिक्षण संस्थान
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटï्ूट ऑफ इंडिा, पुणे (महाराष्टï्र)
डिप्लोमा इन फिल्म डारेक्शन, एडिटिंग, मोशन पिक्चर फोटोग्राफी, साउंड रिकार्डिंग एंड साउंड इंजीनिरिंग, डिग्री इन फिल्म डारेक्शन, अंग्रेजी समाचार वाचन।
भारती जनसंचार संस्थान, जे.एन.ू. परिसर, नई दिल्ली- 110067
रेडिो और टी.वी. पत्रकारिता के लिए स्नातकोत्तर पाठï्क्रम, हिंदी/अंग्रेजी समाचार वाचन (टी.वी.)
ड्रामा सिने लिंक, एम. 161/1 जी.एल. हाउस, इंडिन ऑल भवन के पीछे, ुसुफ सरा, नई दिल्ली- 110049
अभिन, टी.वी. जर्नलिज्म (तीन-तीन माह), फिल्म डारेक्शन (6 माह), एन्करिंग (एक माह), फिल्म नृत् (एक माह) व मॉडलिंग (शैक्षिक अहर्ता 10+2) अभिन)
जामिा मिलिा इस्लामिा विश्वविद्याल, नई दिल्ली एम.ए. (जनसंचार)
जामिा जनसंचार शोध केंद्र, जामिानगर, नई दिल्ली
जनसंचार में पी.जी. डिग्री (रेडिो, टी.वी., फिल्म प्रोडक्शन आदि)
एशिन अकादमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, मारवाह स्टूडिो, फिल्म सिटी, नोएडा 201301 (उ.प्र.0
प्रोडक्शन डारेक्शन एंड टी.वी. जर्नलिज्म, कैमरा एंड लाइटिंग टेक्नीक्स, एडिटिंग एंड साउंड रिकार्डिंग, एक्टिंग एंड प्रेजेंटेशन