समुद्री क्षेत्र में संरक्षण की दिशा में कार्यरत मरीन कंजर्वेशनिस्ट

धरती के बढ़ते तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पर्यावरण को भारी नुक्सान पहुंच रहा है। इसका काफी प्रभाव समुद्री जीवन पर भी हो रहा है। समुद्र का स्तर बढऩे तथा तापमान एवं ज्वार-भाटों में बदलाव से जीवों की कई प्रजातियों में भी अनेक प्रकार के नुक्सानदायक बदलाव नजर आ रहे हैं। इस सबसे एक चिंताजनक स्थिति पैदा हो चुकी है जिस वजह से अब संरक्षण के क्षेत्र के प्रति लोगों में जागरूकता बढऩे लगी है। समुद्र संबंधी क्षेत्र में संरक्षण की दिशा में काम करने  वालों को मरीन कंजर्वेशनिस्ट के रूप में जाना जाता है।

फील्ड में काम सर्वाधिक महत्वपूर्ण
संरक्षण किसी भी तरह का हो, चाहे वन्यजीवों से जुड़ा या समुद्री जीवन से जुड़ा, उसमें सफलता प्राप्त करने के लिए फील्ड में जाकर प्रकृति से जुड़े मुद्दों पर जमीनी स्तर पर काम करना लाजमी है।

संरक्षण के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने वाले प्रेरणादायक व्यक्तित्वों में से एक हैं दीपक आप्टे। 12वीं कक्षा में फेल होने के बाद उनके पास जब करने के लिए कुछ नहीं बचा तो वह शंखों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए निकल पड़े। उन्होंने साइकिल पर 2 हजार किलोमीटर का सफर करके शंखों के बारे में जितनी हो सकी जानकारी जुटाई। आज वह बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बी.एन.एच.एस.) में चीफ ऑप्रेटिंग अफसर हैं।

आज वह अपने जीवन के उस दौर को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं जब उन्हें अपने अंतर्मन की सुनने तथा उस करियर को अपनाने का अवसर मिला जिसके लिए आज वह कुछ भी कर सकते हैं। शंख के बारे में जुटाई अपनी जानकारी को उन्होंने बाद में एक पुस्तक का रूप भी दिया।

साइकिल ट्रिप से हासिल आत्मविश्वास के बाद उन्होंने जूलॉजी में ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी की। फिर मरीन बायोलॉजी में पोस्ट ग्रैजुएशन की जिसके बाद वह बी.एन.एच.एस. से जुड़ गए जो भारतीय उपमहाद्वीप की सर्वाधिक विशाल तथा पुरानी गैर-सरकारी संस्था है।

इस संगठन में पहले 10 साल उन्होंने बतौर एजुकेशन अफसर काम किया तब उन्हें बच्चों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने का अवसर मिला। इस काम के दौरान उन्हें अपने सम्प्रेषण कौशल को निखारने में भी मदद मिली।

कंजर्वेशन अफसर के तौर पर पदोन्नति मिलने के पश्चात उन्होंने लोगों तथा विभिन्न संगठनों के साथ मिल कर संरक्षण की दिशा में काम किया। उन्होंने अनेक परियोजनाओं को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। उनका कहना है कि आज अनेक समुद्री जीवों तथा वनस्पतियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है जिनके संरक्षण के लिए अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है।

मरीन कंजर्वेशनिस्ट का कार्यक्षेत्र
मरीन कंजर्वेशनिस्ट महासागरों तथा समुद्री जीवों तथा पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित बनाते हैं। उन्हें मरीन साइंस का गहन ज्ञान होना चाहिए, साथ ही साथ उन्हें समुद्र पर निर्भर लोगों की जरूरतों तथा प्राथमिकताओं की भी जानकारी होनी चाहिए। उन्हें इससे जुड़े आर्थिक पहलुओं, कानूनों तथा नीतियों की जानकारी भी होनी चाहिए। समुद्री जीवों तथा सम्पूर्ण पारिस्थितिकी के संरक्षण की दिशा में प्रभावी रूप से काम करने में ये सारा ज्ञान तथा जानकारी मरीन कंजर्वेशनिस्ट्स के लिए बेहद सहायक साबित होती है।

पारिश्रमिक
किसी गैर-सरकारी संगठन के लिए कार्य करने वाले युवा शुरूआत में प्रतिमाह 10 हजार रुपए तक प्राप्त कर सकते हैं। इस क्षेत्र में काम करने वालों की तनख्वाह उनके कार्य तथा नियोक्ता पर निर्भर करती है। वैसे उच्च स्तर तथा पदों पर कार्य करने वाले प्रतिमाह 1 लाख रुपए से भी अधिक पारिश्रमिक अर्जित कर सकते हैं।

योग्यता
इस क्षेत्र में करियर बनाने की चाह रखने वाले छात्रों को 11वीं-12वीं कक्षाओं में बॉटनी, जूलॉजी तथा कैमिस्ट्री विषयों का अध्ययन करना चाहिए। ग्रैजुएट एवं पोस्ट ग्रैजुएट स्तर पर उन्हें बायोलॉजी अथवा इकोलॉजी का अध्ययन करने की सलाह दी जाती है। पर्यावरणीय एवं समुद्रीय कानूनों की जानकारी, समुद्र संबंधी आर्थिक पहलुओं एवं नीतियों के बारे में जागरूकता भी उन्हें हासिल करनी चाहिए। इस जानकारी की सहायता से वे सरकारों को प्रभावित कर सकते हैं या उन्हें मना सकते हैं कि वे अपने नीति-निर्माण में ऐसे बदलाव लाएं कि समुद्रीय संरक्षण को प्रोत्साहित किया जा सके तथा समुद्र पर निर्भर लोगों का भी कल्याण हो सके।

प्रमुख संस्थान
डिपार्टमैंट ऑफ मरीन साइंस, गोवा यूनिवर्सिटी

डिपार्टमैंट ऑफ मरीन साइंस, यूनिवर्सिटी ऑफ कलकत्ता

टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुम्बई

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