एक
बार अगर आपने मानव शरीर पा लिया तो आपके पास स्वतंत्र इच्छा नामक एक
दुर्लभ क्षमता होती है जिससे विकास के आगे की प्रक्रिया शुरू होती है।
शारीरिक वयस्कता के उलट भावनात्मक विकास आपके अपने हाथों में होता है।
आंतरिक परिपक्वता की प्रक्रिया आपको स्वयं शुरू करनी होती है। जो 4
सार्वभौम छोर मनुष्य छूने का प्रयास करता है वे हैं सुरक्षा, आनंद, अर्थ और
कर्म। मनुष्य अन्य 2 पुरुषार्थों धर्म और मोक्ष को भी प्राप्त कर सकते
हैं।
अर्थ उसे कहा जाता है जो भावनात्मक, आर्थिक या सामाजिक सुरक्षा देता है। आनंद की खोज एक अन्य पुरुषार्थ है जिसे संस्कृत में काम कहा जाता है। यह भी कई प्रकार का होता है जैसे इंद्रीय प्रसन्नता, सी-फूड से लेकर आइसक्रीम तक कुछ भी हो सकती है। धर्म न तो अर्थ है और न ही कर्म। यह सामंजस्य से उपजता है, मित्रता से, बांटने से, दूसरों की सहायता करने से मिलता है।
धर्म आपकी परिपक्वता पर निर्भर है। आप जितने परिपक्व होंगे उतने ही धार्मिक होंगे। परिपक्व होने के लिए धर्म की समझ और अनुरूपता व्यक्ति के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। इस प्रकार इन तीनों छोरों में से धर्म सबसे प्रथम स्थान पा लेता है। धर्म का उल्लंघन किए बिना जो होना चाहिए वही करके आप अर्थ, काम, सुरक्षा और आनंद को प्राप्त करते हैं।
अर्थ उसे कहा जाता है जो भावनात्मक, आर्थिक या सामाजिक सुरक्षा देता है। आनंद की खोज एक अन्य पुरुषार्थ है जिसे संस्कृत में काम कहा जाता है। यह भी कई प्रकार का होता है जैसे इंद्रीय प्रसन्नता, सी-फूड से लेकर आइसक्रीम तक कुछ भी हो सकती है। धर्म न तो अर्थ है और न ही कर्म। यह सामंजस्य से उपजता है, मित्रता से, बांटने से, दूसरों की सहायता करने से मिलता है।
धर्म आपकी परिपक्वता पर निर्भर है। आप जितने परिपक्व होंगे उतने ही धार्मिक होंगे। परिपक्व होने के लिए धर्म की समझ और अनुरूपता व्यक्ति के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। इस प्रकार इन तीनों छोरों में से धर्म सबसे प्रथम स्थान पा लेता है। धर्म का उल्लंघन किए बिना जो होना चाहिए वही करके आप अर्थ, काम, सुरक्षा और आनंद को प्राप्त करते हैं।