आशाओं के कैनवस पर स्वर्णिम भविष्य के चित्र-ललित कला


मूर्ति शिल्प, ड्रइंग, पेंटिंग, एप्लाइड आर्ट आदि फाइल आट्ïर्स या ललित कलाओं की श्रेणी में आते हैं। तेजी से परिवर्तित होते दौर में विकसित विधाओं तथा प्रोडक्ट डिजाइन, फोटोग्राफी, इंटीरियर डेकोरेशन तथा टेक्सटाइल डिजाइन की कलात्मकता को स्वीकार करने के बाद इन्हें भी ललित कला की एप्लाइड आर्ट या कमर्शियल शाखा में शुमार कर लिया गया है। कला रूप से संबंद्ध होने के बावजूद ये समस्त पाठ्ïयक्रम विशुद्धत: रोजगारोन्मुखी हैं। इन क्षेत्रों में आप अपने स्वर्णिम भविष्य के चित्र निर्मित कर सकते हैं।
संचार माध्यमों के चहुंमुखी विकास के साथ ललित कला के क्षेत्र में भी नूतन का्रंति का सूत्रपात हुआ। यही वजह है कि आज ललित कलाओं में पारंगत व्यक्ति स्वतंत्र कलाकार कम और कमर्शियल आर्ट के क्षेत्र में बहुत अधिक हैं। कमर्शियल आर्टिस्ट के पास काम व दाम दोनों की भरमार होती है। परंपरागत नौकरी की लीक से हटकर आज बहुत से युवक-युवतियां बेहद थोड़े से प्रयासों के उपरांत ललित कला क्षेत्र के सफलतम हस्ताक्षर हैं। बतौर कैरियर ललित कलाओं की इन दोनों विद्याओं में शानदार सफलता की असीम संभावनाएं मौजूद हैं। एक बार आपके नाम का सिक्का चला नहीं कि शोहरत, दौलत आपके कदम चूमेगी। इस क्षेत्र में प्रशिक्षित युवाओं को फिल्म टेलीविजन और आर्ट स्टूडियों से लेकर विज्ञापन, प्रकाशन तथा प्रचार माध्यमों में अच्छे अवसर मिल सकते हैं। यही नहीं फैशन हाउस, होटल तथा कंपनी के बड़े शो-रूमों में भी समय-समय पर कलाकारों की आवश्यकता पड़ती रहती है। यहां इनसे इंटीयर डेकोरेशन के अलावा मूर्तियां, चित्र या भित्ति सज्जा का काम लिया जाता है।
ललित कलाओं की कम पेशेवार शाखा में चित्रकार और मूर्तिकार का काम आता है। एक चित्रकार विविध चित्र, दृश्य चित्र तथा भित्तिचित्र व विभिन्न डिजाइनों का निर्माण करता है। चित्रकार अनेक माध्यमों की मदद से विभिन्न कोणों के तथा विविध पृष्ठïभूमि पर चित्रों का निर्माण करता है जबकि मूतिकार पत्थर, धातु लकड़ी और मॉडलिंग क्ले (मिट्टïी) के जरिए विभिन्न स्मारिकाएं तथा मूर्तियां निर्मित करता है। आजकल मूर्ति शिल्प में लगे लोग तो सीमेंट, कंक्रीट, प्लास्टिक, फाइबर ग्लास, प्लास्टर ऑफ पेरिस आदि का भी बहुतायत में प्रयोग कर रहे हैं। कमर्शियल आर्ट में मुख्यत: विज्ञापन और पैकेजिंग के लिए डिजाइन तैयार करना तथा विजुअल्स रचनाएं बनाना सम्मिलित हैं। एक कुशल डिजाइनर तकनीकी सूझबूझ और व्यावसायिक हुनर के साथ जरूरत के अनुसार डिजाइन तैयार करता है। इस काम के बेहतरीन तरीके से संपन्न करने के लिए डिजाइनर, तकनीकी विशेषज्ञ तथा कारोबार से जुड़े लेागों की दक्ष टीम उसकी मदद करती है।
ग्राफिक डिजाइनर का कार्य दृश्य रचना, लेखन, प्रतीक (लोगों) तथा चित्रांकन (इलेक्ट्रेशन) आदि होता है। फोटोग्राफी के कार्य को भी इससे अलग करके नहीं देखा जा सकता, क्योंकि अनेक बार किसी उत्पाद की विज्ञापन फिल्म बनाने का काम भी इन्हें सौंप दिया जाता है। सूचना विशेष को टेलीविजन पर प्रस्तुत करने से लेकर पैकेजिंग, विज्ञापन और प्रचार आदि का काम भी ग्राफिक डिजाइनर के ही सुपुर्द होता है।
व्यक्तिगत अभिरूचि तथा लगन के बलबूते इस क्षेत्र की बुलंदियों को स्पर्श किया जात सकता है। प्रतिभा, मौलिकता और रचनात्मकता को और भी अधिक धारदार तथा सटीक बनाने का कार्यकुशल प्रशिक्षण दिया जाता है। वैसे तो आप किसी विशेषज्ञ की देखरेख व मार्गदर्शन में अपनी कलात्मक संभावनाओं को पैनापन प्रदान कर सकते हैं लेकिन संस्थान में एक ही परिवेश में विधिवत्ï रूप से अनेक विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण का कोई मुकाबला नहीं है।
देशभर में अनेक संस्थान ललित कला में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री कार्स संचालित कर रहे हैं। 10+2 युवक-युवतियां इन कोर्सो में प्रवेश ले सकते हैं। बैचलर डिग्री कार्स (बी.एफ.ए.) की पाठ्ïयक्रम अवधि चार वर्ष है। सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कार्स कम समय में भी किए जा सकते हैं। बी. एफ. ए. करने के बाद मास्टर ऑफ फाइन आट्ïर्स (एम.एफ.ए.) दो वर्ष में किया जा सकता है। बी. एफ. ए. में विशेषज्ञता के लिए चित्रकारी, मूर्तिकलाद्व धातु शिल्प, मृतिका कला, टेक्सटाइल डिजाइन, भित्ति शिल्प, इंटीयर डेकोरेशन तथा फोटोग्राफी जैसे संकायों में अध्ययन किया जाता है। यहां यह जान लेना बेहद जरूरी है कि जो विषय हम बी.एफ. ए. में लेते हैं उन्हीं के साथ एम.एफ.ए. किया जा सकता है।
प्रशिक्षण संस्थान
नेशनल इंस्टीट्ïयूट ऑफ डिजाइन, पालडी, अहमदाबाद-380007
नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, जयपुर हाउस, नई दिल्ली
राजकीय कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ (उ.प्र.)
जामिया मिलिया इस्लामिया, जामिया नगर, नई दिल्ली-25
ललित कला महाविद्यालय, 20-22 तिलक मार्ग, नई दिल्ली-110001

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