आनुवंशिक इंजीनियरी के नये आयाम


1980 के दशक में अनुसंधानकर्ताओं ने किसी विशेष जीन को एक जीवधारी से दूसरे जीवधारी में स्थानांतरित करने के लिए आवश्यक साधन विकसित कर लिए। इससे जीन प्राप्त करने वाले जीवधारी में मनचाहे गुणों का डालना संभव होगया। यह सफलता इंजाइमों की खोज से संभव हुई जिनका इस्तेमाल आणविक  कैंची के रूप में डीएनए श्रंखला के किसी खास बिन्दु पर जीन के हिस्से की कांट-छांट के लिए किया जाता है। इसके बाद कई अन्य इंजाइम खोजे जा चुके हैं और इनका वर्गीकरण भीकिया जा चुका है।
काटे गए जीन खंड को किसी दूसरे जीवधारी की डीएनए श्रंखला में चिपका कर प्राप्तकर्ता में वांछित गुण उत्पन्न किए जा सकते हैं। डीएनए को जोडऩे की इस तकनीक को रीकांबिनेंट डीएनए टैक्नोलॉजी  (क्र-ष्ठहृ्र) कहा जाता है।
सामान्य पौधों को उगाने में दो किस्मों के संकरण में वांछित गुणों वाला नया पौधा बनाया जा सकता है। इस विधि में भी जीन्स का स्थानान्तरण होता है मगर यह अनियंत्रित तरीके से होता है। यहां स्थानांतरित जीन व जीन होता है, जिसके जरिए हम कोई खास गुण उत्पन्न करना चाहते हैं। रीकाम्बिनेंट डीएनए टेक्नोलॉजी (पुनसंयोजित डीएनए तकनीक) में यह प्रक्रिया बड़े नपे-तुले  तरीके से संचालित होती है। इसमें सबसे पहले किसी खास गुण को उत्पन्न करने वाले जीन की पहचान की जाती है। इसके बाद इसे काट कर दूसरे जीव में चिपका या संयोजित कर दिया जाता है। रीकाम्बिनेंट डीएनए टेक्नोलॉजी इस शताब्दी की सबसे सशक्त टेक्नोलॉजी में से एक है।
सैद्धांतिक रूप से इस टेक्नोलॉजी की कोई सीमा नहीं है। हम किसी भी जीव के जीन को काट कर दूसरे जीव में लगा सकते हैं इस तरह मानव जीव को काट कर किसी पौधे के डीएनए में लगाया जा सकता है ओर पौधे के जीन को मनुष्य या किसी जन्तु में लगाना भी संभव है। असल में यही इस टेक्रोलॉजी की खूबी भी हैऔर इसकी खतरनाक बात भी यही है। प्रकृति में जीन म्यूटेशन यानीआनुवंशिक संरचना में बदलाव बड़ा ही दुर्लभ होता है यही कारण है कि सैकड़ों-हजारों वर्ष तक जीवधारियों के गुण बदलते नहीं है और ज्यों के त्यों बने रहते हैं। अगर कोई परिवर्तन होते भी हैं तो उनकी रफ्तार बेहद धीमी होती है। इसी कोहम उद्ïविकास या इवोल्यूशन कहते हैं। दूसरी और रीकाम्बिनंट डीएनए तकनीक में किसी जीवधारी की मौलिक आनुवशिंक संरचना में नए जीन को प्रवेश करा कर उद्ïविकास शुरू हो जाता जिसे प्राकृतिक रूप से होने में लाखों-करोड़ों वर्ष लगते इस टेक्रोलॉजी के निर्बाध उपयोग से प्रकृति में आनुवंशिक रूप में परिवर्तित जीवधारी बड़ी तादादमें बन सकते हैं। नये गुणों वाले इन जीवधारियों से हमारे पर्यावरण या परिस्थितिकी पर क्या असर पड़ेगा। यह कोई नहीं जानता, प्रकृति के तमाम नियमों को तोड़कर बनाई गई इन प्रजातियों के विकास के बाद प्रकृति हमारा साथ देती रहेगी, इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती है। इस टैक्रोलॉजी के साथ जैव सुरक्षा की यह चिपकी लगाना बेहद जरूरी है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि आनुवांशिक हेरफेर से बनाए गए ट्रांसजैनिक पौधे पर्यावरण में किस तरह रहेंगे। इसका कोई सामान्य अनुमान नहीं लगाया जा सकता। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, जीन स्थानांतरण की प्राकृतिक बाधाओं  को तोड़कर आनुवांशिक सामग्री को एक जीवधारी से दूसरे में पहुंचाकर ट्रांसजेनिक नस्ल विकसित की जाती है। इस प्रक्रिया में किसी पौधे से बिल्कुल असंबद्घ कुछ खास गुणों के लिए जीन कोडिंग जीनोम का अनिवार्य हिस्सा बन जाती है। इससे व्यवहार संबंधी ऐसे नये बदलाव आ सकते हैं जिनका कम अवधि में अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
किसी विशिष्टï आनुवांशिक गुणवाली नस्ल का जब उसी नस्ल के अन्य प्रजातियों से संकरण किया जाता है तो उसके गुणों में बदलाव आ सकते हैं। हांलाकि जीन एक समान हो सकते हैं। मगर अलग-अलग प्रजातियों में भिन्न-भिन्न गुण आ सकते हैं। पर्यावरण का भी इन पर बड़ा गहरा असर पड़ता है। इसलिए एक ट्रांसजेनिक पौधों के गुणों के मूल्यांकन के जो नतीजे मिलते हैं वे दूसरे पर्यावरण में गलत सिद्घ हो सकते हैं।
दूसरा प्राकृतिक खतरा पर-पराग (क्रॉस पॉलीनेशन) से पैदा होता है। फूलों को पराग हवा या परागण में सहायक कीड़े-मकौड़ों के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाता है। यह देखा गया है कि स्वाभाविक तरीके में जो जीन सुरक्षित माने जाते हैं, कृत्रिम रूप से उन्हें दूसरे पौधे में स्थापित करने से वे खतरनाक साबित हो सकते हैं। इस तरह से स्थानांतरित जीन अब किसी फसल, खरपतवार और किसी अवांछित पौधे में पहुंच जाते हैं तो इससे सुरक्षा का खतरा पैछा हो जाता है।
हांलाकि जीन परिवर्तन से तैयार ट्रांसजेनिक पौधों के कुछ खतरे हैं, मगर दुनियाभर में इसके आंकलन के प्रयास जारी हैं। चीन दुनिया का पहला देश है जिसने 1990 के दशक के प्रारंभ में ही तम्बाकू और टमाटर में कृत्रिम रूप सेजीन संशोधन कर ऐसी किस्म तैयार कर ली थी जिस पर वायरस का असर नहीं होता। अमरीका व्यवसायिक उत्पादन के लिए जीन परिवर्तन से तैयार फसलों की कई किस्मों की स्वीकृति दे चुका है।  कई देश इस तरह की किस्मों का खेतों में परीक्षण कर रहे हैं और इसके नतीजे धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं।
भारत भी इसका अपवाद नहीं है। यहां 1995 के शुरू में ट्रांसजेनिक किस्मों का खेतों में परीक्षण शुरू हुआ। देश भर के कई अनुसंधान केन्द्रों में यह कार्य चल रहा है। वैज्ञानिक इस किस्म के कपास सरसों और धान के विकास के लिए प्रयत्नशील हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर में खाद्य वैक्सीन यानि खाने योग्य टीका तैयार करने के लिए जीन परिवर्तन करके ट्रांसजेनिक टमाटर का विकास किया जा रहा है। इन सब क्षेत्रीय परीक्षणों के नतीजों पर बड़ी सावधानी से निगाह रखी जा रही है और शीघ्र ही भारतीय किसानों को बुआई के लिए जीन में परिवर्तन करके बनाए गए बेहतर किस्म के बीज मिलने लगेंगे।
फिलहाल ट्रांसजेनिक पौधे से संभावित खतरे के बारे में विशुद्घ वैज्ञानिक तरीके से विचार किया जा रहा है। मगर कई मुद्दे ऐसे भी हैं जिनके राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक और नैतिक पहलू भी हैं। यूरोपीय देशों के बाजारों में प्राकृतिक रूप से उगाई जाने वाली फसलों की मांग जिस तरह से बढ़ रही है उससे इस बात का संकेत मिलता है कि जीन में फेरबदल से तैयार पौधों, खासकर मानव आहार में काम आने वाली फसलों की गुणवत्ता को लेकर संदेह उत्पन्न होने लगा है।
मगर लगातार बढ़ती आबादी, विशेष रूप से विकासशील देशों की बेतहाशा बढ़ती आबादी की वजह से गुणवत्ता को लेकर समझौता करने की नौबत आ सकती है। भूखे व्यक्ति के लिए अच्छा-बुरा कुछ नहीं होता, उसे तो खाने के लिए कुछ चाहिए। पर्यावरण आंदोलन से जुड़े एक कार्यकर्ता के अनुसार आने वाले वर्षों मेंतीसरी दुनिया के कररोड़ों लोगों को ट्रांसजेनिक उत्पादों के असर के परिणाम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
वैसे वैज्ञानिक इस दृष्टिïकोण से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि जो आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं या तो उनका सत्यापन नहीं हो सकता या फिर उनके सत्यापन में लम्बा अरसा लग सकता है लिहाजा इस शताब्दी की इस सबसे शक्तिशाली और नई टेक्रोलॉजी का फायदा उठाने में लागत-लाभ समीकरण जैसी कोई बात आड़े नहीं आनी चाहिए।
बायोटेक्रोलॉजी का क्षेत्र अपार संभावनाओं से भरा हुआ है। इसके उपयोग के बारे में अलग-अलग दृष्टिïकोण हो सकते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि परीक्षण और तर्क से आशंकाओं तथा भ्रम को दूर किया जाए।

Post a Comment

Previous Post Next Post
संस्कार News
संस्कार News

🎧 LIVE FM RADIO




🔊 Volume