जब बादल गरजने लगते हैं तो स्टीफन थर्न की नजरें तुरंत अपने
कम्प्यूटर पर गड़ जाती हैं। यह इलैक्ट्रीकल इंजीनियर तुरंत जानना चाहते
हैं कि कहीं आसमानी बिजली गिराने वाला तूफान तो आने वाला नहीं है। उनकी
तकनीक ने उन्हें कभी निराश नहीं किया है। वह बहुराष्ट्रीय इलैक्ट्रॉनिक्स
कम्पनी सीमन्स की ‘द लाइटनिंग सर्विस’ नामक जर्मन फर्म के प्रमुख हैं जो
जर्मनी में प्रतिवर्ष औसतन 10 लाख बार आसमानी बिजली के कौंधने को दर्ज करती
है। फर्म का जर्मन नाम ‘ब्लित्जडेन्स्ट’ है। जर्मन भाषा में ‘ब्लित्ज’ का
अर्थ बिजली कौंधना होता है।
जर्मनी भर में स्थापित 16 निगरानी केंद्र देश में बिजली कौंधने की सभी घटनाओं को दर्ज करने के लिए काफी हैं। अपनी सहयोगी कम्पनियों के साथ मिल कर सीमन्स यूरोप में ऐसे कुल 150 निगरानी केंद्र चला रही है। इन आंकड़ों की जरूरत इलैक्ट्रिसिटी कम्पनियों, हवाई अड्डों, बीमा कम्पनियों एवं सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजकों को पड़ती है जो इस सूचना के लिए फर्म को फीस देते हैं।
आसमानी बिजली को दर्ज करना सरल है। इसकी हर कौंध के साथ इलैक्ट्रॉमैग्नेटिक तरंगें पैदा होकर तेज रफ्तार से सभी दिशाओं में फैल जाती हैं। आसमानी बिजली की निगरानी करने वाले केंद्र इन तरंगों को 600 किलोमीटर दूर से भी पहचान सकते हैं। स्टीफन के अनुसार इन्हें और भी दूरी से दर्ज किया जा सकता है। वह पुर्तगाल के आकाश में चमकने वाली बिजली की कौंध को जर्मनी के कार्लरुहे निगरानी केंद्र से दर्ज कर चुके हैं।
जब आसमानी बिजली को कम से कम दो केंद्रों में दर्ज किया जाता है तो उनके समय तथा दूरी का आकलन करके स्थान का पता लग जाता है। जितने अधिक निगरानी केंद्र होंगे आसमानी बिजली के कौंधने के स्थान का पता उतनी ही सटीकता से लगाया जा सकता है। फिलहाल फर्म की सटीकता 200 से 700 मीटर तक है। बिजली कौंधने के स्थान में सबसे अधिक रुचि ओवरहैड पावर लाइन ऑप्रेटर्स को होती है। उनकी कोई तार टूटते ही वह जानना चाहते हैं कि इसकी वजह कहीं आसमानी बिजली का गिरना या पेड़ का गिरना तो नहीं है। यदि इलाके में बिजली गिरने की पुष्टि हो जाए तो तारों को जल्द से जल्द जोड़ा जा सकता है जबकि पेड़ गिरने की सूरत में उसे ठीक करने में अधिक समय लगता है।
बीमा कम्पनियां बिजली गिरने से होने वाले नुक्सान के दावों की पड़ताल के लिए इस सूचना की मदद लेते हैं। अक्सर आसमान से गिरने वाली बिजली की वजह से सीधा नुक्सान नहीं होता है बल्कि इसकी वजह से वोल्टेज में होने वाली अत्यधिक वृद्धि के कारण होता है। इससे अढ़ाई किलोमीटर के दायरे में विद्युत उपकरणों में शॉर्ट-सर्किट हो सकता है।
जर्मनी में हर साल बिजली गिरने से होने वाले नुक्सान के 3 से 5 लाख दावे किए जाते हैं। दावों की राशि करीब 25 अरब रुपए होती है। बीमा कम्पनियां ‘द लाइटनिंग सर्विस’ से हासिल बिजली गिरने की घटनाओं के आंकड़ों की जांच करके तुरंत पता लगा लेती हैं कि दावा असली है या फर्जी।
वैसे फर्म केवल आसमानी बिजली की कौंध को दर्ज ही नहीं करती है, उसके आंकड़े चेतावनी जारी करने के काम भी आते हैं। कम्पनी के अनेक ग्राहक हैं जिन्हें समय रहते इलाके में बिजली चमकने या तूफान आने की पूर्व सूचना मिलती है और वे अपने बिजली के उपकरणों को बंद करके नुक्सान होने से बच जाते हैं।
गत कुछ वर्षों से फर्म बिजली के कौंधने के आंकड़ों को अन्य मौसमी आंकड़ों के साथ जोड़ कर तूफानों के मार्ग का बेहतर ढंग से पता लगाने पर काम कर रही है। यह जानकारी विशाल सार्वजनिक आयोजनों के वक्त विशेष रूप से काम आती है जिनके आयोजक समय रहते किसी तूफान के बारे में जान लेना चाहते हैं ताकि सुरक्षा के लिए जरूरी तैयारी हो सके या लोगों को आयोजन स्थल से समय रहते सुरक्षित ढंग से हटाया जा सके।
अभी तक स्टीफन अपनी फर्म के आंकड़ों से यह निर्धारित नहीं कर सके हैं कि पहले की तुलना में अधिक शक्तिशाली आसमानी बिजली पैदा करने तथा गिराने वाले तूफानों की वजह जलवायु परिवर्तन है। औसतन कोई न कोई जर्मन इलाका वर्ष के 16 से 36 दिन बिजली युक्त तूफान का सामना करता है। इनमें से 95 प्रतिशत मई से सितम्बर महीनों के दौरान आते हैं। जर्मनी के पहाड़ी इलाकों में मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक बिजली कड़कती तथा गिरती है। आसमानी बिजली बड़े वृक्षों, चिमनियों एवं इमारतों पर गिर सकती है परंतु जर्मनी में पवन चक्कियों को यह सबसे अधिक निशाना बनाती है।
जर्मनी भर में स्थापित 16 निगरानी केंद्र देश में बिजली कौंधने की सभी घटनाओं को दर्ज करने के लिए काफी हैं। अपनी सहयोगी कम्पनियों के साथ मिल कर सीमन्स यूरोप में ऐसे कुल 150 निगरानी केंद्र चला रही है। इन आंकड़ों की जरूरत इलैक्ट्रिसिटी कम्पनियों, हवाई अड्डों, बीमा कम्पनियों एवं सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजकों को पड़ती है जो इस सूचना के लिए फर्म को फीस देते हैं।
आसमानी बिजली को दर्ज करना सरल है। इसकी हर कौंध के साथ इलैक्ट्रॉमैग्नेटिक तरंगें पैदा होकर तेज रफ्तार से सभी दिशाओं में फैल जाती हैं। आसमानी बिजली की निगरानी करने वाले केंद्र इन तरंगों को 600 किलोमीटर दूर से भी पहचान सकते हैं। स्टीफन के अनुसार इन्हें और भी दूरी से दर्ज किया जा सकता है। वह पुर्तगाल के आकाश में चमकने वाली बिजली की कौंध को जर्मनी के कार्लरुहे निगरानी केंद्र से दर्ज कर चुके हैं।
जब आसमानी बिजली को कम से कम दो केंद्रों में दर्ज किया जाता है तो उनके समय तथा दूरी का आकलन करके स्थान का पता लग जाता है। जितने अधिक निगरानी केंद्र होंगे आसमानी बिजली के कौंधने के स्थान का पता उतनी ही सटीकता से लगाया जा सकता है। फिलहाल फर्म की सटीकता 200 से 700 मीटर तक है। बिजली कौंधने के स्थान में सबसे अधिक रुचि ओवरहैड पावर लाइन ऑप्रेटर्स को होती है। उनकी कोई तार टूटते ही वह जानना चाहते हैं कि इसकी वजह कहीं आसमानी बिजली का गिरना या पेड़ का गिरना तो नहीं है। यदि इलाके में बिजली गिरने की पुष्टि हो जाए तो तारों को जल्द से जल्द जोड़ा जा सकता है जबकि पेड़ गिरने की सूरत में उसे ठीक करने में अधिक समय लगता है।
बीमा कम्पनियां बिजली गिरने से होने वाले नुक्सान के दावों की पड़ताल के लिए इस सूचना की मदद लेते हैं। अक्सर आसमान से गिरने वाली बिजली की वजह से सीधा नुक्सान नहीं होता है बल्कि इसकी वजह से वोल्टेज में होने वाली अत्यधिक वृद्धि के कारण होता है। इससे अढ़ाई किलोमीटर के दायरे में विद्युत उपकरणों में शॉर्ट-सर्किट हो सकता है।
जर्मनी में हर साल बिजली गिरने से होने वाले नुक्सान के 3 से 5 लाख दावे किए जाते हैं। दावों की राशि करीब 25 अरब रुपए होती है। बीमा कम्पनियां ‘द लाइटनिंग सर्विस’ से हासिल बिजली गिरने की घटनाओं के आंकड़ों की जांच करके तुरंत पता लगा लेती हैं कि दावा असली है या फर्जी।
वैसे फर्म केवल आसमानी बिजली की कौंध को दर्ज ही नहीं करती है, उसके आंकड़े चेतावनी जारी करने के काम भी आते हैं। कम्पनी के अनेक ग्राहक हैं जिन्हें समय रहते इलाके में बिजली चमकने या तूफान आने की पूर्व सूचना मिलती है और वे अपने बिजली के उपकरणों को बंद करके नुक्सान होने से बच जाते हैं।
गत कुछ वर्षों से फर्म बिजली के कौंधने के आंकड़ों को अन्य मौसमी आंकड़ों के साथ जोड़ कर तूफानों के मार्ग का बेहतर ढंग से पता लगाने पर काम कर रही है। यह जानकारी विशाल सार्वजनिक आयोजनों के वक्त विशेष रूप से काम आती है जिनके आयोजक समय रहते किसी तूफान के बारे में जान लेना चाहते हैं ताकि सुरक्षा के लिए जरूरी तैयारी हो सके या लोगों को आयोजन स्थल से समय रहते सुरक्षित ढंग से हटाया जा सके।
अभी तक स्टीफन अपनी फर्म के आंकड़ों से यह निर्धारित नहीं कर सके हैं कि पहले की तुलना में अधिक शक्तिशाली आसमानी बिजली पैदा करने तथा गिराने वाले तूफानों की वजह जलवायु परिवर्तन है। औसतन कोई न कोई जर्मन इलाका वर्ष के 16 से 36 दिन बिजली युक्त तूफान का सामना करता है। इनमें से 95 प्रतिशत मई से सितम्बर महीनों के दौरान आते हैं। जर्मनी के पहाड़ी इलाकों में मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक बिजली कड़कती तथा गिरती है। आसमानी बिजली बड़े वृक्षों, चिमनियों एवं इमारतों पर गिर सकती है परंतु जर्मनी में पवन चक्कियों को यह सबसे अधिक निशाना बनाती है।