क्या कोई कार्य ऐसा भी हो सकता, जहाँ सम्मान, ग्लैमर तथा पैसा एक साथ हो? तो इसका मौजूदा अर्थों में सीधा-सा जवाब होगा पत्रकारिता। विश्ïवव्यापी जर्नलिज्म को एक विशिष्टï कैरियर के रूप में मान्यता मिल चुकी है। आज भारत में अनेक विश्वविद्यालय तथा निजी संस्थान पत्रकारिता का विधिवत प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। नई पीढ़ी के युवक-युवतियों में इस क्षेत्र में अपना नाम चमकाने का एक जुनून-सा है। परिणामत: भारत में प्रतिवर्ष हजारों छात्र-छात्राएं खबरों की रोमांचक दुनिया में अपना भविष्य तलाश रहे हैं।
खबरों की रोमांचक दुनिया
भारतीय पत्रकारिता के वे दिन अब लद गए जब इस विधा को मात्र एक मिशन की संज्ञा देकर अपने कत्र्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती थी। आज प्रिंट मीडिया के चहुंमुखी विस्तार के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में नई-नई संभावनाओं व उपलब्धियों की मौजूदगी ने पत्रकारिता के लिए स्वर्णिम भविष्य के रास्ते खोल दिए हैं। आज समूचे देश में पत्रकारिता के विवध आयामों के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था है। यह ऐ ऐसा पेशा साबित हुआ है जिसके अपने जोखिम तथा रोमांच हैं। परिणामत: आज अधिकाधिक युवा खकबरों की दुनिया में अपना भविष्य तलाश रहे हैं।
स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व की पत्रकारिता विशुद्धत: मिशनरी पत्रकारिता थी। देश की बागडोर लोकतंत्र के हाथों मेँ अपने के पश्चात्ï हुए विभिन्न परिवर्तनों की लहर से पत्रकारिता स्वयं को नहीं बचाए रख सकी। फलस्वरूप उसके आयाम भी समय-समय पर परिवर्तित होते चले गए। भारत की स्वतंत्रता के बाद सामाजिक तथा राजनैतिक चेतना के क्षेत्र में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योदान रहा। वस्तुत: सूचना क्रांति ने खबरों और जानकारी की दुनिया को सुलभ, सुगम और रोचक बना दिया। मौजूदा दौर में समाचार आधुनिक जीवन शैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
दुनियाभर के लाखों नाम आज विकासशील पत्रकारिता के सुनहरे हस्ताक्षर हैं। असंख्य स्तंभकार, अनगिनत रिपोर्टर, समालोचक, टिप्पणीकत्र्ता तथा विशेषज्ञ पूरे विश्व की घटनाओं को देखने, समझाने, उनके बारे में विचार करने तथा छापने के काम में लगे हैं। सूचना ही ज्ञान है। श्रेष्ठï पत्रकारिता का अर्थ है-प्रमाणिक व विश्ïवसनीय सूचना का संप्रेषण इन सूचनाओं का विश्लेषण भी किया जाता है ओर अनेक बार जनमत का दिशा निर्धारण भी इन्हीं सूचनाओं के गर्भ से होता है। पत्रकारिता के शुरुआती दौर इस क्षेत्र में महिलाओं की संख्या न के बराबर थी लेकिन आज स्थिति में जमीन-आसमान का फर्क है। समाचार-संकलन से लेकर संपादन व प्रस्तुतिकरण तक में महिलाओं की सहभागिता तेजी से बढ़ी है। सेटेलाइट चैनलों द्वारा सूचना क्रांति के विस्फोट के बाद तो युवतियां इस क्षेत्र में अपनी बुलंद मौजूदगी दर्ज करा चुकी हैं। किसी भी अन्य पेशे की भांति यहां भी बहुमंखी प्रतिभा और अच्छा काम बोलता है। इस क्षेत्र में अनुभव को अपनी अलग महत्ता है।
संवाददाता किसी भी समाचार-पत्र अथवा न्यूज एजेंसी के उपसंपादक के समान एक पत्रकार है। संवाद-संकलन एवं प्रेषण पत्रकारिता का ही एक अविभाज्य अंग है, अत: पत्रकारिता के व्यवसाय में प्रवेश के लिए जिस प्रशिक्षण की उपेक्षा की जाती है, वह सवांददाता के लिए भी जरूरी है। सभी व्यवसायों की तरह समाचार-संकलन या रिपोर्टिंग में भी नवांगतुक तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावहारिक अनुभव दोनों की सहायता से अपना स्थान बना सकता है। कई बार ऐसा भी हुआ है कि अनुभव के बल पर ही संवाददाता इतने सफल रहे कि उन्हें किसी प्रशिक्षण की कभी कमी अनुभव ही नहीं हुई।
आज से कुछ वर्ष पूर्व तक पत्रकारों के प्रशिक्षण के लिए बाकायदा कोई प्रबंध नहीं था। उस जमाने में वे व्यक्ति भी पत्रकार बन सकते थे, जो किसी यूनिवर्सिटी के स्नातक भी नहीं थे। अनुभव और जी-तोड़ परिश्रम ने भारत में अभी अनेक ऐसे पत्रकारों को जन्म दिया जो बाद में अपने क्षेत्र में प्रामाणिक हस्ताक्षर सिद्ध हुए। भारतीय हिंदी पत्रकारिता जगत की तीन महान विभूतियां स्व. पं. बाबूराव विष्णु पराडकर (आज के संपादक), पंडित अंबिका प्रसाद बाजपेयी (भारत मित्र के संपादक) तथा पंडित लक्ष्मी नारायण गर्दे (नवनीत के सपंदाक) की जीवनियां तथा उनके अतुलनीय सहयोग इस तथ्य के ज्वलंत उदाहरण हैं कि निरंतर साधना और संघर्ष किसी भी यूनिवर्सिटी द्वारा प्रदत्त उपाधि के अभाव को पूरा कर सकते हैं।
इनके अतिरिक्त और भी कई लब्धप्रतिष्ठï विभूतियां रही हैं जिन्होंने भारतीय पत्रकारिता को दैदीप्यमान किया और ये सभी महानुभव बिना किसी डिग्री-डिप्लोमा के इस क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुए। समाचार-संकलन अथवा रिपोटिंग में अनेक लोग भी ऐसे होते हें जो पूर्णकालिक पत्रकार नहीं होते। अत: जो प्रशिक्षण किसी उपसंपादक के लिए आवश्यक माना जाता है, वह भी उन्हें नहीं मिलता। छोटे-छोटे शहरों में दुकानदार, लिपिक अथवा अध्यापक अपने-अपने क्षेत्र के समाचार तथा छायाचित्र एकत्र समाचार-पत्रों को भेजते हैं। उनकी सामग्री की गुणवत्ता तथा प्रकाशन के आकार के आधार पर उनको मानदेय प्रदान किए जाने का प्रावधान है। इस प्रकार के प्रतिनिधियों को 'अंशकालिक संवाददाताÓ अथवा स्ट्रिंगर कहा जाता है। अनेक पत्र-पत्रिकाएं अपने इस प्रकार के प्रतिनिधियों से 'विज्ञापनÓ तथा प्रसार आदि के कार्यों में भी मदद लेते हैं। विज्ञापन के क्षेत्र में प्रचलित आदर्श मानक कुल रकम का पंद्रह प्रतिशत बतौर कमीशन संबंधित व्यक्ति को प्रदान कर दिया जाता है। अनेक अवसरों पर ऐसे प्रतिनिधयों को भी बाकायदा प्रशिक्षण की जरूरत महसूस होती है। विधिवत प्रशिक्षण से एक ओर जहां संवाददताओं के काम की गुणवत्ता में निखार आता है वहीं दूसरी ओर अनेक प्रकार के विवादों में भी कमी की संभावना बढ़ जाती है।
दूसरी तरह के प्रतिनिधि पूर्णकालिक पत्रकार कहलाते हैं। इस तरह के लोगों का समस्त समय पत्रकारिता को समर्पित होता है। वे इस व्यवसाय की परंपराओं और मर्यादाओं का पूरे उत्तरदायित्व से परिपालन करते हैं। जबकि अंशकालिक संवाददाता अपने दूसरे उद्देश्य अथवा मुख्य व्यवसाय में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रेस के बिल्ले का कई बार अनुचित प्रयोग भी करते हैं। यह सर्वमान्य सत्य है कि पत्रकारों का बौद्धिक और व्यावसायिक स्तर जितना ऊँचा होगा, रिर्पोटिंग उतनी ही श्रेष्ठï होगी। यह तभी संभव है जब पत्रकारों की शिक्षा और व्यावहारिक अच्छे ढंग से हो।
पत्रकारिता का इतना बड़ा सामाजिक उत्तरदायित्व होने पर भी कानून अथवा डॉक्टरी की पढ़ाई की भांति इसका विधिवत प्रशिक्षण आज से कुछ साल पूर्व तक जरूरी नहीं समझा जाता था। इसकी एक खास वजह यह भी हो सकती है कि पत्रोद्योग का विकास किसी निश्चित उद्देश्य से नहीं हुआ है तथा इसके लक्ष्य तथा क्षेत्र इतने विवध रहे हैं कि पत्रकारों में व्यावसायिक चेतना का संचार बहुत बाद में हुआ। इस व्यवसाय में बिना तकनीकी प्रशिक्षण के भी सर उषानाथ सेन और श्री के.सी. राय सरीखे जाने-माने पत्रकारों ने अपने जमाने में प्रेस कवरेज के मामले में अंग्रेज पत्रकारों को शिकस्त दी तथा एसोसिएट प्रेस ऑफ इंडिया की स्थापना की। यह संस्था आज पी.टी.आई. (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया) के रूप में भारत की सबसे न्यूज एजेंसी है।
लगभग इसी तर्ज पर लाला दुर्गादास ने अर्धशताब्दी तक भारतीय पत्रकारिता को गौरवान्वित किया। वे इस व्यवसाय में काम करते-करते ही सफलता के शिखर पर चढ़े थे। 'ट्रिब्यूनÓ के समाचार-संपादक और विशेष प्रतिनिधि अविनाश चंद्र बाली भी अपने कड़े परिश्रम और ठोस काम के जरिये व्यवसाय में सम्मानित गौरव को प्राप्त हुए। इस संदर्भ में श्री सदानंद (एक राष्टï्रवादी न्यूज एजेंसी 1927) के संस्थापक तथा श्री बी. सेनगुप्ता (यूनाइटेड प्रेस ऑफ इंडिया 1933) के संस्थापक भी स्वयंभू पत्रकार ही थे। विधिवत प्रशिक्षण के अभाव को इन लोगों ने अपनी प्रतिभा और परिश्रम से पूर्ण किया। इस सबका अभिप्राय यह कतई नहीं है कि सफल संवाददाता बनने के लिए किसी प्राविधिक प्रशिक्षण की आवश्यकता ही नहीं है, इसका मतलब यह भी निकल सकता है कि औपचारिक प्राविधिक प्रशिक्षण के अभाव के चलते कितने ही प्रतिभासंपन्न नवयुवकों को पत्रकारिता में प्रवेश के सुअवसर से वंचित रहना पड़ा है और इस तरह हमारे समाचार-पत्रों को अनेक सुयोग्य, संभावनाशील और निष्ठïावान पत्रकारों की सेवाएं प्राप्त नहीं हो सकीं।
भारतीय पत्रकारिता के विकास और समाचार पत्रों की समस्याओं पर खोजबीन के लिए भारत सरकार ने 1952 में एक प्रेस आयोग नियुक्ïत किया था। इसकी रिपोर्ट 1954 में प्रकाशित हुई। रिपोर्ट में कहा गया था कि पत्रकारिता के व्यवसाय के लिए जितनी संख्या में भी कार्यकर्ता अपेक्षित हैं, वे सब हमारे देश में मिल सकते हैं। लेकिन कठिनाई यही है कि वांछित स्तर का पत्रकार बनने के लिए उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण की आवश्यकता है। आयोग ने अफसोस व्यक्त करते हुए स्पष्टï किया था कि हमारे पत्रकारों में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें न तो उचित स्तर की शिक्षा मिली तथा न ही उनका मानिसिक संतोषप्रद है।
प्रेस आयोग ने समुचित प्रशिक्षण के अभाव के दुष्परिणाम को इंगित करते हुए दो उदाहरण भी दिए थे। पत्रकारिता के एक नए प्रवेष्टïा से जब 'आनंद बाजार पत्रिकाÓ की बाबत पूछा गया तो उसका जवाब था कि यह समाचार पत्र कन्नड़ में छपता है और इसके संपादक राजा राममोहन राय हैं। इसी तरह एक मलयालम दैनिक के कार्यालय में यह समाचार आया कि चिनाब नदी में बाढ़ आ जाने के कारण लकड़ी के एक लाख शहतीर जम्मू के नजदीक एक स्थान से पानी में बहते हुए पाकिस्तान पहुंच गए। उपसंपादक महोदय अंग्रेजी शब्द 'स्लीपरÓ का ठीक अर्थ नहीं समझ पाए तथा समाचार का यह अनुवाद किया कि चिनाब नदी की बाढ़ की लपेट में आकर एक लाख व्यक्ति, जो नदी के किनारे सो रहे थे, डूब गए और उनके शव पाकिस्तान पहुंच गए। इस समाचार से सनसनी तो फैलनी ही थी। अगले कई दिनों तक अखबार की फजीहत तो होती ही रही, साथ ही संपादक को क्षमा याचना अलग से करनी पड़ी। जिस समय यह ब्लंडर (भयंकर भूल) हुई उस समय संपादक कार्यालय में सो रहा था।
विश्व के अन्य विकसित तथा विकासशील देशों का तरह भारत में पिछले पचास साल से पत्रकारिता में आगंतुकों के विधिवत प्रशिक्षण की जरूरत पर बड़ी सजीव चर्चाएं हो रही हैं। तथापि स्थिति बहुत कुछ स्पष्टï हो गई है और पत्रकारिता में प्राविधिक प्रशिक्षण के महत्त्व को सर्वत्र स्वीकृति तथा समर्थन मिला है। भारत में युवक-युवतियों को पत्रकारिता तथा इससे जुड़े जनसंचार, विज्ञापन, टी.वी. जर्नलिज्म, मास कम्युनिकेशन आदि के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था कुछ विश्वविद्यालयों तथा प्राइवेट संस्थाओं की देखरेख में संपन्न हो रही है।
1938 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (उ.प्र.) में प्रयोग के तौर पर सर्वप्रथम पत्रकारिता विभाग की स्थापना की गई। लेकिन यह व्यवस्था केवल दो वर्ष ही चल सकी, बाद में इस प्रयोग पर विराम लग गया। इसके बाद तत्काल पंजाब यूनिवर्सिटी लाहौर (पाकिस्तान) में विश्वविद्यालय स्तर पर पहले डिप्लोमा पाठ्ïयक्रम की व्यवस्था श्ुरू हो गई। 1947 के बाद पंजाब विश्वविद्यालय के भारत में स्थानांतरित होने के बाद पत्रकारिता विभाग ने कुछ वर्ष दिल्ली में काम किया। पंजाब यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग द्वारा प्रशिक्षित पत्रकारों ने समाचार पत्रों तथा सरकारी प्रचार अभिकरणों में सफलता के झंडे गाड़कर अभूतपूर्व सफलता से प्राविधिक प्रशिक्षण की आवश्यकता को चरितार्थ किया। परिणामस्वरूप देश के अनेक विश्वविद्यालयों में आज पत्रकारिता विभाग संचालित हैं तथा भावी पत्रकारों को 'धारÓ प्रदान कर रहे हैं।
प्रशिक्षण संस्थान
भारतीय जनसंचार संस्थान (आई.आई.एम.सी) जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर-नई दिल्ली-110067
इंदिरा गांधी राष्टï्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
माखनलाल चतुर्वेदी राष्टï्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, ई-8/76 एरिया कॉलोनी, पो.बा.न. आर.एस.एन. 60, भोपाल (मध्य प्रदेश) 462016
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
जामिया मिलिया विश्वविद्यालय (जामियानगर), नई दिल्ली-110025
मुंबई विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी रोड, फोर्ट, मुंबई-400032
मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद (महाराष्टï्र)
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, कामेश्वर नगर (दरभंगा) बिहार
लाल बहादुर शास्त्री जनसंचार संस्थान, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
आगरा विश्वविद्यालय - आगरा (उ.प्र.)
गुवाहाटी विश्वविद्यालय (असम)
जबलपुर विश्वविद्यालय (मध्य प्रदेश)
पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़
कलकत्ता विश्वविद्यालय, सीनेट हाउस, 87 कॉलेज स्ट्रीट, कलकत्ता-700007
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राजस्थान)
बैंगलोर विश्वविद्यालय, ज्ञान भारती, बैंगलोर-560056
केरल विश्वविद्यालय, यूनिवर्सिटी डाकघर, त्रिवेंद्रम-695034
वाई.एम.सी.ए. जयसिंह रोड, नई दिल्ली
ऑक्सफोर्ड कॉलेज ऑफ एजुकेशन 71/1ए पटुओटोलालेन कलकत्ता-700009
चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय, मेरठ, 250004 (उ.प्र.)
पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला, (पंजाब)
रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर (म.प्र.)
पटना विश्वविद्यालय, पटना (बिहार)
शिवाजी विश्वविद्यालय (महाराष्टï्र)
उस्मानिया विश्वविद्यालय (आंध्रप्रदेश)
बहरामपुर विश्वविद्यालय (उड़ीसा)
मुंबई कॉलेज ऑॅफ जर्नलिज्म
सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ मास कम्युनिकेशन, मुंबई
इंस्टीट्ïयूट ऑफ जर्नलिज्म, थियेटर कम्युनिकेशन बिल्डिंग, नई दिल्ली
डेट लाइन स्कूल ऑफ जर्नलिज्म, नई दिल्ली।
समस्त बड़े समाचार पत्रों में भारी खपत तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चौतरफा विस्तार के चलते संभावनाओं के आकाश पर पाप अपने सुनहरे भविष्य के हस्ताक्षर कर सकते हैं। विधिवत रूप से प्रशिक्षित पत्रकारों के काम करने का क्षेत्र जब केवल प्रिंट मीडिया तक सीमित नहीं है। रेडियो, टेलीविजन, सरकारी प्रचार एवं सूचना सेवा, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, बड़े-बड़े गैर सरकारी पब्लिसिटी अभिकरण, सार्वजनिक सेक्टरों की परियोजनाएं तथा सेवा, बड़ी-बड़ी प्रकाशन संस्थाएं अदि के द्वार आपके लिए खुले पड़े हैं।