वास्तुशिल्प की भूमि पर उम्मीदों की इमारत-आर्किटेक्ट


पूरी दुनिया में जितनी तेजी के साथ जनसंख्या का ग्राफ ऊपर की ओर जा रहा है, उतनी ही लोगों की चिंताएं भी बढ़ी हैं। मानव सभ्यता के विस्तार के साथ ही भूमि व भवनों के प्रबंध में भी आधुनिकता आई है। भौगोलिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले पचास वर्षों बाद शहरों के बीच के जंगल व खेती योग्य भूमि समाप्त हो चुकी होगी। एक शहर के भवन, भूखंड दूसरे शहर से चस्पा हो चुके होंगे। यही वजह है कि भूमि व भवन के क्षेत्रफल का आज अधिकाधिक उपयोग किया जा रहा है। यह काम आर्किटेक्ट (वास्तुविद) के जिम्मे होता है। एक कुशल आर्किटेक्ट सीमित व कम भू-भाग के लिए पर्याप्त सुविधाओं वाले भवनों की वास्तु योजना तैयार करते हैं। इस क्षेत्र में युवाओं की दिलचस्पी दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।
भारत जैसे संस्कृति प्रधान राष्टï्र में वास्तुशिल्प का प्राचीनकाल से महत्त्व रहा है। रामायण काल मेें रावण की सोने की लंका उस युग की सर्वश्रेष्ठï कृति थी। मुगलकाल में भी देश में योजनाबद्ध चरण से इमारतों के सृजन की परंपरा खूब फली-फूली। ताजमहल, कुतुब मीनार, लालकिला आदि इसके उदाहरण हैं। इन निर्माणों को देखने के बाद हमारे मुंह से अनायास ही 'वाह-वाहÓ निकल आता है। हम सोचने लगते हैं कि काश हम भी उस समय पैदा हुए होते तो इतने शानदार निर्माण कार्य को अपनी आंखों से देखने का सौभाग्य प्राप्त करते। दरअसल, इस प्रशंसा के वास्तविक हकदार वे वास्तुशिल्पी होते हैं, जो निर्जीव वस्तुओं को आकर्षक व मनमोहक रूप प्रदान करते है। आज तकनीकों व संसाधनों की भरमार तथा आधुनिकता की नई बयार में वास्तुशिल्प की यह पुरातन परंपरा अंगड़ाई ले रही है। इस क्षेत्र में शिक्षित युवाओं के आगे बढऩे की अपार संभावनाएं हैं। जिन युवक-युवतियों में कल्पनाशीलता, सृजनात्मकता, मौलिक तथा कुछ नया कर गुजरने का जज्बा हो, उन्हें यह पेशा सिर आंखों पर बैठाकर रखता है।
आज देशभर में बड़े-बड़े व्यावसायिक कॉम्पलेक्स, गगनचुंबी इमारतें, पंचसितारा होटल, बड़े-बड़े रिजाट्र्स, पिकनिक स्पॉट, पर्यटन स्थल, मठ-मंदिर, गुरुद्वारे, आवासीय कॉलोनी, प्रेक्षागृह, फिल्म स्टूडियो, सरकारी भवन, स्पोटï्र्स स्टेडियम आदि के निर्माण का कार्य तेज गति से हो रहा है। इन समस्त भावी इमारतों की इबारत पहले वास्तुविद ही तैयार करते हैं।
किसी भी इमारत के निर्माण की योजना बनाने से पूर्व बहुत-सी बातों का ख्याल रखना पड़ता है। यह काफी कुछ आर्किटेक्ट की कार्यकुशलता, सक्षमता, अनुभव व योग्यता पर भी निर्भर करता है। कोई भी आर्टिकेक्ट भवन निर्माण की समस्त आवश्यकताओं का आकलन करके भावी इमारत का प्रारूप तैयार करता है।
आर्किटेक्ट एक ओर जहां यह सुनिश्चित करता है कि भवनों का निर्माण सुनियोजित विशिष्टïताओं तथा निर्माण की अपेक्षाओं के अनुरूप हो, वहीं दूसरी ओर वह समस्त कायदे, कानूनों व सीमाओं की परिधि में भी हो। सामान्यत: देखा जाए तो एक आर्किटेक्ट का कार्य भी इंजीनियर के कैरियर के अनुसार ही है। काफी समय पहले तक विज्ञान के विद्यार्थी इंजीनियरिंग के क्षेत्र में ही अपने भविष्य की योजनाओं को साकार होते देखना चाहते थे लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। आज भारी तादाद में युवक-युवतियां अपना कैरियर वास्तुकला के क्षेत्र में बनाने के लिए गंभीर हैं क्योंकि इस क्षेत्र में काफी कुछ वो है जो इंजीनियरिंग के क्षेत्र में मिल पाता है।
इंजीनियरिंग की भांति आर्किटेक्चर के पाठï्यक्रम में भी प्रवेश के लिए न्यूनतम अहर्ता 10+2 अथवा इंटरमीडिएट है। देशभर में एक सौ से भी ज्यादा सरकारी व निजी क्षेत्र के संस्थान आज आर्किटेक्चर के पाठï्यक्रम संचालित कर रहे हैं। पाठï्यक्रम में चयन का आधार प्रवेश परीक्षा है। विज्ञान संकाय में 50 प्रतिशत अंकों के साथ इंटरमीडिएट उत्तीर्ण अभ्यर्थी प्रवेश परीक्षा में भागीदारी के लिए पात्रता रखते हैं। प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन राज्य स्तरीय होता है लेकिन इस क्षेत्र के अनेक संस्थान स्वयं भी प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन करते हैं।
आर्किटेक्चर में स्नातक स्तर का पाठï्यक्रम 5 वर्ष की अवधि का है। जिसे पूर्ण करने के बाद 'बैचलर ऑफ आर्किटेक्चरÓ की डिग्री या स्नातक डिप्लोमा प्रदान किया जाता है। कुछ संस्थान डिग्री प्रदान करते हैं तो कई जगह डिप्लोमा दिए जाने का प्रावधान है। डिग्री हो अथवा डिप्लोमा-दोनों को समान मान्यता व महत्त्व दिया जाता है। पाठï्यक्रम में डिजाइनिंग के मूलभूत सिद्धांत, आर्किटेक्चरल डिजाइन, इंटीरियर डिजाइन, शहर संबंधी डिजाइन, आवासीय परियोजनाओं एवं टाउनशिप की रूपरेखा आदि पर अध्ययन किया जाता है। यही नहीं अभ्यर्थियों को भवन निर्माण के वैज्ञानिक एवं तकनीकी सिद्धांतों, जलापूर्ति, जल-निष्कासन, विद्युत व्यवस्था, ड्रेनेज, सीवेज आदि की भी तकनीकी व व्यावहारिक जानकारी प्रदान की जाती है।
अन्य क्षेत्रों की भांति इस क्षेत्र में भी अब कम्प्यूटर की उपयोगिता बढ़ गई है। अत: इस क्षेत्र में भविष्य तलाशने वाले युवाओं को यदि कम्प्यूटर की भी जानकारी होगी तो वे अपने कार्य को अधिक खूबियों के साथ अंजाम दे सकने में सक्षम होंगे। निर्माण की अनेक परियोजनाएं अब कम्प्यूटर पर तैयार की जाती है।
भारत में आर्किटेक्चर के शिक्षार्थियों का एक राष्टï्रीय संगठन 'नेशनल एसोसिएशन ऑफ स्टूडेंटï्स ऑफ आर्किटेक्चरÓ है। यह संगठन अपने सदस्यों को रोजगार के अवसरों की जानकारी तो देता ही है, साथ ही वर्षपर्यन्त अनेक ज्ञानवर्धक व सार्थक कार्यक्रमों का भी आयोजन करता है।
आर्किटेक्चर में स्नातक पाठï्यक्रम पूर्ण करने के पश्चात आप पोस्ट ग्रेजुएट पाठï्यक्रम में शामिल हो सकते हैं। इस पाठï्यक्रम की अवधि दो वर्ष की है। हालांकि इस पाठï्यक्रम में प्रवेश लेन वाले युवाओं की संख्या न के बराबर होती है क्योंकि इससे पूर्व ही वे कहीं-न-कहीं सेटल हो चुके होते हैं। वस्तुत: आर्किटेक्चर कला और विज्ञान दोनों विधाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला क्षेत्र है। सृजनात्मक क्षमताओं वाले युवाओं के लिए इस क्षेत्र में करने के लिए बहुत कुछ नया है।
प्रशिक्षण संस्थान
स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, निकट आई.टी.ओ. नई दिल्ली-110002
सर जे.जे. कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर, मुंबई
के. रहेजा इंस्टीटï्यूट ऑफ आर्किटेक्चर, मुंबई
रिजवी कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर, मुंबई
रुड़की विश्वविद्यालय, रुड़की (उ.प्र.)
वास्तुकला वातावरण योजना व तकनीकी विद्यालय, अहमदाबाद
योजना व वास्तुकला विद्यालय, इंद्रप्रस्थ एस्टेट, नई दिल्ली
महात्मा गांधी मिशन अभियांत्रिकी व वास्तुकला संस्थान, नांदेड़ (महाराष्टï्र)

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