पश्चिमी
संस्कृति के प्रभाव ने हमारे देश में भौतिकवाद को प्रोत्साहन दिया है और
अब तो पढ़े लिखे हों या नहीं सभी सुख सुविधाओं के जाल में फंसते जा रहे
हैं। भारतीय अध्यात्म ज्ञान के बारे में जानते सभी हैं पर उसे धारण करना
लोगों को अब पिछड़ापन दिखाई देता है। नतीजा यह है कि समाज में आपसी रिश्ते
एक औपचारिकता बनकर रहे गए हैं।
अक्सर अनेक लोग शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे उनसे दूर हो रहे हैं अथवा उनकी देखभाल नहीं करते। इसके दो कारण होते हैं एक तो यह कि नए सामाजिक परिवेश से तालमेल न बिठा पाने के कारण लोग अपने माता पिता को त्याग देते हैं या फिर वह व्यवसाय के सिलसिले में उनसे दूर हो जाते हैं। दोनों ही स्थितियों का विश्लेषण करने पर अनुभव होगा कि आधुनिक युग के समस्त माता पिता अपने बच्चों से यह अपेक्षा करते हैं कि वह इस मायावी दुनियां में उच्च से उच्च पद प्राप्त कर, अधिक से अधिक धनार्जन करें और भरपूर मान प्रतिष्ठा की दुनियां में चमक कर उनका व अपना नाम रोशन करें।
लोग बच्चों की कामयाबी के सपने देखते हैं और केवल सांसरिक शिक्षा तक ही अपने बच्चों को सीमित रखते हैं। किसी तरह अपना पेट पालो यही सिखाते हुए वह ऐसा अनुभव करते हैं कि जैसे कि वह दुनियां का कोई विशेष ज्ञान दे रहे हैं। यह तो एक सामान्य चतुराई है जिसे सब जानते हैं।
यह उनका एक भ्रम है। यह शिक्षा तो सभी स्वतः ही प्राप्त करते हैं पर जिन बच्चों को उनके माता पिता इसके साथ ही अध्यात्म ज्ञान, ईश्वर भक्ति और परोपकार करना सिखाते हैं वह अधिक योग्य निकलते हैं। जब तक आदमी मन में अध्यात्म का ज्ञान नहीं होगा तब वह न तो स्वयं कभी प्रसन्न रह पाता है और न ही दूसरों को प्रसन्न करता है।
किसी भी मनुष्य का परिचय दो प्रकार का होता है। प्रथम भौतिक परिचय एवं दूसरा अध्यातिमक परिचय। सफलता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने के लिए बच्चों को अध्यात्म विज्ञान को आत्मसात करना चाहिए। बच्चे ही परिवार समाज व देश के भविष्य होते हैं। उन्हें नियमित रूप से ध्यान साधना करनी चाहिए, इससे मन में शांति एवं एकाग्रता आती है।
आज समस्त सुख सुविधाएं होने के बावजूद भी बहुत सारे लोगों का मन अशांत रहता है क्योंकि मानव को परमात्मा के ज्ञान का प्रत्यक्ष बोध कर शांति, सत्य, अहिंसा एवं नि:स्वार्थ प्रेम का वातावरण स्थापित करने का समय नहीं है। वह तो पैसे कमाने और सफलता की दौड़ में सबसे आगे निकलना चाहते हैं।
मनुष्य जीवन में भक्ति और ज्ञान प्राप्त करने की सुविधा मिलती है पर उसका उपयोग नहीं कर हम उसे ऐसे ही नष्ट कर डालते हैं। ऐसे में वह ज्ञानी धन्य है जो दाल रोटी खाकर पेट भरते हुए भगवान भजन और ज्ञान प्राप्त करने के लिये समय निकालते हैं।
अक्सर अनेक लोग शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे उनसे दूर हो रहे हैं अथवा उनकी देखभाल नहीं करते। इसके दो कारण होते हैं एक तो यह कि नए सामाजिक परिवेश से तालमेल न बिठा पाने के कारण लोग अपने माता पिता को त्याग देते हैं या फिर वह व्यवसाय के सिलसिले में उनसे दूर हो जाते हैं। दोनों ही स्थितियों का विश्लेषण करने पर अनुभव होगा कि आधुनिक युग के समस्त माता पिता अपने बच्चों से यह अपेक्षा करते हैं कि वह इस मायावी दुनियां में उच्च से उच्च पद प्राप्त कर, अधिक से अधिक धनार्जन करें और भरपूर मान प्रतिष्ठा की दुनियां में चमक कर उनका व अपना नाम रोशन करें।
लोग बच्चों की कामयाबी के सपने देखते हैं और केवल सांसरिक शिक्षा तक ही अपने बच्चों को सीमित रखते हैं। किसी तरह अपना पेट पालो यही सिखाते हुए वह ऐसा अनुभव करते हैं कि जैसे कि वह दुनियां का कोई विशेष ज्ञान दे रहे हैं। यह तो एक सामान्य चतुराई है जिसे सब जानते हैं।
यह उनका एक भ्रम है। यह शिक्षा तो सभी स्वतः ही प्राप्त करते हैं पर जिन बच्चों को उनके माता पिता इसके साथ ही अध्यात्म ज्ञान, ईश्वर भक्ति और परोपकार करना सिखाते हैं वह अधिक योग्य निकलते हैं। जब तक आदमी मन में अध्यात्म का ज्ञान नहीं होगा तब वह न तो स्वयं कभी प्रसन्न रह पाता है और न ही दूसरों को प्रसन्न करता है।
किसी भी मनुष्य का परिचय दो प्रकार का होता है। प्रथम भौतिक परिचय एवं दूसरा अध्यातिमक परिचय। सफलता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने के लिए बच्चों को अध्यात्म विज्ञान को आत्मसात करना चाहिए। बच्चे ही परिवार समाज व देश के भविष्य होते हैं। उन्हें नियमित रूप से ध्यान साधना करनी चाहिए, इससे मन में शांति एवं एकाग्रता आती है।
आज समस्त सुख सुविधाएं होने के बावजूद भी बहुत सारे लोगों का मन अशांत रहता है क्योंकि मानव को परमात्मा के ज्ञान का प्रत्यक्ष बोध कर शांति, सत्य, अहिंसा एवं नि:स्वार्थ प्रेम का वातावरण स्थापित करने का समय नहीं है। वह तो पैसे कमाने और सफलता की दौड़ में सबसे आगे निकलना चाहते हैं।
मनुष्य जीवन में भक्ति और ज्ञान प्राप्त करने की सुविधा मिलती है पर उसका उपयोग नहीं कर हम उसे ऐसे ही नष्ट कर डालते हैं। ऐसे में वह ज्ञानी धन्य है जो दाल रोटी खाकर पेट भरते हुए भगवान भजन और ज्ञान प्राप्त करने के लिये समय निकालते हैं।