पवित्र
स्थान चित्रकूट में प्रभु श्रीराम ने माता जानकी और अपने अनुज संग वनवास
के 11 साल का समय व्यतीत किया था और माता जानकी ने अपनी पवित्रता का
प्रमाण अर्थात अग्नि परीक्षा भी इसी स्थान पर दी थी। चित्रकूट का कुछ भाग
उत्तर प्रदेश व कुछ भाग मध्य प्रदेश में सम्मिलित है। मान्यता है कि जिस
वक्त यह क्षेत्र जंगलों से ढंका हुआ था उस समय नदियों के किनारों पर
खूबसूरत कमल के फूल खिला करते थे। भक्तों की आस्था थी कि वे इस पावन जल
में स्नान करने के उपरांत चिंताओं व पापों से मुक्त हो जाते हैं।
चित्रकूट में भक्तों में शिरोमणि कहे जाने वाले भक्त हनुमान जी अपने भक्तों के समस्त कष्टों का निवारण करते हैं और उन्हें मनचाहा वर प्रदान करते हैं। खासतौर पर बेरोजगारी से निजात दिलाने वाला हनुमान जी का मंदिर। यहां आने वाले भक्त पाते हैं अच्छी एवं मनचाही नौकरी पाने का आशीर्वाद। श्रद्धालुओं की मान्यता है की इस मंदिर में हनुमान जी के दर्शनों के उपरांत कोई भी बेरोजगार नहीं रहता और न ही कभी भविष्य में रोजगार की चिंता रहती है। हुनमान जी की इस कृपालता से भाव विभोर हुए भक्त उन्हें नौकरी वाले हनुमान के नाम से पुकारते हैं और उनकी उपासना करते हैं।
नौकरी वाले हनुमान जी का श्री रूप भी बहुत अनोखा है उनका एक पैर धरती पर है और दूसरा पाताल लोक में। यह मंदिर यहां कैसे स्थापित हुआ और उनका यह श्री रूप यहां कैसे आया। इस संबंध में आज तक किसी को कुछ ज्ञात नहीं हो पाया।
लोक मान्यता के अनुसार ये श्री रूप स्वयंभू है। जिस समय गांव वासियों को इस अद्भुत प्रतिमा के विषय में ज्ञात हुआ तो वो इसे गांव ले जाने के लिए उठाने लगे परंतु श्री रूप तो अपने स्थान पर ही टिका रहा। उन्होंने बहुत प्रयत्न किया मगर सफल न हो पाए। जब काफी गहराई तक खुदाई करने के उपरांत भी श्री रूप का पैर बाहर निकलने के स्थान पर खून बहने लगा तो गांव वाले वहां से डर कर वापिस चले गए। कुछ समय के उपरांत हनुमान जी ने अपने एक भक्त को दर्शन दिए और कहा कि मैं जिस स्थान पर हूं वहां से अन्यत्र कहीं नहीं जाऊंगा औऱ इसी स्थान पर रहकर भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ती किया करुंगा।
लोक मान्यता है कि हनुमान जी के वार मंगलवार को पूजा करने के उपरांत जो भी मुराद मांगी जाती है वो अवश्य पूर्ण होती है। मुराद मांगने के लिए श्रद्धालुओं को एक नारियल अर्पित करने के उपरांत इक्कीस हफ्ते तक प्रतिदिन मंगलवार का व्रत रखना होता है और श्री रूप के सामने श्रीराम का गुणगान करना होता है। मुराद पूरी होने के उपरांत भक्त भीगी हुई चने की दाल और गुड़ का प्रसाद चढ़ाते हैं।
हनुमान जी की कृपा का कोई पार नहीं पा सकता। माना जाता है की हनुमान जी ने चित्रकूट के रामघाट पर तुलसीदास जी को प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जी के दर्शनों से कृतार्थ करवाया था। तुलसीदास जी राम और लक्ष्मण को पहचानने में असमर्थ थे तो हनुमान जी ने शुक रूप धार कर चौपाई का गुणगान कर उन्हें राम जी से अवगत करवाया था। तभी तो जब भी सच्चे मन से हनुमान जी के दर्शन किए जाते हैं तो प्रभु श्रीराम के दर्शनों का अहसास होने लगता है।
चित्रकूट पंहुचने के लिए अलग अलग स्थानों से बसें आती हैं। रेलगाढ़ी द्वारा चित्रकूट पंहुचना हो तो झांसी से 261 किमी और मानिकपुर से 31 किमी की दूरी तय करना पड़ती है। इसके अतिरिक्त जबलपुर, वाराणसी, हजरत निजामुद्दीन व हावड़ा से भी चित्रकूट धाम के लिए रेल सेवाएं उपलब्ध हैं। खजुराहो यहां पड़ने वाला निकटतम हवाई अड्डा है।
चित्रकूट में भक्तों में शिरोमणि कहे जाने वाले भक्त हनुमान जी अपने भक्तों के समस्त कष्टों का निवारण करते हैं और उन्हें मनचाहा वर प्रदान करते हैं। खासतौर पर बेरोजगारी से निजात दिलाने वाला हनुमान जी का मंदिर। यहां आने वाले भक्त पाते हैं अच्छी एवं मनचाही नौकरी पाने का आशीर्वाद। श्रद्धालुओं की मान्यता है की इस मंदिर में हनुमान जी के दर्शनों के उपरांत कोई भी बेरोजगार नहीं रहता और न ही कभी भविष्य में रोजगार की चिंता रहती है। हुनमान जी की इस कृपालता से भाव विभोर हुए भक्त उन्हें नौकरी वाले हनुमान के नाम से पुकारते हैं और उनकी उपासना करते हैं।
नौकरी वाले हनुमान जी का श्री रूप भी बहुत अनोखा है उनका एक पैर धरती पर है और दूसरा पाताल लोक में। यह मंदिर यहां कैसे स्थापित हुआ और उनका यह श्री रूप यहां कैसे आया। इस संबंध में आज तक किसी को कुछ ज्ञात नहीं हो पाया।
लोक मान्यता के अनुसार ये श्री रूप स्वयंभू है। जिस समय गांव वासियों को इस अद्भुत प्रतिमा के विषय में ज्ञात हुआ तो वो इसे गांव ले जाने के लिए उठाने लगे परंतु श्री रूप तो अपने स्थान पर ही टिका रहा। उन्होंने बहुत प्रयत्न किया मगर सफल न हो पाए। जब काफी गहराई तक खुदाई करने के उपरांत भी श्री रूप का पैर बाहर निकलने के स्थान पर खून बहने लगा तो गांव वाले वहां से डर कर वापिस चले गए। कुछ समय के उपरांत हनुमान जी ने अपने एक भक्त को दर्शन दिए और कहा कि मैं जिस स्थान पर हूं वहां से अन्यत्र कहीं नहीं जाऊंगा औऱ इसी स्थान पर रहकर भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ती किया करुंगा।
लोक मान्यता है कि हनुमान जी के वार मंगलवार को पूजा करने के उपरांत जो भी मुराद मांगी जाती है वो अवश्य पूर्ण होती है। मुराद मांगने के लिए श्रद्धालुओं को एक नारियल अर्पित करने के उपरांत इक्कीस हफ्ते तक प्रतिदिन मंगलवार का व्रत रखना होता है और श्री रूप के सामने श्रीराम का गुणगान करना होता है। मुराद पूरी होने के उपरांत भक्त भीगी हुई चने की दाल और गुड़ का प्रसाद चढ़ाते हैं।
हनुमान जी की कृपा का कोई पार नहीं पा सकता। माना जाता है की हनुमान जी ने चित्रकूट के रामघाट पर तुलसीदास जी को प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जी के दर्शनों से कृतार्थ करवाया था। तुलसीदास जी राम और लक्ष्मण को पहचानने में असमर्थ थे तो हनुमान जी ने शुक रूप धार कर चौपाई का गुणगान कर उन्हें राम जी से अवगत करवाया था। तभी तो जब भी सच्चे मन से हनुमान जी के दर्शन किए जाते हैं तो प्रभु श्रीराम के दर्शनों का अहसास होने लगता है।
चित्रकूट पंहुचने के लिए अलग अलग स्थानों से बसें आती हैं। रेलगाढ़ी द्वारा चित्रकूट पंहुचना हो तो झांसी से 261 किमी और मानिकपुर से 31 किमी की दूरी तय करना पड़ती है। इसके अतिरिक्त जबलपुर, वाराणसी, हजरत निजामुद्दीन व हावड़ा से भी चित्रकूट धाम के लिए रेल सेवाएं उपलब्ध हैं। खजुराहो यहां पड़ने वाला निकटतम हवाई अड्डा है।