स्वर साधना के क्षेत्र में रोजगार


संगीत की लय-ताल भारतीय संस्कृति में रची-बसी है। प्राचीन काल से लेकर अभी तक तानसेन, बैजू बावरा, पंडित जसराज और पंडित गधर्व जेसे स्वर साधकों ने अपने संगीत के जरिए ही भारतीयता की छाप पूरे विश्ïव पर छोड़ी है। हालांकि पहले संगीत साधना में सिर्फ प्रतिष्ठïा ही ळाथ लगती थी। महान से महान संगीतकार बिना किसी खास भौतिक लाभ के अपनी कला का जादू बिखेरते रहते थे। किन्तु अब यह क्षेत्र शोहरत के साथ-साथ दौलत का भी जरिया बन चुका है। अब यहाँ भी उज्जवल भविष्य की ढेर सारी संभावनाएं मौजूद हैं।
आज जब प्रत्येक क्षेत्र में बेरोजगारी की समस्या बढ़ रही है, संगीत के क्षेत्र  में काफी अवसर देखे जा सकते हैं। संगीत का जादू आज भी लोगों के दिलोदिमाग पर सवार रहता है। और इसके सहारे आप एक शानदार भविष्य बना सकते हैं। संगीत के छात्रों को अनेक शिक्षण संस्थाओं की तरफ से छात्रवृत्तियां दी जाती हैं। साहित्य कला परिषद, मानव संसाधन मंत्रालय और कई विश्ïवविद्यालयों तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा भी छात्रवृत्ति व फैलोशिप की व्यवस्था है।
आज भी सच्ची स्वर साधना कठिन है। संगीत को कैरियर बनाने के इच्छुक छात्रों को निर्धारित पाठ्ïयक्रम पूरा करना जरूरी है। सामान्य तौर पर यह पाठ्ïयक्रम तीन से चार वर्ष तक का होता है। जो स्नातक के समकक्ष होता है और इसे 'संगीत प्रभाकरÓ कहते हैं। यह डिग्री देश के किसी भी प्रतिष्ठिïत संस्थान से ली जा सकती है। फिर भी प्रोफेसर पद के लिए आगे की पढ़ाई जरूरी है। यह पाठ्ïयक्रम संचालित करने वाले कुछ प्रतिष्ठिïत संस्थान निम्रलिखित हैं:
गंधर्व संगीत महाविद्यालय, पूना
भातखंडे संगीत समिति, लखनऊ
प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद
संगीत समिति, बनारस
संगीत महाविद्यालय लखनऊ
श्री राम भारतीय कला केन्द्र, मंडी हाऊस, नई दिल्ली
संगीत भारती, मंउी हाउस, नई दिल्ली
मातृकला मंदिर, अरविंद आश्रम, नई दिल्ली
गंधर्व महाविद्यालय, नयी दिल्ली
प्राचीन कलाकेंद्र चंडीगढ़
कत्थक केंद्र, नई दिल्ली
त्रिवेणी कला संगम, मंउी हाउस, नई दिल्ली
संगीत के विद्वानों के लिए व्याख्याता, शिक्षक, प्रशिक्षिक, संगीतकार आदि जैसे अनेक पद है। विभिन्न विद्यालयों में संगीत शिक्षक की मांग रहती है। मुख्य तौर पर शिक्षण क्षेत्र में ही ज्यादा संभावनाएं हैं। निजी संस्थान खोलकर ट्ïयूशन का कार्य कर सकते हैं या फिर आकाशवाणी और दूरर्शन में भी संगीतकारों की मांग पर आवेदन कर सकते हैं। आज प्राइवेट टी.वी चैनलों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यहाँ संगीतकारों की मांग भी बेतहाशा बढ़ रही है। इनकी सफलता का पूरा दारोमदार भी संगीत पर ही रहता है।

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