किसी भी कार्य की सफलता के लिए भावना अच्छी होनी चाहिए। कार्य को प्रारम्भ करने के पीछे हमारा भाव क्या है। हम क्या करना चाहते हैं इसका महत्व है। सफलता के लिए भगवान का सुमिरन कर कार्य करें। भगवान का ध्यान कर किए जाने वाले कार्य में सफलता अवश्य मिलती है। केवल परिश्रम से कुछ नहीं होता। कुछ लोग भगवान की असीम कृपा से कम परिश्रम में भी सफलता की ऊंचाइयों को छू लेते हैं। संतों ने सफलता के 3 मंत्र बताए। पहला भगवान का स्मरण, दूसरा धैर्य तथा तीसरा परमार्थ की भावना जुड़ी होनी चाहिए।
प्रत्येक मंदिर बाहर से स्वच्छ होना चाहिए और भीतर से पवित्र होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति भी बाहर से स्वच्छ और भीतर से पवित्र होना चाहिए। फिर कोई लम्बी साधना करने की जरूरत नहीं।
मां त्रिस्तरीय काम करती है। सृष्टि को उत्पन्न करती है, उसका परिपालन और उसका संघार करती है। अम्बा के 3 स्तर हैं, स्त्री शरीर अम्बा का ही अंश है। ऐसा मानकर उसका 3 स्तर पर सम्मान करना चाहिए। कन्या का सम्मान, धर्मपत्नी का सम्मान और मां का सम्मान। आनंद की अंतिम सीमा आंसू हैं। हम सबका जीवन फल होना चाहिए प्रेम। सत्य शायद हम चूक जाएं। करुणा छूट जाए लेकिन प्रेम बना रहे। यह जीवन का फल है।
प्रत्येक मंदिर बाहर से स्वच्छ होना चाहिए और भीतर से पवित्र होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति भी बाहर से स्वच्छ और भीतर से पवित्र होना चाहिए। फिर कोई लम्बी साधना करने की जरूरत नहीं।
मां त्रिस्तरीय काम करती है। सृष्टि को उत्पन्न करती है, उसका परिपालन और उसका संघार करती है। अम्बा के 3 स्तर हैं, स्त्री शरीर अम्बा का ही अंश है। ऐसा मानकर उसका 3 स्तर पर सम्मान करना चाहिए। कन्या का सम्मान, धर्मपत्नी का सम्मान और मां का सम्मान। आनंद की अंतिम सीमा आंसू हैं। हम सबका जीवन फल होना चाहिए प्रेम। सत्य शायद हम चूक जाएं। करुणा छूट जाए लेकिन प्रेम बना रहे। यह जीवन का फल है।
