पिछले आधे दशक से भी कम समय में स्कूल बैग (बस्ता) बाजार में तेजी के साथ-साथ बहुत कुछ बदलाव आया है। इसका एक प्रमुख कारण तो दिनों दिन पढऩे वाले बच्चों की बढ़ती संख्या है, दूसरे आकर्षक व नवीनतम डिजाइनों ने भी इस व्यवसाय में अपेक्षाकृत अधिक तेजी के तौर पर आप उपयोग स्थापित की है। आधुनिकता की होड़ और भेड़ चाल कें कारण मांग के अनुरूप आज बाजार में विभिन्न साइजों के साथ-साथ नवीनतम डिजाइनों के बस्ते उपलब्ध हैं। पिछले कई वर्षों से तो यह भी लोगों के लिए 'स्टेटस सिम्बलÓ के तौर पर उपयोग किया जाने लगा है। कुछ धनाढ्ïय तो साल में दो-तीन बार बच्चे को नए रंग-रूप और डिजाइनो के बस्ते खरीद कर देते हैं। वैसे बच्चों को जन्मदिन के ताहफे के तौर पर स्कूल बैग दिए जाने का चलन तो अब पुराना ही हो चुका है।
य उद्योग लघु स्तरपर लगभग बीस हजार रुपए से आरंभ किया जा सकता है, जिसे मांग और आपूर्ति के अनुसार धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है। वैसे इस उद्योग को और अधिक विस्तार देने के लिए स्कूल बैग के साथ-साथ 'बिसतर बंदÓ बनाने का कार्य भी किया जा सकता है, उसके लिए किसी अतिरिक्त साजोसामान की जरूरत नहीं पड़ती है। उत्पादन करने के स्थान पर केवल बस्ते सिलाई का कार्य भी किया जा सकता है। शहरों के बड़े दुकानदार अपने लिए थोक में ठेके पर बस्ता सिलाई का कार्य करवाते हैं, इसमें सारा सामान दुकानदार का ही होता है। इस कार्य में कारीगर को औसत 3 रुपए से 12 रुपए प्रति बस्ता मजदूरी पड़ती है।
यहउद्योग एक हॉलनुमा कमरे में तीन-चार सिलाई मशीनें लगा कर आरंभ किया जा सकता है। इस कार्य के लिए विशेष प्रकार की सिलाई मशीनें आती हैं, जिनकी उत्पादन क्षमता अन्य सामान्य सिलाई मशीनें से अधिक होती है। अच्छी कंपनी की ऐसी कसलाई मशीन लगभग साढ़े तीन-चार हजार रुपए की पड़ती है। एक मशीन पर कुशल व्यक्ति दिन भर में लगभग चार दर्जन बना लेता है।
इस उद्योग में कच्चे माल के रूप में मोटी तीन, टैटरान, जूट तथा कैनवास के पकड़ों का उपयोग किया जाता है। ऊँची कीमत के बस्तों के लिए वाटरप्रूफ कपड़ा प्रयुक्त होता है। अधिक बचत के लिए आप साधारण जीन, टैटारान आदि कपड़ों को अपने कारखाने में भी वाटरप्रूफ बना सकते हैं। इसके लिए साधारण कपड़े की मोम से घटाई की जाती है, और यदि अधिक अच्दे स्तर का वाटरप्रूफ करना है तो कपड़े पर लेमीनेशन करवा लिया जाता है।
बस्ते बनाने के उपयोग में आने वाले कपड़े 30 रुपए से 150 रुपए प्रति मीटर के भाव मिल जाते हैं। इसके अलावा स्ट्रेप, बक्कल, जिप, विभिन्न आकर-प्रकार के स्टीकर की भी कच्चे माल के रूप में जरूरत होती है। ये सब सामान थोक भाव से खरीदना चाहिए।
इस समय 25 रुपए से ज्यादा तक कीमत के बस्ते बाजार में उपलब्ध हैं। बस्ते की कीमत उसके कपड़े और डिजाइन के अनुरूप कम या अधिक होती है। उच्च क्वालिटी के कपड़े एवं अन्य अच्छे स्तर के सामान तथा फैन्सी डिजाइनिंग में बने हुए बस्ते उच्च आय वर्ग का उपभोक्ता मुंह मांगे दामों पर खरीदने को तत्पर रहता है। ऐसे बस्तों में पेंसिल बॉक्स, लंच बॉक्स कॉपी-किताबे रखनेके लिए अलग-अलग खाने होते हैं। इनमें बिढिय़ा किस्म की तीन-चार जिप चैन लगी होती हैं। बच्चों के द्वारा इन्हें उठाने के लिए तीन-तीन प्रकार के स्ट्रेप लगे होते हैं। हाथ में ब्रीफकेस की तरह उठाने के लिए हैंडल, दो शोल्डर स्ट्रेप पीठ पर लगाने के लिए तथा एक लंबा स्ट्रेप कंधे पर एक ओर लटकाने के लिए होता है। जबकि सस्ते किस्म के बस्तों पर ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता है, उनमें केवल कंधे पर लटकाने के लिए एक स्ट्रेप होता है।
साधारण किस्म के बस्तों का कपड़ा व अन्य सामान बहुत सस्ती कीमत का होता है, जो मुश्किल से चार-छह महीने ही चल पाता है। ऐसे बस्तों के लिए दुकानदार किसी प्रकार की गारण्टी नहीं देते हैं जबकि उच्च किस्म के महंगे बस्तों की किसी भी प्रकार की खराबी संबंधित दुकानदार गारन्टी देते है। ऐसे बस्ते फटने—खराब होने के कारण नहीं अपितु अरुचि और दिखावे के लिए चार-छह महीने में ही बदल दिए जाते हैं। खास तौर ऐ एसे ही बदलाव के कारण इस व्यवसाय में आय की अधिकतम संभावनाएं हो गई हैं।
उद्योग व्यवसाय चाहे कोई भी हो, इसे लगन-परिश्रम और योग्यता से ही चलाया और बढ़ाया जा सकता है। यह उद्योग भी आप लघु स्तर से आरंभ करके मेहनत और योग्यता के बल पर ऊंचे से ऊंचे स्तर तक बढ़ा सकते हैं।