क्या है माइक्रोफाइनांस?
माइक्रोफाइनांस को लागू करने के पीछे प्रमुख विचार समाज के सर्वहारा वर्ग एवं निम्न आय वर्ग को वित्तीय सुविधाएं उपलब्ध कराना है। ये वे लोग हैं जिनकी पहुंच बैंकिंग एवं पारम्परिक वित्तीय सेवाओं तक नहीं है। गत 2 दशकों के दौरान सरकारी, गैर-सरकारी संगठनों तथा बैंकिंग संस्थानों द्वारा इस क्षेत्र में विकास एवं सुविधाओं के लिए पर्याप्त कार्य किया गया है। इन सभी का उद्देश्य देश के गरीबों तक वित्तीय सुविधाएं पहुंचाना है।
माइक्रोफाइनांस को लघु स्तरीय वित्तीय सेवाओं के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अंतर्गत ऋण तथा बचत दोनों ही प्रकार की सेवाएं आती हैं जो शहरी एवं ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों के गरीबों के उत्थान के लिए है। यह आर्थिक सेवाओं में जोखिम कम करने, बचत एवं आत्म सशक्तिकरण को बढ़ावा देता है। माइक्रोफाइनांस में कई प्रकार की वित्तीय सुविधाएं शामिल हैं। इन सभी सेवाओं में एक सामान्य बात है कि इनमें पूंजी कम से कम लगाई जाती है। अधिकतर माइक्रोफाइनांस कार्यक्रमों में ऋण, बचत, जीवन बीमा तथा फसल बीमा शामिल होता है। इस तरह की सेवाएं समाज में उन लोगों के लिए वरदान साबित हो रही हैं जो पारंपरिक वित्तीय प्रणालियों का लाभ उठा पाने में असमर्थ हैं।
भारत में माइक्रोफाइनांस
माइक्रोफाइनांस गरीबी से लडऩे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) भारत में माइक्रोफाइनांस को प्रोत्साहित करने में अग्रणी है। इसके स्वसहायता समूह मॉडल ने वाणिज्यिक बैंकों को गरीबों के लिए ऋण निर्माण हेतु प्रेरित किया है। इससे स्वैच्छिक एजैंसियों, बैंक, सामाजिक रूप से उत्साही व्यक्तियों, अन्य औपचारिक एवं अनौपचारिक संस्थाओं तथा सरकारी तंत्र को स्वसहायता समूह और माइक्रोफाइनांस संस्थानों को बढ़ावा देने का प्रोत्साहन मिला है।
विशेष योजनाओं की वजह से वाणिज्यिक बैंक भी स्वसहायता समूहों और माइक्रोफाइनांस संस्थानों को ऋण उपलब्ध करवा रहे हैं। ये समूह और संस्थान इस राशि में से अपने सदस्यों को ऋण उपलब्ध करवाते हैं जो सीधे बैंक से प्राप्त करना कठिन होता है। इस प्रकार जरूरतमंद गरीबों को ऋण के रूप में एक वित्त पोषण स्रोत मिल जाता है जो ऋण लेने वाले को अपनी जानकारी के आधार पर राशि उपलब्ध करवाता है।
प्रमुख चुनौतियां
भारत में माइक्रोफाइनांस को सबसे पहले 1970 में शुरू किया गया। इस कार्यक्रम ने मात्र 40 वर्षों में अभूतपूर्व विकास किया तथा देश के सामाजिक ढांचे में सबसे नीचे के लोगों को प्रोत्साहित कर उन्हें मुख्यधारा में लाने का काम किया। इसके लिए घरेलू तथा विदेशी स्वप्रेरित दानियों एवं निवेशकों को भी प्रोत्साहित किया गया। छोटे ऋणों की बढ़ती मांग तथा उच्च ब्याज दर के चलते माइक्रोफाइनांस संगठन इसे अंशों में बांटते हैं जिससे कृत्रिम रूप से इसकी ब्याज दर कम हो जाती है और इसकी पहुंच अत्यधिक गरीबों तक हो जाती है।
उच्च विकास क्षमता को देखते हुए माइक्रोफाइनांस संगठनों की ओर कई उद्योगों का ध्यान गया है तथा कई बार ऋण लिए जाने पर कोई रोक नहीं है। इस वजह से भी इनकी लोकप्रियता काफी बढ़ी है। इनके तीव्र विकास तथा बढ़ते हुए लाभ की वजह से इस पर कई प्रकार के सवाल भी उठाए जा रहे हैं। इसके कार्पोरेट प्रशासन तथा व्यापार मॉडल की व्यावहार्यता पर ही कई बार प्रश्र उठ चुके हैं। माइक्रोफाइनांस संगठन का ग्राहक आधार इसकी ख्याति की प्रमुख वजह है। इसी वजह से राजनीतिक सक्रियावादी इसे नियंत्रित एवं इसका लाभ उठाना चाहते हैं। इसकी मुख्य वजह इसके लाभ की उच्च दर तथा वह विकास है जो गरीबों से इन्हें होता है। यद्यपि भारत के कई गैर-सरकारी संगठनों ने अपनी स्वयं की माइक्रोफाइनांस इकाई स्थापित कर ली हैं, इनमें से कई संगठनों के पास इस क्षेत्र का कोई अनुभव नहीं है, फिर भी इस क्षेत्र में सार्वजनिक सेवा एवं समर्पण की वजह से एन.जी.ओ. इस ओर आ रहे हैं।
माइक्रोफाइनांस का प्रभाव एवं भविष्य
देश में माइक्रोफाइनांस तेजी से बढ़ रहा है। विकास और वृद्धि की प्रक्रिया शुरू करने में यह एक शक्तिशाली उपकरण साबित हुआ है। सभी सेवाओं के लिए सामान्य वसूली दर सारे एम.एफ.आई. के लिए बहुत उच्च है। हालांकि कथित जोखिम के कारण औपचारिक क्षेत्र की तुलना में ब्याज दर अधिक है, एम.एफ.आई. अभी भी स्थानीय साहूकारों के मुकाबले कम अंतर पर कर्ज देती है।
माइक्रोफाइनांस से सामाजिक और आॢथक सशक्तिकरण प्रदान करने में मदद मिली है। ऋण की उपलब्धता विकास के लिए सहायक हो सकती है, लेकिन गरीबी उन्मूलन के लिए ऋण राशि भी कम है। इस तरह सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आजीविका हेतु ऋण प्रदान करने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई है। माइक्रोफाइनांस की पहुंच लगातार बढऩे के साथ स्वसहायता समूह और उनके परिसंघों ने सामाजिक स्थान और राजनीतिक शक्ति प्रदान की है जिसकी गरीबों को इन बाधाओं से लडऩे के लिए जरूरत है। क्षेत्र में विस्तार की गुंजाइश सामाजिक झुकाव वाले लाभकारी और गैर-लाभकारी दोनों तरह के संगठनों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
माइक्रोफाइनांस को लागू करने के पीछे प्रमुख विचार समाज के सर्वहारा वर्ग एवं निम्न आय वर्ग को वित्तीय सुविधाएं उपलब्ध कराना है। ये वे लोग हैं जिनकी पहुंच बैंकिंग एवं पारम्परिक वित्तीय सेवाओं तक नहीं है। गत 2 दशकों के दौरान सरकारी, गैर-सरकारी संगठनों तथा बैंकिंग संस्थानों द्वारा इस क्षेत्र में विकास एवं सुविधाओं के लिए पर्याप्त कार्य किया गया है। इन सभी का उद्देश्य देश के गरीबों तक वित्तीय सुविधाएं पहुंचाना है।
माइक्रोफाइनांस को लघु स्तरीय वित्तीय सेवाओं के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अंतर्गत ऋण तथा बचत दोनों ही प्रकार की सेवाएं आती हैं जो शहरी एवं ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों के गरीबों के उत्थान के लिए है। यह आर्थिक सेवाओं में जोखिम कम करने, बचत एवं आत्म सशक्तिकरण को बढ़ावा देता है। माइक्रोफाइनांस में कई प्रकार की वित्तीय सुविधाएं शामिल हैं। इन सभी सेवाओं में एक सामान्य बात है कि इनमें पूंजी कम से कम लगाई जाती है। अधिकतर माइक्रोफाइनांस कार्यक्रमों में ऋण, बचत, जीवन बीमा तथा फसल बीमा शामिल होता है। इस तरह की सेवाएं समाज में उन लोगों के लिए वरदान साबित हो रही हैं जो पारंपरिक वित्तीय प्रणालियों का लाभ उठा पाने में असमर्थ हैं।
भारत में माइक्रोफाइनांस
माइक्रोफाइनांस गरीबी से लडऩे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) भारत में माइक्रोफाइनांस को प्रोत्साहित करने में अग्रणी है। इसके स्वसहायता समूह मॉडल ने वाणिज्यिक बैंकों को गरीबों के लिए ऋण निर्माण हेतु प्रेरित किया है। इससे स्वैच्छिक एजैंसियों, बैंक, सामाजिक रूप से उत्साही व्यक्तियों, अन्य औपचारिक एवं अनौपचारिक संस्थाओं तथा सरकारी तंत्र को स्वसहायता समूह और माइक्रोफाइनांस संस्थानों को बढ़ावा देने का प्रोत्साहन मिला है।
विशेष योजनाओं की वजह से वाणिज्यिक बैंक भी स्वसहायता समूहों और माइक्रोफाइनांस संस्थानों को ऋण उपलब्ध करवा रहे हैं। ये समूह और संस्थान इस राशि में से अपने सदस्यों को ऋण उपलब्ध करवाते हैं जो सीधे बैंक से प्राप्त करना कठिन होता है। इस प्रकार जरूरतमंद गरीबों को ऋण के रूप में एक वित्त पोषण स्रोत मिल जाता है जो ऋण लेने वाले को अपनी जानकारी के आधार पर राशि उपलब्ध करवाता है।
प्रमुख चुनौतियां
भारत में माइक्रोफाइनांस को सबसे पहले 1970 में शुरू किया गया। इस कार्यक्रम ने मात्र 40 वर्षों में अभूतपूर्व विकास किया तथा देश के सामाजिक ढांचे में सबसे नीचे के लोगों को प्रोत्साहित कर उन्हें मुख्यधारा में लाने का काम किया। इसके लिए घरेलू तथा विदेशी स्वप्रेरित दानियों एवं निवेशकों को भी प्रोत्साहित किया गया। छोटे ऋणों की बढ़ती मांग तथा उच्च ब्याज दर के चलते माइक्रोफाइनांस संगठन इसे अंशों में बांटते हैं जिससे कृत्रिम रूप से इसकी ब्याज दर कम हो जाती है और इसकी पहुंच अत्यधिक गरीबों तक हो जाती है।
उच्च विकास क्षमता को देखते हुए माइक्रोफाइनांस संगठनों की ओर कई उद्योगों का ध्यान गया है तथा कई बार ऋण लिए जाने पर कोई रोक नहीं है। इस वजह से भी इनकी लोकप्रियता काफी बढ़ी है। इनके तीव्र विकास तथा बढ़ते हुए लाभ की वजह से इस पर कई प्रकार के सवाल भी उठाए जा रहे हैं। इसके कार्पोरेट प्रशासन तथा व्यापार मॉडल की व्यावहार्यता पर ही कई बार प्रश्र उठ चुके हैं। माइक्रोफाइनांस संगठन का ग्राहक आधार इसकी ख्याति की प्रमुख वजह है। इसी वजह से राजनीतिक सक्रियावादी इसे नियंत्रित एवं इसका लाभ उठाना चाहते हैं। इसकी मुख्य वजह इसके लाभ की उच्च दर तथा वह विकास है जो गरीबों से इन्हें होता है। यद्यपि भारत के कई गैर-सरकारी संगठनों ने अपनी स्वयं की माइक्रोफाइनांस इकाई स्थापित कर ली हैं, इनमें से कई संगठनों के पास इस क्षेत्र का कोई अनुभव नहीं है, फिर भी इस क्षेत्र में सार्वजनिक सेवा एवं समर्पण की वजह से एन.जी.ओ. इस ओर आ रहे हैं।
माइक्रोफाइनांस का प्रभाव एवं भविष्य
देश में माइक्रोफाइनांस तेजी से बढ़ रहा है। विकास और वृद्धि की प्रक्रिया शुरू करने में यह एक शक्तिशाली उपकरण साबित हुआ है। सभी सेवाओं के लिए सामान्य वसूली दर सारे एम.एफ.आई. के लिए बहुत उच्च है। हालांकि कथित जोखिम के कारण औपचारिक क्षेत्र की तुलना में ब्याज दर अधिक है, एम.एफ.आई. अभी भी स्थानीय साहूकारों के मुकाबले कम अंतर पर कर्ज देती है।
माइक्रोफाइनांस से सामाजिक और आॢथक सशक्तिकरण प्रदान करने में मदद मिली है। ऋण की उपलब्धता विकास के लिए सहायक हो सकती है, लेकिन गरीबी उन्मूलन के लिए ऋण राशि भी कम है। इस तरह सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आजीविका हेतु ऋण प्रदान करने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई है। माइक्रोफाइनांस की पहुंच लगातार बढऩे के साथ स्वसहायता समूह और उनके परिसंघों ने सामाजिक स्थान और राजनीतिक शक्ति प्रदान की है जिसकी गरीबों को इन बाधाओं से लडऩे के लिए जरूरत है। क्षेत्र में विस्तार की गुंजाइश सामाजिक झुकाव वाले लाभकारी और गैर-लाभकारी दोनों तरह के संगठनों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
शुरूआती तनख्वाह: 20 हजार रुपए प्रतिमाह
प्रमुख नियोक्ता
एस.के.एस. माइक्रोफाइनांस, सपंदन स्फूर्ति फाइनांशियल, शेयर माइक्रोफिन, अस्मिता माइक्रोफिन, श्री क्षेत्र धर्मस्थल रूरल डिवैल्पमैंट प्रोजैक्ट इस क्षेत्र के प्रमुख नियोक्ता हैं। अब आई.सी.आई.सी.आआर्इ एवं एच.डी.एफ.सी. बैंक की भी सक्रिय माइक्रोफनांस शाखाएं हैं।
प्रमुख नियोक्ता
एस.के.एस. माइक्रोफाइनांस, सपंदन स्फूर्ति फाइनांशियल, शेयर माइक्रोफिन, अस्मिता माइक्रोफिन, श्री क्षेत्र धर्मस्थल रूरल डिवैल्पमैंट प्रोजैक्ट इस क्षेत्र के प्रमुख नियोक्ता हैं। अब आई.सी.आई.सी.आआर्इ एवं एच.डी.एफ.सी. बैंक की भी सक्रिय माइक्रोफनांस शाखाएं हैं।
संस्थान
इंडियन इंस्टीच्यूट आफ बैकिंग एंड फाइनांस, मुंम्बर्इ, महाराष्ट्र (डिप्लोमा इन माइक्रोफाइनांस)
इंस्टीच्यूट आफ फाइनांस, बैकिंग एंड इंश्योरैंस (पेशेवरों के लिए तीन दिवसीय कोर्स)
इंडियन इंस्टीच्यूट आफ बैकिंग एंड फाइनांस, मुंम्बर्इ, महाराष्ट्र (डिप्लोमा इन माइक्रोफाइनांस)
इंस्टीच्यूट आफ फाइनांस, बैकिंग एंड इंश्योरैंस (पेशेवरों के लिए तीन दिवसीय कोर्स)
