न्यू एज टीचर्स

Teacher's Day Special न्यू एज टीचर्स
सीनियर सेकंडरी स्कूल में पढ रहा 17 साल का राहुल देर रात तक फोन पर बातें किया करता था। उसके पेरेंट्स ने कई बार नोटिस किया, लेकिन एक दिन जब हद हो गई, तो उन्होंने उसे चुपचाप बातें करते हुए सुना। पता चला कि वह किसी को फोन पर मैथ की प्रॉब्ल्म्स सॉल्व करवा रहा है। पेरेंट्स ने उससे पूछा, तो उसने बताया कि वह गरीब स्टूडेंट्स को पढाता है और उनके मैथ स्किल्स डेवलप करने में हेल्प करता है। उन्होंने इस इनिशिएटिव की तारीफ तो की, लेकिन साथ ही नसीहत भी दी कि कहीं खुद के एग्जाम्स में उसके नंबर कम न रह जाएं। जब राहुल का रिजल्ट आया तो वह स्कूल का टॉपर था। साथ ही, उसके पढाए सभी बच्चों की मैथ में डिस्टिंक्शन आई थी। देश में ऐसे कई युवा हैं, जो किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में टीचर तो नहीं हैं, लेकिन खुद आगे बढकर अंडर प्रिविलेच्ड स्टूडेंट्स को गाइड कर रहे हैं..वह भी फ्री में.। यानी जो काम स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी के ट्रेंड टीचर्स को करना चाहिए, उसे बिना किसी के कहे संभाल लिया है जागरूक स्टूडेंट्स-कम-टीचर्स ने..
स्वामी विवेकानंद से इंस्पायर्ड
यह सच है कि देश का लिटरेसी रेट बढा है, लेकिन ऐसे बच्चों की तादाद भी अच्छी-खासी बनी हुई है, जो टैलेंटेड होते हुए भी सही अपॉ‌र्च्युनिटी न मिलने से पिछड रहे हैं। ये बच्चे सपने तो देखते हैं, अच्छी तालीम भी हासिल करना चाहते हैं, लेकिन जिस कम्युनिटी में सर्वाइव करना ही मुश्किल है, वहां दिनों-दिन महंगी होती एजुकेशन को कैसे हासिल करें। सोसायटी के इन्हीं बच्चों के लिए रोशनी की किरण बनकर आए हैं आईआईटी दिल्ली और दिल्ली यूनिवर्सिटी के अलग-अलग कॉलेजेज के वे स्टूडेंट्स, जो अपनी पढाई के साथ गरीब तबके के बच्चों को बेसिक एजुकेशन दे रहे हैं। इतना ही नहीं, वे पूरे जोश-खरोश से उनकी स्किल्स को डेवलप करने में लगे हैं। आईआईटी दिल्ली के दर्जन भर से ज्यादा स्टूडेंट्स ने मिलकर एन इनिशिएटिव फॉर नेशनल एडवांसमेंट (एआईएनए) नाम से एक ग्रुप ही बना रखा है। ये ग्रुप स्वामी विवेकानंद के अराइज, अवेक एंड स्टॉप नॉट टिल योर गोल इज रिच्ड मैसेज से इंस्पायर्ड है। इसके मेंबर्स का मानना है कि बेशक दुनिया उन्हें बेस्ट प्रॉब्लम सॉल्वर मानती हो, लेकिन वे ऐसा नहीं समझते। इन स्टूडेंट्स का कहना है कि सिर्फ इंजीनियरिंग के प्रॉब्लम्स सॉल्व करना उनका मकसद नहीं है, बल्कि वे सोसायटी में मौजूद कमियों-खामियों को दूर करने का इरादा रखते हैं। यानी वे समस्या नहीं, उसका हल बनना चाहते हैं और इसके लिए इन्होंने ऐसे बच्चों को एजुकेट करने का डिसीजन लिया, जो मेनस्ट्रीम से कटे थे।
स्टूडेंट्स बने मेंटर
दिल्ली आईआईटी के थर्ड ईयर कंप्यूटर साइंस के स्टूडेंट शुभम ने बताया कि आईना (एआईएनए) ने सबसे पहले ट्यूज्डे टीचिंग क्लास से शुरुआत की थी। बच्चों को क्लस्टर्स में बांट कर (जूनियर, सेकंडरी और हायर सेकंडरी लेवल) पढाया जाता था। धीरे-धीरे फ्राइडे और संडे को भी उन्हें पढाई के साथ-साथ दूसरे क्रिएटिव व‌र्क्स कराए जाने लगे। शुभम कहते हैं, ये बच्चे गवर्नमेंट स्कूल में पढते हैं, लेकिन उन्हें एक्स्ट्रा मदद की जरूरत होती है, इसीलिए बच्चों को मुनिरका इलाके में एक मंदिर में सारे सब्जेक्ट्स पढाए जाते हैं। फ्राइडे को खासकर इंग्लिश की क्लासेज होती हैं। हमने एनसीईआरटी को बेस कर अपना करिकुलम बनाया है, जिससे कि बच्चों को पढाने में आसानी हो। बीते तीन साल से शुभम इन बच्चों के साथ जुडे हैं और ये महसूस करते हैं कि उनमें कई तरह के पॉजिटिव चेंजेज आए हैं, जैसे वे लडाई नहीं करते बल्कि कंस्ट्रक्टिव गेम खेलते हैं। देशभक्ति के गीत गाते हैं। उनके एकेडमिक रिजल्ट्स पहले से बेहतर हुए हैं। उन्होंने बताया कि पिछले साल कुछ बच्चे तो 95 परसेंट मा‌र्क्स तक लाए थे।
आर.के. पुरम के पास झुग्गी बस्ती में रहने वाला भोपाल पहले किसी से ठीक से बात नहीं कर पाता था, लेकिन आज पेंटिंग बनाता है और स्टडीज में भी अच्छा कर रहा है। आठवीं में पढ रहा भोपाल कहता है कि भइया लोग बहुत अच्छी बातें सिखाते हैं। इसलिए पढने में अच्छा लगता है और मम्मी-पापा भी गुस्सा नहीं करते हैं। इन स्टूडेंट्स का मानना है कि कोई भी चेंज अचानक नहीं आता है। रोम भी एक दिन में नहीं बना था। इसलिए कोशिश करने से ही बात बनेगी।
गिविंग वैल्यू एजुकेशन
दिल्ली आईआईटी के फाइनल ईयर कंप्यूटर साइंस के स्टूडेंट तरुण मांगला भी हर मंगलवार करीब डेढ घंटे बच्चों को पढाते हैं। वे बेसिक्स को ठीक करने से लेकर स्कूल की पढाई में मदद करते हैं। तरुण कहते हैं, शुरू में बच्चे कुछ पूछने में थोडा संकोच करते हैं, लेकिन एक बार खुलने के बाद वे डेली लाइफ की प्रॉब्ल्म्स से लेकर स्टडीज के बारे में ढेर सारे क्वैश्चन करते हैं। तरुण की मानें तो ये बच्चे काफी टैलेंटेड होते हैं, कोई अच्छा डांसर होता है, कोई पेंटर। बस उन्हें थोडा डायरेक्शन देने, थोडा नर्चर करने की जरूरत होती है। तरुण और शुभम की ही तरह आईना ग्रुप के एक और मेंबर, प्रोडक्शन इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर स्टूडेंट प्रणाम बंसल बीते दो साल से ऐसे बच्चों की जिंदगी में कुछ उजाला लाने की कोशिश कर रहे हैं। वे बच्चों को स्टोरीज, सिंपल एक्सपेरिमेंट्स और वीडियोज की हेल्प से एजुकेट करते हैं। पढाई के साथ-साथ उनमें वैल्यूज डेवलप करना इनकी प्रॉयरिटी होती है। आखिर खुद की पढाई पर ध्यान देते हुए इन बच्चों के लिए समय निकाल पाना कितना मुश्किल होता है, पूछने पर इन सभी आईआईटिएंस से एक ही आंसर मिला। वेयर देयर इज ए विल, देयर इज ए वे। इनका कहना है कि बेशक ये बच्चों को पढाते हैं, लेकिन इस दौरान उन्हें भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
प्राइमरी एजुकेशन नॉट वेल
आज भले ही नए इनिशिएटिव्स लिए जा रहे हों, बच्चों को फ्री में स्कूल यूनिफॉ‌र्म्स, बुक्स दी जा रही हों, मिड डे मील स्कीम्स चल रही हों, लेकिन फिर भी गवर्नमेंट स्कूल्स में टीचर्स की कमी बनी हुई है। जो हैं भी, उन्हें प्रॉपर ट्रेनिंग नहीं दी गई है, ताकि वे क्वॉलिटी एजुकेशन दे सकें। इन न्यू एज टीचर्स का भी मानना है कि देश में प्राइमरी एजुकेशन के लेवल पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है। रूरल एरियाज हों या अर्बन, गवर्नमेंट स्कूल्स में बेसिक एमिनिटीज नहीं होतीं। क्वॉलिटी टीचर्स नहीं होते। बच्चे क्लासेज में आगे बढ तो जाते हैं, लेकिन उन्हें कैलकुलेशन तक नहीं आती। क्योंकि टीचर की कोई अकाउंटेबिलिटी तय नहीं हो पाई है, इसलिए स्कूल में पढाई हो रही या नहीं, इस पर ध्यान नहीं होता। प्रणाम कहते हैं, बच्चों में काफी लगन होती है। उन्हें लगता है कि पढेंगे तो भइया लोगों की तरह बनेंगे। ऐसा वे स्कूल के टीचर के लिए भी सोच सकते थे, लेकिन नहीं सोचते। आखिर क्यों.? जवाब हम सभी जानते हैं। और शायद यही वजह है कि सोसायटी में आल्टरनेटिव टीचिंग स्पेस क्रिएट हो रहा है। एनजीओ के अलावा आईआईटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी के अलग-अलग कॉलेजेज के स्टूडेंट्स वॉलंटियरली अंडरप्रिविलिजेच्ड बच्चों की लाइफ संवार रहे हैं। मानवी खन्ना दिल्ली के गार्गी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन कर रही हैं, लेकिन दिल में सोसायटी के गरीब तबके के बच्चों के लिए कुछ करने की चाहत थी, इसलिए स्ट्रीट चिल्ड्रेन के लिए काम करने वाले एनजीओ से जुड गईं। बच्चों को स्टोरी के जरिए पढाना, उन्हें आर्ट एंड क्राफ्ट सिखाना और स्किल डेवलप करना, उन्हें कुछ इतना पसंद आया कि वे हर शनिवार को तीन घंटे इन बच्चों के लिए निकाल ही लेती हैं। मानवी कहती हैं, ये तीन घंटे उस दिन का बेस्ट पार्ट होता है। बच्चे आपको इतना कुछ देते हैं कि आप खुद पर प्राउड फील करने लगते हैं।
प्रोवाइडिंग प्लेटफॉर्म
दरअसल, एजुकेशन ही वह जरिया है जिससे एक बच्चा अपने ड्रीम्स, अपने एस्पीरेशंस को पूरा कर सकता है। अपनी कैपेबिलिटी को पहचान पाता है। लेकिन अगर उसे वह माहौल, वह मौका ही नहीं मिले, तो बच्चा क्या करेगा। गरीब तबके के बच्चों के सामने ये सबसे बडी प्रॉब्लम है। सही एजुकेशन न मिलने के कारण उनमें सोचने, क्वैश्चन करने, डिसीजन लेने की क्षमता ही नहीं डेवलप हो पाती है। उनका कॉन्फिडेंस लेवल इतना लो होता है कि अपने टैलेंट को भी नहीं जान पाते। स्कूल ड्राप- आउट्स और इन जैसे दूसरे बच्चों को एजुकेट करने में लगीं आरोहण संस्था की डायरेक्टर रानी पटेल कहती हैं, कुछ लोगों का मानना है कि इंडिया में किशोरों की संख्या काफी ज्यादा है। अगर इन्हें ठीक से एजुकेट और ट्रेन किया जाए, तो हमारा देश डेवलप्ड कंट्रीज की कतार में खडा हो सकता है, लेकिन हकीकत में ऐसा हो नहीं पा रहा है। हालांकि रानी स्टूडेंट वॉलंटियर्स और कुछ दूसरे लोगों की मदद से गरीब तबके के बच्चों को शिक्षित करने के साथ, उन्हें इस काबिल बना रही हैं कि उनका एडमिशन अच्छे स्कूल में हो सके। एक बार बच्चे का दाखिला हो जाता है, तो उसकी पढाई की पूरी रिस्पॉन्सिबिलिटी उनकी संस्था उठाती है। अब तक इनकी कोशिशों से 700 से ज्यादा बच्चे अलग-अलग स्कूल्स में पढाई कर रहे हैं।
टैलेंट की पहचान
जेन वाई बदल रहा है। वह समझ रहा है कि जो उसे हासिल है, गरीब तबके के बच्चों या किशोरों के पास नहीं है। वे चीजों को टेकन फॉर ग्रांटेड नहीं ले सकते। उन्हें एक प्लेटफॉर्म, एक गाइड चाहिए होता है। जैसे कि दिल्ली के शेख सराय की स्लम बस्ती जगदंबा कैंप में रह रहे 16 साल के सूरज को। उसके अंदर बहुत सारी एनर्जी थी जो यूटलाइज नहीं हो रही थी। लेकिन दिल्ली की इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी से एलएलबी कर रहे करण देसाई ने सूरज के टैलेंट को पहचाना और उसे ताइक्वॉन्डो की ट्रेनिंग देनी शुरू की। खुद ताइक्वॉन्डो के स्टेट लेवल चैंपियन रह चुके करण कहते हैं, मैं फरवरी से सूरज को ट्रेन कर रहा हूं ताकि 23 नवंबर को दिल्ली में होने वाले स्टेट लेवल ताइक्वॉन्डो चैंपियनशिप में उससे शामिल करा सकूं। इस चैंपियनशिप में देश के 25 राच्यों के खिलाडी हिस्सा लेंगे। सूरज ने बताया कि वह चैंपियनशिप के लिए कडी मेहनत कर रहे हैं। आज की तारीख में जगदंबा कैंप में सूरज जैसे कितने ही होनहार बच्चों को एक गुरु की जरूरत है। खुद करण कम से कम 15 से 20 लडके-लडकियों को ताइक्वॉन्डो के अलावा इंग्लिश पढाते हैं। इतना ही नहीं, वे बच्चों के लिए हर वक्त फोन पर अवेलेबल रहते हैं। खुद की पढाई के साथ अलग से इतनी बडी रिस्पॉन्सिबिलिटी संभालने से कई बार लाइफ हेक्टिक हो जाती है, लेकिन इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पडता है।
बिल्डिंग कॉन्फिडेंस
न्यू एज टीचर्स में सबसे अच्छी बात ये देखने को मिली कि ये अपने आइडियाज को बखूबी शेयर करना जानते हैं। इसलिए कोई बच्चा अगर बहस करता है या कोऑपरेट नहीं करता है, फिर भी वे बुरा नहीं मानते हैं। उल्टा कोशिश करते हैं कि उनमें अच्छे वैल्यूज, स्पो‌र्ट्समेनशिप क्वॉलिटी और कॉन्फिडेंस बिल्ड अप कर सकें। दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज की सोशियोलॉजी की सेकंड ईयर की स्टूडेंट मेघना खुराना का कहना है कि इन बच्चों को सिर्फ रिसोर्सेज चाहिए। उसके बाद आप देखेंगे कि ये कितना अच्छा परफॉर्म करते हैं और आगे बढते हैं। मेघना खुद पढाई के बीच से समय निकाल कर हफ्ते में दो दिन सातवीं, आठवीं और नौवीं क्लास के अंडरप्रिविलेज्ड बच्चों को इंग्लिश, मैथ्स, साइंस और सोशल साइंस पढाती हैं। मेघना कहती हैं, बच्चे क्वैश्चन नहीं पूछते थे। मैंने समझाया कि अगर सवाल पूछोगे नहीं तो सीखोगे कैसे। इसके बाद धीरे-धीरे उनमें हिम्मत आई और वे सवाल पूछने लगे। इससे उनके एकेडमिक रिजल्ट्स अच्छे हो गए। आज न सिर्फ उनके, बल्कि मेरे पेरेंट्स को भी मुझ पर गर्व है। मेघना की ही तरह लेडी श्रीराम कॉलेज की थर्ड ईयर साइकोलॉजी की स्टूडेंट हिमानी खुद की स्टडीज के बीच ऐसे बच्चों को इंग्लिश और हिस्ट्री में गाइड करती हैं। ये काम करके उन्हें पर्सनल सैटिस्फैक्शन मिलता है।
दूसरी ओर अंबेडकर यूनिवर्सिटी से एनवॉयरनमेंट साइंस में मास्टर्स कर रहे सुमीत बिदला की भी कोशिश होती है कि बच्चों को रट्टामार टेक्निक से निजात दिलाएं। वे छोटे-छोटे एग्जांपल्स देकर उन्हें समझाते हैं। बीते एक साल से बच्चों को साइंस, मैथ्स और इंग्लिश पढा रहे सुमीत कहते हैं, सिर्फ फॉर्मल एजुकेशन ही नहीं, डांस, ड्रामा और दूसरे स्किल्स को डेवलप करके भी बच्चों को मेनस्ट्रीम से जोडा जा सकता है।
लाइफ स्किल्स में ट्रेनिंग
जगदंबा कैंप में वॉलंटियर्स के साथ काम कर रही स्वेच्छा संस्था की नेहा ने बताया कि स्लम के बच्चों के पास कोई लर्निग स्पेस नहीं था। इसलिए यहां किताब घर नाम से एक लाइब्रेरी खोली गई। इसके अलावा रेमेडियल इंग्लिश क्लासेज चलाई जाती हैं। थियेटर, पपेट्री सिखाई जाती है। कह सकते हैं कि बच्चों को पढाई के साथ-साथ लाइफ स्किल्स में भी ट्रेन किया जा रहा है, जिससे एजुकेशन सेक्टर में बडा चेंज आ रहा है।
फॉलो योर ड्रीम्स एंड फॉरगेट एवरीथिंग
फिल्म थ्री इडियट्स में दिखाया गया था कि एक बच्चा सिर्फ एजुकेशन से ही नहीं, किसी और मीडियम से भी आगे बढ सकता है। कुछ वैसा ही एक्सपेरिमेंट और उसे इंप्लीमेंट कराने की कोशिश में जुटे हैं एयरोनॉटकिल इंजीनियर और एजुकेशनिस्ट प्रेम फकीरा। उनका मानना है कि करियर बनाने पर फोकस करने से ज्यादा बच्चे की इंटर्नल कैपेबिलिटी, उनकी क्रिएटिविटी को बढाना इंपॉटर्ेंट है। उनके मुताबिक बच्चों पर करियर थोपना गलत है। पैसे से ज्यादा जरूरी सैटिस्फैक्शन है। अगर बच्चे अपनी ड्रीम को फॉलो करेंगे, तो जाहिर तौर पर उन्हें अच्छा लगेगा। इसीलिए वे बच्चों को गाइड करते हैं, उनकी काउंसिलिंग करते हैं कि वे अपनी ड्रीम और स्किल को पहचानें और फिर उसी पर काम करें।
चेंज मेकर, ट्रेंड सेटर
मेडिकल रीजंस देकर ऑफिस से पहले छुट्टी ली। फिर अच्छी-खासी जॉब छोड दी। इसी के बाद सोनल कपूर ने डाली प्रोत्साहन की नींव। एक ऐसी संस्था जिसका मकसद सडकों पर रहने वाले बच्चों को एजुकेट करने के साथ उनके स्किल्स को मांझना था। सोनल कहती हैं कि प्रोत्साहन की शुरुआत की कहानी बेहद दिलचस्प है। उन्होंने बताया कि 2010 में वे दिल्ली के विकास नगर स्लम में एक कॉरपोरेट फिल्म शूट कर रही थीं, तभी उनका सामना एक ऐसी महिला से हुआ जिसकी छह लडकियां थीं और सातवें का नंबर लगा था। लेकिन महिला नहीं चाहती थी कि इस बार भी बेटी हो। जबकि वह बेटियों को पढाती भी नहीं थी। उसके इस जवाब ने उन्हें इतना डिस्टर्ब कर दिया कि सोनल ने लडकियों के लिए एक स्कूल खोलने का फैसला कर लिया। विकास नगर में ही 1500 रुपये में किराये का एक कमरा लिया और वहीं फ्रेंड्स के साथ मिलकर लडकियों को पढाना शुरू कर दिया। स्टार्टिंग में पेरेंट्स बेटियों को स्कूल भेजने को रेडी नहीं थे। उन्हें समझाने में समय लगा। सोनल कहती हैं, हमने आठ से दस महीने का बेसिक कनेक्ट कोर्स शुरू किया जिसमें बच्चों को कलरिंग, आर्ट, हिंदी, इंग्लिश, मैथ्स की बेसिक एजुकेशन देकर उन्हें गवर्नमेंट स्कूल में एडमिशन दिलाया। अब तक तकरीबन 65 से 70 परसेंट ग‌र्ल्स को स्कूल्स में एडमिशन मिल चुका है। हां, कुछ फेल्योर्स भी हाथ लगे हैं, लेकिन उन बच्चों को पेंटिंग जैसी दूसरी एक्टिविटीज में ट्रेनिंग दी गई। कॉलेज स्टूडेंट्स बच्चों को बेसिक एजुकेशन के अलावा फोटोग्राफी, डिजाइन आर्ट, फिल्म मेकिंग, डिजिटल आर्ट में ट्रेन कर रहे हैं। सोनल बताती हैं कि अंशु कभी सडकों से कचरा इकट्ठा करती थी, लेकिन आज वह एक कलमकारी आर्टिस्ट, चाइल्ड फिल्ममेकर बन चुकी है। सोनल कहती हैं, वे इस काम के लिए किसी से फाइनेंशियल सपोर्ट नहीं लेतीं, लेकिन आज यूएस, ऑस्ट्रेलिया तक से लोग हेल्प के लिए आगे आ रहे हैं।
यंग तु‌र्क्स ने बदली तस्वीर
चार यंगस्टर्स। दो आईआईटी मुंबई के अंडरग्रेजुएट स्टूडेंट वैभव देवनाथन और रोहित सिंह, तीसरे हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के ग्रेजुएट अक्षय सक्सेना और चौथे बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के कृष्ण रामकुमार ने पुडुचेरी के नवोदय विद्यालय में अवंती सेंटर की नींव रखी। 70 बच्चों को कोचिंग देना शुरू किया गया। अगले दो साल में स्कूल पीयर कोचिंग प्रोग्राम के जरिए देश के अलग-अलग सेंटर्स पर बच्चों को गाइड किया जाने लगा। अवंती का मकसद था, इंडिया के हरेक ब्राइट और मोटिवेटेड हाई स्कूल स्टूडेंट तक टॉप क्वॉॅलिटी अंडरग्रेजुएट एजुकेशन पहुंचाना। इन सभी की एक ही साझा कोशिश थी, आईआईटी में एडमिशन के लिए होने वाले ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जाम यानी जेईई क्वॉलिफाई करने का ड्रीम देखने वाले अंडरप्रिविलेज्ड किशोरों को सही डायरेक्शन और मोटिवेशन देना। इस प्रयास का ही नतीजा रहा कि बीते सालों में यहां से गाइडेंस लेने वाले कई यंगस्टर्स आईआईटी में सक्सेसफुल रहे हैं। इसके अलावा उन्हें दूसरे इंजीनियरिंग और टेक्निकल इंस्टीट्यूट्स में एडमिशन मिला है। इस साल पूरे इंडिया से कुल 89 में से 51 अवंती फेलोज ने जेईई का मेन एग्जाम क्वॉलिफाई किया और इसके एडवांस एग्जाम में शामिल हुए। इसमें से 20 स्टूडेंट्स ने एडवांस एग्जाम क्लियर किया है।
अवंती के नॉर्थ इंडिया ऑपरेशंस को देख रहीं मनीषा कुकरेजा खुद आईआईटी कानपुर की ग्रेजुएट रही हैं। पढाई के बाद वे यूएस और मलेशिया चली गईं थीं। वहां कई मल्टीनेशनल कंपनियों में काम किया, लेकिन लाइफ में कुछ मीनिंगफुल करने की चाहत में वापस इंडिया लौट आईं और अवंती से जुड गईं। हालांकि इससे पहले आईआईटी में रहते हुए वह डॉ. एच. सी. वर्मा के शिक्षा सोपान के साथ जुडकर भी गरीब जरूरतमंद बच्चों को इंजीनियरिंग की तैयारी कराती थीं। मनीषा खुद को लकी मानती हैं कि उनके पेरेंट्स ने हमेशा उनका हौसला बढाया। कहती हैं, फैमिली में शुरू से एजुकेशन का माहौल था इसलिए वे इसकी इंपॉटर्ेंस समझते थे। उन्होंने बताया कि उनके प्रोग्राम का मोटो इकोनॉमिकल रूप से पिछडे स्टूडेंट्स तक क्वॉॅलिटी कॉलेज एजुकेशन पहुंचाना है। वे कहती हैं कि जरूरी नहीं कि बच्चे सिर्फ आईआईटी में ही जाएं, बल्कि कोशिश होती है कि वे खुद सोसायटी में अपनी जगह बनाएं। इसके लिए हर साल अवंती अपने पार्टनर कोचिंग इंस्टीट्यूट्स के यहां से बच्चों का टेस्ट लेती है। फिर मेरिट और फाइनेंशियल कंडीशन के बेसिस पर उन्हें लर्निंग सेंटर पर ट्यूशन दिया जाता है। बच्चों को साइकोलॉजिकल ट्रेनिंग के साथ ही पीयरडिस्कशन और इंस्ट्रक्शन मेथड से प्रिपेयर कराया जाता है। दिल्ली के शाहदरा इलाके में अवंती के लर्निंग सेंटर में आज भी दर्जन से ज्यादा बच्चे पढने के लिए आते हैं। इसके अलावा, कॉलेज स्टूडेंट्स भी वॉलंटियर के तौर पर इन बच्चों को मेंटर करते हैं।
दिल्ली आईआईटी में टेक्सटाइल इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर के स्टूडेंट वत्सल दो साल से इन बच्चों को फिजिक्स और मैथ्स पढा रहे हैं। इनमें प्रतीक नाम के लडके को वे खासतौर पर इंजीनियरिंग के लिए तैयार कर रहे हैं। वत्सल उसके घर जाकर और फोन पर भी काउंसलिंग करते हैं। कहते हैं, पहले उसे प्रॉपर नॉलेज नहीं थी, लेकिन अब वह टेस्ट पेपर्स में अच्छे स्कोर लाता है। मेरे लिए वह दिन खास होगा जब वह किसी कॉम्पिटिटिव एग्जाम में क्वॉॅलिफाई कर जाएगा। आईआईटी में वत्सल की जूनियर सान्या भी हर गुरुवार को बच्चों को मेंटर करती हैं। इसके अलावा फोन पर या घर जाकर भी डिस्कशंस होती हैं। अंजलि और गोविंद जैसे कई स्टूडेंट्स सान्या से गाइडेंस पाकर खुश हैं। जबकि अवंती जैसे ग्रुप से जुडकर आईआईटी के स्टूडेंट्स भी यंग जेनरेशन को इंस्पायर करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। टीम अवंती का भी यही मोटो है, थिंक बिग, बी बोल्ड एंड ड्राइव चेंज।
स्माइल है सबसे बडा रिवॉर्ड
ये हमारी ड्यूटी है कि हम अगर सोसायटी को कुछ दे सकते हैं, तो जरूर देना चाहिए। मैंने भी सोचा कि बच्चों को पढाना चाहिए। क्योंकि सिर्फ टेक्स्ट बुक टीचिंग से बात नहीं बनती, इसलिए उन्हें फन एक्टिविटीज और स्टोरीज के जरिए भी एजुकेट किया। इसका असर हुआ कि बच्चे अच्छा स्कोर करने लगे। मेरे लिए यह सैटिस्फैक्शन की बात थी। बच्चे खुश थे, उनके चेहरे पर स्माइल थी और यही मेरे लिए सबसे बडा रिवॉर्ड था।
-ऐश्वर्या, सेंकड ईयर स्टूडेंट, एलएसआर, दिल्ली
नहीं हुई डिस्टर्ब
मन में था कि बच्चों के लिए कुछ करूं, इसलिए विद्या प्रोजेक्ट के जरिए स्लम के बच्चों को साइंस सब्जेक्ट्स पढाना शुरू किया। उनके कॉन्सेप्ट्स वीक थे। इसलिए एक्स्ट्रा टाइम देकर पहले बेसिक ठीक किया। कुछ बच्चों के 12वीं में 90 परसेंट तक मा‌र्क्स भी आए। ये मेरे लिए एक अचीवमेंट था। मेरी स्टडीज भी चलती रही।
आयुषी, थर्ड ईयर, आईआईटी दिल्ली
मेट्रो ब्रिज के नीचे जलती शिक्षा की मशाल
राइट-टु-एजुकेशन एक्ट भले ही लागू हो चुका है, लेकिन आज भी हजारों बच्चे स्कूल नहीं जा सके हैं या फिर बीच में ही पढाई छोड दी है। ऐसे ही बच्चों को एजुकेशन से जोडे रखने की एक कोशिश दिल्ली के मेट्रो ब्रिज के नीचे भी चल रही है। ब्रिज की छत धूप और बारिश से बच्चों को बचाती है। दीवार पर काले रंग से पेंट कर एक ब्लैकबोर्ड बना हुआ है। बच्चों के बैठने के लिए कुछेक गत्ते और चटाइयां हैं। यहींराजेश कुमार शर्मा हर दिन अपने ओपन स्कूल में सुबह दो घंटे क्लास लगाते हैं। वे आस-पास रहने वाले मजदूरों, रिक्शाचालकों और उन जैसे तमाम लोगों के बच्चों को साक्षर बना रहे हैं। राजेश अलीगढ में बीएससी की पढाई कर रहे थे, लेकिन परिवार की फाइनेंशियल कंडीशन ठीक नहीं थी, तो पढाई बीच में छोडकर दिल्ली आना पडा। यहां एक किराने की शॉप खोल ली। कुछ दिनों बाद जब काम ठीक चलने लगा तो उन्होंने ऐसे बच्चों को पढाने की सोची जिनके पेरेंट्स गरीब हैं, जिनके पास इतने रिसोर्सेज नहीं हैं कि वे बच्चों को स्कूल भेज सकें या पढा सकें। वे यमुना बैंक के पास वाले इलाके में रहते थे जहां ज्यादातर फैमिलीज लोअर क्लास से हैं। राजेश कहते हैं, मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि बच्चों को पढाने के लिए अलग से रूम ले सकूं। इसलिए पास में बने मेट्रो पुल के नीचे पढाना शुरू कर दिया। राजेश इस बात से सैटिस्फाइड हैं कि वे अपने लेवल से जो हो सकता है, इन बच्चों के लिए कर पा रहे हैं। बच्चे अपने गुरुजी से खुश हैं जो इन्हें बेसिक रीडिंग, राइटिंग के अलावा मैथ्स के फॉर्मूले सिखाते हैं। इस इनिशिएटिव में राजेश का साथ दे रहे लक्ष्मी चंद्रा साइंस में पीजी है और प्राइवेट ट्यूशन देकर घर चलाते हैं। फिर भी इन बच्चों को फ्री ऑफ कॉस्ट एजुकेट कर रहे हैं। बच्चे भी दोनों टीचर्स को बेहद मानते हैं और उनसे काफी उम्मीद रखते हैं। यही वजह है कि 3 बच्चों से शुरू हुए इस स्कूल में जल्द ही 140 बच्चे हो गए, जिनमें 60 बच्चों को गवर्नमेंट स्कूल में एडमिशन भी मिल गया।
एमएनसी की छोड दी जॉब
दिल्ली की इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद मोहित अरोडा अमेरिका की एक मल्टीनेशनल कंपनी अर्नस्ट एंड यंग में जॉब करने चले गए। लेकिन दो साल बाद ही उन्हें टीच फॉर इंडिया कैंपेन के बारे में पता चला, तो खुद को रोक नहीं पाए और जॉब छोडकर, टीएफआई की फेलोशिप ले ली। दो साल के इस फेलोशिप के दौरान मोहित को अंडर प्रिविलेज्ड बच्चों को एजुकेट करना था। मोहित को पहला असाइनमेंट पुणे के एक स्कूल में मिला, जहां उन्हें फोर्थ स्टैंडर्ड के बच्चों को पढाना था। उन्होंने ये रिस्पॉन्सिबिलिटी बखूबी निभाई। इसके बाद मोहित को दिल्ली के संगम विहार के एक एमसीडी स्कूल में पढाने की जिम्मेदारी दी गई। मोहित कहते हैं, क्लास में काफी डिस्पैरिटी थी। जैसे एक ही क्लास में 7 से लेकर 14 साल का बच्चा था। इसके अलावा भले ही वह तीसरे या चौथे स्टैंडर्ड में पढ रहे थे, लेकिन नॉलेज लेवल फ‌र्स्ट स्टैंडर्ड के बच्चे से ज्यादा नहीं थी। इस गैप को दूर करना मेरी प्रॉयरिटी थी। मोहित को टीएफआई के साथ चार साल हो गए हैं। वे आगे भी इसी तरह के कॉज के लिए काम करते रहना चाहते हैं।
पढाने से मिलती है खुशी
अंधेरे से लडने का जज्बा हो तो तमाम विसंगतियां होते हुए भी व्यक्ति खुद को रोशनी देने वाला दीपक बना लेता है। ऐसा ही जज्बा आईआईटी कानपुर के बीटेक फाइनल ईयर के स्टूडेंट सुरजीत सिंह गौतम में है, जो अपनी पढाई करते हुए, अंडरप्रिवलेज्ड चिल्ड्रंस को हर रोज दो घंटे फ्री में पढा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद शहर से 17 किलोमीटर दूर बसे गांव दुगना के साधारण किसान कालीचरण गौतम के बेटे सुरजीत को यह जज्बा अपने गांव में पढाई के दौरान ही मिला। सुरजीत बताते हैं, मैंने जूनियर तक की पढाई सरकारी स्कूल में की। मेहनतकश व किसानों के बच्चों को पढाई के लिए प्रॉपर रिसोर्सेज नहीं मिलते थे। हाईस्कूल तक पता ही नहीं था कि आईआईटी या जेईई क्या होते हैं? फिरोजाबाद पढने आया तो इंजीनियर बनने का हौसला जागा और जेईई क्वॉलिफाई करके आईआईटी में बायोटेक एंड बायो इंजीनियरिंग में एडमिशन मिला। गांव में कोई पढाने वाला नहीं था। यहां आकर संस्थान में मेहनतकश गरीबों के बच्चों को पढाई में मदद करने के लिए चल रहे शिक्षा सोपान से जुडा, तो महसूस हुआ कि यहां आ रहे बच्चों को भी अच्छी शिक्षा की वैसी ही दरकार है, जैसी उसने गांव में रह कर महसूस की थी। इसीलिए रविवार के अलावा हर रोज शाम पांच से सात बजे का समय बच्चों को पढाने में दे रहा हूं। सुरजीत कहते हैं, पढाने से आत्मिक आनंद मिलता है। मां शांति देवी ने बचपन में समझाया था कि किसी को कुछ देना हो, तो कुछ ऐसा दो, जो जीवन भर उसके साथ रहे। शिक्षा वह मूल्यवान वस्तु है जो किसी को दी जाए तो हमेशा साथ रहती है। उसे लगता है कि जहां वह पहुंचे हैं, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे भी वहां तक पहुंचें। वह छठी से ग्रेजुएट तक के स्टूडेंट्स को मुख्य विषय पढाते हैं।
लाइफ को मिली नई दिशा
वे चाहते तो आईआईटी से बीटेक-एमटेक कर किसी बडी कंपनी में मोटे पैकेज पर नौकरी कर सकते थे, लेकिन उन्होंने कुछ समय तक शिक्षा की रोशनी बांटने का जज्बा पैदा किया और आईआईटी कानपुर के अपॉच्र्युनिटी स्कूल में गरीबों के बच्चों को पढाने लगे। वे आईआईटी के पास एक ऐसा उच्च स्तरीय स्कूल बनाना चाहते हैं, जहां मेहनतकश गरीबों के बच्चे पढकर देश के विकास की नई इबारत लिख सकें। अपनी पढाई के साथ कुछ घंटे फाइनेंशियली वीक स्टूडेंट्स को पढाने के बाद, अब एक साल तक पूरा समय इन बच्चों को देने का फैसला करने वाले ये छात्र मेरठ के वैभव (एमटेक मैकेनिकल), जौनपुर के रत्नाकर (एमटेक मैकेनिकल), जयपुर के चतुर्भुज संभारिया (बीटेक केमिकल) और उडीसा के संवित मिश्र (बीटेक बायोलॉजिकल साइंस) हैं।
गुरुजी से इंस्पायर्ड
चारों स्टूडेंट्स कहते हैं कि उन्हें यह प्रेरणा भौतिकी के अपने प्रोफेसर डॉ. हरीश वर्मा से मिली। वह स्वयं अपना समय लोअर क्लास के स्टूडेंट्स को पढाने में लगाते हैं। बेकार चीजों से एक्सपेरिमेंटल चीजें तैयार करते हैं और सिलेबस बनाते हैं। उन्होंने पढाई के दौरान स्कूली बच्चों को पढाने में समय देने को कहा। बच्चों से जुडे तो लगा कि ऐसे परिवारों के बच्चों को स्तरीय शिक्षा मिले, तो वे भी भारत का नया भाग्य गढ सकते हैं।
सेल्फ सैटिस्फैक्शन
प्लेसमेंट न लेकर बच्चों को पढाने से क्या मिला? के सवाल पर वे कहते हैं, वहां आत्मिक आनंद व संतुष्टि मिल रही है, जिसका कोई मूल्य नहीं। जिस समाज से लिया है, उसे देने की भी हमारी जिम्मेदारी है। जिम्मेदारी किसी भी रूप में निभाई जाए, निभानी चाहिए। इसके बदले न कोई तमगा चाहिए न धन। पेरेंट्स ने भी कभी सवाल नहीं उठाया, बल्कि पीठ ही थपथपाई। इससे बडी खुशी क्या हो सकती है।
मंजिल मिलने का भरोसा
मैं तो हूं पर मेरी तस्वीर नहीं मिलती, आभास तो है पर तदवीर नहीं मिलती। बडी मुश्किल से बनाया है नायाब तोहफा, जिंदगी को मायने दे वह तकदीर नहीं मिलती पर सच तो यह है कि जिंदगी को मायने देना है तो जहां से जिंदगी का नायाब तोहफा मिला है, वहां के दुख-दर्द भी अनुभव करने होंगे। बस इन्हीं एक्सपीरिएंसेज के साथ विकास की दौड में पिछडे, दूर अंधेरे कोनों में खडे रोशनी को लालच भरी नजर से देख रहे नौनिहालों को आगे लाने की मुहिम में जुट कर तकदीर बनाने की कोशिश कर रहा हूं। हमारे होनहार स्टूडेंट्स की एक बडी ताकत साथ है। विश्वास है मंजिल मिलेगी।
- डॉ. हरीश वर्मा, प्रोफेसर, फिजिक्स आईआईटी कानपुर
फ्रेंड्स के साथ लगे मिशन एजुकेशन में
अब्बू के गुजर जाने के बाद 10 साल का अयान रात में मछली पकडा करता था, 13 साल की इसरत अपने बापू के साथ सब्जी बेचा करती थी। बारह साल के राहुल को तो कभी खेलने से फुरसत ही नहीं मिलती थी। पढाई की तो बात ही छोडिए, इन बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह भी नहीं देखा था लेकिन अब उनके हाथों में किताबें हैं। यही नहीं, वे बडे चाव से रोज स्कूल भी जाते हैं और अपना भविष्य संवारने का सपना भी देखते हैं। अयान, राहुल और इसरत जैसे सैकडों बच्चों की जिंदगी में यह बदलाव आया है एक शिक्षित नौजवान बृजेश त्रिपाठी के डेडिकेशन और एक्टिविज्म के कारण। पोस्ट ग्रेजुएट बृजेश गोरखपुर शहर के बसंतपुर मोहल्ले में रहते हैं। इस मोहल्ले से सटे क्षेत्रों में गरीबों की बस्तियां हैं जहां गरीबी और अशिक्षा मुंह बाए खडी है। यहां के ज्यादातर लोग इलिटरेट हैं इसलिए वे बच्चों की शिक्षा को लेकर उदासीन रहते थे। दस्तखत करने या हिंदी के बडे अक्षर पढ लेने भर की शिक्षा पाए लोग भी रोजमर्रा का जीवन जीते हैं। कोई मछली मारता है तो कोई मजदूरी करके दो समय की रोटी का इंतजाम करता है। पैरेंट्स के इस रूटीन का असर बच्चों की जिंदगी पर साफतौर से देखा जा सकता है। बहुत से बच्चे स्कूल जाने की बजाय कूडा बीनने, मछली पकडने के काम में लगे रहते थे। बच्चों की यह रूटीन आते-जाते बृजेश त्रिपाठी को खटकती थी। एक दिन उन्होंने तय किया कि क्यों न इन बच्चों को शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाए। उन्होंने अपने कुछ दोस्तों से बात की, तो सबने इसके लिए उन्हें प्रेरित किया। फिर वे गरीब बस्तियों में जाकर अभिभावकों को तैयार करने लगे कि वे बच्चों को पढाई के लिए उनके घर पर भेजें। काफी कोशिश के बाद कुछ बच्चे उनके घर पर पढने के लिए आने लगे। दोस्तों की मदद से उन्होंने इन बच्चों को कॉपी, किताब और पेंसिल दी। पहले दिन कापी-किताब लेकर जब ये बच्चे घर लौटे तो पूरे मोहल्ले में उत्सुकता बढ गई। खासकर कॉपी, किताब एवं पेंसिल फ्री मिलने को लेकर। फिर क्या था? एक-एक कर 100 से अधिक बच्चे त्रिपाठी के घर पर पहुंचने लगे। इस तरह त्रिपाठी ने अपने प्रयास से शिक्षा की लौ जलाई। बिना कोई फीस लिए वह अपनी पत्नी एवं मोहल्ले की ही चार टीचर्स के साथ चार साल से इन बच्चों को फ्री में एजुकेशन देते हैं। उनके इस काम में उनके दो दर्जन दोस्त हाथ बंटाते हैं, जो हर महीने अपनी आमदनी का एक छोटा हिस्सा दान में देते हैं ताकि बच्चों के कॉपी-किताब एवं उन्हें पढाने वाली टीचर्स को सैलरी दी जा सके। अब तो उनके घर के स्कूल में बच्चों की संख्या 100 को पार कर गई है। वे अपने घर के सामने बनाए गए कमरों में क्लास लगाते हैं। वे त्रिपाठी के घर पर पढने और सीखने के साथ अपने घर पर हाथ भी बंटाते हैं। इस अनोखे स्कूल में सिर्फ बच्चे ही नहीं, महिलाएं और बुजुर्ग भी अपना जीवन संवार रहे हैं। 35 वर्षीय शमां परवीन और 22 साल की प्रीती व पुष्पांजलि सिलाई, कढाई और पेंटिंग सीखकर खुद को सेल्फडिपेंडेंट बन रही हैं, तो 45 साल के मुन्ने लाल भी साक्षर बन रहे हैं। सभी के लिए समान अवसर। न कोई छोटा और न ही बडा। न जाति का बंधन और न संप्रदाय की बेडियां।
चेंजिंग सोसायटी
जब मैं पटना तैयारी करने आया तो ट्यूशन पढाकर अपनी जरूरतें पूरी करता था। इसीलिए मन में खयाल आया कि क्यों न अपने जैसे जरूरतमंदों की मदद की जाए, तो मैंने गरीब स्टूडेंट्स को फ्री में कोचिंग देना शुरू किया। कुछ फ्रेंड्स भी साथ जुड गए। स्टूडेंट्स अच्छा रिजल्ट दे रहे हैं तो खुशी होती है।
- साहित्य कुमार, कोचिंग संचालक, पटना
मुझे फ्रेंड के जरिए इंग्लिश सिखाने वाले एक कोचिंग इंस्टीट्यूट के बारे में पता चला कि वे गरीब बच्चों को फ्री में तैयारी कराते हैं। मैंने भी उनसे कॉन्टैक्ट किया और आज मेरी कामयाबी का श्रेय इस कोचिंग संस्थान और यहां के टीचर्स को ही जाता है। मेरे परिवार की हालत भी इसी कारण सुधरी है।
- अनिल कुमार पांडेय, बीएसएफ, पटना
आज के दौर में भला कौन किसी को फ्री में पढाता है। फिर भी मैंने बेटे को एक ऐसे इंस्टीट्यूट में भेजा जो गरीब बच्चों से फीस नहीं लेते थे। मुझे अपने फैसले पर आज कोई अफसोस नहीं है। मेरे बेटे का ड्रीम पूरा हो रहा है, इससे अच्छा और क्या हो सकता है। समाज में ऐसे लोगों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
- गिरिजा देवी, अनिल की मां
गिविंग राइट डायरेक्शन
शिक्षा की चाबी से किस्मत का ताला खुलता है। इसीलिए शिक्षा के दीप जला कर दिशा सिंह धीर जरूरतमंद बच्चों की ऊर्जा को सही दिशा दे रही हैं। आर्थिक रूप से अत्यधिक पिछडे हुए परिवारों के बच्चों को पूरी तरह नि:शुल्क शिक्षा देकर वह समाज के इस तबके को सही दिशा देने की कोशिश कर रही हैं। दिशा बताती हैं कि एजुकेशन वेलफेयर मिशन नामक संस्था के अंतर्गत हम उन बच्चों को शिक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं, जिनके परिवार वाले उन्हें पढाने के बजाय कूडा बीनने या मेहनत-मजदूरी करने के लिए अधिक प्रेरित करते हैं। उनके उलट हमारा टारगेट यह रहता है कि इन बच्चों को शिक्षित करें, ताकि बडे होकर ये अपराध के अंधेरे में न खो जाएं। इन्हें शादी की सही उम्र, परिवार नियोजन आदि की जानकारी हो सके। इनका नैतिक तथा मौलिक विकास हो और ये देश के बेहतर कल के निर्माता बनें। पंजाब मानवाधिकार के वूमन सेल (जालंधर तथा कपूरथला) की अध्यक्ष दिशा जालंधर स्थित नागरा गांव में अपने फ्री को-एजुकेशन मिशन स्कूल में करीब 240 बच्चों को पूरी तरह मुफ्त शिक्षा देती हैं। दिशा का कहना है कि वह अपने पिता इंद्रपाल सिंह के साथ मिलकर अपनी स्वर्गीय मां कविता सिंह के सपने को साकार कर रही हैं। उनकी मां ने 13 साल पहले ब‌र्ल्टन पार्क में एक पेड के नीचे गरीब बच्चों को पढाना शुरू किया था। उसके बाद उन्हें वहां यह खुला स्कूल चलाने की अनुमति न मिली तो स्कूल मद्रासी कॉलोनी में शिफ्ट किया गया। उस समय दिशा अपनी मां की सहायता करती थीं। दिशा के अनुसार, हम बच्चों से कुछ भी नहीं लेते, सभी कुछ स्वयं देते हैं। न ही हम सरकार से किसी तरह की कोई एड ले रहे हैं। कभी कहीं से कॉपी पेंसिलें मिल जाती हैं तो कभी कोई दानी आकर बच्चों को भोजन भी करवा देता है।
टीचर ने संवारी प्रदीप की लाइफ
जालंधर के खालसा कॉलेज में एमएससी मैथमेटिक्स के फ‌र्स्ट ईयर के स्टूडेंट प्रदीप यादव के पिता मजदूरी करते थे। पढाई का खर्च उठा पाना मुश्किल था। प्रदीप की खुशकिस्मती थी कि वह आठवीं के बाद जालंधर के डीआर जैन नेशनल स्कूल में पढने लगा। वहीं की एक अध्यापिका अंजलि ने उसे खूब प्रोत्साहित किया। दसवीं में जब उसके 85 प्रतिशत नंबर आए, तो इसी टीचर ने प्रदीप को जालंधर के खालसा कॉलेज में नॉन मेडिकल की पढाई करवाई। प्रदीप कहता है कि अंजलि मैडम की बदौलत ही उसने बारहवीं में 75 परसेंट मा‌र्क्स हासिल किए।
एजुकेशन के साथ मॉरल वैल्यू भी
72 साल के देव अरोडा जालंधर के डीएवी कॉलेज से बतौर वाइस प्रिंसिपल रिटायर हुए हैं। भले ही उम्र अधिक होने के कारण अब वे कभी-कभी ही स्कूलों में जाते हैं और शिक्षकों को बच्चों को कैसे पढाना है, उस बारे में गाइड करने का काम करते हैं, लेकिन इन द्वारा शुरू किये गए दो स्कूल अब भी चल रहे हैं। इन स्कूलों में गरीब बच्चों को पढाने का जिम्मा उन्होंने उठाया था। उनके अनुसार गरीब बच्चों को मात्र किताबी पढाई करवाने के साथ-साथ हम अपने केंद्र में उन्हें देश का अच्छा भावी नागरिक बनाने की ओर ध्यान देते थे। हम शिक्षा के साथ ही इन्हें ऐसे काम सिखाते हैं जिनसे इनकी थोडी कमाई भी हो जाए ताकि अपनी शिक्षा के लिए ये अपने माता-पिता पर बोझ न बनें।
टीचर से मिली इंस्पीरेशन
धर्मपाल सिंह इन दिनों जालंधर के करीब पतारा गांव के एक सरकारी स्कूल में अध्यापक हैं, लेकिन बिजी शिड्यूल में से जब भी समय निकलता है तो ये गरीब बच्चों को पढाने पहुंच जाते हैं। उसके अनुसार गरीब बच्चों को पढाने की प्रेरणा कॉलेज में बीएससी फ‌र्स्ट ईयर के दौरान अपने ही एक टीचर अनूप वत्स के शब्दों से मिली, जिन्होंने झुग्गी-झोंपडियों में रहने वाले कुछ बच्चों को पढाने की बात क्लास में की। धर्मपाल कहते हैं कि उस समय हमें मालूम भी नहीं था कि गरीबी क्या होती है। ऐसी बस्ती में जाने में भी शर्म महसूस होती थी लेकिन एजुकेशन वेलफेयर मिशन से जुडी स्व. कविता सिंह जी से मुलाकात के बाद पूरा नजरिया ही बदल गया। हम स्लम एरियाज के बच्चों को पढाने लगे।

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