महाभारत का युद्ध कहीं बाहर नहीं, हमारे मन में ही चलता है। मन में अच्छे और बुरे विचारों की लड़ाई ही महाभारत है। यहां हमारा मन अर्जुन है और विवेक रूपी चेतना कृष्ण।
युद्ध के दौरान जब अर्जुन अपने सभी सगे-संबंधियों, गुरुओं आदि को सामने देखते हैं तो उनके मन में मोह पैदा हो जाता है। उन्हें लगता है कि ये सब तो मेरे अपने हैं, मैं इनको कैसे मार सकता हूं। इससे तो अच्छा है कि मैं युद्ध ही न करूं। ऐसी बातें सोच कर दुखी अर्जुन भगवान कृष्ण की शरण में बैठ गए।
तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। कहा, ‘हे अर्जुन, जड़ मत बनो। यह तुम्हारे चरित्र के अनुरूप नहीं है। हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।’
कई बार व्यक्ति को किसी काम को करने से उसका दुर्बल मन डराता है। इस वजह से वह आगे नहीं बढ़ पाता मगर याद रखना चाहिए कि जीवन में तरक्की दुर्बलता से नहीं बल्कि मजबूत इरादों से मिलती है। दिनचर्या के हर काम को युद्ध की तरह समझना चाहिए और उसको उत्साह के साथ पूरा करना चाहिए। मन को कभी कमजोर नहीं पडऩे देना चाहिए। मन डराएगा लेकिन हमें डरना नहीं है। जीवन आगे बढऩे के लिए है, डर कर या निराश होकर बैठ जाने के लिए नहीं।
युद्ध के दौरान जब अर्जुन अपने सभी सगे-संबंधियों, गुरुओं आदि को सामने देखते हैं तो उनके मन में मोह पैदा हो जाता है। उन्हें लगता है कि ये सब तो मेरे अपने हैं, मैं इनको कैसे मार सकता हूं। इससे तो अच्छा है कि मैं युद्ध ही न करूं। ऐसी बातें सोच कर दुखी अर्जुन भगवान कृष्ण की शरण में बैठ गए।
तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। कहा, ‘हे अर्जुन, जड़ मत बनो। यह तुम्हारे चरित्र के अनुरूप नहीं है। हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।’
कई बार व्यक्ति को किसी काम को करने से उसका दुर्बल मन डराता है। इस वजह से वह आगे नहीं बढ़ पाता मगर याद रखना चाहिए कि जीवन में तरक्की दुर्बलता से नहीं बल्कि मजबूत इरादों से मिलती है। दिनचर्या के हर काम को युद्ध की तरह समझना चाहिए और उसको उत्साह के साथ पूरा करना चाहिए। मन को कभी कमजोर नहीं पडऩे देना चाहिए। मन डराएगा लेकिन हमें डरना नहीं है। जीवन आगे बढऩे के लिए है, डर कर या निराश होकर बैठ जाने के लिए नहीं।
