रोबोटिक सर्जरी अपेक्षाकृत नवीन विधि है जिसमें सर्जरी के लिए बेहद कम चीरफाड़ की जाती है जिससे रोगी को शीघ्र आराम मिलने की सम्भावना कई गुणा बढ़ जाती है। गौरतलब है कि रोबोटिक सर्जरी में काम आने वाले सर्वाधिक लोकप्रिय रोबोट दा विंची सिस्टम का पेटैंट अब तक एक अमेरिकी कम्पनी के नाम था जिस वजह से इस सुविधा को अस्पतालों में शुरू करने के लिए उपकरणों पर ही करीब 16 करोड़ रुपए खर्च हो जाया करते थे।
आने वाले दिनों में रोबोटिक सर्जरी के उपकरणों का निर्माण भारतीय कम्पनियां शुरू कर देंगी जिससे इनकी कीमत कम होकर करीब 1 करोड़ रुपए हो जाएगी। इससे देश में शर्तिया तौर पर इस क्रांतिकारी सर्जरी का चलन तेज होगा एवं इस क्षेत्र में रोजगार के नए अवसरों का व्यापक प्रसार भी होगा।
रोबोटिक सर्जरी के लिए अत्याधुनिक दा विंची सिस्टम नामक रोबोट का ही सर्वाधिक प्रयोग किया जाता रहा है। दुनिया भर में इसकी सहायता से अब तक 15 लाख से अधिक सफल सर्जरी की जा चुकी हैं। इस पर अमेरिकन कम्पनी का पेटैंट इस साल खत्म हो रहा है जिससे अनेक यूरोपीय कम्पनियां भी ऐसे रोबोट बनाने का काम शुरू कर देंगी जिससे इस तकनीक के पहले से कहीं अधिक किफायती होने की आशा है।
कार्यक्षेत्र
रोबोटिक सर्जन कैंसर एवं गैर-कैंसर रोगों के लिए सर्जिकल रोबोट की सहायता से एडवांस्ड लैप्रोस्कोपिक सर्जरी करते हैं। रोबोटिक सिस्टम्स में यांत्रिक बांहें तथा कैमरे लगे होते हैं। कैमरों को रोगी के शरीर में डाल दिया जाता है जिससे शरीर के भीतर का दृश्य एक वीडियो स्क्रीन युक्त कंसोल पर दिखाई देता है जहां पर रोबोटिक सर्जन बैठता है। इस कंसोल के साथ वे उपकरण जुड़े होते हैं जिन्हें रोगी के शरीर में सर्जरी के लिए प्रविष्ट किया जाता है। रोबोटिक सर्जन कंसोल पर बैठ कर स्क्रीन पर रोगी के शरीर के भीतर का दृश्य देखते हुए जॉयस्टिक्स की सहायता से उन उपकरणों को नियंत्रित करता है। जिस ढंग से वह जॉयस्टिक्स को हिलाता है उपकरण उसी ढंग से रोगी के शरीर के भीतर हरकत करते हैं। इस तरह से सर्जन सर्जरी को पूरा करता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो इस सर्जरी में रोबोट सर्जन के लिए एक उपकरण के तौर पर काम करता है। यह एक बेहद आधुनिक तकनीक है जो सर्जन को उन जटिल प्रक्रियाओं में भी सक्षम बना देती है जो लैप्रोस्कोपिक, एंडोस्कोपिक जैसी विधियों से भी सम्भव नहीं होती हैं। रोबोटिक सिस्टम्स का इस्तेमाल कार्डियक सर्जरी, थोरेकिक सर्जरी, यूरोलॉजी, गाइनीकोलॉजी, बैरिएट्रिक सर्जरी आदि में प्रमुख रूप से किया जाता है।
भारत में तीन प्रमुख सीमाएं
रोबोटिक सर्जरी के मामले में भारत में तीन मुख्य सीमाएं हैं। पहली- देश में सर्जिकल रोबोट्स की संख्या बेहद कम है क्योंकि ये काफी महंगे हैं और इनकी देखभाल में भी काफी खर्च होता है। दूसरा- आम जनता सहित डॉक्टरों के बीच भी रोबोटिक सर्जरी के बारे में जागरूकता की कमी है। तीसरा- हमारे यहां रैफरल सिस्टम नहीं है जिसका उद्देश्य रोगी को विभिन्न चिकित्सा सुविधाओं से जोडऩा होता है।
योग्यता
सर्जरी में मास्टर डिग्री धारक मैडीकल छात्र को सर्वप्रथम ओपन सर्जरी में महारत हासिल करनी चाहिए। इसके बाद ही उसे रोबोटिक डिवाइस से सर्जरी का प्रशिक्षण हासिल करना चाहिए। इस संबंध में आधारभूत प्रशिक्षण हासिल करके तथा दो से तीन साल तक फैलोशिप ट्रेनिंग प्राप्त करने के बाद रोबोटिक सर्जन स्वतंत्र रूप से यह सर्जरी कर सकता है।
कौशल
बतौर रोबोटिक सर्जन सफलता प्राप्त करने के लिए सर्जिकल स्किल्स में महारत होना आवश्यक है। उन्हें रोबिटिक सिस्टम्स के तकनीकी पक्ष के संबंध में भी दक्ष होना चाहिए। चूंकि इस क्षेत्र में तेजी से शोध एवं नई तकनीक विकसित हो रही है, इस बारे में नवीनतम तबदीली से हमेशा स्वयं को जागरूक रखना लाजमी हो जाता है।
अपने क्षेत्र में उच्च स्तर की दक्षता हासिल करने की ललक होना भी महत्वपूर्ण है तथा उन्हें अपने जैसे तेज दिमाग चिकित्सकों की टीम के साथ सामंजस्य बैठा कर काम करने में भी पारंगत होना चाहिए।
पारिश्रमिक
किसी सरकारी सहायता प्राप्त चिकित्सा संस्थान जैसे एम्स में वरिष्ठ पद पर काम करने वाले चिकित्सक प्रतिमाह 1 लाख रुपए से अधिक प्राप्त करते हैं। किसी निजी संस्थान में समान पद पर कार्य करने वाले चिकित्सक इससे 10 गुणा अधिक भी कमा सकते हैं जो संस्थान एवं शहर पर निर्भर करता है।
संस्थान
फिलहाल भारत में रोबोटिक सर्जरी की शिक्षा एवं प्रशिक्षण देने वाला कोई विशिष्ट संस्थान नहीं है। अमेरिका में विभिन्न विश्वविद्यालयों में इस विषय में दो से तीन वर्षीय फैलोशिप प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं।
रोबोटिक टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में शुरूआती कामयाबी हासिल करने वाले पीयर क्रिस्टोफोरो गियूलियानोती इस वक्त डिवीजन ऑफ जनरल, मिनिमली इन्वेसिव एंड रोबोटिक सर्जरी के प्रमुख हैं। वह शिकागो स्थित यूनिवॢसटी ऑफ इलिनोइस में सर्जन्स को रोबोटिक सर्जरी का प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। हालांकि अमेरिकी संस्थानों में इन फैलोशिप प्रोग्राम्स में दाखिले से पहले यूनाइटेड स्टेट्स मैडीकल लाइसैंश्योर एग्जामिनेशन (यू.एस.एम.एल.ई.) पास करना अनिवार्य है।
एंडयूरोलॉजिकल सोसायटी एवं सोसायटी ऑफ यूरोलॉजिक ओन्कोलॉजी जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं यूरोप एवं एशिया में संबंधित शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों का प्रमाणन करती हैं।
आने वाले दिनों में रोबोटिक सर्जरी के उपकरणों का निर्माण भारतीय कम्पनियां शुरू कर देंगी जिससे इनकी कीमत कम होकर करीब 1 करोड़ रुपए हो जाएगी। इससे देश में शर्तिया तौर पर इस क्रांतिकारी सर्जरी का चलन तेज होगा एवं इस क्षेत्र में रोजगार के नए अवसरों का व्यापक प्रसार भी होगा।
रोबोटिक सर्जरी के लिए अत्याधुनिक दा विंची सिस्टम नामक रोबोट का ही सर्वाधिक प्रयोग किया जाता रहा है। दुनिया भर में इसकी सहायता से अब तक 15 लाख से अधिक सफल सर्जरी की जा चुकी हैं। इस पर अमेरिकन कम्पनी का पेटैंट इस साल खत्म हो रहा है जिससे अनेक यूरोपीय कम्पनियां भी ऐसे रोबोट बनाने का काम शुरू कर देंगी जिससे इस तकनीक के पहले से कहीं अधिक किफायती होने की आशा है।
कार्यक्षेत्र
रोबोटिक सर्जन कैंसर एवं गैर-कैंसर रोगों के लिए सर्जिकल रोबोट की सहायता से एडवांस्ड लैप्रोस्कोपिक सर्जरी करते हैं। रोबोटिक सिस्टम्स में यांत्रिक बांहें तथा कैमरे लगे होते हैं। कैमरों को रोगी के शरीर में डाल दिया जाता है जिससे शरीर के भीतर का दृश्य एक वीडियो स्क्रीन युक्त कंसोल पर दिखाई देता है जहां पर रोबोटिक सर्जन बैठता है। इस कंसोल के साथ वे उपकरण जुड़े होते हैं जिन्हें रोगी के शरीर में सर्जरी के लिए प्रविष्ट किया जाता है। रोबोटिक सर्जन कंसोल पर बैठ कर स्क्रीन पर रोगी के शरीर के भीतर का दृश्य देखते हुए जॉयस्टिक्स की सहायता से उन उपकरणों को नियंत्रित करता है। जिस ढंग से वह जॉयस्टिक्स को हिलाता है उपकरण उसी ढंग से रोगी के शरीर के भीतर हरकत करते हैं। इस तरह से सर्जन सर्जरी को पूरा करता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो इस सर्जरी में रोबोट सर्जन के लिए एक उपकरण के तौर पर काम करता है। यह एक बेहद आधुनिक तकनीक है जो सर्जन को उन जटिल प्रक्रियाओं में भी सक्षम बना देती है जो लैप्रोस्कोपिक, एंडोस्कोपिक जैसी विधियों से भी सम्भव नहीं होती हैं। रोबोटिक सिस्टम्स का इस्तेमाल कार्डियक सर्जरी, थोरेकिक सर्जरी, यूरोलॉजी, गाइनीकोलॉजी, बैरिएट्रिक सर्जरी आदि में प्रमुख रूप से किया जाता है।
भारत में तीन प्रमुख सीमाएं
रोबोटिक सर्जरी के मामले में भारत में तीन मुख्य सीमाएं हैं। पहली- देश में सर्जिकल रोबोट्स की संख्या बेहद कम है क्योंकि ये काफी महंगे हैं और इनकी देखभाल में भी काफी खर्च होता है। दूसरा- आम जनता सहित डॉक्टरों के बीच भी रोबोटिक सर्जरी के बारे में जागरूकता की कमी है। तीसरा- हमारे यहां रैफरल सिस्टम नहीं है जिसका उद्देश्य रोगी को विभिन्न चिकित्सा सुविधाओं से जोडऩा होता है।
योग्यता
सर्जरी में मास्टर डिग्री धारक मैडीकल छात्र को सर्वप्रथम ओपन सर्जरी में महारत हासिल करनी चाहिए। इसके बाद ही उसे रोबोटिक डिवाइस से सर्जरी का प्रशिक्षण हासिल करना चाहिए। इस संबंध में आधारभूत प्रशिक्षण हासिल करके तथा दो से तीन साल तक फैलोशिप ट्रेनिंग प्राप्त करने के बाद रोबोटिक सर्जन स्वतंत्र रूप से यह सर्जरी कर सकता है।
कौशल
बतौर रोबोटिक सर्जन सफलता प्राप्त करने के लिए सर्जिकल स्किल्स में महारत होना आवश्यक है। उन्हें रोबिटिक सिस्टम्स के तकनीकी पक्ष के संबंध में भी दक्ष होना चाहिए। चूंकि इस क्षेत्र में तेजी से शोध एवं नई तकनीक विकसित हो रही है, इस बारे में नवीनतम तबदीली से हमेशा स्वयं को जागरूक रखना लाजमी हो जाता है।
अपने क्षेत्र में उच्च स्तर की दक्षता हासिल करने की ललक होना भी महत्वपूर्ण है तथा उन्हें अपने जैसे तेज दिमाग चिकित्सकों की टीम के साथ सामंजस्य बैठा कर काम करने में भी पारंगत होना चाहिए।
पारिश्रमिक
किसी सरकारी सहायता प्राप्त चिकित्सा संस्थान जैसे एम्स में वरिष्ठ पद पर काम करने वाले चिकित्सक प्रतिमाह 1 लाख रुपए से अधिक प्राप्त करते हैं। किसी निजी संस्थान में समान पद पर कार्य करने वाले चिकित्सक इससे 10 गुणा अधिक भी कमा सकते हैं जो संस्थान एवं शहर पर निर्भर करता है।
संस्थान
फिलहाल भारत में रोबोटिक सर्जरी की शिक्षा एवं प्रशिक्षण देने वाला कोई विशिष्ट संस्थान नहीं है। अमेरिका में विभिन्न विश्वविद्यालयों में इस विषय में दो से तीन वर्षीय फैलोशिप प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं।
रोबोटिक टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में शुरूआती कामयाबी हासिल करने वाले पीयर क्रिस्टोफोरो गियूलियानोती इस वक्त डिवीजन ऑफ जनरल, मिनिमली इन्वेसिव एंड रोबोटिक सर्जरी के प्रमुख हैं। वह शिकागो स्थित यूनिवॢसटी ऑफ इलिनोइस में सर्जन्स को रोबोटिक सर्जरी का प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। हालांकि अमेरिकी संस्थानों में इन फैलोशिप प्रोग्राम्स में दाखिले से पहले यूनाइटेड स्टेट्स मैडीकल लाइसैंश्योर एग्जामिनेशन (यू.एस.एम.एल.ई.) पास करना अनिवार्य है।
एंडयूरोलॉजिकल सोसायटी एवं सोसायटी ऑफ यूरोलॉजिक ओन्कोलॉजी जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं यूरोप एवं एशिया में संबंधित शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों का प्रमाणन करती हैं।
