मेरा बचपन कितना अच्छा था
सब कुछ सहज सलोना था
आज का बचपन बूढ़ा है
बंद कमरे में बैठा है
टी वी , फ़ोन , विडीओ गेम
इसी में अनुरक्त बड़ा है
पढ़ाई के बोझ तले दबा हैं
इतना कुछ अब पढ़ना है
जो अपनी समझ से परे बड़ा है
छोटे छोटे नोनिहालों का बचपन
पिस सा गया है
खेल कूद ओर हूल्हड अब दब सा गया है
नहीं चाहिए इनको अब आज़ादी
सिर्फ़ करनी है बड़ों जैसी मनमानी
इसमें किसका दोष बड़ा है
क़सूरवार को कौन सजा देगा
पूरा सिस्टम ही इनके पीछे पड़ा है
किसी को करानी है आदर्श पढ़ाई
तो कहीं व्यावसायिक कोर्स की हैं आँधी आइ ।
मात पिता सब कन्फ़्यूज़ बड़े है
बचपन से ही बच्चों के पीछे पड़े है
कुछ ना कुछ जो बन जाता
दर दर के धक्के न खाता
बेचारा बच्चा अबोध बड़ा हैं
फ़ुट्बॉल की तरह से लुढ़क रहा है
सोच समझ से परे खड़ा हैं
उसका स्टिगर किसी और के हाथ में पड़ा हैं
भावनाएँ, सपने सब दब गए
मासूमों के दिलों में भी कड़वाहट
ने घर क़र लिया है
बोली में अब मिठास नहीं
बच्चों में अब वो बच्चों वाली बात नहीं
मत झोकों इनको आँधी में
लाड़ दुलार मनुहार से पालों
डाट फटकार की ना आदत डालों
जो ये अच्छे से पुष्पित हो जाएँगे
खूब नाम कमाएँगे ॥
डॉ. अर्चना मिश्रा
