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छठ मईया




                 विज्ञान एवं पर्यावरण की दृष्टि से, रितु काल का छठ पर्व पूर्वांचल का अति विशिष्ट है।। प्रचंड गर्मी से हम ठंड की ओर प्रवेश करते हैं । संपूर्ण रितु चक्र परिवर्तित होता है। सूर्य की प्रथम किरणें पूर्वांचल ही प्रस्फुटित होती है।


                      . इस तिथि में पैराबैगनी किरणें मात्रा में पृथ्वी पर एकत्र हैं। इस पर्व में पराबैगनी किरणों हानिकारक तत्वों को कम करने क्षमता होती है। सूर्य को देखते हुए लोटों गिरती जल धाराओं से परिवर्तित सूर्य किरणे स्नायु तंत्र को नियंत्रित है।। सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय मात्रा में विटामिन डी प्राप्त है।


                    सूर्य संपूर्ण उत्पादकता के प्रतीक हैं । शरीर की अग्नि को प्रज्वलित सशक्त रखने में यह पर्व है। सूर्य कू प्रतिबिंबित किरणें शरीर में कंपन कर मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव है। 


भारत के पूर्वांचल क्षेत्र में के कई प्रमुख मंदिर हैं। कोणार्क सूर्य मंदिर, बड़गांव सूर्य मंदिर ,, मार्तण्ड मंदिर कश्मीर, ग्वालियर सूर्य मंदिर, कटारमल मंदिर उत्तराखंड, सूर्य मंदिर गुजरात गुजरात


                   जम्मू दीप में तीन ऐसे सूर्य मंदिर है। जहां सूर्य की पहली किरण पड़ती है‌। ‌ उड़ीसा का कोणार्क सूर्य मंदिर, बिहार का देव मंदिर, पाकिस्तान के मुल्तान सूर्य।। बिहार का देव सूर्य मंदिर पश्चिमोभिमुख सूर्य मंदिर है।


                  अंगिका रामायण के रचयिता मुदगलपुरी जी कहा है कि महर्षि ऋषि के कहने पर माता सीता ने कार्तिक शुक्ल में षष्ठी का छठ व्रत किया।। अस्ताचल एवं उदयाचल सूर्य को अर्ध दिये। 


                     महर्षि दुर्वासा ऋषि के श्राप कृष्ण पुत्र सांब के कुष्ठ हो गया था। श्री कृष्ण के कहने पर सांब कुष्ठ रोग मुक्ति हेतु बड़गांव में में 49 दिनों तक सूर्य उपासना की।।।।। दूध एवं जल मिश्रित अर्ध दे, कुष्ठ रोग से मुक्ति की।


                      महाभारत काल में अंग प्रदेश राजा महादानी कर्ण प्रतिदिन ब्रह्म में गंगा स्नान कर सूर्योपासना करते।। सूर्य उपासना के उपरांत ही दिनचर्या प्रारंभ होती थी।


                    वैदिक सभ्यता में सिंधु घाटी प्राप्त स्वास्तिक चिन्ह सूर्य से है। ऋग्वेद में सूर्य को प्राकृतिक का केंद्र कहा गया है। सूर्योपनिषद पूर्णरूपेण से सूर्य की पर ही आधारित है।


                       रावण वध के पूर्व श्रीराम आदित्य हृदय स्त्रोत से सूर्य की की। शक्ति अर्जन किए, रावण जैसी बुराइयों का अंत किये।


                  डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल की पुस्तक कालीन भारत वर्ष के चंद्र गुप्त काल में षष्ठी देवी के वाली मोहरें प्राप्त हुई।।।।


                  मिथिला के ब्राह्मण विद्वान चंदेश्वर रूद्रधर की रचनाओं में छठ के प्रावधानों की जानकारी प्राप्त होती।। चंदेश्वर रचित कृत रत्नाकार में दिवसीय छठ अनुष्ठान का वर्णन।। रूद्र दत्त की रचना वर्षकृत्य में मैया की महिमा का वर्णन हुए कहा गया है कि छठी तिथि को उपवास रखते हुए अस्ताचल को को को प्रातः सप्तमी को उदयाचल को अर्घ दिया जाता।।। है है है है है है है है है है है है HIP


                 मयूर भट्ट ने सूर्य सत्त में कहा है कि सप्तमी भगवान सूर्य की तिथि है। षष्ठी तिथि माता षष्ठी की तिथि है । सूर्य सहित माता षष्ठी देवी श्रद्धा पूर्वक पूजा अर्चना करने विवेचना की है।


                छठ पर्व पर्यावरण एवं स्वच्छता का प्रती। सभी भूगर्भीय जल स्रोतों की कर नवजीवन कार्यक्रम चलाए जाते।। गोबर, गोमूत्र एवं प्राकृतिक रसायनों द्वारा तलाब, पोखर, नदी,

नहरों की सफाई की जाती है । तटों पर नये पेड़ लगाए जाते हैं । पुराने पेड़ों की कटाई छटाई की जाती है।


                    सूर्य की किरणों में प्रफुल्लित उत्पादों की से ही सूर्योपासना की है। ग्राहय योग्य प्राकृतिक उत्पाद शारीरिक में वृद्धि करते हैं। अग्राहय पदार्थ प्रकृति के साथ मिल कर पर्यावरण को शुद्ध में सहायक होते हैं।


                    . उपवास शारीरिक संरचना को संगठित करती है। पाचनअग्नि अवशिष्ट .


                       छठ पर्व पूर्ण आस्था का सामाजिक सांस्कृतिक उन्नति का पर्व।। छठ मैया का प्रसाद बिना के श्रद्धा नमन स्वीकार्य है। यह पर्व सामाजिक समरसता के साथ मनाया जाता है।


                         आस्था एवं विश्वास के साथ जाने वाले पर्व में किसी पंडित की आवश्यकता नहीं है। कोई मंत्रोच्चारण नहीं है । कोई वैदिक गणना नहीं है। भक्ति पूर्वक लोग भावनाओं से गीत ही पूर्ण मंत्र हैं। . प्रकृति द्वारा अभिव्यक्त वस्तुओं से छठ मैया की उपासना की है। 


" प्रकृति की ओर लौट चलें " इस पर्व का मुख्य संदेशह


                  छठ पूजा चार दिवसीय अनुष्ठान होता है । प्रथम दिन नहाए खाए व्रती गंगा तालाब पोखर, भूगर्भीय जल से स्नान करते। तन मन की पवित्रता के साथ चावल, चना दाल, लौकी का प्रसाद ग्रहण करते।।

            शरीर का अभ्यांतर शुद्धता पूर्ण हो सके।


                 खरना 36 व्रती खरना वाले दिन उपवास रखते हैं । सांय काल मिट्टी के चूल्हे गाय दूध एवं गुड़ से खीर ऋतु फल इत्यादि ग्रहण करते।।  

मन की स्थिरता एवं शांति प्रतीक खरना व्रतियों में विश्वास जागृत है।


एकमात्र छठ पर्व में ही अस्ताचल को उनकी पत्नी प्रत्यूषा साथ जल में खड़े होकर अर्ध दिया है।।।

        पूर्वांचल की सांस्कू 

देव…..


             चौथे दिन सतमी तिथि को प्रातः व्रती कमर भर जल खड़े होकर भगवान भास्कर एवं उनकी पत्नी उषा को अर्पित कर कर छठी मैया की आराधना करते।।।।


                 महापर्व छठ की पूर्णाहुति होती है । सभी श्रद्धा पूर्वक प्रसाद ग्रहण करते हैं । सूर्य देव से मंगल कामना कर

 .


                छठ पूजा सामाजिक समरसता का प्रतीक है। जहां ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा होता है । हर किसी के सहयोग से यह पर्व पूर्ण होता है । बांस की बहंगी, बांस की सूप, ऋतुफल, कहीं का श्रीफल, गेहूं की धुलाई सुखाई पिसाई आंगन की शुद्धता परस्पर सहयोग ही संभव होती।।।।।। 

                डेग डेग मिल चलते हम सब 

आम की लकड़ी में धीमी आंच ठेकवे की खुशबू माँ आशीष वचनों का एहसास करवाती।।

 तन मन मां के स्वागत स्वयं ही मुखारविंद होने लगते।।


छठी मईया पधारो माँ साफ सफाई हुई हमारी

हल्की-हल्की सुरसुराहट पधारो माी मईया ।।


बांस की बहंगी सोंधी सोंधी खुशबू 

धीमी धीमी आंच महक उठा चमन  


भक्ति शक्ति मात् देती निर्जला व्रत करवाती 

मधुप मधुप जल छपाक सूर्य किरणें इठलाती ।।


पश्चिमोभिमुख अर्ध सूर्य देव प्रत्यूषा

देव देव हमारे सदैव देवो भवः… ।।


सतमी तिथि उषाकाल सूर्यदेव ‌ हमारे 

जागृति हुई शक्तियां सारी अर्ध छठी मईया ।।


पूर्ण काज सारे मात् प्रसाद निवाले

मात् चरण चरणस्पर्श जय हो छठी मईया ।।

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