महंगे गैजेट के लिए चाहिए ज्यादा पॉकेट मनी






एक वक्त था जब युवा सिर्फ अच्छे कपड़े पहन कर ही खुश हो जाते थे। मगर आज के युवा सिर्फ कपड़े पर ही नहीं बल्कि अपने लुक, एक्सेसरीज और गैजेट्स पर भी खासा ध्यान देते हैं। इसी वजह से उनका पॉकेट खर्च भी बढ़ा है। चाहे आप युवक हो या युवती हर कोई सुंदर दिखना चाहता है। महंगे से महंगे गैजेट खरीद कर दोस्तों पर रौब डालना और उसे दिखाना उन्हें पसंद है। चाहे बात बाइक की हो या महंगे मोबाइल की, या फिर महंगे एक्सेसरीज जैसे जूते, चश्मे और जूलरी की। नई पीढ़ी किसी भी तरह का खर्च करने से नहीं कतराती। चाहे पैसे पॉकेट मनी से बचाए हों या मां−बाप से लिए हों या फिर पार्ट−टाइम जॉब कर पैसे कमाए हों। तरीका चाहे कोई भी हो बस नए फैशन और स्टाइल में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।
अभिभावकों की शिकायत है कि यह सब विज्ञापनों का खेल है। रोज टीवी पर तरह−तरह के विज्ञापन करते हीरो−हीरोइन दिख जाते हैं और नई पीढ़ी इन्हीं से प्रभावित होकर कोई भी चीज खरीद लेती है। चाहे चश्मा दो हजार का हो या मोबाइल 20 हजार रुपए का हो। पर युवा इस बात को सही नहीं मानते। उनका कहना है सुंदर लगना और स्टाइल के साथ जीना कोई गलत बात नहीं। जैसे आज रोज नहाना पसंद करते हैं वैसे ही रोज सुंदर लगना क्या गलत है?
शालिनी दसवीं की छात्रा है पर उसकी प्रतिमाह पाकेट मनी तीन हजार रुपए है। यह पूछने पर कि आखिर वह इतने पैसों को क्या करती है? जवाब देती है− करना क्या है एक बार आप ब्यूटी पार्लर जाएंगे तो महीने का हजार−पंद्रह सौ तो यूं ही खर्च हो जाते हैं। बाकी एक्सेसरीज वगैरह पर खर्च होते हैं। और हमें नए टेंड्र के साथ चलता है।
युवाओं में एक और क्रेज है− वह आधुनिक बाइक्स और मंहगे गैजेट का। राहुल मध्यवर्गीय परिवार से है। पिछले दिनों वह 18 हजार रुपए का मोबाइल कॉलेज लेकर आया। दरअसल उसे भी अपने दोस्तों का ध्यान अपनी तरफ खींचना था। इसीलिए उसने अपनी पॉकेटमनी बचा कर इतना मंहगा मोबाइल खरीदा। पर यह कहां तक सही है? यह सवाल जब युवाओं से किया गया तो कई तो जबाव नहीं दे पाए और कई ने सिर्फ यह कहा कि हम ट्रेंड के साथ चलना पसंद करते हैं। पर कई ने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा कि बढ़ता पॉकेट खर्च हमारी भी जिम्मेदारी है। हम पार्ट−टाइम जॉब करते है। कुछ उससे भी कमा लेते हैं।
दरअसल बाजार की चकाचौंध ने भी युवाओं को काफी भ्रमित किया है। कल तक जो बाजार परिवार के भरोसे था, आज उसने अपना निशाना युवा पीढ़ी को बनाया है। युवाओं की पसंद−नापसंद को ध्यान में रख कर ही बाजार सब कुछ कर रहा है। वह नए जमाने के ट्रेंड के साथ कोई भी प्रोडक्ट लांच करता है। कंपनियां अपनी मार्केटिंग राजनीति युवाओं को लक्ष्य में रख कर बनाती है।
भारत की जनसंख्या का 54 प्रतिशत हिस्सा 25 वर्ष से कम आयु वालों का है। ऐसे में बाजार के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। अपने लुभावने विज्ञापनों और अपने नए उत्पादों के बूते कंपनियां युवाओं को अपनी ओर खींचने में कामयाब हो रही है। पिछले कुछ सालों में आईटी और कॉल सेंटरों में काम कर रहे युवाओं की आय बढ़ी है और उनका खर्च भी। जाहिर है जब जेब में ज्यादा रुपए होंगे तो मंहगे से मंहगा उत्पाद खरीदने में क्यों हिंचकेगे।
कुछ साल पहले की बात करें तो घर में जो भी नई चीज आती थी, उसमें बड़ों की राय शामिल होती थी। पर अब ऐसा नहीं है। आजकल के युवा और बच्चे घर की किसी भी चीज की खरीद में अहम् भूमिका निभाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि युवाओं के पास अपने खुद के पैसे होते हैं, जिन्हें वह आसानी से खर्च कर सकते हैं। बाजार युवाओं की इसी भावनाओं का फायदा उठाता है।
टीवी विज्ञापनों की बात करें तो आजकल ज्यादातर विज्ञापनों में ऐसे अभिनेता नजर आते है। जो करोड़ो युवाओं के चहेते है। वे उत्पाद के बारे में जो भी राय रखते है युवा उन पर आंख मूंद कर विश्वास करते है। इन्हें यूथ आइकन कह सकते हैं और आज के युवा इन्हीं आइकन के नक्शे कदम पर चलना चाहते हैं।
चाहे वह बाइक्स का आइकन जान अब्राहम और धोनी हो या मोबाइल का प्रचार करते शाहरूख खान, अजय देवगन और काजोल हो या फिर कोई और। इनकी अलग लुक इन्हें 'यूथ आइकन' बना देती है।
विज्ञापन देखा नहीं कि बस उस चीज को खरीदने की चाह मन में बैठ गई। अब चाहे जैसे भी खरीदी जाए। पैसे के लिए आज युवा किसी भी काम को करने से गुरेज नहीं करते आखिर उन्हें भी जमाने के साथ चलना है और फिर उनका पॉकेट खर्च भी तो बढ़ गया है। कम उम्र में भी कुछ ज्यादा चाह रखने वाले कई युवा आजकल न सिर्फ पार्ट टाइम काम नौकरी कर रहे हैं बल्कि कोई भी छोटा से छोटा काम जैसे आइसक्रीम पार्लर और रेस्तरां तक में काम कर रहे है। सिर्फ इसीलिए कि पॉकेट का खर्च निकालना है।

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