जब न होंगी बेटियां तो किसे बचाएंगे, किसे पढ़ाएंगे?





प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर 'बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ' अभियान की शुरूआत हुई है। हरियाणा, राजस्थान यहां तक कि राजधानी दिल्ली में बेटियों की घटती संख्या चिंतनीय है। हालांकि अब जो ताजे आंकड़े आए हैं, उसमें दिल्ली में लड़कियों की संख्या बढ़ने की बात सामने आई है। पर जब बात भ्रूण हत्या की आती है तो सारे कायदे-कानून धरे रहे जाते हैं। ऐसा नहीं है कि कन्या भ्रूण हत्या के लिए कड़े कानून नहीं हैं, फिर भी गर्भ में कन्या की हत्या जारी है। अब लाख टके का सवाल है कि जब बेटी ही नहीं रहेगी, तो क्या पढ़ेगी और क्या समाज होगा?
भारत में हर साल लाखों कन्याओं को कोख में ही मार दिया जाता है। गिरते लिंगानुपात इस बात की पुष्टि करते हैं। एक लड़की की हत्या के साथ कई रिश्तों की भी हत्या होती है। इस काम में सहयोगी भी हमारे आसपास के ही होते हैं। अल्ट्रासाउंड सेंटर, डॉक्टर और दलाल थोड़े से पैसों के लालच में इस काम को और भी आसान बनाते हैं। अब तक लोगों की धारणा यही थी कि कन्या भ्रूण हत्या गरीब और अनपढ़ परिवार ही करते हैं, पर यह प्रवृत्ति सिर्फ छोटे शहरों ही नहीं बल्कि पढ़े-लिखे लोगों और विकसित शहरों में भी दिखती है। माता-पिता, परिवार-समाज कोई भी लड़की को अपना वारिस नहीं बनाना चाहता। उनके लिए लड़की का होना सिर्फ एक जिम्मेदारी भर है। उच्च शिक्षित वर्ग हो या पिछड़ा और अनपढ़ वर्ग दोनों की सोच लड़कियों के लिए एक ही है।
पिछले कुछ दशक में शिक्षा का विस्तार तो हुआ है पर आज भी उस शिक्षा में लड़कियों के प्रति जागरूकता या सकारात्मक सोच नहीं दिखती। कन्या भ्रूण हत्या हा या रेप जैसे मामले हों, यह सिर्फ लड़कियों के हिस्से में आता है। आज जब लड़कियां हर क्षेत्र में तरक्की कर रही हैं, हर ऊंचाई को छूने का हौसला रखती हैं तो ऐसे में उन्हें वह मौका नहीं मिल रहा है जो अमूमन लड़कों को सहजता से मिल जाते हैं। बेटियों का गर्भ में मारकर उसके सभी अधिकारों का ही हनन किया जाता है। प्रकृति के संतुलन को भी आज मनुष्य खत्म कर रहा है। इसका परिणाम भयावह हो सकता है। अगर बेटी ही नहीं होगी तो बेटों की उम्मीदें कैसे पूरी होंगी। परिवार और समाज कैसे बनेगा। जिस तरह से यह भ्रूण हत्या का सिलसिला बढ़ता जा रहा है आने वाले समय में लड़कों को शादी के लिए लड़कियां ढूंढ़नी मुश्किल हो जाएंगी।
महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा के लिए नित नए कानून अमल में लाए जा रहे हैं पर बात जब गर्भ में पल रही बेटी को बचाने की आती है तो यही कानून हाथ खड़े कर देता है। लिंग निर्धारण की तकनीक का गलत इस्तेमाल लिंग हत्या कानून लागू होने से पहले होने लगा था। लड़कियों के प्रति नफरत की शुरूआत उसके अपनों द्वारा ही शुरू होती है। कहीं जबरदस्ती तो कहीं सहमति से एक मां को गर्भ में पल रही अपनी ही बेटी की हत्या का पाप ढोना पड़ता है।
महिला दिवस पर कई तरह के कार्यक्रम होते हैं। बड़ी बातें की जाती हैं पर किसी का भी ध्यान भ्रूण हत्या की तरफ नहीं जाता। लड़कियों के प्रति सामाजिक धारणा को बदलने की बात नहीं की जाती। अगर लड़कियां ही इस समाज का हिस्सा नहीं बन पाएंगी तो महिला दिवस का मतलब क्या रह जाएगा। फिर बेटी को बचाने, उसे शिक्षित और सशक्त बनाने का सपना कैसे पूरा होगा। लड़कियों के प्रति हमें अपनी सोच को बदलना होगा, तभी कानून का पालन हो पाएगा।

Post a Comment

Previous Post Next Post
संस्कार News
संस्कार News

🎧 LIVE FM RADIO




🔊 Volume