हर कोई आज रफ्तार भरे सपनों की तलाश में है। वे सपने जिन पर सवार होकर कॅरियर का कठिन से कठिन व लंबा रास्ता भी चुटकियों में काटा जा सके। लेकिन ऐसे सपने देखना सबके बस की बात नहीं होती, इन्हें देखने के लिए तो दिल में जज्बे का तूफान व आंखों में उम्मीद की रौशनी चाहिए। आज भारतीय वायुसेना ऐसे ही सपनों का दूसरा नाम बन चुकी है, जिसमें जुझारू तेवरों व देश के लिए कुछ करने की हसरत रखने वाले युवाओं की दरकार है। यदि आप के दिलों में भी जांबाजी भरे तेवर पल रहे हैं तो भरोसा करिए भारतीय वायुसेवा आपके लिए एक सही जगह है। हर वर्ष अक्टूबर माह की 8 तारीख देश में वायुसेना दिवस के तौर पर मनाई जाती है।
पिक एंड किल है एयरफोर्स का मंत्र
बेहतर कोऑर्डिनेशन आज की लडाइयां जीतने का महत्वपूर्ण मंत्र है, जिसमें आर्मी व एयरफोर्स परस्पर सामंजस्य बनाते हुए दुश्मन के ठिकाने व उनके इरादे दोनों तबाह करती है। पर जब बात सैन्य रणनीति की करें तो एयरफोर्स की भूमिका और दमदार हो जाती है। दरअसल मॉडर्न वॉरफेयर में एयरफोर्स की भूमिका हरावल दस्ते की होती है, जो लडाई में सबसे आगे रहते हुए दुश्मन के चुने हुए इलाकों पर कहर बरपाती है। सैन्य भाषा में इन हमलों को सर्जिकल अटैक कहा जाता है, जहां दुश्मन को संभलने का मौका दिए बगैर पिक एंड किल सिद्धांत के तहत उनकी चूलें हिला वापस अपनी सरहद में लौट आते हैं। पिछले कुछ सालों में हुई प्रमुख सैन्य कार्रवाईयों पर नजर डालें तो एयरफोर्स की भूमिका और अच्छे से समझी जा सकती है। अब चाहें वो 1999 की कारगिल की लडाई हो या 2003 का ऑपरेशन इराकी फ्र डम या फिर हो लीबिया में गद्दाफी के खिलाफ नाटो की मुहिम। हर बार एयरफोर्स के बूते नामुमकिन से लग रहे टास्क को भी आसान बनाया गया। सैन्य विशेषज्ञों की मानें तो वे इलाके जो पैदल सेना की पहुंच से बाहर होते हैं, वहां जमीनी परिस्थितियों को पैदल सेना के अनुकूल बनाना एयरफ ोर्स की जिम्मेदारी होती है। केवल लडाई ही क्यों सैन्य परिवहन, प्राकृतिक आपदाओं के क्षणों में भी वायुसेना कारगर भूमिका निभाती है।
क्या हैं इंट्री के रास्ते
दुनिया की चौथी सबसे बडी एयरफोर्स आईएएफ को आज जोश से भरे ऐसे युवाओं की दरकार है, जो जरूरत पडने पर देश के लिए कुछ भी कर गुजरें। इसके लिए समय-समय पर यहां वेकेंसीज निकलती हैं, जहां आप कमीशंड व नॉन कमीशंड पदों के लिए आयोजित परीक्षाओं में भाग ले सकते हैं। क मीशंड ऑफिसर बनने के लिए आपको जहां एनडीए, सीडीएस परीक्षा क्वालीफाई करना जरूरी है, तो नॉन कमीशंड पदों पर भी काबिज हो आप आईएएफ का हिस्सा बन सकते हैं।
पायलट एप्टीट्यूड टेस्ट
पायलट एप्टीट्यूड टेस्ट या पीएबीटी सिर्फ एक बार होता है, जिसमें असफल हो जाने के बाद कैंडीडेट भविष्य में कभी यह टेस्ट नहीं दे सकता। इसमे दो टेस्ट होते हैं- एक लिखित व दूसरा कार्यगत क्षमता टेस्ट। लिखित परीक्षा में इंस्ट्रक्टर कैंडीडेट को पढाता है। और फिर उसी आधार पर प्रश्नों को हल किया जाता है। दूसरी प्रक्रिया में लाइट कंट्रोल टेस्ट, ड्रम टेस्ट के द्वारा परीक्षार्थी के मस्तिष्क का रिफलेक्शन एक्शन व फिजिकल क्षमताओं की परख होती है। मूलत: इन टेस्टों का उद्देश्य कैंडीडेट्स की फ्लाइंग एबीलिटी की जांच करना होती है।
कमीशंड पद
आसमां में सपने सच करने की तरकीब वे पद जहां आपकी शुरुआत बतौर ऑफिसर होती है कमीशंड पोस्ट कहलाती हैं। एयरफोर्स में इन पदों के लिए अलग-अलग समय में परीक्षाओं का आयोजन होता है।
एनडीए-इंटरमीडिएट लेवल
देखा जाए तो सशस्त्र सेनाओं में प्रवेश के कई?रास्ते हैं, लेकिन यहां ऑफिसर बनने का सबसे बडा व जाना पहचाना रास्ता एनडीए ही है। इसमें चयनित लोग कम आयु में ही अधिकारी बन देश को सैन्य नेतृत्व दे सक ते हैं। जहां तक भारतीय वायुसेना की बात है तो इस एग्जाम के जरिए आप आईएएफ को बतौर फाइटर पायलट ज्वाइन कर सकते हैं। लिहाजा वे सभी युवा जिन्होंने इंटरमीडिएट (पीसीएम ग्रुप) पास किया है और उनकी उम्र 16 से 19 के बीच है इस ऑल इंडिया लेवल परीक्षा के माध्यम से आईएएफ में अधिकारी बन सकते हैं। एनडीए का आयोजन यूपीएससी साल में दो बार अप्रैल व अगस्त माह में कराता है। परीक्षा में उत्तीर्ण? कैंडिडेट्स एसएसबी के लिए आमंत्रित किए जाते हैं। इसमें उत्तीर्ण होने के बाद अभ्यर्थियों का मेडिकल चैकअप होता है और तब जाकर ऑल इंडिया मेरिट में वे अंतिम रूप से जगह बना पाते हैं।
सीडीएस (गे्रजुएट)
फ्लांइग ब्रांच में नियुक्ति,सीडीएस एनसीसी, स्पेशल इंट्री व एसएसबी के जरिए होती है। एनसीसी, स्पेशल इंट्री व एसएसबी में प्रवेश की जरूरी योग्यता जहां ग्रेजुएशन में गणित, भौतिकी विषयों के साथ न्यूनतम 60 फीसदी मार्क्स हैं, तो वहीं सीडीएस के लिए ग्रेजुएट होना जरूरी है।
महिलाओं के लिए भी मौके- एयरफोर्स में महिलाओं को भी बतौर अधिकारी जगह बनाने का मौका मिलता है। यहां एयरफोर्स महिलाओं के लिए खास तौर पर शॉर्ट सर्विस कमीशन(एसएसबी) का आयोजन करता है। इसमें फिजिक्स व मैथ्स में ग्रेजुएट या बीई डिग्रीधारी 19 से 23 एज ग्रुप वाली महिलाओं को जगह मिलती है। हर साल नंवबर व मार्च महीने में इस खास भर्ती?के लिए विज्ञापन निकलता है।
ग्रांउड ड्यूटी ऑफिसर्स (जीडीओ)- ग्राउंड ड्यूटी ब्रांचेज में एडमिनिस्ट्रेशन, अकाउंट्स, लॉजिस्टिक्स आते हैं, जिनके माध्यम से आपको वायुसेना में फ्लाइट कंट्रोलर से लेकर एयर ट्रैफिक कंट्रोलर, एयरोनॉटिकल इंजीनियर आदि बनने का अवसर मिलता है। सभी के लिए अलग-अलग योग्यता व उम्र सीमा निर्धारित होती है। अमूमन सभी ब्रांचेज में इंट्री के लिए न्यूनतम 60 प्रतिशत अंक आवश्यक हैं।
किस तरह की चयन प्रक्रिया
सभी पदों के लिए लिखित परीक्षा होती है। जिसमें उत्तीर्ण?होने के बाद एसएसबी, इंटरव्यू व मेडिकल एग्जाम होता है। इन सब को क्वालीफाई करने के लिए बेहतर तैयारी की जरूरत होती है। अक्सर देखा गया है कि स्टूडेंट्स लिखित परीक्षा में तो पास हो जाते हैं, लेकिन कॉन्फिडेंस की कमी के चलते एसएसबी में असफल हो जाते हैं। ऐसे में जरूरी है कि छात्र बौद्धिक रूप से दक्ष होने के साथ-साथ मानसिक रूप से भी खुद को परफेक्ट बनाएं।
नॉन कमीश्ाड कम आंकना होगी भूल
नॉन कमीशंड रैंक भी एयरफोर्स का एक अभिन्न हिस्सा है। ये वे लोग हैं जो ऑपरेशन्स के बेहतर संचालन के लिए उतने ही जरूरी होते हैं। एयरमैन- वायुसेना में इंट्री की चाहत रखने वाले युवाओं के लिए एयरमैन भी एक विकल्प है। एयरमैन में तीन ग्रुप होते हैं जिसमें टेक्निकल, नॉन टेक्निकल व म्यूजिकल ग्रुप शामिल होते हैं। इन तीनों ही गु्रपों में भर्ती के लिए अलग-अलग योग्यता की दरकार होती है। इनमें कैंडीडेट्स का चयन तभी होता है, जब वह लिखित, मेडिकल परीक्षा के साथ चयन के सभी मापदंड पूरा करते हों।
एक्स ग्रुप-टेक्निकल: एक्स ग्रुप में भर्ती के लिए कैंडीडेट्स को फिजिक्स, केमेस्ट्री, मैथ्स के साथ इंटरमीडिएट में न्यूनतम 50 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण होना जरूरी है। इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम के लिए उम्मीदवार को मान्यता प्राप्त पॉलिटेक्निक से मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, आटोमोबाइल, आईटी आदि जैसी किसी ब्रांच में डिप्लोमा जरूरी है। इस दौरान उसकी उम्र 17 से 22 वर्ष के बीच होनी चाहिए। एयरफोर्स चयन बोर्ड द्वारा चयनित छात्रों को रेडियो फिटर, राडार फिटर, मेंटीनेंस, सेफ्टी इक्यूपमेंट वर्कर, रेडियो टेक्नीशियन, एयर डिफेंस सिस्टम ऑपरेटर आदि पदों पर काम करने का अवसर मिलता है।
ग्रुप वाई- इन पदों पर वे कैंडिडेट्स आवेदन करते हैं, जिन्होंने 10वीं 50 फीसदी अंकों (अंग्रेजी विषय) के साथ पास की हो या 12वीं 50 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण हों। कैंडीडेट्स की उम्र 16 से 20 वर्ष के बीच होना चाहिए। इस सेवा में ग्राउंड ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर, मिटीऑरिलॉजिकल असिस्टेंट, एयर फील्ड सेफ्टी ऑफिसर, रेडियो, टेलीफोन ऑपरेटर, एयरफोर्स पुलिस क्लर्क आदि पदों पर काम कर सकते हैं।
म्यूजिकल गु्रप- इस ग्रुप के लिए आपको मान्यता प्राप्त स्कूल से दसवीं पास होना होगा, जबकि उनका ऐज क्राइटेरिया 17 से 35 साल के बीच है। इसके साथ उन्हें एक वाद्य यंत्र भी बजाना आना चाहिए।
कैसे होता है सेलेक्शन- ऊपर दिए सभी पदों के लिए लिखित परीक्षा होती है, जो कैंडिडेट्स लिखित व फिजिकल फिटनेस परीक्षा पास कर लेते हैं उनका साक्षात्कार अफसरों व वारंट रैंक की एक टीम द्वारा लिया जाता है। इसमें सफल होने पर वायुसेना की चिकित्सकीय टीम अपने मानकों के आधार पर उनका मेडिकल टेस्ट करती है।
क्यों मनाते हैं वायुसेना दिवस
ज्यादातर देशों में सेनाओं के गौरव, उनके योगदान को याद करने के लिए सेना, नौसेना, वायुसेना दिवस आदि मनाए जाते हैं। भारत में भी हर साल 8 अक्टूबर को वायुसेना दिवस मनाया जाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान 8 अक्टूबर 1932 को इंडियन एयर फोर्स एक्ट के जरिए भारतीय वायुसेना की आधारशिला रखी गई थी।
दरअसल इस समय देश में वायुसेना के गठन का मकसद देश में ब्रिटिश औपनिवेशिक हितों की रक्षा करना था। मात्र 6 ऑफिसर,19 एयरमैन व 4 वेस्टलैंड वेपिटी एयरक्राफ्ट्स के साथ भारतीय वायुसेना की शुारुआत हुई व कराची इसका केंद्र बना था। इन सबके इतर आज भारतीय वायुसेना की गिनती दुनिया की चौथी सबसे बडी एयरफोर्स में होती है। पौने दो लाख वायुसैनिकों, 5 ऑपरेशनल, 2 फंक्शनल कमांड व करीब 1400 एयरक्राफ्ट्स के साथ इन दिनों आईएएफ वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अपनी भूमिका तलाश रही है। आगामी 8 अक्टूबर को भारतीय वायुसेना अपना 80वां स्थापना दिवस मनाएगी।
आकाश में अर्जन का मार्शल लॉ
बहुत कम लोग होते हैं, जिन्हें अपने क्षेत्र का अगुआ बनने का मौका मिलता है। वो भी तब जब मुसीबत केवक्त देश की उम्मीदें सवालों की शक्ल में घूर रही हों। पूर्व एयर चीफ मार्शल अर्जन सिंह ने अपने पूरे कॅरियर में इन सवालों का बखूबी जवाब दिया । 1919 में पंजाब के ल्यालपुर शहर (अब नाम बदलकर फैसलाबाद, पाकिस्तान) में जन्में अर्जन सिंह ने 1938 में महज 19 साल की उम्र में बतौर पायलट ऑफिसर, रॉयल एयर फोर्स ज्वाइन की। लेकिन दुनिया को उनके हुनर का पता दूसरे विश्व युद्ध में तब चला जब स्क्वैड्रन नब्ार-1 का नेतृत्व करते हुए उन्होंने बर्मा में दुश्मन के पैर उखाडे। अरकान कैंपेन के नाम से मशहूर इस लडाई में गजब की शूरता दिखाने के लिए अर्जन सिंह को ब्रिटिश सरकार ने 1944 में डिस्टंग्विश फ्लाइंग क्रॉस से नवाजा। वहीं आजादी के बाद 1964 से 69 तक वे भारतीय वायु सेना के एयर चीफ मार्शल भी रहे। 1965 की जंग में पाक के आसमानी मंसूबों को आसमान में ही ध्वस्त करने में उनकी भूमिका आज भी याद की जाती है। इन्हीं सबको देखते हुए 2002 में भारत सरकार ने अर्जन सिंह को मार्शल ऑफ एयर के दुर्लभ पांच सितारा रैंक से सम्मानित किया। फील्ड मार्शल करियप्पा व फील्ड मार्शल मानेकशॉ के बाद भारतीय सशस्त्र सेनाओं में यह रैंक पाने वाले तीसरे सैन्यकर्मी व इकलौते एयरफोर्स ऑफिसर हैं। आज भी युवा पायलटों के लिए अर्जन सिंह की गाथाएं टॉनिक का काम करती है।