Green हुआ संसार

Green हुआ संसार
एक पेड को बच्चों से बहुत प्यार था। एक लडका हर रोज पेड के नीचे खेलने आता। पेड को उसका इंतजार रहता। एक बार बच्चा कई दिनों तक नहीं आया। उसकी राह देखते-देखते पेड उदास रहने लगा। काफी दिन बाद जब वह आया तो वह उदास था। उसने कहा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं। पेड ने कहा मैं पैसे तो नहीं दे सकता, पर अपने फल जरूर दे सकता हूं, तुम इन्हें बेचकर पैसे पा सकते हो। कुछ साल के बाद लडका फिर पेड के पास आया। अब वह जवान हो गया था। वह बोला, मुझे अपने परिवार के लिए घर चाहिए। पेड ने कहा-तुम मेरी शाखाओं को काट कर घर बना लो। कई सालों बाद लडका फिर वापस आया और पेड से कहा कि मुझे बिजनेस के लिए नाव की जरूरत है। पेड बोला, मेरा तना ले लो और नाव बना लो। सालों बाद वह फिर लौटा। वह बूढा हो चुका था। पेड ने उसे देख कर कहा, मैं आपको कुछ देना चाहता हूं, लेकिन मेरे पास अब कुछ नहीं है। सिर्फ ठूंठ रह गया हूं..चाहो तो इसे ले जा सकते हो..।
दोस्तो, पेड तो हमेशा से ही हमें देते आये हैं। सब कुछ दे दिया, पर कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा। वक्त आ गया है पर्यावरण का कर्ज उतारने का..। हमारा जीवन बचाने और हमें आगे बढाते रहने के लिए अपना जीवन तक दांव पर लगा देने वाले पेडों के बारे में हम सोचें और उन्हें नया जीवन दें.. ताकि हम भी खुली, ताजी हवा में सांस ले सकें..
जानें पॉल्यूशन लेवल चुटकियों में
अब जल्द ही आपको गाडी का पॉल्यूशन लेवल चेक करने के लिए पॉल्यूशन चेकिंग सेंटर जाने की जरूरत नहीं पडेगी। बल्कि एक डिवाइस इंस्टाल करके आप जान सकेंगे कि गाडी कितना पॉल्यूशन कर रही है। आईआईटी दिल्ली से एनवॉयरनमेंट साइंस में रिसर्च स्कॉलर जय प्रकाश ने एक ऐसी डिवाइस बनाई है, जिसे वेहिकल में इंस्टाल करके पता लगाया जा सकेगा कि गाडी का पॉल्यूशन लेवल क्या है। जयप्रकाश कहते हैं कि पॉल्यूशन में कमी लाने के लिए टेक्नोलॉजी का साथ जरूरी है। आईआईटी जैसे संस्थानों में इनोवेटिव एक्सपेरिमेंट्स के जरिए इस सोच को नेक्स्ट लेवल दिया जा रहा है। वह बताते हैं कि डाइल्यूशन सैंपलिंग सिस्टम फॉर ऑटोमोबाइल से पॉल्यूशन व उसके टाइप का पता लगाने में मदद मिलती है। इस डिवाइस का दूसरा फायदा यह होगा कि ह्यूमन बॉडी और नेचर पर पडने वाले दुष्प्रभाव का भी आकलन किया जा सकेगा। जयप्रकाश कहते हैं कि उनका सपना इस किट को गाडियों में फिट करने का है ताकि लोग हायर लेवल पर अपनी गाडियों के पॉल्यूशन लेवल की जांच कर सकें।
Think, Eat and Save
व‌र्ल्ड एनवॉयरनमेंट 5 जून की इस साल की थीम है थिंक, ईट एंड सेव। इसका मकसद है कि कैसे भोजन की बर्बादी रोकी जाए और जरूरतमंदां के लिए भोजन उपलब्ध कराया जाए। मुंबई के कुछ यंगस्टर्स ने साथ मिलकर कुछ ऐसा कर दिखाया कि आज पूरी मुंबई उन पर नाज करती है। वीकेंड पार्टी, रेस्टोरेंटस, कॉरपोरेट पार्टीज, होटल्स, और वेडिंग पार्टी में ढेरों प्रकार के पकवान बनते हैं, लेकिन आखिर में पूरा भोजन इस्तेमाल नहीं हो पाता है और बच जाता है। इस भोजन को अक्सर कूडे में या नालों में गंदगी फैलाने के लिए फेंक दिया जाता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान तो पहुंचता ही है, साथ ही कई बीमारियां भी फैलती हैं। अरहम युवा ग्रुप के युवा मेंबर्स इसी वेस्ट फूड को मैनेज करके स्लम में रहने वाले गरीब और जरूरतमंद लोगों का पेट भरते हैं। ग्रुप के यावा मेंबर और वॉलंटियर निमित सेठ बताते हैं कि शादी-ब्याह में बचा हुआ खाना 70 से 80 लोगों का पेट भर सकता है। वह कहते हैं कि देश में लाखों लोगों को भूखे पेट सोना पडता है और अगर हम वेस्ट फूड को फेंकने की बजाय इन लोगों तक पहुंचा दें, तो उन्हें भूखे पेट नहीं सोना पडेगा। आज उनके गु्रप में मेंबर्स की संख्या बढकर 60 तक पहुंच चुकी है और अभी तक हजारों लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था कर चुके हैं। वह बताते हैं कि मुंबई के कई इलाकों में उन्होंने सेंटर बनाए हैं, जहां लोग उन्हें कॉल करके वेस्ट फूड को उनके हवाले कर देते हैं। निमित बताते हैं कि वे पिछले ढाई साल से गरीबों को निवाला उपलब्ध करा रहे हैं। वे बताते हैं कि इस काम के लिए उनका ग्रुप किसी की मदद नही लेता बल्कि पुराने न्यूज पेपर कबाड में बेच कर इसके लिए पैसा जुटाते हैं, यहां तक कि लॉजिस्टिक्स का पैसा भी कई बार उन्हें अपनी जेब से देना पडता है, खाना कलेक्ट करने के बाद वे उसे नजदीक के स्लम में ही डिस्ट्रीब्यूट कर देते हैं। इसके अलावा लोगों में ज्यादा से ज्यादा अवेयरनेस हो, इसके लिए लगातार कैंपेन भी चलाते रहते हैं।
हाइड्रोजन से चलेंगी गाडियां
वह वक्त दूर नहीं कि जब देश में डीजल-पेट्रोल की बजाय हाइड्रोजन से गाडियां चलेंगी। हालांकि अल्टरनेटिव फ्यूल की दिशा में हम पहले ही कदम बढा चुके हैं। 2011-12 की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीएनजी और एलपीजी से चलने वाली गाडियों की संख्या 11 लाख के पार पहुंच चुकी है। लेकिन आईआईटी के सेंटर फॉर एनर्जी स्टडीज के प्रोफेसर एलएम दास का सपना है कि देश में चलने वाली सभी कॉमर्शियल गाडियां हाइड्रोजन फ्यूल पर चलें। उन्होंने ऐसी किट डेवलेप की है, जिससे थ्री-व्हीलर्स को हाइड्रोजन फ्यूल पर चलाया जा सकेगा। प्रो. दास बताते हैं कि एयर पॉल्यूशन की प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए जरूरी है कि ऑटोमोबाइल्स के क्षेत्र में कुछ बुनियादी कदम उठाए जाएं, गाडियों के डिजाइन, फ्यूल में फेरबदल कर उन्हें इको-फ्रेंडली बनाया जाए। वह बताते हैं कि थ्री-व्हीलर्स वेहिकल्स के लिए उन्होंने जो हाइड्रोजन किट डेवलेप की है, उसमें टॉक्सिक एलीमेंट्स की संख्या न के बराबर है। वह बताते हैं कि एम एंड एम ने उनके कॉन्सेप्ट के मुताबिक कुछ वेहिकल्स डिजाइन किए, जिनकी यूएन ने भी काफी वाहवाही की। वह कहते हैं कि हाइड्रोजन से चलने वाले वाहनों को भी सरकार से सहयोग मिले तो एनवॉयरनमेंट की बेहतरी के लिए एक बडा कदम होगा।
एडिबल ऑयल्स से बॉयो-फ्यूल
बायो-फ्यूल के बारे में सालों से बहुत कुछ लिखा-पढा जाता रहा है। लेकिन अभी तक इस फील्ड में ज्यादा कुछ नहीं हो पाया है। गुडगांव के अक्षत राठी ने न केवल इसे हकीकत में बदला बल्कि इसे सक्सेस भी करके दिखाया। नोडविन ग्रुप की सब्सिडियरी अर्थ 100 कंपनी के ऑनर 34 साल के अक्षत राठी ने डीजल कारों के लिए बॉयो-फ्यूल से चलने वाली किट डिजाइन की हैं। ये कारें डीजल के साथ-साथ बॉयो-फ्यूल पर भी चलती हैं।?अक्षत बताते हैं कि कई कॉरपोरेट क्लाइंट्स के लिए उन्होंने यह किट इंस्टाल की हैं। वह बताते हैं कि ब्राजील जैसे देश में 70 परसेंट बॉयो-फ्यूल का इस्तेमाल होता है। एक रेगुलर डीजल इंजन में कुछ बदलाव करके उसे बॉॅयो-फ्यूल पर चलाया सकता है। अक्षत अभी तक हजार से ज्यादा कारों को बॉयो-फ्यूल पर कनवर्ट कर चुके हैं। वह कहते हैं कि ईमानदार कोशिश से एनवॉयनमेंटल कंजर्वेशन और कॉमर्शियली सक्से दोनों मुमकिन हैं। अक्षत बताते हैं कि 4 साल पहले पहली बार उन्हें आइडिया आया कि क्यों न गाडियों को इको-फ्रेंडली फ्यूल पर चलाया जाए। वे कहते हैं कि प्लानिंग को हकीकत में तब्दील करने से पहले उन्होंने करीब ढाई साल तक रिसर्च किया, लोगों की राय जानी, आईआईटी के कई रिसचर्स का सहयोग लिया। वह कहते हैं कि आज हम इस स्थिति में हैं कि वेस्ट ऑयल फिर वो चाहें खाने में इस्तेमाल होता हो या मशीनरी चलाने में, सभी का इस्तेमाल हम करीब 90 फीसदी एनवॉयरनमेंट फ्रेंडली फ्यूल ऑयल बनाने में करते है। राठी मानते हैं कि एनवॉयरनमेंट की बेहतरी के लिए यदि यूथ ठान ले तो नामुमकिन कुछ भी नहीं।
बांस से बनेंगे मजबूत घर
क्या आप सोच सकते हैं कि बैंबू से घर बन सकते हैं और वो भी इतने मजबूत, जितने सरिया, सीमेंट और लोहे से बने हुए घर होते हैं। आपको शायद यह मजाक लग सकता है। लेकिन यह हकीकत है। आईआईटी दिल्ली के विलेज डेवलपमेंट सेंटर में बांस से घर बनाने पर एक्सपेरिमेंट हो रहा है और संभव है कि एक दिन ऐसा आए कि जब घर बांस से बनें दिखें। इस प्रोजेक्ट के हेड एसोसिएट प्रो. सनथ मोहंती बताते हैं कि ग्रीन एनवॉयरनमेंट में बांस यानी बैंबू काफी मददगार साबित हो रहा है। बांस को अक्सर बेकार की चीजों में शुमार किया जाता रहा है। पिछले कुछ सालों से बांस केवल सजावटी सामान बनाने में उपयोग किया जा रहा है। लेकिन इससे क्या नहीं किया जा सकता? वह बताते हैं कि शहर में मकान बनाना बडा सिरदर्द है।
सरिया, सीमेंट, लोहा ये सब चीजें कंस्ट्रक्शन में लगती हैं। ऐसे में पैसा तो लगता ही है, हर मौसम के हिसाब से मकान को ठंडा-गरम करने में एक्स्ट्रा एनर्जी की भी दरकार होती है। वह बताते हैं कि बैंबू से बने घर इस प्रॉब्लम का सॉल्यूशन साबित हो सकते हैं। प्रो. मोहंती बताते हैं कि लोगों का पहला सवाल यही होता है कि क्या बांस के बने घर स्टील, सीमेंट की तुलना में मजबूत होंगे? इसका आंसर देते हुए वह कहते हैं कि अभी तक मजबूती को लेकर हमने जितने भी प्रयोग किए हैं, बांस उनमें सबसे ज्यादा खरे उतरे हैं। वह कहते हैं कि कई सालों तक बांस को पिलर, बीम की तरह इस्तेमाल करने के बाद भी ये मकान के बोझ को आसानी से झेल रहे हैं। वह बताते हैं कि मजबूती के लिए पहचाने जाने वाले हैमलेट को भी बैंबू से बनाने की कोशिशें हो रही हैं। इस प्रोजेक्ट में उनके सहयोगी बैंबू कंपोजिट्स में पीएचडी कर रहे डॉ. विवेक के मुताबिक चीन, जापान, साउथ-ईस्ट के देशों में तो बैंबू बिजनेस खासा आगे बढ चुका हैं। वहां बैंबू पल्प से कई सारी चीजें बनाई जाती है। वह चाहते हैं कि सरकार इसमें पहल करे और देश को इको-फ्रेंडली बनाने में मदद करे।

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