स्टूडेंट्स व्यू
झारखंड के धनबाद के करीब कतरास में रहने वाले अशोक कुमार को कुछ महीने पहले एक दिन अचानक अपनी पान की दुकान बंद करनी पड गई। आमदनी बिल्कुल बंद हो गई थी। घर का खर्चे चलाना मुश्किल हो गया। परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खडा हो गया। उनके तीनों बच्चों का भविष्य अंधकारमय दिखने लगा। पर पिता ने हिम्मत नहीं हारी और सलानपुर फ्यूल्स में 3,500 रुपये की नौकरी करने लगे। पिता की आंखों में सपने थे..बच्चों को अच्छी परवरिश और उच्च शिक्षा देने के। बच्चों में भी पिता का उपकार चुकाने का जज्बा था। उन्होंने भी अपनी ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोडी। आखिर एक दिन जागती आंखों से देखे गए सपने रंगीन हो गए। 12वीं के सीबीएसई एग्जाम में साइंस स्ट्रीम में अतुल ने 97.8 परसेंट नंबर लाकर पिता का सिर फº से ऊंचा कर दिया। अतुल स्टेट टॉपर बन गया। अतुल अखबारों की सुर्खियां बन गया। उसी दिन दिल्ली के अखबारों की सुर्खियां बने पारस शर्मा, जिन्होंने कॉमर्स स्ट्रीम में 99 परसेंट नंबर हासिल किए। लेकिन जहां एक के पास संसाधनों की कमी नहीं थी, तो वहीं दूसरे ने संसाधनों के घोर अभाव में पढाई की। पर दोनों के नंबरों में अंतर केवल 1.2 परसेंट का ही था। कहानी अकेले कतरास की नहीं है।
यही नहीं, पटना के अविनाश ने 98.4 परसेंट नंबर हासिल किए, तो हरिद्वार की आचंल सोमानी ने 97.8 परसेंट नंबर हासिल करके उत्तराखंड टॉप किया। और तो और गाजियाबाद के अखिल ने 98.6 परसेंट नंबर लाकर यूपी और उत्तराखंड में टॉप किया.. तो क्या फासले घट रहे थे। कहां दिल्ली और कहां कतरास? लेकिन यह सच है कि कतरास जैसे शहर और कस्बे आज ग्लोबल विलेज पर साफ-साफ दिखाई देने लगे हैं। क्या फिर से हवा का रुख पूरब की ओर हो चला है? कुछ साल पहले तक माना जाता था कि दिल्ली-मुंबई-चेन्नई जैसे महानगरों के स्टूडेंट्स ही 95 परसेंट से अधिक नंबर ला सकते हैं, लेकिन अब तो फासला 1.2 परसेंट से कम रह गया है। पटना, कतरास, हरिद्वार और गाजियाबाद अब टियर-वन सिटी और देश की राजधानी के बगल में आकर खडे हो रहे हैं। आज अगर दिल्ली का स्टूडेंट 99 प्रतिशत अंक पाता है, तो पटना, रांची, धनबाद, देहरादून-हरिद्वार, गाजियाबाद जैसे अपेक्षाकृत छोटे-मंझोले शहरों के बच्चे भी उनसे किसी मायने में कम नहीं हैं। इस बार सीबीएसई में 97, 98 परसेंट अंक लाकर उन्होंने यही साबित किया है कि भले ही हम छोटे शहरों में रहते हैं, लेकिन प्रतिभा और टैलेंट के मामले में बडे शहरों से किसी भी मामले में कमतर नहीं हैं।
क्या छोटे शहरों के बच्चों के हाथ अलादीन का चिराग लग गया है या उनमें खुद को साबित करने जिद पैदा हो गई है। उन्हें गढने और ग्रूम करने में पेरेंट्स और योग्य टीचर्स ने भी जान लडा दी है। यही कारण है कि छोटे शहरों, गांवों, कस्बों से निकलने वाले टैलेंट भी सामने आने लगे हैं।
ग्लोकल का कमाल
सीबीएसई के 12वीं बोर्ड एग्जाम में 97.8 परसेंट नंबर लाकर उत्तराखंड टॉपर बनीं हरिद्वार की आंचल सोमानी कहती हैं कि ये बात अब दूर की कौडी साबित हो चुकी है कि टैंलेट केवल बडे शहरों में मिलता है। वह कहती हैं कि ग्लोबलाइजेशन और लोकल इनपुट यानी ग्लोकल की पैठ इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी के माध्यम से अब घर-घर में पहुंच गई है। उससे बडे और छोटे शहरों की दूरियां मिट गई हैं। जो इनफॉरमेशन चेन्नई जैसे महानगर में बैठे स्टूडेंट को मिलती है, वही उत्तरकाशी जैसे एक छोटे शहर के स्टूडेंट को भी। यही वजह है कि छोटे शहरों के बच्चों का कॉन्फिडेंस बुलंदियां छू रहा है। वह कहती हैं कि जिस तरह से इंटरनेट और तमाम सोशल साइट्स ने वैश्विक समुदाय को ग्लोबल विलेज के रूप में गूंथा है, उससे छोटे और बडे शहरों का अंतर खत्म हो गया है। वह कहती हैं कि जब भेद मिट जाता है, तो हर व्यक्ति, शहर या प्रदेश एक-दूसरे से कुछ न कुछ सीखते हैं।
इक्वल इंफ्रास्ट्रक्चर
टॉपर सोमानी कहती हैं कि छोटे शहर भी अब इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में बडे शहरों को टक्कर दे रहे हैं। वह कहती हैं कि स्कूलिंग के मामले में उत्तरांखड में वह सब कुछ उपलब्ध है, जो कुछ समय पहले तक बडे शहरों के स्टूडेंट्स को ही उपलब्ध हो पाता था।
सोमानी की बात को झारखंड के स्टेट टॉपर अतुल वैभव भी सही ठहराते हैं। धनबाद के पास एक छोटे से शहर कतरास के अतुल खुद संसाधनों के अभाव में रहे हैं। संसाधनों की महत्ता को उनसे बेहतर कोई नहीं आंक सकता। वह कहते हैं कि बडे शहरों में संसाधन और मौका अधिक जरूर रहता है, लेकिन लगन व आत्मबल से मेहनत करने के बाद महानगर भी छोटे कस्बों या गावों से पीछे छूट जाते हैं। हालांकि वह इस बात का मलाल जताते हैं कि अगर उनके पास चौबीसों घंटे बिजली और अन्य बेहतर संसाधन होते, तो शायद वे भी 99 परसेंट से ज्यादा मार्क्स लाते।
सीबीएसई के 12वीं के बोर्ड एग्जाम में साइंस स्ट्रीम में 98.6 परसेंट नंबर लाकर यूपी-उत्तराखंड के टॉपर गाजियाबाद के अखिल गर्ग भी संसाधनों वाली बात को सही मानते हैं। वह कहते हैं कि छोटे शहरों के मुकाबले महानगरों के स्टूडेंट्स को ज्यादा एक्सपोजर इसलिए मिलता है, क्योंकि वहां लाइब्रेरी और नॉलेज बढाने वाले संसाधन ज्यादा होते हैं। यही वजह है कि उसका असर वहां के बच्चों की एजुकेशन और रिजल्ट पर दिखता है, लेकिन अब धीरे-धीरे छोटे शहरों में भी संसाधन बढ रहे हैं।
सेल्फ स्टडी जरूरी
टॉपर अखिल गर्ग कहते हैं कि कोचिंग सेंटर्स और ट्यूशन पढकर कोई भी टॉपर नहीं बन सकता। जरूरी है सेल्फ स्टडी। वे कहते हैं कि उन्होंने कोई ट्यूशन नहीं लिया और क्लास में टीचर्स के पढाए गए नोट्स के आधार पर पढाई की। कतरास के अतुल वैभव भी मानते हैं कि सेल्फ स्टडी आगे बढने के लिए बहुत जरूरी है। वह कहते हैं कि सेल्फ स्टडी और दृढ संकल्प की बदौलत ही वे इस मुकाम तक पहुंच पाए हैं। सेल्फ स्टडी कॉन्फिडेंस बढाने में हेल्प करती है।
पेरेंट्स बोले
इच्छाएं न थोपें
टॉपर अखिल के पिता जीके गर्ग कहते हैं कि बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है कि उन्हें पर्याप्त समय और माहौल दिया जाए। वह कहते हैं कि एक बार अगर बच्चा सही रास्ते पर चलना शुरू कर देता है, तो उसके लिए मंजिल आसान हो जाती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि पेरेंट्स कभी बच्चों पर अपनी इच्छाएं न थोपें। बच्चों की जिस क्षेत्र में ज्यादा रुचि होगी, उन्हें उस क्षेत्र में मार्गदर्शन की जरूरत नहीं पडेगी। क्योंकि अपनी पसंद के अनुसार मौका मिलने पर बच्चा उसे कभी बोझ नहीं समझता।
टॉपर आंचल सोमानी के पिता सुनील सोमानी भी मानते हैं कि इच्छाएं थोपने की बजाय बच्चे को सही दिशा में गाइड करें। हर बच्चे की क्षमता अलग-अलग होती है। उन्होंने कभी आंचल पर अपनी इच्छाएं नहीं थोपीं, बल्कि उसे प्रॉपर गाइड किया।
टैलेंट के लिए मार्क्स जरूरी!
टॉपर अतुल वैभव के पिता अशोक वर्णवाल कहते हैं कि टैलेंट के लिए बच्चों को मार्क्स लाना जरूरी है। वह कहते हैं कि अगर मार्क्स अच्छे नहीं तो, फिर अच्छे स्कूल या कॉलेज में एडमिशन मिलना मुश्किल हो जाता है।
अनिल सोमानी भी कहते हैं कि टैलेंट को नापने का एक मानक मार्क्स भी है, लेकिन मार्क्स ही सब कुछ नहीं है। बच्चे को हर फील्ड की इनफॉरमेशन होनी चाहिए। इससे टैलेंट और मार्क्सका बैलेंस बना रहता है। वह कहते हैं कि टैलेंट ज्यादा जरूरी है, लेकिन मार्क्स की भी बराबर वैल्यू हो गई है। जो स्टूडेंट टैलेंटेड होगा, उसका मार्क्स भी औरों से बेहतर होगा। इसके विपरीत टैलेंट के बिना बेहतर मार्क्स लाना संभव नहीं है।
टीचर्स टॉक
कामयाबी के लिए टैलेंट जरूरी
दिल्ली पब्लिक स्कूल, रानीपुर के प्रिंसिपल डॉ. के.सी. पांडेय मानते हैं कि चाहे कुछ भी हो, लेकिन कामयाबी के लिए टैलेंट जरूरी है। वे कहते हैं कि यह टैलेंट और लक का कुछ मिक्सचर जैसा है। मार्क्स टैलेंट मापने का एक तरीका हो सकता है, लेकिन टैलेंट किसी पैमाने की मोहताज नहीं होती। वहीं सरस्वती विद्या मंदिर, सिनीडीह के प्राचार्य उपेन्द्र राय भी मानते हैं कि बच्चों में टैलेंट बेहद जरूरी है, क्योंकि नंबर्स तो घटते-बढते रहते हैं, लेकिन टैलेंट स्थाई रहता है।
टयूशन पर फुल स्टॉप
झारखंड के स्टेट टॉपर अतुल वैभव के सरस्वती विद्या मंदिर, सिनीडीह के प्राचार्य उपेन्द्र राय कहते हैं कि उन्होंने अपने स्कूल में सबसे पहले स्टूडेंट्स की टयूशन व्यवस्था को बंद कराया, क्योंकि इससे स्टूडेंट्स स्कूल को कम वक्त देते थे। वह कहते हैं कि अच्छे मार्क्स और आगे बढने के लिए जरूरी है सेल्फ स्टडी। वह कहते हैं कि टीचर्स की डयूटी है कि वे छात्रों को नियमित तौर पर वक्त दें। प्राचार्य राय कहते हैं कि वे खुद समय-समय पर स्टूडेंट्स के साथ मीटिंग करते हैं और लगातार क्लासेज की विजिट भी करते हैं। अविनाश मोहक के स्कूल सेंट माइकल स्कूल के प्रिंसिपल फादर पीटर कहते हैं कि उनकी कोशिश होती है कि बच्चों का मॉरल डाउन न होने पाए। वे बच्चों को अपना सेंट-परसेंट देने के लिए प्रेरित करते रहते हैं।
एक्सपोजर जरूरी है
सीबीएसई 12वीं बोर्ड के यूपी-उत्तराखंड टॉपर अखिल गर्ग के नेहरू वर्ल्ड स्कूल के डायरेक्टर अरूणाभ सिंह कहते हैं कि बडे शहरों की तरह छोटे शहरों में भी टैलेंट बिखरा पडा है लेकिन एक्सपोजर न मिलने की वजह से वह उपेक्षित है। वह कहते हैं कि बात चाहे बोर्ड एग्जाम की हो या अन्य किसी कॉम्पिटिशन की, जब तक उन्हें आगे बढने के लिए एक्सपोजर नहीं मिलेगा, वे आगे नहीं बढ पाएंगे। वे कहते हैं कि छोटे शहरों का स्टूडेंट एग्जाम में अच्छे नंबर लेकर आता है, लेकिन जब उन्हें आगे बढने का अवसर नहीं दिया जाएगा, तो उसका टैलेंट दम तोड देगा। वह जोर देकर कहते हैं कि स्कूलों को चाहिए कि स्टूडेंट्स की थिंकिंग पॉवर को मजबूत करें और उन्हें हर तरह मोटिवेट कर कर आगे बढाएं।
फ्लॉप हुए मैकाले
सरस्वती विद्या मंदिर, सिनीडीह के प्राचार्य उपेन्द्र राय साफ शब्दों में कहते हैं कि वेस्टर्न एजुकेशन सिस्टम फ्लॉप शो बनकर रह गया है और सरकारें उसे स्टूडेंट्स पर थोप रही हैं। वे कहते हैं कि अगर वैदिक शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित कर दिया जाए, तो हम बडे शहरों से भी आगे निकल जाएंगे। वे कहते हैं कि जिस तरह से एजुकेशन महंगी होती हो रही है, वह दिन दूर नहीं जब केवल पूंजीपतियों के बच्चों को ही अच्छे स्कूलों में एडमिशन मिलेगा। नेहरू वर्ल्ड स्कूल के डायरेक्टर अरूणाभ सिंह भी इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि आज भी हमारा एजुकेशन सिस्टम अंग्रेजों के पुराने ढर्रे पर चल रहा है और हमें उससे आगे आने की जरूरत है।
सेल्फ स्टडी की पॉवर
झारखंड के स्टेट टॉपर अतुल वैभव के सरस्वती विद्या मंदिर, सिनीडीह के प्राचार्य उपेन्द्र राय कहते हैं कि उन्होंने अपने स्कूल में सबसे पहले स्टूडेंट्स की टयूशन व्यवस्था को बंद कराया, क्योंकि इससे स्टूडेंट्स स्कूल को कम वक्त देते थे। वह कहते हैं कि अच्छे मार्क्स और आगे बढने के लिए जरूरी है सेल्फ स्टडी। इससे स्टडेंट के नॉलेज में गहराई आती है और उसका कॉन्फिडेंस बढता है।
उपेन्द्र राय कहते हैं कि टीचर्स की डयूटी है कि वे स्टूडेंट्स को रेगुलर वक्त दें। प्राचार्य राय कहते हैं कि वे खुद समय-समय पर स्टूडेंट्स के साथ मीटिंग करते हैं और लगातार क्लासेज की विजिट भी करते हैं। अविनाश मोहक के स्कूल सेंट माइकल स्कूल, पटना के प्रिंसिपल फादर पीटर कहते हैं कि उनकी कोशिश होती है कि बच्चों का मॉरल डाउन न होने पाए। वे बच्चों को हमेशा अपना सेंट-परसेंट देने के लिए प्रेरित करते रहते हैं, ताकि वे हमेशा मोटिवेटेड महसूस करें और उनका टैलेंट सामने आये।