छोटे शहरों के Rockstar

छोटे शहरों के Rockstar
जिंदगी जश्न बन जाती है। सवाल है कि ये कहां से आ रहे हैं, कहां है इनकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट? दरअसल, ये सभी छुटकनपुर टू मुंबई जैसे छोटे शहरों से आने वाली ट्रेनों से लंबा फासला तय करके आ रहे हैं। मुंबई पहुंचने वाली सभी ट्रेनों में कोई न कोई छुटकू जरूर होता है, जिसकी आंखों में बडे-बडे सपने होते हैं। हों भी क्यों न, क्योंकि बडे-बडे सपने यहीं सच होते हैं। ऐसी सपनों वाली ट्रेनों का अंतिम मुकाम बॉलिवुड ही होता है। हजारों ख्वाहिशें यहीं आकर पूरी होती हैं और बॉलिवुड के गेटवे इन्हें पूरा करने में अहम भूमिका निभाते हैं। एस्टैब्लिश्ड गायकों-संगीतकारों के बीच जगह बनाना आसान नहीं होता। घरानों से निकल कर सीधे स्टेज की दुनिया से रूबरू होना पडता है। कई चैलेंजेज होते हैं, लेकिन जज्बा सभी मुश्किलें आसान कर देता है..इस बार कवर स्टोरी में पढें छोटे शहरों से आने वाले इन्हीं रॉकस्टार्स की कहानी..
अलका याग्निक
जानी-मानी सिंगर
क्या टैलेंट हंट शोज से म्यूजिक इंडस्ट्री की जरूरतें पूरी हो रही हैं?
यह समय की बात है। कितनी पूरी होती है यह मैं एकदम से नहीं बता सकती, लेकिन कई कलाकारों की होती भी है और कई की नहीं भी होती। कुछ टैलेंटेड लोग कहीं नहीं हैं पर कई तीसरे-चौथे स्थान पर आने के बाद भी काम कर रहे हैं।
क्या संगीत के क्षेत्र में आगे बढने के लिए फेमिली बैकग्राउंड होना जरूरी है? जिनका कोई बैकग्राउंड नहीं, क्या उसे परेशानी होती है?
संगीत ऐसी विधा है, जिसे जो आत्मा में बसाएगा, वहीं कामयाब होगा। हां, आज क्षणिक सफलता को भी लोग कामयाबी कहते हैं। कुछ ऐसे लोग भी आज चल रहे हैं, जिन्हें संगीत की अच्छी समझ नहीं है। यह उनका लक है, लेकिन वे लंबी रेस का घोडा नहीं हो सकते।
सुरीली आवाज, सुरों-रागों पर अच्छी पकड और रेगुलर रियाज के अलावा और किन-किन चीजों की जरूरत होती है?
इनसे अलग अगर आप गुड लुकिंग हैं और स्टाइलिश भी, तो स्टेज शो में फायदा मिल सकता है।
फ्यूजन के जमाने में क्लासिकल म्यूजिक की समझ जरूरी है?
आज जो बच्चे या बडे सिंगर शो में आ रहे हैं, सभी में इस बात को देखा जा रहा है। अब लोगों ने जान लिया है कि चाहे जो भी गायें, लेकिन क्लासिकल से आप दमदार होते हैं।
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर डिस्ट्रिक्ट का नाहन कस्बा अगर अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए मशहूर तो है ही, लेकिन नए जमाने के रॉकस्टार्स ने उसे एक नई पहचान दी है। यहां से शायद ही कोई ट्रेन सीधे मुंबई जाती हो। यहां के मोहित चौहान की कहानी किसी फिल्मी स्टोरी से कम नहीं है। पेरेंट्स की विश के अगेंस्ट जाकर उन्होंने म्यूजिक को करियर बनाया। ज्योलॉजी में मास्टर डिग्री हासिल करने वाले मोहित ने कभी सिंगिग की ट्रेनिंग नहीं ली, लेकिन म्यूजिक का शौक था। कॉलेज टाइम में ही अपने दोस्तों के साथ मिल कर एक बैंड बनाया सिल्करूट, जिसका एक गाना डूबा-डूबा बेहद पॉपुलर हुआ। लेकिन बैंड ज्यादा दिनों तक न चल सका और वे फिर निकल पडे अकेले सफर पर। आवाज में गंभीरता थी, तो जल्द ही एक नया मुकाम मिला। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे कलाम की कविताओं को सुरों में पिरो कर उन्होंने सोलो एलबम बनाई कलाम। एक छोटी सफलता जरूर थी, लेकिन सफर का पडाव आखिरी नहीं था। आखिरकार एक मिरेकल हुआ, बॉलिवुड के म्यूजिक बादशाह ए.आर. रहमान ने उन्हें ब्रेक दिया और रंग दे बसंती के एक गाने खून चला ने बॉलिवुड के दरवाजे खोल दिए और फिल्म रॉकस्टार ने उन्हें रियल लाइफ रॉकस्टार बना दिया।
स्माल सिटी बिग ड्रीम
आशिकी-2 के सुन रहा है तू गाने से अपनी पहचान बनाने वाले 26 साल के अंकित तिवारी आज सुपर स्टार हैं। वे सिंगर भी हैं और कंपोजर भी। बॉलिवुड में ऐसे बेहद कम लोग हैं, जो ये दोनों खूबियां रखते हैं। मात्र 18 साल की उम्र में म्यूजिक को करियर चुनने वाले अंकित पर आज कानपुर का रानीगंज नाज करता है। वह बताते हैं कि बीबीएस कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद वे पूरी तरह म्यूजिक फील्ड में आ गए। घर में मां गाती थीं, तो उन्हें सुनता था। वहीं से शौक शुरू हुआ। पैशन मंबई ले आया और जैसा अक्सर होता है कि बहुत से लोग यहां आकर करियर के लिए भटकते हैं, मेरे साथ भी वही हुआ। इसी दौरान गीतकार संदीपनाथ से भी रिश्ता जुडा, उनसे गीत लिखने के लिए मदद मांगी। इसके बाद तिग्मांशु धूलिया की फिल्म साहब बीबी और गैंगस्टर के लिए टाइटिल सॉन्ग गाया, जिसे लोगों ने पसंद किया। उसके बाद आशिकी 2 में गाने को मिला।
हॉबी से शुरुआत
यूपी के शहर इटावा के रहने वाले और अलाप बैंड के मेंबर शिवम चंदेल कहते हैं कि हम जिस सोसायटी में रहते हैं, वहां डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजर और आईएएस को ही कामयाब और बेहतर करियर माना जाता है। मैं भी इससे अछूता नहीं रह सका और न चाहकर भी संगीत को छोडकर पढाई करने लगा। बीसीए और एमबीए जैसी डिग्री लेकर मार्केटिंग मैनेजर और लेक्चररशिप तक भी की, लेकिन मन नहीं रमा। कुछ था जो अभी बाकी था। शिवम कहते हैं कि बचपन से ही संगीत में इंट्रेस्ट था। संगीत में कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे अलग पहचान बने और इसी ने ही अलाप बैंड बनाने के लिए प्रेरित किया।
बॉलिवुड का गेटवे टैलेंट शोज
आजकल टीवी चैनल्स पर ऐसे कई टैलेंट हंट प्रोग्राम्स होते रहते हैं, जो स्माल टाउंस टैलेंट्स के लिए बॉलिवुड का गेटवे साबित हो रहे हैं। 19 साल की चंडीगढ की पूर्वी कौटिश में एक परिपक्व सिंगर का अंदाज, अलग स्टाइल की गायकी और वेस्टर्न के साथ इंडियन को मेल कर लेने की खूबी है। इंडियन आइडल 6 के टॉप फोर में पहुंच कर अपनी पहचान बनाने वाली पूर्वी कौटिश बताती हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे कभी इंडियन आइडल में हिस्सा लेंगी। वह कहती हैं कि इंडियन आइडल के ऑडीशन के अगले दिन मेरा बारहवीं का अकांउट्स का पेपर था। ऑडीशन दिया, सलेक्शन हुआ और गायकी प्रोफेशन बन गया।
लॉफ्टर चैलेंज से एंट्री
कहावत है कि प्रतिभा छिपाए नहीं छिपती, चाहे कितनी कोशिश कर लो। जालंधर की सुगंधा मिश्रा आज स्मॉल स्क्रीन पर जाना-पहचाना नाम हैं। वह एक अच्छी कॉमेडियन भी हैं, तो एक अच्छी सिंगर भी। लेकिन गायकी में एंट्री उनकी एक ऐसे शो से हुई, जो बॉलीवुड का गेटवे तो जरूर था, लेकिन गायकी की बजाय एक कॉमेडी शो से। सुगंधा बताती हैं कि वे ओरिजनली यूपी के इलाहाबाद की रहने वाली हैं, लेकिन उनकी परवरिश जालंधर, पंजाब में हुई। उनका पारिवारिक माहौल भी संगीतमय था और वे इंदौर घराने की चौथी पीढी से ताल्लुक रखती हैं। वह बताती हैं कि एमए म्यूजिक से करने के बाद वे अपनी मंजिल तलाशने मुंबई पहुंची। वहां उन्हें लॉफ्टर चैलेंज में एंट्री मिली और यही उनके लिए टर्निंग प्वाइंट बन गया। वह कहती हैं कि ये शोज न केवल पहचान देते हैं बल्कि मेन इंडस्ट्री के साथ काम करने का मौका भी देते हैं। वह बताती हैं कि कॉमेडी शो ने उन्हें इंडस्ट्री के सामने प्रतिभा दिखाने का मौका दिया।
स्टेज शो से मिली पहचान
अलाप बैंड के शिवम चंदेल कहते हैं कि आज वह जो कुछ भी हैं, सिर्फ स्टेज शो की बदौलत हैं। अगर स्टेज शो नहीं होता तो हम इतने पॉपुलर नहीं होते। स्टेज शो ने हमें फाइनेंशियली भी स्ट्रॉन्ग बनाया है। एलबम में हमें अधिक फायदा नजर नहीं आता है, क्योंकि इसमें संगीत से जुडे लोगों को अधिक पैसा नहीं मिलता है।
सिंगर अंकित तिवारी कहते हैं कि अगर काम मिलता है, तो आर्थिक मजबूती तो मिलती ही है। छोटे-मोटे शो मिले, जिनसे गुजारा किया। मैं ईश्वर को थैंक्स कहता हूं कि उन कामों से मिले पैसों ने मुझे मुंबई में टिकने की हिम्मत दी।
बिना प्लेटफॉर्म के पहचान
चन्ना वे घर आजा वे.., बम्बू, केएलपीडी जैसे फिल्मों और गीतों के म्यूजिक कंपोजर और संगीतकार संतोख सिंह बताते हैं कि छोटी जगह से होने के कारण एक्सपोजर नहीं मिल पाता। वह कहते हैं कि राजस्थान के श्रीगंगानगर जैसे छोटे शहर में म्यूजिक का इतना एक्सपोजर नहीं मिलता। उनके घर में म्यूजिक का ऐसा कोई माहौल नहीं था। थोडा- बहुत गाने का शौक था। एक बार नुसरत फतेह अली खान साहब का प्रोग्राम था। उनकी गायकी बेहद पसंद आयी और यहीं से संगीत मेरे अंदर बैठ गया। जब बडा हुआ तो घर वालों को बताया, तो उन्होंने कहा कि जो जी में आए करने दो, बाद में लौट कर घर आ जाएगा। नवाब खान साहब से संगीत की तालीम लेने के बाद बहुत से लोगों के साथ शागिर्दी की। फिर खुद एलबम के लिए प्लान किया। उसके बाद लोग जानने लगे। फिर काम मिलना शुरू हो गया। मुझे ऐसे कोई प्लेटफॉर्म नहीं मिले। मैंने अभी तक जो भी पहचान बनाई है, मेहनत के बूते बनाई है।
प्लेटफॉर्म है जरूरी
कंपोजर, संगीतकार और सिंगर शंकर महादेवन कहते हैं कि हमारे देश में बॉलीवुड ही इकलौता मार्केट है म्यूजिक का। यहां हीरो के नाम पर गाना चलता है या हिट होता है। आप विदेशों में जाइए। यूरोप, अमेरिका, यहां तक कि पाकिस्तान में स्थिति बिल्कुल अलग है। वहां सिंगर के लिए ऐज ए सिंगर एक मार्केट है। वहां यह नहीं जाना जाता कि किसने किस स्टार के लिए गाना गाया है। बल्कि यह देखा जाता है कि इस गायक ने यह गाना गाया है। यहां मार्केट की जरूरत है। यहां ऐसे प्रोजेक्ट आने चाहिए जिनका टीआरपी से अलग हट कर अच्छा संगीत देने का मोटिव हो। गायकी के लिए एक प्लेटफॉर्म भी होना चाहिए। बॉलीवुड से अलग कुछ किए जाने की आवश्यकता है।
फ‌र्स्ट इंटरनेशनल इंटरनेट बैंड
क्या इंटरनेट पर बैंड बनाना पॉसिबिल है। सुनकर आश्चर्य लगेगा, लेकिन मॉडल लुक और स्मार्ट सिंगर सागरिका देब ने इसे पॉसिबल बनाया। नेटवर्किग इंजीनियर और लिम्का बुक में नाम दर्ज करा चुकी सागरिका बताती हैं कि इंटरनेट बैंड बनाने में मुझे काफी मुश्किलें आईं। सभी को लगा मैं पागल हूं। पर मुझे तो कुछ करना ही था। हम मिडिल क्लास लोग किसी बडे स्टूडियो को 15,000 रुपये प्रति घंटे देकर बुक नहीं करा सकते। इन्वेस्टमेंट के लिए मेरे पास भी पैसा नहीं था और इंटरनेट ही ऑप्शन था। मेरी मेहनत ने रंग दिखाया और लोग हमसे जुडते गए। वह बताती हैं कि हमारे वाइल्ड ब्लॉसम्स बैंड के सदस्य अमेरिका, यूके, फ्रांस, जर्मनी से हैं। हम आपस में मिले नहीं हैं, लेकिन एक टीम के रूप में काम करते हैं। मैं अपने हिस्से को रिकॉर्ड कर के डाटा बेस में डाल देती हूं, जहां से दूसरे देशों में मौजूद हमारे म्यूजिक कंपोजर उठा लेते हैं। हमारे दो एलबम तो अभी तक साइबर व‌र्ल्ड में आ चुके हैं। हमारी मेहनत को देखते हुए मोबाइल और इंटरनेट टेक्नोलॉजी द्वारा रिवॉल्यूशन लाने के लिए एमबिलियंथ अवार्ड साउथ एशिया 2013  के लिए नॉमिनेशन हुआ है। अमेरिका की हॉरिजोन वीयू म्यूजिक फर्म हमें सपोर्ट कर रही है।
समझदारी से करें रियाज
स्टैब्लिश होने के लिए बेसिक क्वालिटीज क्या होनी चाहिए?
देखिए, म्यूजिकपरफॉर्मिग आ‌र्ट्स का हिस्सा है, जहां थ्योरी की अपेक्षा लगातार की गई प्रैक्टिस ही काम आती है। इस दौरान आप कौन सा गाना गा रहे हैं कौन सा सुर लगा रहे हैं, गाने में कौन सी टेक्निक इस्तेमाल कर रहे हैं, सभी को जानना जरूरी है। मेरे ख्याल से जुनून की हद तक रियाज इस फील्ड में स्टैब्लिश होने के लिए सबसे बडी क्वालिटी है।
शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा लेना कितना जरूरी है?
बिना गुरु के ज्ञान संभव नहीं है। जिस तरह खाद, पानी, बीज मौजूद हो, लेकिन बगैर उन्हें रोपे, ग्रूम करें उनका पौधों में तब्दील हो पाना संभव नहीं होता। उसी तरह संगीत के क्षेत्र में ग्रूमिंग के लिए विधिवत शिक्षा खासी महत्वपूर्ण है।
रखें म्यूजिकल रुआब :
अभिजीत भट्टाचार्य
छोटी जगहों से बडे शहर की राह कितनी मुश्किल होती है?
देखिए, छोटी जगहों से फिल्मों, संगीत के क्षेत्र में जगह बनाने के लिए हर रोज सैकडों लोग मुंबई आते हैं, लेकिन उनमें से बिरले ही कामयाब हो पाते हैं। खुद मै कानपुर से आया, लेकिन मुझे कभी नहीं लगा कि मै इतने बडे शहर में आया हूं और आज स्थिति यह है कि मुंबई भी छोटा लगता है। मैं सभी युवाओं को सलाह दूंगा कि अपने म्यूजिकल रुआब से खुद को इतना बडा बनाएं कि शहर ही छोटा लगने लगे।
क्या नामी फैमिली बैकग्राउंड होना जरूरी है?
मैं इसे नहीं मानता। बेहतर सिंगर तो ऊपर वाले की देन होता है। वह अपनी मेहनत से खुद को बेहतरीन बनता है। जाहिर है यदि वो अच्छा है, अपने टैलेंट से सबका ध्यान खींचता है तो कोई कारण नहीं कि वो म्यूजिक के क्षेत्र में आगे न बढे।
नियमित रियाज के अलावा और किन चीजों की दरकार होती है?
एक सही मार्गदर्शक, एक सच्चा गुरु जो इस क्षेत्र में भाग्यशाली लोगों को ही नसीब होता है, को मैं सबसे महत्वपूर्ण मानता हूं। सुरों में जान नई-नई चीजों को प्रैक्टिकली सीखने की तडफ से ही आती है।
सूफी म्यूजिक ने खोली राह
आमतौर पर माना जाता है कि एक फीमेल सिंगर के लिए सॉफ्ट वॉयस का होना जरूरी है। लेकिन मूवी रॉकस्टार के फेमस सॉन्ग कतिया करू की सिंगर हर्षदीप कौर इसकी अपवाद हैं। सूफी की सुल्तान के नाम से मशहूर हर्षदीप कहती हैं कि आम लडकियों की तरह पतली आवाज नहीं है मेरी। हाई पिच्ड और हैवी है। बचपन से ही रेशमा जी, नुसरत फतेह अली खां साहब और जगजीत सिंह जी के गाने गाती थी। इसी टोन के गाने मेरी आवाज को सूट करते हैं। लंबी जुदाई  बहुत गाया मैंने। इसमें एक सूफियाना अंदाज है। सब तारीफ करते थे, तो मैं ऐसे ही गाने ढूंढने लगी। जब सूफी में इंट्रेस्ट बढा तो बाबा बुल्लेशाह के कलाम, पंजाबी फॉक गाने लगी। राह मिलती चली गई, लेकिन हर फील्ड की तरह संगीत में भी अगर आप यूनिक हों, तभी चलेगा। आप कुछ ऐसा क्रिएट कर सकते हैं जो सबसे अलग हो, तभी आपको पहचान मिलेगी। आपको यूनिकनेस क्रिएट करनी होगी। इसे मेंटेन करना होगा, वरना मेहनत करने वाले आर्टिस्ट कम नहीं हैं।

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