मैं भी गांधी

मैं भी गांधी
हमारे भीतर हैं गांधी
गांधी जी असहयोग आंदोलन के जरिए भारत का शुद्धिकरण चाहते थे। भ्रष्टाचार और राजनीतिक आतंकवाद उन्हें परेशान करते थे। इसीलिए 6 दिसंबर 1928 के यंग इंडिया में उन्होंने लिखा, एक दिन भ्रष्टाचार सबके सामने आएगा, भ्रष्टाचारी चाहें उसे जितना छिपाने की कोशिश करें। इसलिए ये हरेक नागरिक की जिम्मेदारी होगी कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाए और अपने अधिकारों के लिए लडे। जब भी कोई रिश्वतखोरी का मामला सामने आए, तो उसे तुरंत जड से खत्म करें। भ्रष्ट लोगों को सजा दिलाने, उन्हें पद से बर्खास्त करने के लिए कोई कसर न रहने दें। मेरा भी यही मानना है कि आज जब देश में भ्रष्टाचार एक कैंसर की तरह जड जमा चुका है, तो इसे खत्म करने की पहली और सबसे ज्यादा जवाबदेही यहां के नागरिकों की है। मेरा मत है कि आज भी हरेक इंसान में एक गांधी मौजूद है, सिर्फ उसे पहचानने की जरूरत है।
लापरवाही बनी आदत
अफसोस की बात है कि आज लापरवाही एक राष्ट्रीय दोष बन चुका है। आसपास घटने वाली घटनाओं से सरोकार खत्म होता जा रहा है। किसी को किसी की परवाह नहीं है। अपना काम बन जाना चाहिए, फिर चाहे उसके लिए रिश्वत ही क्यों न देनी पडे। इसलिए आज समाज में इतना कुछ घटित हो रहा है, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक हिंसा और यौन शोषण जैसी तमाम बुराइयां सामने आ रही हैं।
गुम हुई ईमानदारी
महात्मा गांधी कहते थे कि एक इंसान जो सोचता है, वही बनता है। वह अगर अपने काम में ईमानदारी नहीं रखेगा और उसमें जरूरत से ज्यादा सामान रखने या छिपाने की प्रवृत्ति होगी, तो उससे भ्रष्टाचार को बढावा मिलेगा। आज यही हो रहा है, जो महंगाई का भी एक बडा कारण है। गांधी जी का मानना था कि प्रकृति ने इंसान की जरूरत के लिए सब कुछ दिया है, उसकी लालच के लिए नहीं। इसलिए अगर आज लोग ये समझ लें कि अपने स्वार्थ के लिए किसी का शोषण नहीं करना है, फिर वह इंसान हो, पशु या पर्यावरण, तो हम एक सभ्य समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।
अहिंसा में है बडी ताकत
मैं जब विभिन्न सेशंस या कैंप्स में युवाओं से बात करती हूं, तो वे गांधी जी को जानने में रुचि लेते हैं। देश के युवाओं से कहना चाहूंगी कि अगर उन्हें तरक्की करनी है, तो गांधी जी की विचारधारा को समझना होगा, जो बताती है कि अहिंसा और मानवता में कितनी ताकत है। कुछ समय पहले हुए निर्भया कांड के बाद जिस तरह जनता ने अपनी शक्ति पहचान कर, बिना किसी नेता के खुद से आंदोलन छेडा था, वह इसी का परिणाम कहा जाएगा।
शिक्षा में जरूरी करुणा
समाज में जिस तरह से हिंसा बढ गई है, इसके लिए कहीं न कहीं हमारे पारिवारिक और सामाजिक संस्कार के अलावा शिक्षा पद्धति भी जिम्मेदार है। लडकियों की शिक्षा पर जोर दिया जाता है, लेकिन ज्यादा जरूरी है लडकों को सही से शिक्षित करना। उन्हें सशक्त बनाना है। अगर सुरक्षित भविष्य चाहिए, तो उनमें बचपन से ही अहिंसा के उदाहरण देने होंगे। संभव है कि 90 प्रतिशत तक हिंसा पर काबू पा लिया जाए। इसके अलावा शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि करुणा जगाना भी है।
राष्ट्र से मिलती है पहचान
गांधी जी का मानना था कि भ्रष्टाचार तभी खत्म होगा, जब इसमें शामिल लोगों को ये समझ में आ जाएगा कि राष्ट्र का अस्तित्व उनसे नहीं है, बल्कि उनका राष्ट्र से है। तब देश की स्थिति कुछ और होगी। हम सभी जानते हैं कि भारत जितनी बौद्धिक संपदा कहीं और नहीं है। किसी दूसरे राष्ट्र से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है, फिर क्यों गलत रास्ते पर चलें।
क्षमा में है शक्ति
गांधी जी ने राजनीति में रहते हुए नैतिक मूल्यों का कभी त्याग नहीं किया। हालांकि उनके साथ के लोगों ने गलतियां भी कीं, लेकिन गांधी जी ने उन्हें क्षमा कर दिया। गांधी जी कहते थे, जब भी आपका सामना किसी विरोधी से हो, तो उससे प्यार से पेश आएं, इसलिए वे खुद अपने विरोधियों को क्षमा करके आगे बढते गए। वे जैसे निर्भीक थे, दूसरों को भी वैसा ही बनने की प्रेरणा देते थे। भले ही कई लोग उनके विचारों से असहमति रखते थे, लेकिन गांधी जी ने उन्हें भी दोस्त माना और हमेशा अपनी चेतना की आवाज सुनी।
सर्व-धर्म सम-भाव
गांधी जी ने बाइबल, टॉलस्टॉय और श्रीमद्भगवद्गीता को बडे ध्यान से पढा था। वे सर्व-धर्म सम-भाव में विश्वास रखते थे। वे कहते थे कि अगर हम अपने धर्म का सम्मान चाहते हैं, तो दूसरों के धर्म का भी सम्मान करना होगा। अगर आप सामने वाले शख्स में ईश्वर को नहीं पाते हैं, तो ईश्वर की तलाश करना बेकार है। इसलिए हरेक स्त्री और पुरुष की यह जिम्मेदारी है कि वह दुनिया के हरेक धर्मशास्त्र को जाने।
सर्वोदय का सपना
अंतिम सांस लेने से पहले गांधी जी देश में सर्वोदय आंदोलन शुरू करना चाहते थे, ताकि हर दिशा, हर समुदाय तक विकास की रोशनी पहुंच सके। उनके जाने के बाद आचार्य विनोबा भावे ने इस सपने को साकार करने की कोशिश की, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। (तारा गांधी, महात्मा गांधी की पौत्री एवं गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और कस्तूरबा गांधी नेशनल मेमोरियल ट्रस्ट की वाइस चेयरपर्सन हैं)
जनाग्रह वॉयस ऑफ पीपल
रमेश रामनाथन (को-फाउंडर, जनाग्रह) एजुकेशन : बिट्स पिलानी से ग्रेजुएट। येल यूनि.से एमबीए। सिटी बैंक, न्यूयॉर्क में किया काम।
इनवेस्टमेंट बैंकर रमेश रामनाथन न्यूयॉर्क के सिटी बैंक में टॉप पोजिशंस पर काम कर रहे थे, जबकि उनकी आर्किटेक्ट वाइफ स्वाति रामनाथन भी अमेरिका की रिनाउंड कंपनी में जॉब कर रही थीं। दोनों लग्जीरियस लाइफ लीड कर रहे थे। इस तरह यूएस में रहते हुए करीब 10 साल बीत गए थे, तभी एक दिन दोनों ने डिसाइड किया कि उन्हें सोशल सेक्टर में काम करना है, अपने देश के लिए कुछ करना है, जिसके लिए इंडिया लौटना होगा और इस तरह साल 1998 में दोनों बेंगलुरु लौट आए। इसके तीन साल बाद 2001 में शुरू हुआ जनाग्रह, जो गांधी जी के सत्याग्रह से इंस्पायर्ड था।
अमेरिका में दिखी राह
रमेश रामनाथन कहते हैं, अमेरिका को लोग मैटेरियलिस्टिक देश मानते हैं, लेकिन वहां की सोसायटी में इंप्रूवमेंट के लिए पब्लिक की ओर से काफी इनिशिएटिव लिया जाता है। आम लोग और उन जैसे प्रोफेशनल्स वॉलंटियर के तौर पर लोकल इश्यूज को सॉल्व करने के लिए एफर्ट लगाते हैं। इन सबने उनके मन में काफी डीप इंपैक्ट डाला। रमेश ने बताया कि अमेरिका में टाउन बजट की प्लानिंग में भी पब्लिक का पार्टिसिपेशन होता है। लोग एक जगह इकट्ठा होते हैं, अपने आइडियाज रखते हैं। उनमें डिफरेंसेज होते हैं, लेकिन अपनी बात रखने से संकोच नहींकरते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने अमेरिका में डेमोक्रेसी का एक बिल्कुल नया चेहरा देखा और इस तरह स्वाति के साथ फैसला लिया कि 5000 मील दूर रहकर इंडिया में चेंज नहीं लाया जा सकता, बल्कि वहां जाकर ही कुछ किया जा सकता है। गांधी जी ने भी कहा था, पहले आपको अपने अंदर वह बदलाव लाने होंगे, जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं। रमेश कहते हैं, जनाग्रह ने छोटे लेवल से शुरुआत की। कॉलोनीज में डोर-टु-डोर गार्बेज कलेक्शन किया, पा‌र्क्स को डेवलप किया, स्ट्रीट लाइट्स की प्रॉब्लम सॉल्व की।
पार्टिसिपेटिव डेमोक्रेसी
गांधी जी ने कभी नहीं कहा कि कोई इंसान बुरा होता है। रमेश कहते हैं कि उन्होंने भी कभी गवर्नमेंट या सिस्टम की बुराई नहीं की, बल्कि वे रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी को पार्टिसिपेटिव डेमोक्रेसी बनाना चाहते हैं। सोशल और दूसरे चेंजेज लाने में लोगों की भागीदारी बढाना चाहते हैं। इसीलिए बेंगलुरु शहर की बजट प्लानिंग में आम पब्लिक को शामिल करने के लिए जनाग्रह ने एक कैंपेन चलाया। इसमें सैयद किरमानी, देवी शेट्टी, नंदन नीलेकणी के अलावा 2000 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। इस कैंपेन के जरिए सरकार से मांग की गई थी कि वह शहर के हर वार्ड के डेवलपमेंट के लिए कम से कम 50 लाख रुपये अलॉट करे। इस तरह जब 2001-02 का बजट तैयार हुआ, तो उसमें 10.7 करोड रुपये का काम लोगों द्वारा आइडेंटिफाई किया गया था। यह जनाग्रह की पहली सक्सेस थी।
अर्बन प्लानिंग
रमेश ने बताया कि जब वे यूएस से लौटे, तो देखा कि इंडिया में अर्बन प्लानिंग की कोई स्कीम,कोई स्ट्रक्चर नहीं है। चीन में जहां एक लाख से ज्यादा अर्बन प्लानर्स को हर साल ट्रेनिंग दी जाती है। वहीं, इंडिया में अभी काफी सुधार की जरूरत है। रमेश कहते हैं, वह 2004 का साल था, जब यूपीए सरकार अपने पहले बजट में कई नई स्कीम्स लॉन्च करने जा रही थी, लेकिन अर्बन प्लानिंग को लेकर कोई योजना नहीं थी। जनाग्रह ने प्लानिंग कमीशन, अर्बन डेवलपमेंट मिनिस्ट्री और पीएमओ तक, इस इश्यू को उठाया। 6 महीने तक कई राउंड की मीटिंग हुई। इसके बाद आखिरकार अथॉरिटीज कनवींस हुईं और शहरों के री-डेवलपमेंट के लिए 2005 से जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूबल मिशन को लागू किया गया। रमेश इस मिशन के नेशनल टेक्निकल एडवाइजर हैं। वे कहते हैं कि इस स्कीम में कम्युनिटी पार्टिसिपेशन लॉ एक इंपॉटर्ेंट पार्ट है जो अर्बन सिटीजंस को एरिया सभा के जरिए अपनी बात रखने का एक प्लेटफॉर्म देता है।
फाइट अगेंस्ट करप्शन
रमेश कहते हैं कि इंडिया में दो तरह के करप्शन्स हैं, होलसेल और रिटेल। आम पब्लिक का सामना सबसे ज्यादा रिटेल करप्शन से होता है, जिसे बंद किया जा सकता है, अगर पब्लिक ये डिसाइड कर ले कि वह करप्शन को टॉलरेट नहीं करेगी। रमेश सवाल करते हैं कि जब कंपनीज अपनी क्वॉर्टरली या एनुअल रिपोर्ट पब्लिश कर सकती हैं, तो लोकल एडमिनिस्ट्रेशन क्यों नहीं। उन्होंने बताया कि जनाग्रह का टाटा टी के साथ किए गए जागो रे कैंपेन को काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला था। इसी के बादwww.ipaidabribe.com स्टार्ट किया गया। ये एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहां पब्लिक करप्शन से रिलेटेड अपने एक्सपीरियंस को रिकॉर्ड कर सकती है। रमेश के मुताबिक आने वाले सालों में इस प्लैटफॉर्म के जरिए काफी कुछ चेंज लाया जा सकता है। इस तरह जनाग्रह की कोशिश है कि वे अर्बन प्लानिंग, अर्बन मैनेजमेंट, लेजिटिमेट पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन और पब्लिक पार्टिसिपेशन के जरिए इंडिया में बडा बदलाव ला सकें।
गांधी ही दिखा रहे राह
अनुपमा शर्मा
(फाउंडर, पिक अ फाइट)
एज : 29
एजुकेशन : एम.टेक., कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी
वेबसाइट : www.pickafight.in
अनुपमा शर्मा का डेबिट कार्ड चोरी हो गया था। किसी ने उनके कार्ड से हजारों की शॉपिंग भी कर डाली। बैंक में कंप्लेन करने पर ऑफिसर्स ने उनसे एफआईआर दर्ज कराने को कहा। वह कैलिफोर्निया से मास्टर्स करने के बाद कुछ ही दिनों पहले बेंगलुरु आईं थीं। वह इससे पहले कभी पुलिस स्टेशन नहीं गईं थीं। पुलिस वाले उन्हें एक थाने से दूसरे थाने दौडाते रहे। आखिरकार एक स्टेशन में ऑफिसर ने अनुपमा से पूछा, कहां काम करती हो। ऑफिसर ने उनसे कहा, मैडम, इतना आसान नहीं है एफआईआर लिखवाना। अनुपमा भी समझ गईं कि पुलिस वाला क्या चाहता है। गुस्सा आ रहा था अपने देश की पुलिस और करप्ट सिस्टम पर। अनुपमा को महात्मा गांधी के सिद्धांत याद आए और उन्होंने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह एक रुपया नहीं देंगी और एफआईआर लिखवाकर ही रहेंगी। उन्हें दोस्तों के साथ कई बार पुलिस स्टेशन के चक्कर काटने पडे। घंटों इंतजार करना पडा, लेकिन वे झुकने वालों में से नहीं थीं। आखिर में पुलिस ऑफिसर को समझ में आ गया। उन्हें अनुपमा की एफआईआर लिखनी पडी। कुछ महीनों बाद उनकी एक दोस्त का कार्ड चोरी हो गया। एफआईआर लिखवाने के लिए जाना पडा। सारे दोस्त साथ में पुलिस स्टेशन गए, लेकिन इस बार बिना देरी एफआईआर दर्ज हो गई।
जिंदा हैं गांधी
अनुपमा के साथ जो कुछ हुआ वह अक्सर लोगों के साथ होता है और होता आया है। कुछ सिस्टम को कोसते हुए ब्राइब देकर काम बना लेते हैं, लेकिन कुछ विरोध कर दूसरों के लिए मिसाल बन जाते हैं। करप्शन के खिलाफ अनुपमा की लडाई भले ही छोटी-सी थी, लेकिन इस घटना ने उन्हें एक बडी लडाई के लिए ग्राउंड दे दिया। वह कहती हैं, वक्त के साथ लोगों ने महात्मा गांधी की इमेज खराब करने की बहुत कोशिश की, लेकिन आज भी उनके सिद्धांत उतने ही रिलीवेंट हैं।
पिक अ फाइट अगेन्स्ट करप्शन
Nobody can do everything but Everybody can do something. इसी सोच के साथ काम कर रही हैं अनुपमा शर्मा और पिक अ फाइट की उनकी टीम। पिक अ फाइट की शुरुआत अनुपमा और उनके दो साथियों सुमित दत्ता और चेतन भाटिया ने मई 2011 में की थी। अनुपमा बताती हैं, वह ऐसा वक्त था जब करप्शन के खिलाफ देश के नौजवान लामबंद हो रहे थे। ऑनलाइन और ऑनरोड मूवमेंट दोनों साथ-साथ चल रहे थे। एक्चुअली हुआ ये था कि तब हम तीनों बेंगलुरु में थे। हमने डांडी मार्च ऑर्गेनाइज की थी, हम चाहते थे कि उसमें कम से कम 1000 लोग आएं। हमने फेसबुक पर पेज इनवाइट डाला। करीब 1200 लोगों ने इनविटेशन ऐक्सेप्ट किया। 500 लोग ही आए। भले ही संख्या कम रही, लेकिन इससे लोग अवेयर तो हुए कि करप्शन को यूं ही बर्दाश्त नहीं करना चाहिए, बल्कि आवाज उठानी चाहिए। उसी के बाद हमें जोश आ गया कि और भी कुछ करना चाहिए। तब हमने ये वेबसाइट शुरू की।
करप्शन खत्म होने की उम्मीद
अनुपमा कहती हैं कि आज जब बडे से बडा नेता यह कहता है कि करप्शन इंडियंस की नसों में खून बनकर दौडने लगा है, तो इसका मतलब वह करप्शन को पाल-पोस रहा है और करप्शन के लिए ग्राउंड तैयार कर रहा है। अनुपमा सबको गांधी जी की ऑटोबायोग्राफी-माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथ पढने को एनकरेज करती हैं। उन्हें यकीन है कि बापू के बताए रास्ते पर चलकर ही देश को करप्शन से मुक्ति मिल सकती है। वह कहती हैं कि जब दूसरे देश गांधी जी के सिद्धांतों पर अमल कर सकते हैं, तो हम भारतीय क्यों नहीं, आखिर गांधी तो हमारे ही हैं।
हल्ला बोल
ग्राम पंचायत लेवल पर किस तरह करप्शन है, करोडों का फंड खर्च हुए बिना किस तरह गायब हो जाता है, भागलपुर के कृष्ण गोपाल सिंह अक्सर न्यूज पेपर में ऐसी खबरें पढा करते थे, टीवी में देखा करते थे। उनके मन में सवाल उठता था, इतना पैसा आ रहा है लेकिन जा कहां रहा है ? इन्हीं सवालों से जूझते-जूझते 2008 में कृष्ण गोपाल को महात्मा गांधी के सिद्धांतों में सॉल्यूशन नजर आया। कृष्ण गोपाल ने आरटीआई को हथियार बनाया और शुरू कर दी करप्शन के खिलाफ लडाई।
हाऊ-टु-फाइट
दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क से ग्रेजुएशन करने के बाद बेंगलुरु से सोशल एंटरप्रेन्योरशिप में मास्टर्स कर रहे कृष्ण गोपाल कहते हैं, करीब 250 आरटीआई एप्लीकेशंस डालने के बाद मैंने यही फील किया है कि लोगों को इस अचूक हथियार के बारे में ठीक से पता ही नहीं है। ऐसे में करप्शन के खिलाफ कैसे लड सकते हैं ?
मॉडर्न हथियार : आरटीआई
कृष्ण ने आरटीआई के जरिए अपने गांव के विकास के लिए मिले फंड और खर्च की जानकारी मांगी। पता चला कि आईसीडीएस यानी इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज के तहत बच्चों के विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए था, लेकिन कुछ नहीं हो रहा था। कृष्ण ने इसकी शिकायत उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से की। जांच के लिए टीम भेजी गई और कथित सीडीपीओ को सस्पेंड कर दिया गया। उस वक्त 19 साल का यह नौजवान आगे फिर कभी नहीं रुका।
आरटीआई सेल से अवेयरनेस
आज टीवी पर भले ही विज्ञापनों के जरिए लोगों को जागरूककिया जा रहा है, लेकिन रूरल एरियाज में, जहां बिजली न होने से लोग टीवी नहीं देख पाते, वहां इंटरनेट तो बहुत दूर की बात है। ऐसे में कृष्ण गोपाल को एक ही सॉल्यूशन नजर आया। हर शहर, हर कस्बे और हर गांव में एक-एक ऐसा प्रतिनिधि नियुक्त किया जाए, जो लोगों को आरटीआई के बारे में बता सके। जो लोगों को इंफॉर्म कर सके कि कैसे आरटीआई फाइल करके आप मनचाही इंफॉर्मेशन डिपार्टमेंट से हासिल कर सकते हैं। इस तरह से कृष्ण गोपाल ने शुरू की एक आरटीआई सेल। इसके जरिए वे ज्यादा से ज्यादा लोगों को आरटीआई के बारे में अवेयर करेंगे और उनकी ओर से आरटीआई फाइल करेंगे। कृष्ण कहते हैं कि गांधी जी चाहते थे कि देश की जनता करप्शन के खिलाफ आवाज उठाए और अपने अधिकारों के लिए लडे। ऐसे में देश के युवाओं का ये फर्ज बन जाता है कि वे अपने आस-पास होने वाली घटनाओं पर नजर रखें और करप्शन को जड से मिटाने की पूरी कोशिश करें।
एक साइलेंट क्रूसेडर
गोपाल मोहन
इंजीनियर
एज : 29
एजुकेशन : आईआईटी दिल्ली से बीटेक और पीएचडी, एक्स एंप्लाई आईबीएम।
गोपाल मोहन इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर हैं। इन्होंने कोई ऑर्गेनाइजेशन तो नहीं बनाया है, लेकिन गांधी जी की सत्याग्रह की फिलॉसफी को मानते हैं, जो कहती है कि यह सशक्त लोगों का हथियार है, यानी जो सच का साथ देता है और किसी भी सिचुएशन में वॉयलेंस को एक्सेप्ट नहीं करता है। गोपाल भी आरटीआई के जरिए सोसायटी के सामने सच लाने की कोशिश करते हैं, ताकि पब्लिक अपने राइट्स के बारे में जान सके।
सत्याग्रह में विश्वास
गोपाल ने 2007 में दिल्ली आईआईटी से ग्रेजुएशन और फिर एंबेडेड सिस्टम में पोस्टग्रेजुएशन किया है। इसके बाद आईटी कंपनी आईबीएम में अच्छी-खासी जॉब की, लेकिन काम से सैटिस्फैक्शन नहीं मिल रहा था। सोशल सेक्टर से जुडकर देश के लिए कुछ करना चाहते थे। इसलिए जॉब छोड दी और एडल्ट एजुकेशन प्रोग्राम से जुड गए। सोशल सेक्टर में काम करने के दौरान ही गोपाल ने देखा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सडक से लेकर सोशल मीडिया तक में काफी हलचल थी। वे भी एक साइलेंट क्रूसेडर की तरह आरटीआई के जरिए छोटी-छोटी गडबडियों को सामने लाने का काम करने लगे।
कानून का खौफ नहीं
गोपाल की मानें, तो देश में अगर करप्शन बढ रहा है, तो इसके लिए यहां के सिटीजंस भी काफी हद तक रिस्पॉन्सिबल हैं। इंडियंस को अपने देश में रूल्स ब्रेक करने में जरा भी डर नहीं लगता है। बिना हेल्मेट के बाइक चलाने, घूस देकर ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में इन्हें कोई दिक्कत नहीं होती है, लेकिन यही इंडियंस जब फॉरेन कंट्रीज में जाते हैं, तो वहां के रूल्स को अच्छे से फॉलो करते हैं। इस डबल स्टैंडर्ड का क्या मतलब है।
हर जगह मिस-मैनेजमेंट
गोपाल कहते हैं कि उन्होंने अकेले अब तक 100 से ज्यादा आरटीआई फाइल की है, जिससे पता चला है कि दिल्ली के स्कूल्स, हॉस्पिटल्स और एमसीडी में कितनी ही गडबडियां हैं। मसलन, आरटीआई से इंफॉर्मेशन मिली कि सफदरजंग अस्पताल में इंटर्नशिप कर रहे मेडिकल स्टूडेंट्स को स्टाइपेंड का पूरा पैसा नहीं मिलता था। इसी तरह एमसीडी में एम्प्लॉइज 20-25 साल से कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर ही काम कर रहे हैं और उनकी कोई सुनवाई नहीं है। आरटीआई से ही उन्हें मालूम हुआ कि फरीदाबाद में अरावली हिल्स में अवैध माइनिंग हो रही है। इसी तरह बहुत सारी गवर्नमेंट स्कीम्स सिर्फ पेपर पर ही चल रही हैं। गवर्नमेंट स्कूल्स में डेवलपमेंट और फैसिलिटीज प्रोवाइड कराने के नाम पर जो फंड आता है, उसका इस्तेमाल सही जगह पर नहीं होता है। टॉयलेट बनाने के नाम पर आने वाला पैसा किसी और चीज पर खर्च कर दिया जाता है। गोपाल कहते हैं, हमने आरटीआई के जरिए आम जनता से सरोकार रखने वाले इस तरह के कई स्कैम्स या गडबडियों का पता लगाया, लेकिन देश का कानून ऐसा है कि दोषी को सजा मिलने में सालों लग जाते हैं, क्योंकि ब्यूरोक्रेसी या पॉवर सर्किल में बैठे लोग भी इसी सोसायटी का हिस्सा हैं। वह कहते हैं कि जब तक करप्शन से निपटने के लिए सख्त कानून नहीं बनेंगे और उनका इंप्लीमेंटेशन नहीं होगा, करप्शन को खत्म करना आसान नहीं होगा।
मेकिंग चेंज विद एजुकेशन
रितू मेहरा
एडवोकेट
फाउंडर : पारदर्शिता
एजुकेशन : दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीएससी, बीएड।
रितू मेहरा कॉलेज टाइम से ही सोशल सेक्टर में काम करना चाहती थीं, लेकिन मौका नहीं मिल पा रहा था। तभी साल 2005 में परिवर्तन नाम की संस्था के साथ वॉलंटियर के रूप में काम करना शुरू किया। इसके बाद साल 2006 में राजीव कुमार के साथ मिलकर पारदर्शिता नाम से एनजीओ बनाया। मकसद था- टु फाइट अगेंस्ट करप्शन। इसके अलावा पब्लिक गवनर्ेंस सिस्टम में ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी लाना, जिससे सोसायटी के जरूरतमंद लोगों की हेल्प की जा सके।
आरटीई इंप्लीमेंटेशन में कमी
रितू और उनकी टीम आज करप्शन के अलावा एजुकेशन, इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन, पीडीएस और आरटीआई के इश्यूज पर काम कर रही है। वे कहती हैं, 2009 के राइट टु एजुकेशन एक्ट में साफ लिखा है कि अगर कोई पेरेंट स्कूल में एडमिशन के टाइम बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट या प्रूफ ऑफ रेजिडेंस सबमिट नहीं करा पाते हैं, तो बच्चे का एडमिशन नहीं रोका जाएगा। पेरेंट्स एक प्लेन पेपर पर बच्चे का डेट ऑफ बर्थ लिखकर स्कूल में जमा कर सकते हैं। ये सब कुछ कानून कहता है, लेकिन रिएलिटी इसके उलट है। दिल्ली में ऐसे कई स्कूल्स हैं जहां पेरेंट्स से बर्थ सर्टिफिकेट मांगा जाता है और नहीं देने पर बच्चे का एडमिशन नहीं होता।
इतना ही नहीं, कई स्कूलों के प्रिंसिपल उनसे 50 रुपये का स्टांप पेपर देने को कहते हैं। इससे हर साल हजारों बच्चे स्कूल जाने से रह जाते हैं। रितू के अनुसार, जब उन्हें आरटीआई के जरिए इसका पता चला, तो उन्होंने अथॉरिटीज के सामने इसकी शिकायत रखी। इसके बाद ईडीएमसी के म्यूनिसिपल कमिश्नर को एमसीडी के सभी स्कूलों में एक बोर्ड लगाने को कहा गया, जिस पर लिखा हो कि पेरेंट्स के पास कोई सर्टिफिकेट न भी हो, तो बच्चे का एडमिशन रोका नहीं जा सकता है।
फंड्स का मिसयूज
रितू कहती हैं, दिल्ली में 900 से ज्यादा एमसीडी स्कूल्स हैं। इन्हें गवर्नमेंट की ओर से काफी फाइनेंशियल असिस्टेंस भी मिलता है। बच्चों के यूनिफॉर्म आदि के लिए फंड आते हैं, लेकिन पेरेंट्स के पास सही इंफॉर्मेशन नहीं होने और अकाउंटेबिलिटी फिक्स न होने से फंड का मिसयूज होता रहता है। लोग भी अवेयर नहीं होते हैं। इनका मानना है कि आरटीआई कानून तो आ गया, लेकिन इंप्लीमेंटेशन रेट काफी वीक रहा है। दरअसल, उसकी कमान ब्यूरोक्रेट्स के हाथों में रही, जो चाहते ही नहीं हैं कि पब्लिक डोमेन में सच सामने आए। इसलिए करप्शन रिलेटेड केसेज सामने आते भी हैं, तो दोषियों को सजा नहीं मिलती है।
राइट इंटेंशन नहीं
रितू कहती हैं कि आज शायद ही ऐसा कोई सेक्टर बचा है, जहां करप्शन न हो। पीडीएस सिस्टम को ही लें, लोगों को एक राशन कार्ड बनवाने के लिए महीनों ऑफिसेज के चक्कर लगाने पडते हैं। इसके बाद भी काम नहीं बनता, तो रिश्वत देनी पडती है। लोग भी सोचते हैं कि अगर पैसे से बात बन जाए, तो क्यों अपना टाइम वेस्ट करें। इसी सोच के कारण करप्शन खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है, क्योंकि यहां लोगों का इंटेंशन ही सही नहीं है, न ही वह कोई रिस्पॉन्सिबिलिटी लेना चाहते हैं।
कॉमन मैन की आवाज
करप्शन के खिलाफ लोगों को जगा रहे गोरखपुर के सौरभ पांडेय कोई बडी हस्ती नहीं हैं। उनकी गतिविधियां न्यूज पेपर और न्यूज चैनल्स की सुर्खियां नहीं बनतीं, लेकिन जो करते हैं, वह अपने आप में अनूठा है। सात साल पहले की ही बात है, जब 25 साल का यह नौजवान साइकिल से गवर्नमेंट प्लान्स के पेपर लिए गांव-गांव घूमता था। लोगों को बताता था कि इंफॉर्मेशन पाना उनका हक है। देखते-देखते इतने साल गुजर गए, लेकिन उनका जुनून कम नहींहुआ। सौरभ करप्शन रोकने के लिए गांव-गांव आम आदमी तक पहुंचते हैं और उन्हें सरकार की वेलफेयर स्कीम्स की जानकारी देते हैं। लोगों को बताते हैं कि वे बिना रिश्वत दिए, कैसे किसी योजना का फायदा उठा सकते हैं।
32 साल के सौरभ के जीवन का एक ही मकसद है वंचितों को हक दिलाना। 2008 में उन्होंने गोरखपुर समेत आसपास के 26 जिलों के करीब 428 ऐसे गांवों की यात्रा की है, जो दो नदियों के बीच में पडते थे। उन्हें गवर्नमेंट की योजनाओं के बारे में पता ही नहीं चलता था। इसके लिए सौरभ साइकिल से यात्रा करते। जब लोगों की सराहना मिली, तो इसे ही जीवन का उद्देश्य बना लिया। बीबीसी लंदन ने भी सौरभ के इस काम की तारीफ की। सौरभ गांधी जी से इतने प्रभावित हैं कि गरीबों को ही अपना भगवान मानते हैं। सौरभ अपने गांव के ही एक बाग में अंग्रेजी सीखने के इच्छुक युवाओं को बीते छह साल से फ्री में अंग्रेजी पढा रहे हैं। सौरभ जिन्हें एजुकेशन देते हैं, उनसे प्रॉमिस लेते हैं कि वे भी अपने जूनियर्स को फ्री में एजुकेशन देंगे। करियर बनाने की बजाय समाज सेवा में क्यों कूद गए? इस पर सौरभ कहते हैं कि अगर महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत न आते, तो क्या होता अपने देश का। कहने का मतलब है कि किसी न किसी को तो आगे आना ही होगा। करप्शन आज हर जगह है, करप्शन से फाइट करने के लिए कॉमन मैन को आगे आना ही होगा।
करप्शन पर फुलस्टॉप
कंट्री में हर तरफ करप्शन है। ऐसे में गांधी जी के नक्श-ए-कदम पर चलने में दिक्कत तो होती है, लेकिन सुकून भी मिलता है। लखनऊ के रहने वाले आशू कहते हैं, छोटी-छोटी चीजों पर अगर ध्यान दें, तो करप्शन खत्म हो सकता है। यह अलग बात है कि हम इस पर गौर नहीं करते हैं। रेलवे टिकट के लिए लाइन में न लगना पडे, इसके लिए रिश्वत का सहारा लेते हैं। मैं बहुत बडी चीजों से तो नहीं, लेकिन छोटी-छोटी चीजों से करप्शन को निकालने की कोशिश कर रहा हूं। आशू बताते हैं कि बहन की शादी के बाद राशन कार्ड से उसका नाम हटवाना था। जब इसके लिए मैं गया तो बाबू ने दो सौ रुपये मांगे। रुपये देने से मना किया, तो उसने बहन का नाम राशन कार्ड से नहीं हटाया। इसके बाद मैं डीएम से मिला और शिकायत की। इसके बाद तुरंत कार्रवाई हुई। मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। हां, समय थोडा ज्यादा लगता है। वे कहते हैं कि लोग अक्सर जुगाड की तलाश में रहते हैं, ऐसे लोग करप्शन को पाल-पोस रहे हैं। वह कहते हैं कि जुगाड की बजाय सही तरीके से किया जाए, तो थोडा सा टाइम लगता है, लेकिन काम हो जाते है। आशू कहते हैं कि जितनी मुश्किल से हमें आजादी मिली थी, उतनी ही आसानी से हम आजादी को खो देंगे। मैंने शुरुआत कॉलेज के समय की थी। मैं जब भी बिजली का बिल जमा करने जाता था। बाबू हमेशा खर्चे-पानी के लिए पैसे मांगता था। इस चक्कर में करीब तीन महीने तक बिल नहीं जमा कर सका। फिर मैंने ठान लिया कि इसकी शिकायत अधिकारी से करनी पडेगी। मैंने किया भी ऐसा ही और फिर तब से आज तक इलेक्ट्रिसिटी डिपार्टमेंट में कोई भी न मुझसे पैसे की बात करता है और न ही मेरे इलाके के लोगों से। मेरे इस कदम के बाद हर कोई मेरे साथ है और लोग किसी भी डिपार्टमेंट के ऑफिसर को रिश्वत नहीं देते हैं। रगों में दौडते हैं गांधी
रीतेश सिंह
(फाउंडर, ग्रुप फॉर चेंज)
एज : 21
एजुकेशन : एमटेक आईआईटी खडगपुर
वेबसाइट : getup4change.org
जिस देश में करप्शन के बारे में यही कहा जाता हो कि लोगों की नसों में लहू बनकर दौड रहा है, उस देश में अगर छठी क्लास के बच्चे को आप विरोध-प्रदर्शन करते देखें, तो कैसा फील करेंगे ? आपको यकीन नहीं होगा, लेकिन हकीकत यही है।
गांधी बने प्रेरणा
कुछ साल पहले, रायबरेली के छठी क्लास के एक स्टूडेंट को स्कूल जाते वक्त रास्ते का एक गढ्ढा बहुत अखरता था। उसने अपने टीचर, प्रिंसिपल सभी से गढ्ढा भरवाने के लिए कहा, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। फिर उसने अपने क्लासमेट्स के साथ प्रोटेस्ट शुरू कर दिया। इसके बाद 2005 में जब वह नौवीं कक्षा में पहुंचा, तो एक अखबार के जरिए आरटीआई के बारे में पता चला और तभी पहली बार आरटीआई दाखिल की। महात्मा गांधी के आदशरें को अपने दिल में संजोए वह बच्चा रीतेश सिंह आज बडा हो चुका है और आरटीआई एक्टिविस्ट के तौर पर करप्शन को सामने लाने की कोशिश कर रहा है।
आरटीआई बना हथियार
रीतेश ने बताया कि जब वे छोटे थे, तो पडोस की किसी फैमिली को डेथ सर्टिफिकेट नहीं मिल रहा था। उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी कि जिंदा तो जिंदा, मरने के बाद भी एक सर्टिफिकेट के लिए घर वालों को कितना परेशान होना पडता है। इसी के बाद उन्होंने इसके लिए एक आरटीआई दाखिल कर दी। रीतेश ने इसी तरह के छोटे-मोटे मामलों में कई बार प्रोटेस्ट किया और करप्शन के खिलाफ अपनी आवाज उठाई, लेकिन 2008 में बात खुद उन पर आ गई। दरअसल, रीतेश को किसी इंटरनेशनल कांफ्रेंस में दक्षिण कोरिया जाना था, उन्हें पासपोर्ट की जरूरत थी। उन्होंने पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया। इसके बाद पुलिस वेरिफिकेशन के लिए बुलाया गया। रीतेश बताते हैं, जब वे पिता के साथ पहुंचे, तो विभाग के कर्मचारियों ने उनके साथ गलत बर्ताव करना शुरू कर दिया। पिता को लगा कि शायद रिश्वत लेना चाह रहे हों, तो क्यों न दे दी जाए। लेकिन रीतेश को ये कतई मंजूर नहीं था। उन्होंने आरटीआई दाखिल कर दी। जल्द ही उनका पासपोर्ट उनके हाथ में था। रीतेश के भीतर का गांधी जाग चुका था। अब वो कुलबुला रहा था कुछ करने को। देश के लिए, समाज के लिए। जरूरत थी तो बस एक चिंगारी की। इसके बाद 16 अगस्त 2011 को भोपाल में एक आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या ने रीतेश को झकझोर कर रख दिया। इस कांड ने रीतेश को इस करप्ट सिस्टम के खिलाफ हल्ला बोल आंदोलन में शरीक होने पर मजबूर कर दिया और गांधीवादी तरीके से करप्शन के खिलाफ लडाई शुरू कर दी।
ऑनलाइन फाइट
रीतेश और उनके साथियों ने 15 अक्टूबर, 2011 को गेट अप फॉर चेंज नाम से एक वेबसाइट बनाई, जिसके जरिए कोई भी शख्स बिना अपना नाम जाहिर किए आरटीआई के सहारे करप्शन से लड सकता है। इससे उसे इंसाफ पाने में भी आसानी होगी। रीतेश बताते हैं, इस वेबसाइट की जरूरत उन्हें तब महसूस हुई, जब उनके पास कई सारे करप्शन के मामले आने लगे। ऐसे में अकेले आखिर कब तक और कहां तक लडते, तो एक कम्युनिटी बना ली। इस पर कोई भी आरटीआई फाइल करने के लिए अप्लाई कर सकता है। कह सकते हैं कि आज का यूथ सोशल मीडिया और इंटरनेट प्लेटफॉर्म का यूज कर देश में करप्शन और तमाम दूसरे मसलों पर पब्लिक को काफी हद तक एक्टिवेट करने में सक्सेसफुल रहा है।
चेंज योरसेल्फ चेंज द व‌र्ल्ड
सौम्या बहादुर
एज : 29
एजुकेशन : एमबीए, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, पीएचडी (मार्केटिंग मैनेजमेंट, मुंबई
करियर : असिस्टेंट बैंक मैनेजर
अगर आप सोसायटी और देश को बदलना चाहते हैं, तो पहले खुद में वो बदलाव लाइए, जो दुनिया में देखना चाहते हैं। महात्मा गांधी के इन शब्दों को अपनी लाइफ का इंस्पिरेशन बनाया सौम्या बहादुर ने। सौम्या को करप्शन के खिलाफ जंग लडने की ताकत अपनी मां की बीमारी से मिली। दरअसल, सौम्या की मां कैंसर पेशेंट हैं और उनके पिता गवर्नमेंट सर्र्वेट। ट्रीटमेंट में जो भी खर्च आता था, उसका बिल पास कराने के लिए सौम्या और उनके पिता को एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस के चक्कर काटने पडते। गवर्नमेंट जॉब में होने के बावजूद सौम्या के पिता के कलीग्स ही घूस की डिमांड करते।
फाइट विद सिस्टम
मां के इलाज के दौरान ही सौम्या ने सिस्टम में फैली खामियों को दूर करने का मन बनाया। सौम्या सिर्फ नाम से ही बहादुर नहीं हैं, बल्कि काम से भी बहादुर हैं। सिस्टम में फैले करप्शन को जड से खत्म करने के लिए सौम्या ने प्रण किया और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से साल 2008 में एमबीए करने के बाद मुंबई आ गईं और बैंक में जॉब करने के साथ-साथ खाली समय में अपने इलाके के करप्शन रिलेटेड प्रॉब्लम्स से जूझ रहे लोगों की मदद भी करती हैं। सौम्या ने बताया कि उनके इलाके में (मीरा बायंदरा) बीपीएल कार्ड होल्डर्स को मिलने वाले राशन में जबर्दस्त धांधली चल रही थी। गरीबों को जो अनाज दिया जाता था, उसकी क्वॉलिटी बहुत ही खराब होती थी। उन्होंने लोगों की प्रॉब्लम्स को समझा और इसके खिलाफ मुहिम चलाई। जब उन्होंने शुरुआत की, तो उनके साथ चंद लोग ही जुडे थे, लेकिन धीरे-धीरे काफी संख्या में लोग उनकी मुहिम में शामिल हो गए। इसी तरह मीरा बायंदरा इलाके में ही एक सरकारी अस्पताल बनकर तैयार था, लेकिन चालू होने के लिए शायद किसी नेता के रिबन काटने का इंतजार कर रहा था।
अस्पताल खुलने के बावजूद आसपास के गरीब लोगों को इसका कोई फायदा नहीं मिल पा रहा था। सौम्या ने अपने साथियों के साथ इसके लिए आंदोलन चलाया और आरटीआई को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। सौम्या और उनके साथियों की बदौलत 2012 में अस्पताल में सरकारी सेवा दी जाने लगी।
हेल्प दोज हू नीड
इसी प्रकार सरकार की तरफ से हैंडिकैप्ड लोगों को दी जाने वाली बैसाखी का पैसा जरूरतमंद लोगों तक न पहुंचकर गवर्नमेंट एम्प्लॉइज के पॉकेट में पहुंच जाता था। सौम्या को जब इसका पता चला, तो उन्होंने अपने साथियों के साथ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज से मोर्चा लिया और लोगों को उनका हक दिलाया। सौम्या ने बताया कि जब उनकी मां का इलाज चल रहा था, तो उन्होंने पीडितों की मजबूरी को समझा। बिना इलाज के उन्होंने लोगों को मरते देखा है। दर्द दूर करने वाले एक इंजेक्शन के लिए पीडितों को गिडगिडाते देखा है। लेकिन सिस्टम में करप्शन की जडें इतनी गहरी हैं कि यह आसानी से खत्म नहीं होंगी। इसे खत्म करने के लिए सबको एक साथ खडा होना पडेगा। खासकर युवाओं को इसके लिए जिम्मेदारी लेनी होगी। आज सौम्या बहादुर अपने इलाके में जाना पहचाना नाम हैं। समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में सौम्या के पति भी उनका पूरा साथ देते हैं। जॉब से जब भी उन्हें मौका मिलता है सौम्या के साथ वह भी आंदोलन में उनका साथ देते हैं। सौम्या बैंक में जॉब करने के साथ इलाके के लोगों की करप्शन से लडने में मदद करती हैं।
घूस को घूंसा
अफरोज आलम साहिल 2005 में दिल्ली पढने आए थे। उसी साल राइट-टु-इंफॉर्मेशन कैंपेन से जुडने का मौका मिला। इसके अलावा वे घूस को घूंसा अभियान से जुडे, उन्हें सैटिस्फैक्शन मिला। करप्शन को खत्म करने की प्रेरणा के बारे में अफरोज कहते हैं, मैं इत्तफाक से वहां से संबंध रखता हूं, जो गांधी जी के सत्याग्रह की भूमि है, लेकिन मैं गांधी के तब और करीब आया, जब जामिया में एडमिशन के दौरान ही गांधी पर एक डॉक्यूमेंट्री ए जर्नी ऑफ चंपारण बनाई। इस दौरान खूब गांधी साहित्य पढा। अफरोज कहते हैं, जामिया में स्टडीज के दौरान कई मामले में धमकियां मिलीं। 50 लाख रुपये का मानहानि का मुकदमा भी किया गया। नौकरी का लालच देकर खरीदने की कोशिश की गई। जब मोहल्ले में निगम पार्षद के खिलाफ आरटीआई डाली, तो उसने मुश्किल खडी कर दी। लेकिन पता था कि सच के लिए लडने पर दिक्कत तो आती ही है।
अफरोज ने भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर किए हैं। वह कहते हैं कि आज गांधी बनने की नहीं, बल्कि सही अर्र्थो में गांधी को समझने की जरूरत है, जबकि लोग आज गांधी नहीं गोडसे बनकर सॉल्यूशन चाहते हैं। अफरोज कहते हैं कि देश के लगभग हर नौजवान ने स्कूली शिक्षा में कभी न कभी गांधी जी के आदर्शो के बारे में पढा होगा, लेकिन कितने ऐसे लोग हैं, जो आज भी युवा होने के बाद गांधी जी के सिद्धांतों को फॉलो कर रहे हैं। हमें गांधी जी बस 2 अक्टूबर या फिर 30 जनवरी को ही याद आते हैं और उसके बाद तुरंत हम उन्हें भूल भी जाते हैं। लोग गांधी जी को अपने हिसाब से यूज कर रहे हैं। अफरोज कहते हैं कि अगर भारत को करप्शन फ्री बनाना है, तो यूथ को आगे आना होगा। युवाओं को राइट डायरेक्शन में बढने में मदद करनी होगी। सभी आंदोलन में युवा आगे रहते हैं, लेकिन उनका राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है, यह यूथ को भी सोचना पडेगा। अगर युवा सही दिशा में चल निकलेगा, तो सभी प्रॉब्लम्स सॉल्व हो जाएंगी। लोग अपने रिस्पॉन्सिबिलिटी को लेकर अलर्ट हो जाएंगे, तो कंट्री को पूरी तरह से करप्शन फ्री बनाया जा सकता है।
मत सहो करप्शन
जम्मू के रहने वाले रमण शर्मा साल 2005 से अब तक छह सौ से ज्यादा आरटीआई फाइल कर चुके हैं। अच्छी बात यह है कि इनमें से ज्यादातर में उनकी जीत हुई और भ्रष्टाचार को लोकतंत्र के सामने घुटने टेकने पडे। रमण के लिए लैंड लाइन टेलीफोन कटने के बाद सिक्योरिटी अमाउंट वापस पाने के लिए डाली गई आरटीआई एक नया रास्ता लेकर आई। वे कहते हैं, यह मेरा पहला प्रयास था। वह भी एक ऐसे बुजुर्ग के लिए जिसने आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण अपना टेलीफोन कनेक्शन डिस्कनेक्ट करवा दिया था, फिर भी उन्हें सिक्योरिटी अमाउंट वापस नहीं मिल रहा था। वह अपने गांव से हर बार सत्तर रुपये खर्च करके टेलीफोन विभाग जाते थे। मेरे आरटीआई फाइल करने के बाद न केवल उनबुजुर्ग को सिक्योरिटी अमाउंट वापस मिला, बल्कि उस पर दो रुपये का ब्याज और संबंधित दो ऑफिसर्स का तबादला भी किया गया। रमण कहते हैं, मैं आज भी आरटीआई की मार्फत अपने आसपास के लोगों के लिए काम कर रहा हूं।
पहले मैं अकेला था, लेकिन अब मेरे साथ दोस्त भी हैं। हम सब साथ मिलकर आरटीआई मूवमेंट चला रहे हैं। मुझे लगता है कि देश में पहले से ही इतने अच्छे कानून हैं कि अगर उन पर सौ फीसदी अमल किया जाए, तो सिस्टम अपने आप दुरुस्त हो जाएगी। रमण मानते हैं कि कंट्री करप्शन फ्री तभी हो पाएगा, जब हर व्यक्ति अपना हक और अपनी जिम्मेदारी दोनों को समझें। वे कहते हैं, हम अपनी मेहनत की कमाई से सरकार को टैक्स पे करते हैं, लेकिन उसके बाद कोई यह नहीं पूछता कि उस पैसे का क्या हुआ। मैंने जब सेल्स टैक्स विभाग में इस संबंध में आरटीआई फाइल की तो पता चला कि वहां एक बडा घोटाला चल रहा था, जिस पर सरकार को भी एक्शन लेना पडा।
लगाना होगा एफर्ट
गांधी जी कहते थे कि वास्तविक शिक्षा वही है, जिसमें बिना किसी भेदभाव के अमीर और गरीब बच्चों को स्किल डेवलपमेंट के माध्यम से एजुकेट किया जाए। सोशल एक्टिविस्ट अमिता जोशी ने गांधी की इसी फिलॉसफी पर चलते हुए उन यूथ की लाइफ में चेंज लाया है जो राह से भटक रहे थे।
ट्रेनिंग इन लाइफ स्किल्स
इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज के साथ काम कर रहीं अमिता ने आज से करीब 13 साल पहले दिल्ली के कल्याणपुरी पुलिस स्टेशन में साथी यूथ रिसोर्स सेंटर शुरू किया था। यहां अंडरप्रिविलेज्ड कम्युनिटी के किशोरों और युवाओं को लाइफ स्किल्स, वोकेशनल कोर्सेज और कंप्यूटर की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वे फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट बन सकें, क्योंकि एक बार ये फाइनेंशियली स्टेबल हो जाएंगे, तो गलत रास्ते पर भटकने का चांस खुद-ब-खुद कम हो जाएगा।
दीया जलाओगे, होगी रोशनी
अमिता कहती हैं, कोई भी इंसान जन्म से क्रिमिनल नहीं होता है। यह एक यूनिवर्सल ट्रुथ है कि जैसा हम बोते हैं, वैसा ही काटते हैं। हमारे आसपास का एनवॉयरनमेंट ही हमारा मिरर होता है। अगर हम किसी से हॉस्टाइल बिहैव नहीं करेंगे, तो बदले में वैसा रिटर्न भी नहीं मिलेगा।
खुद में लाना होगा चेंज
आज सोशल मीडिया और बाकी जगहों पर करप्शन के अलावा कई मुद्दों पर खूब गांधीगीरी हो रही है, लेकिन जब तक लोग खुद में चेंज नहीं लाएंगे, कोई स्थायी बदलाव नहीं आएगा। भ्रष्टाचार आज वे ऑफ लाइफ बन चुका है। इसलिए सिर्फ कहने से नहीं, एफर्ट करने से ही कुछ हो पाएगा।
हो जज्बा
जम्मू यूनिवर्सिटी में स्टैटिस्टिक्स के स्कालर डॉ. विकास शर्मा बताते हैं कि करप्शन के खिलाफ जंग का ख्याल मन में उस समय आया, जब साल 2000 में एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में अवैध एडमिशन हुए। यह एक बडा गोरखधंधा था, जिसने हजारों स्टूडेंट्स का भविष्य दांव पर लगा दिया था, मैंने अपने साथी स्टूडेंट्स के साथ मिलकर इसके खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन लगातार कोशिश के बाद भी इनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं हो रहा था। एक दिन मैं अपने एक साथी स्टूडेंट के साथ अपनी यह आवाज लेकर विधानसभा की वैल में पहुंच गया। शायद यह तरीका सिस्टम के खिलाफ था, लेकिन मुझे सोए हुए सिस्टम को जगाना था। अंत में जीत सच्चाई की ही हुई और 150 अवैध स्टडी सेंटर्स को बंद किया गया। वह कहते हैं, मेरी फाइट उस सिस्टम के खिलाफ भी है जिसने करप्शन को पोषित किया है। मौजूदा दौर में गांधी जी के सिद्धांत अमल में लाने के लिए शहीद भगत सिंह जैसा जोश व जज्बा भी होना चाहिए।
उठाओ आवाज
रोपड के 31 साल के कमल किशोर शर्मा आईटी प्रोफेशनल हैं, लेकिन तीन महीने पहले अपनी नौकरी छोड कर पूरी तरह से करप्शन के खिलाफ लडाई में खुद को झोंक दिया है। इनकी सिस्टम के खिलाफ जंग उस दिन शुरू हुई, जब उन्होंने नांगल में एक गर्भवती गाय को तडप-तडप कर दम तोडते देखा। कमल कहते हैं, मैं काफी कोशिशों के बावजूद उसे बचा नहीं सका। वहीं से सिस्टम के अगेन्स्ट लडने की ताकत मिली। कहते हैं, ऐसे अनगिनत मामले हैं जहां करप्शन के खिलाफ आवाज उठाई है। हाल में आधार कार्ड बनवाने का सिलसिला शुरू हुआ, तो कुछ नाई और चाय वाले एजेंट बन बैठे। डाक विभाग से उनकी दुकान पर आधार कार्ड की डिलीवरी होती थी और वह पचास रुपये लेकर संबंधित व्यक्ति को कार्ड देते थे। यह मामला उठाया, तो डाक विभाग के कर्मचारियों पर एक्शन हुआ। कमल कहते हैं, देश के सिस्टम में सुधार तभी संभव है, जब किसी की जवाबदेही तय की जाए। जब तक कोई पूछने वाला नहीं होगा सिस्टम नहीं बदलेगा। कुछ लोगों पर गाज गिरेगी, तो दूसरे जरूर सबक लेंगे। मुझे लगता है कि युवा अगर अपने आसपास के एक भ्रष्टाचारी के खिलाफ भी आवाज उठाएगा, तो भारत से करप्शन खत्म हो सकता है।
गांधी इंस्पायर्ड मी
अपना दुख दूर करने की कोशिश तो सभी करते हैं, लेकिन समाज में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो दूसरों की तकलीफ को अपना समझते हैं और उसे दूर करना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। नागपुर के डॉ. अमोल ध्रुवे ने भी अपने इलाके के गरीब और कमजोरों के दुख को समझा और सरकारी नौकरी के एक बडे ऑफर को ठुकराकर महाराष्ट्र के एक ऐसे ग्रामीण इलाके में अपनी प्रैक्टिस की शुरुआत की, जहां लोगों को इलाज की सख्त जरूरत थी। अमोल बताते हैं कि पिता को उन्होंने बचपन से करप्शन के खिलाफ लडते देखा। विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन में पिता की भूमिका ने भी उन्हें इंस्पायर किया। अमोल को दूसरों के लिए कुछ करने की प्रेरणा भी अपने पिता और महात्मा गांधी से मिली। अमोल ने जब मेडिकल की पढाई शुरू की, तो उन्होंने महसूस किया कि कैसे गरीब और बेसहारा लोगों का शोषण किया जाता है। उन्हें प्रॉपर इलाज नहीं दिया जाता। थोडी सी दवाइयों के लिए उनसे पैसों की डिमांड की जाती है। अक्सर इलाज के अभाव में तो उनकी मौत हो जाती, लेकिन उनकी तकलीफ से किसी को कोई मतलब नहीं। अमोल क्लिनिक में आने वाले गरीबों का फ्री में इलाज करते हैं। अमोल कहते हैं दूसरों की मदद करने में जो सुख और शांति मिलती है वह किसी और काम में नहीं मिल सकती।
जिंदा हैं बापू की यादें
भले गांधी जी हमारे बीच नहींहैं, लेकिन उनकी विचारधारा और स्मृतियां आज भी मौजूद हैं। आज भी गांधी जी की पसंदीदा जगहों पर लोग उन्हें महसूस करने आते हैं..
गांधी स्मृति, दिल्ली
दिल्ली स्थित गांधी स्मृति (पहले बिडला हाउस) में दाखिल होते ही वैष्णव जन तो तेणे कहिए.. कानों तक पहुंचता है, तो सारा माहौल बापू के रंग में रंगा दिखता है। यह बापू का प्रिय भजन है और इसकी धुन उनके साक्षात होने का अहसास दिलाती है। बिडला हाउस में बापू ने अपने अंतिम 144 दिन गुजारे थे। सवेरे घडी के दस बजाते ही यहां देश-विदेश के तमाम कोनों से लोग पहुंचने लगते हैं। कई नंगे पांव हैं, क्योंकि जहां गांधी जी रहे हों, वहां जूते-चप्पल कैसे पहने जा सकते हैं। हजारों किलोमीटर फासला तय कर मणिपुर के तोंबी सिंह भी गांधीजी को श्रद्धासुमन अर्पित करने यहां पहुंचे हैं। साथ में माता-पिता भी आए हैं। पेशे से टीचर तोंबी ने बताया, मैं और माता-पिता लंबे वक्त से यहां आना चाहते थे। आज मैं यहां आकर खुद को खुशकिस्मत महसूस कर रहा हूं।
84 साल के डी मदान नियमित रूप से यहां आते हैं। वह आकाशवाणी में काम किया करते थे और उनकी जिम्मेदारियों में बापू की प्रार्थना सभाओं की रिकॉर्डिंग करना शामिल था। मदान उस रोज भी मौजूद थे, जिस दिन बापू हमें छोड कर चले गए थे। उन्होंने उस जगह की ओर इशारा किया, जहां खडे होकर जवाहरलाल नेहरू ने बापू के निधन की घोषणा की थी। साथ में लॉर्ड माउंटबेटन, सरदार पटेल और बाकी तमाम हस्तियां भी खडी थीं। गांधी स्मृति की वाइस चेयरपर्सन और बापू की पौत्री तारा गांधी ने बताया, यहां रोज 3-4 हजार लोग आते हैं। बापू की स्मृतियां देखते हैं और गांधी साहित्य खरीदते हैं।
वाल्मीकि मंदिर, दिल्ली
गांधी स्मृति के करीब पंचकुइयां रोड पर वाल्मीकि मंदिर है। वाल्मीकि मंदिर में बापू 214 दिन रहे थे। 1 अप्रैल 1946 से 10 जून,1947 तक। शाम का वक्त है और कुछ लोग इस तरफ आ रहे हैं। सबसे ज्यादा लोग बापू के उस कमरे की ओर बढ रहे हैं, जहां वह वाल्मीकि बस्ती के बच्चों को अंग्रेजी पढाया करते थे। रेलवे में आला अधिकारी रहे डॉ. ओ.पी. शुक्ला के पिता को भी बापू ने पढाया था। डॉ. शुक्ला बापू और वाल्मिकी मंदिर से जुडे किस्से सुनकर बडे हुए हैं। उन्होंने बताया, बापू बस्ती के बच्चों और बडों, दोनों को अंग्रेजी पढाते थे, जो नहा-धोकर पाठशाला नहीं आता था, उसे बापू ऐसी गलती न दोहराने की हिदायत देते थे। मंदिर के पुजारी संत कृष्ण विद्यार्थी कहते हैं, हमने बापू के कमरे में रत्तीभर भी बदलाव नहीं किया। उनका बिस्तर और राइटिंग टेबल ठीक वैसी ही है। दोनों जगहों पर रोज फूल चढाए जाते हैं।
यहां आए कर्नाटक के शिवराम कहते हैं कि हमारे वाल्मीकि समाज को बापू ने जिस तरह गले से लगाया, उसे हम कभी नहीं भूल सकते। यह कहते-कहते उनकी आंखें भर आईं।
साबरमती आश्रम, अहमदाबाद
घने पेडों की शीतल छाया में बापू का साबरमती आश्रम बना है। अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे बने इस आश्रम का नाम इसी नदी पर है। एक मान्यता यह भी है कि पौराणिक कथाओं में आने वाले दधीचि ऋषि का आश्रम भी यहीं था। महात्मा गांधी 2 जनवरी से लेकर 12 मार्च, 1930 तक इस आश्रम में रहे। आश्रम के सचिव और गांधीवादी अमृतभाई मोदी बीते 60 बरस से यहां से जुडे हैं। उन्होंने कहा, यहां रहते हुए ही बापू ने अहमदाबाद की मिलों में हुई हडताल का सफल संचालन किया था। गांधी जी ने साबरमती आश्रम में रहते हुए ही 2 मार्च, 1930 को भारत के वायसराय को पत्र लिखकर सूचित किया था कि वह 9 दिनों का सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने जा रहे हैं। 12 मार्च, 1930 को उन्होंने साबरमती आश्रम के 78 अन्य सहयोगियों के साथ नमक कानून भंग करने के लिए दांडी यात्रा की। अहमदाबाद में बसे बांग्ला लेखक रतिन दास कहते हैं, साबरमती आश्रम के दर्शन के बिना आपकी गुजरात यात्रा अधूरी है। मैं तो इसे तीर्थस्थल ही मानता हूं। अगर आप यंग इंडिया, नवजीवन और हरिजन में छपे लेखों की करीब 400 मूल प्रतियां, गांधीजी की तस्वीरों का संग्रह और भाषणों के 100 संग्रह देखना चाहते हैं, तो यहां जरूर आइए।
मणि भवन, मुंबई
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की 2010 में भारत यात्रा के दौरान ओबामा ने कहा था कि अगर गांधी नहीं होते, तो वह अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं बनते। मणि भवन और बापू का 1917 से लेकर 1934 तक बेहद गहरा संबंध रहा। वह यहां कई बार ठहरे। मणि भवन से जुडे हुए सजीव राजन बताते हैं, ओबामा मणि भवन में जिस भाव से बापू से जुडी चीजों को देख रहे थे, उससे साफ था कि उनके मन में बापू के लिए किस तरह का भाव है। गुजराती के लेखक हेमंग पलन का कहना है, मुझे मुंबई की कभी खत्म न होने वाली मारामारी के बीच मणि भवन आना बहुत सुकून देता है। यहां की लाइब्रेरी में जरूर बैठता हूं, जहां हजारों किताबें हैं। यूं तो गांधीजी ने जहां-जहां कदम रखा, वही जगह ऐतिहासिक हो गई, लेकिन फिर भी अगर गांधीजी के संघर्ष और बलिदान को समझने की कोशिश करनी है, तो इन चारों स्थानों की यात्रा काफी मदद दे सकती है।
इंटरैक्शन : विवेक शुक्ला
जोश टीम से अंशु सिंह, मिथिलेश श्रीवास्तव, मो. रजा।
इनपुट : पटना से गौतम कात्यायन, जालंधर से वंदना वालिया बाली, लखनऊ से दीपा श्रीवास्तव, गोरखपुर से संजय मिश्रा, दिल्ली से अभिनव उपाध्याय, जम्मू से योगिता यादव।

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