जीवन में शीघ्र सफलता पाने का रहस्य

मनुष्य के जीवन में आए नएपन से ही उसे सफलता मिलती है। कोई भी व्यापार अथवा कार्य तभी आगे बढ़ता है जब हम उसमें कुछ न कुछ नया करते रहे। इसके लिए ऐसी सोच चाहिए जो नए काम का जोखिम उठाने को तैयार हो। कौन जानें उसका नतीजा क्या निकले? और फिर नए काम को रोजमर्रा के नित्यक्रम में जमाना भी अवश्यक हो जाता है। जो आप चाहते हैं वह नहीं मिलता हैं तो तकलीफ होती हैं जो नहीं कहते हैं वह मिल जाता हैं तो भी तकलीफ होती हैं और जो चाहते हैं वह भी मिल जाता हैं तो भी तकलीफ होती हैं क्योकि वह ज्यादा दिन आपके पास नहीं रहता है।

संत सुकरात पश्चिमी विद्वान तथा महान यूनानी दार्शनिक हुए हैं। वह जीवन देवता के रूप में आम जनमानस में अपने सद्गुणों की छाप छोड़ते थे। उनका मानना था की ज्ञान से पूजा-अर्चना करने वाले लोग न केवल अपने जीवन में शोक-सन्ताप मुक्त रहते हैं बल्कि मृत्यु के बाद, उससे भी कहीं उन्नत अवस्था में स्वर्गीय प्रकाश से राज्य में आनन्दमय होकर रहते हैं।

सुकरात का मानना था जीवन की प्रयोगशाला में जीवन विद्या के,अध्यात्म विज्ञान के यही प्रयोग किए हैं। अन्यों को भी यही प्रयोगविधि सिखाना चाहता हूं। इस प्रयोगविधि से जो ज्ञान मिला है, वह केवल कल्पनाओं एवं विचारों तक सीमित नहीं रहता बल्कि जीवन शैली को परिवर्तित कर स्वयं जीवन शैली बन जाता है।

सुकरात ये बातें करते रहते और युवाओं की भीड़ वाद-विवाद करती रहती। एक सभा में वह अपने विचार प्रस्तुत कर रहे थे की एक युवक उनके पास आया और उनसे प्रश्न किया कि सफलता का रहस्य क्या है?

उसका प्रश्न सुनकर सुकरात बोले,"कल तुम मुझे नदी के किनारे मिलना।"

अगले दिन युवक नदी के किनारे आ गया। सुकरात ने युवक से कहा," मेरे पीछे-पीछे नदी में चले आओ।"

युवक सुकरात का अनुकरण करने लगा। नदी में बढ़ते-बढ़ते पानी युवक के गले तक पहुंच गया। तभी अचानक सुकरात मुड़़े और उस युवक का सिर पकड़ कर पानी में डुबोने लगे। लड़का छटपटाने लगा मगर सुकरात ने अपनी पकड़ इतनी मजबूत बना रखी थी की युवक अपना बचाव कर पाने में असर्मथ था। छटपटाते-छटपटाते उसका रंग नीला पड़ने लगा। तभी सुकरात ने उसका सिर पानी से बाहर निकाल दिया और उसे लगभग घसीटते हुए पानी से बाहर निकाल लाए। युवक बुरी तरह से हांफ रहा था उसकी सांसों की गति तेज रफ्तार से चल रही थी।

 जब युवक थोड़ा चेतन अवस्था में आया तो सुकरात ने उस से पूछा,मजब तुम पानी में डूब रहे थे तो तुम्हारे अंर्तमन से किस चीज की चाह उत्पन्न हो रही थी?"

युवक बोला," सांस लेने की चाह।"

सुकरात ने कहा,"यही मनुष्य की सफलता का रहस्य है। जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम अपने अंदर चल रही सांसों को चाहते हो तो वो तुम्हे मिल ही जाएगी।"

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