जिंदगी
में हम सभी आगे बढऩा चाहते हैं, लेकिन फिर भी कुछ ही व्यक्ति सफलता की
पूरी सीढ़ी पर चढ़ कर अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाते हैं। बाकी अधिकतर
सीढ़ी के दूसरे या तीसरे पायदान पर ही अटक जाते हैं। इस अवरोध के कुछ खास
कारण हैं। यदि उन्हें जान और पहचान कर समझ लिया जाए तो आसान हो सकती है
लाइफ में सफलता की यह डगर...
कल्पना : सीढ़ी का पहला पायदान है-कल्पना। हम रोजाना असंख्य कल्पनाएं करते हैं। अगर हमें जीवन में कुछ पाना है तो सर्वप्रथम उस लक्ष्य की कल्पना अपने मन में करनी होगी।
तीव्र इच्छा : यह हम पर है कि हम अनेक चीजों को पाने की इच्छा में अपनी शक्ति खर्च करें या किसी एक लक्ष्य को पाने की इच्छा में अपनी पूरी शक्ति खर्च करें।
संकल्प : इच्छा जब बहुत तीव्र हो जाती है तो वह संकल्प में बदल जाती है। हम संकल्प तो बहुत करते हैं लेकिन वे ज्यादा लंबे समय तक कायम नहीं रह पाते।
दृढ़ संकल्प : जहां दृढ़ता आ जाती है, वहां स्थिरता भी आ जाती है। जब संकल्प के साथ आत्म शक्ति और दृढ़ता जुड़ जाती है तो वह दृढ़ संकल्प में बदल जाती है
कार्य योजना : बिना कार्य योजना के दृढ़ संकल्प सिर्फ एक मानसिक क्रिया बन कर रह जाता है और यथार्थ में बदल नहीं पाता। जीवन में किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए उसकी सही और पूरी कार्ययोजना पूर्व में बनाना जरूरी है।
परिश्रम : सिर्फ सोचने और योजना बनाने मात्र से ही लक्ष्य नहीं पाया जा सकता। उसके लिए परिश्रम करना पड़ता है, वह भी कठिन।
एकाग्रता : जिस तरह अर्जुन को सिर्फ चिडिय़ा की आंख ही दिखी थी, उसी तरह हमें भी सिर्फ अपना लक्ष्य ही दिखना चाहिए। एकाग्र होकर अपने लक्ष्य की ओर बढऩा चाहिए।
प्रबल विश्वास : प्रबल विश्वास सर्वप्रथम अपने आप पर, अपने लक्ष्य को पाने की इच्छा पर और इन सबसे ऊपर उस परमपिता पर। अपने उस आराध्य पर जो आपके जीवन के रथ का सारथी है।
अडिगता : लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में कई प्रलोभन, लालच और मृग मरीचिकाएं रूपी फिसलनें आएंगी, जो आपको अपने लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग से फिसला कर विफलता रूपी गंदगी के दलदल में गिरा देंगी। इन छोटी-छोटी बातों पर अमल कर आप सफलता के अद्भुत सोपान पर आसानी से पहुंच सकते हैं।
कल्पना : सीढ़ी का पहला पायदान है-कल्पना। हम रोजाना असंख्य कल्पनाएं करते हैं। अगर हमें जीवन में कुछ पाना है तो सर्वप्रथम उस लक्ष्य की कल्पना अपने मन में करनी होगी।
तीव्र इच्छा : यह हम पर है कि हम अनेक चीजों को पाने की इच्छा में अपनी शक्ति खर्च करें या किसी एक लक्ष्य को पाने की इच्छा में अपनी पूरी शक्ति खर्च करें।
संकल्प : इच्छा जब बहुत तीव्र हो जाती है तो वह संकल्प में बदल जाती है। हम संकल्प तो बहुत करते हैं लेकिन वे ज्यादा लंबे समय तक कायम नहीं रह पाते।
दृढ़ संकल्प : जहां दृढ़ता आ जाती है, वहां स्थिरता भी आ जाती है। जब संकल्प के साथ आत्म शक्ति और दृढ़ता जुड़ जाती है तो वह दृढ़ संकल्प में बदल जाती है
कार्य योजना : बिना कार्य योजना के दृढ़ संकल्प सिर्फ एक मानसिक क्रिया बन कर रह जाता है और यथार्थ में बदल नहीं पाता। जीवन में किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए उसकी सही और पूरी कार्ययोजना पूर्व में बनाना जरूरी है।
परिश्रम : सिर्फ सोचने और योजना बनाने मात्र से ही लक्ष्य नहीं पाया जा सकता। उसके लिए परिश्रम करना पड़ता है, वह भी कठिन।
एकाग्रता : जिस तरह अर्जुन को सिर्फ चिडिय़ा की आंख ही दिखी थी, उसी तरह हमें भी सिर्फ अपना लक्ष्य ही दिखना चाहिए। एकाग्र होकर अपने लक्ष्य की ओर बढऩा चाहिए।
प्रबल विश्वास : प्रबल विश्वास सर्वप्रथम अपने आप पर, अपने लक्ष्य को पाने की इच्छा पर और इन सबसे ऊपर उस परमपिता पर। अपने उस आराध्य पर जो आपके जीवन के रथ का सारथी है।
अडिगता : लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में कई प्रलोभन, लालच और मृग मरीचिकाएं रूपी फिसलनें आएंगी, जो आपको अपने लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग से फिसला कर विफलता रूपी गंदगी के दलदल में गिरा देंगी। इन छोटी-छोटी बातों पर अमल कर आप सफलता के अद्भुत सोपान पर आसानी से पहुंच सकते हैं।