पुष्प उद्योग से मिल सकती है विदेशी मुद्रा


समूचे विश्व में 50 करोड़ रुपए के फूलों के व्यवसाय में हमारे देश की भागीदारी लगभग नगण्य सी है। हमारी सांस्कृतिक परम्परा में शुभ व मांगलिक कार्यो में फूल पहली जरूरत रहते आए है। आज विश्व के कोने-कोने में पुष्पों का उत्पादन होता है। यूरोपीय देशों में आर्थिक प्रगति के साथ ही फूलों की काफी मांग बढ़ी है। यूरोपीय देशों में पुष्प की मांग काफी अधिक होने से इस बाजार पर हाँलैण्ड ने जबरदस्त पकड़ बना रखी है। कीनिया, थाईलैण्ड, जिम्बाबे व इण्डोनेशिया द्वारा यूरोपीय देशें को पुष्पों का निर्यात कर विदेशी पूंजी का अर्जन किया जा रहा है। हमारे देश में फूलों के निर्यात की विपुल संभावनाओंं के होते हुए भी इस क्षेत्र का पर्याप्त दोहन तक नहीं हो पाया है। अच्छी उष्ण कटिबंधीय जलवायु, उपयुक्त मिट्टïी, स्वच्छ जन और पर्याप्त रोशनी वे बिन्दु हैं जिन पर ध्यान देने की स्थिति में ये भारत के पुष्प व्यवसाय की विदेशों में धाक जमाने में सहयक हो सकते हैं।
दिसम्बर के महीने में यूरोपीय देशों में अधिक ठण्ड रहती है। उस समय भारतीय गुलाब की वहां काफी मांग रहती है। भारत का वातावरण इस समय अर्थात्ï दिसम्बर में गुलाब की भरपूर फसल लेने में सहयक है। गुलाब के लिए 25 से  28 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान दिन में और 15 से 18 डिग्री सेन्टीग्रेड रात के समय तापमान अनुकूल रहता है। एक समय था जब राजस्थान में पुष्कर में गुलाब की खेती को इसी उद्देश्य से प्रोत्साहन दिया गया था। आज भी पुष्कर क्षेत्र में गुलाब की खेती को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता बरकरार है।
यह एक कटु सत्य है कि हमारे देश में आज भी बागवानी की नई तकनीक व फसलोत्तर गतिविधियों की तरफ विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इजराइल जैसे छोटे से देश के किसान यूरोप में फूलों की मांग व भावों पर निरन्तर नजर रखते हैं। फसलोत्तर गतिविधियों से फूलों का वर्गीकरण व गुणवत्ता बनाए रखी जाती है और  मांग के अनुसार फूलों का निर्यात कर विदेशी मुद्रा का अर्जन कर रहे हैं। वहां बागवानों की आय में जबरदस्त इजाफा हो रहा है। एक हम है जहां फूल और फूलों से जुड़े व्यवसायों में पारंगतता होते हुए भी पर्याप्त दोहन में अब तक सफी नहीं हो पाए है। विश्व बाजार में भारतीय इत्र की अपनी पहचान हैं। फूलों से इत्र, तेल, औषधियां बनाने के साथ ही गुलाब जल, गुलकन्द आदि उच्च गुणवत्ता के तैयार कर निर्यात किए जा सकते हैं। इसके लिए बागवानों को प्रेरित करने और पर्याप्त सहयोग की जरूरत हैं।
फूलों की गुणवत्ता बनाए रखने, अच्छी पैदावार  लेने और विदेशी स्तर की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए ग्रीन हाउस तकनीक विकसित की गई है। विदेशें मेंं इस तकनीक का काफी उपयोग हो रहा है। हमारे देश में 1965 में यह तकनीक प्रवेश कर गई थी अब तक इसे पर्याप्त बढ़ावा नही मिला है। यही कारण है कि ग्रीन हाउस तकनीक की पहचान देश में नहीं बन पाई। ग्रीन हाउस तकनीक में फूलों की खेती खुले में नही होकर ढ़के हुए वातावरण में की जाती है ताकि अधिक पैदावार हो सके।
नाजुकता को परिभाषिक करने के लिए फूल का ही उदाहरण दिया जाता है। इस नाजुक फूल की पैदावार के लिए वातावरण का सही रहना आवश्यक है। ग्रीन हाउस तकनीक में इसी बात पर ध्यान रखा जाता है। फूलों को अधिक गर्मी व सर्दी से बचाया जाता है। ग्रीन हाउस के संतुलित वातावरण में तैयार हुए फूल विदेशी प्रतिस्पद्र्धा में टिके रहने की स्थिति में होते हैं। ग्रीन हाउस तकनीक को अपनाने में समूचे विश्व में चीन सबसे आगे बढ़ गया है। जापान, इंग्लैण्ड, फ्रांस और अमरीका में भी यह तकनीक काफी फलफूल रही है। ग्रीन हाउस की लागत अधिक होने से अभी यह हमारे देश में ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाई है।
विश्व पुष्प बाजार में भारतीय पुष्पों की मांग बढ़ाने के लिए कृषि उत्पादन निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) और केन्द्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। जब एक तरफ वित्तरूपी संस्थाएं नाबार्ड तथा व्यावसायिक, ग्रामीण व सहकारी बैंक बागवानी को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त ऋण सहायता उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत हैं, वहीं किसानों को पुष्पों के उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रेरित करने, अच्छी पुष्प प्रजातियां पैदा करने और पुष्पों की गुणवत्ता व प्रतिस्पद्र्धा में बने रहने के लिए फसलोत्तर गतिविधियों को बढ़ावा देने के प्रयासों मेंं भी तेजी लानी होगी। स्थानीय बाजार में भी फूलों की मांग बढ़ी है। देश के प्रमुख महानगरों में ही एक अनुमान के अनुसार करीब दस करोड़ रुपय के फूलों की खपत होती है। पुष्प व्यवसाय किसानों की अतिरिक्त आय बढ़ाने, विदेशी मुद्रा के अर्जन और पुष्प सहायक उद्योगों को बढ़ावा देने में सहायक हैं।
आधारभूत सुविधाएं, पर्याप्त प्रशिक्षण और प्रेरणा में भारत का पुष्प उद्योग कीनियां, थाईलैण्ड, जिम्बावे, इण्डोनेशिया व अन्य देशों को काफी पीछे छोड़ सकता है। जरूरत इस उद्योग की संभावाओं को दोहन करने और किसानों को इससे होने वाली आय की जानकारी देने की है। इससे देश को करोड़ों डालर की विदेशी पूंजी प्राप्त हो सकती है।

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