इतिहास एक ऐसा विषय है जिसे अधिकतर विद्यार्थी इसलिए लेते हैं क्योंकि यह सिविल सेवा परीक्षा या अन्य परीक्षाओं में अच्छे अंक दिलवा सकता है या इतिहास की तैयारी के साथ-साथ सामान्य अध्ययन के पाठï्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा स्वत: तैयार हो जाता है।
अनेक युवाओं के लिए यह एक बड़ा ही बोर विषय है जिसमें यह पढऩा पड़ता है कि किसने किस लड़ाई में किसको और क्यों हराया। एक गाना भी मशहूर हुआ है 'सिकंदर ने पोरस से की थी लड़ाई जो की थी लड़ाई तो मैं क्या करूं।Ó कुछ लोग इसे गड़े मुर्दे उखाडऩे वाला विषय भी बताते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इतिहास की बदौलत ही हम जानते हैं कि भारत कभी सोने की चिडिय़ा कहा जाता था, दूर से देशों से युवा यहां विद्या अध्ययन के लिए आते थे। महान सिकंदर भारतीयों की वीरता से घबरा कर लौट गया था। भारत में ही दुनिया की पहली नगरीय सभ्यता थी, यहां के लोगों को शहर बसाने का वैज्ञानिक तरीका हजारों साल पहले भी मालूम था।
दुनिया का पहला गणतंत्र हमारे ही देश में था, लेकिन एक तथ्य यह भी मालूम चलता है कि राजनीति के मामले में इतिहास से हमने यही सीखा है कि इतिहास से हमने कुछ नहीं सीखा। देश का शायद ही कोई ऐसा विश्वविद्यालय हो जहां कला वर्ग की पढ़ाई होती हो और इतिहास के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था न हो। पर जहां इतिहास से कैरियर बनाने की बात आती हो तो इतिहास पढऩे वाले विद्यार्थियों में से बहुत कम ऐसे होंगे, जिन्हें इस विषय से संबंधित कैरियर के बारे में पूर्ण जानकारी हो। आइए जानें कि इतिहास के छात्र इतिहास को किस प्रकार कैरियर निर्माण में लाभकारी बना सकते हैं।
वस्तुत: इतिहास केवल घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा मात्र नहीं है वरन आज जिसे हम इतिहास के रूप में पढ़ रहे हैं वह पूर्व में किए गए अनेक शोधों का परिणाम है। पुरातत्वविदों, मुद्रा विशेषज्ञों, पुरालेख शास्त्रियों, पुरालिपि शास्त्रियों आदि की एक पूरी टीम होती है जो अपने गहन शोधों के बाद इतिहास को अध्ययन योग्य विषय बनाती है, इन्हीं सब को मोटे तौर पर इतिहासकार भी कहते हैं।
क्या करते हैं इतिहासकार : इतिहासकारों का मुख्य कार्य भूतकाल और वर्तमान काल की उन घटनाओं को सिलसिलेवार एकत्र कर सजाना है जिनसे हम उस काल के लोगों की गतिविधियों, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक परिस्थितियों तथा भौगोलिक परिवर्तनों आदि के बारे में सही प्रकार से जान सकें। आधुनिक इतिहासकार इस प्रकार की घटनाओं के संबंध में सामग्री या जानकारी जुटाते हैं, उसका अध्ययन कर विश्लेषण करते हैं।
क्या-क्या बना जा सकता है : इतिहास को कैरियर के रूप में अपनाने वालों के लिए यह जानना अत्यन्त आवश्यक है कि इसमें क्या-क्या बना जा सकता है क्योंकि इसी के आधार पर वे अपना अध्ययन पूरा कर संबंधित क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त कर सकेंगे। यहां हम इनकी एक-एक कर चर्चा करते हैं-
पुरालेखविद (या आर्किविस्ट) : कुछ इतिहासकार पुरालेखविदï होते हैं। इनका मुख्य कार्य है ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेज को पहचानना, सुरक्षित रखना और सिलसिलेवार कडिय़ों के साथ उनका मिलान करना। यह सामग्री इतिहास लेखन, अनुसंधान तथा अध्यापन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। पुरालेखविद मुख्य रूप से संग्रहालयों, पुस्तकालयों और ऐतिहासिक संस्थाओं में कार्य करते हैं।
इतिहासकार व शोधकर्ता अपनी जांच के संबंध में किसी देश अथवा काल विशेष की जानकारी की सत्यता का पता लगाने के लिए पुरालेखविदों का ही सहारा लेते हैं। अब इसमें भी काल विशेष-प्राचीनकाल, मध्यकाल या आधुनिक काल अथवा क्षेत्र विशेष-दक्षिण एशिया, मध्य एशिया आदि में विशेषज्ञता प्राप्त की जाने लगी है।
उच्च अध्ययन : 10+2 पद्धति के बाद अभिलेख विज्ञान में बीए अजमेर विश्वविद्यालय से किया जा सकता है। स्नातक उत्तीर्ण युवाओं के लिए आर्काइव्स कीपिंग या पुरालेख रख-रखाव (संरक्षण) में डिप्लोमा पाठï्यक्रम अन्नामलाई विश्वविद्यालय में उपलब्ध है। नई दिल्ली स्थित राष्टï्रीय अभिलेखागार में आर्काइव्स में एक वर्षीय डिप्लोमा, रिकार्ड मैनेजमेंट में चार सप्ताह का पाठï्यक्रम तथा रिप्रोग्राफी, पुस्तकों, पांडुलिपियों, पुरालेखों आदि की देखभाल व उनके संरक्षण के लिए 8 सप्ताह का पाठï्यक्रम भी उपलब्ध है। पुस्तकालय विज्ञान में प्रमाण-पत्र या स्नातक के बाद पुस्तकालय अथवा आर्काइव्स के क्षेत्र में अनुभव रखने वालों के लिए गांधीग्राम रूरल इंस्टीटï्यूट, गांधीग्राम (तमिलनाडु) में दो वर्षीय डिप्लोमा इन आर्काइव्स एंड डाक्यूमेंटेंशन उपलब्ध है। स्नातक के बाद गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद से आर्काइव्स में एक वर्षीय डिप्लोमा किया जा सकता है और संबंधित विषय में एमए के बाद पांडिचेरी विश्वविद्यालय से आर्काइव्स स्टडीज में एक वर्ष की अवधि वाला डिप्लोमा पाठï्यक्रम भी किया जा सकता है। कंजरवेशन ऑफ वक्र्स ऑफ आर्ट में एमए नेशनल म्यूजियम इंस्टीटï्यूट से किया जा सकता है।
पुरातत्त्वविद : ये वे इतिहासकार होते हैं जो प्राचीन कला, स्मारकों, उत्खननों एवं अन्य माध्यमों से एक पूरी प्राचीन सभ्यता या उससे जुड़े तथ्यों का गहन शोध कर तत्कालीन सामाजिक परंपरा, व्यवहार, जीवनशौली आदि का निर्धारण करते हैं। पुरातत्वविदों के महत्त्वपूर्ण योगदान से ही हम सिंधु घाटी सभ्यता जैसी प्राचीनतम सभ्यता के बारे में जान सके हैं।
जमीन के नीचे दबी मूर्तियां, सिक्के, मकान आदि ऐतिहासिक महत्व के हैं या नहीं, हैं तो किस काल के, उस स्थान पर मंदिर था या स्नानागार, ऐयाशगाह थी या इबादतखाना यह पुरातत्त्वविद ही बता सकते हैं। इन्हें अपनी कला में इतनी विशेषज्ञता हासिल करनी होती है कि ट्रेन में बैठकर कहीं जाते समय भी बाहर देखकर पता लगा सकें कि वहां को पुरानी सभ्यता तो नहीं दबी पड़ी है। शायद इसी में सिंधु सभ्यता जैसी किसी और सभ्यता का पता चल जाए।
उच्च शिक्षा : 10+2 पद्धति की बारहवीं कक्षा के बाद एमएस विश्वविद्यालय बड़ौदा, पटना विश्वविद्यालय, पंजाब विश्वविद्यालय आदि से आर्कियोलाजी में बीए किया जा सकता है। बीए के बाद आर्कियोलाजी में एमए पाठï्यक्रम कलकत्ता विश्वविद्यालय, गुजरात विश्वविद्यालय अहमदाबाद, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर (उ.प्र.), पूना विश्वविद्यालय, मैसूर विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश आदि मेंं उपलब्ध है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कल्चर एंड आर्कियोलाजी में एमए किया जा सकता है तो कर्नाटक विश्वविद्यालय से इतिहास एवं पुरातत्व विज्ञान में एमए कर सकते हैं।
प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विज्ञान विषयों में एमए रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर, पंजाब विश्वविद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय, डॉ. हरिसिंह गौड़ विश्वविद्यालय सागर, डक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीटï्यूट पुणे, गोरखपुर विश्वविद्यालय, जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर, ओस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद, पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर, विश्व भारती शांति निकेतन, पटना विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय आदि से किया जा सकता है।
प्राचीन या मध्यकालीन इतिहास में एमए या पुरातत्व विज्ञान अथवा भूगर्भशास्त्र में स्नातकोत्तर पाठï्यक्रम करने के बाद आर्कियोलाजिक्स सर्वे ऑफ इंडिया के स्कूल ऑफ आर्कियोलाजी से एक वर्षीय डिप्लोमा किया जा सकता है। इसका सत्र अक्टूबर से प्रारंभ होता है और आवेदन-पत्र जुलाई में मांगे जाते है. स्नातक के बाद एक वर्षीय डिप्लोमा पाठï्यक्रम मदुरै कामराज विश्वविद्यालय में उपलब्ध है जबकि स्नातक के बाद दो वर्षीय डिप्लोमा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया जा सकता है।
इतिहास में कुछ विशेष पाठï्यक्रम : 10+2 पद्धति की बारहवीं कक्षा के बाद इतिहास के क्षेत्र में विशेष अध्ययन पाठï्यक्रम उपलब्ध है।
इस्लामी सभ्यता में बीए मुंबई विश्वविद्यालय तथा इस्लामी इतिहास में बीए पाठï्यक्रम कालीकट विश्वविद्यालय तथा इस्लामी सभ्यता में एमए पाठï्यक्रम गुजरात विश्वविद्यालय अहमदाबाद, मुंबई विश्वविद्यालय आदि में उपलब्ध है। दसवीं के बाद इस्लामी इतिहास व संस्कृति में प्री डिग्री पाठï्यक्रम कालीकट विश्वविद्यालय में उपलब्ध है। यहां से इस्लामी इतिहास में बीए व एमए भी किया जा सकता है।
10+2 के बाद मद्रास विश्वविद्यालय से भारतीय कला एवं संस्कृति में बीए किया जा सकता है तो लखनऊ विश्वविद्यालय में एशियाई संस्कृति में बीए, अरब कल्चर में बीए पाठï्यक्रम उपलब्ध है। लखनऊ विश्वविद्यालय से अरब कल्चर एंड सिविलाइजेशन में एमए संस्कृत कल्चर एंड सिविलाइजेशन में एमए तथा पश्चिमी इतिहास में एमए भी किया जा सकता है। मद्रास विश्वविद्यालय से तमिल साहित्य एवं संस्कृति में एक वर्षीय डिप्लोमा तथा दक्षिण पूर्वी एशियाई भाषा एवं संस्कृति मेंं दो वर्षीय डिप्लोमा पाठï्यक्रम उपलब्ध है। भारती दासन विश्वविद्यालय तिरुवनंतपुरम से बीए (ओरिएंटल कल्चर) पाठï्यक्रम किया जा सकता है जबकि दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय सूरत में आदिवासी लोगों के इतिहास व संस्कृति विषय में बीए किया जा सकता है।