आज
किसी भी देश में उसकी तरक्की मापने के जो अलग-अलग पैमाने हैं, उनमें से एक
है ऑटोमोबाइल सैक्टर। कौन-कौन से वाहन कितनी संख्या में सड़कों पर दौड़
रहे हैं, इससे पता चलता है कि अर्थव्यवस्था की क्या रफ्तार है। इस सैक्टर
को चलाने व आगे ले जाने वाले लोगों में ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स भी हैं जो
डिजाइन, कम्फर्ट, इकॉनोमी, पावरफुल इंजन के साथ न केवल इस इंडस्ट्री को
चलाते हैं बल्कि अपने करियर को भी रफ्तार देते हैं। इसी से जुड़ा है ऑटो
कम्पोनैंट का तेजी से बढ़ता दायरा और यही वजह है कि ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स
की मांग में तेजी से बढ़ौतरी हो रही है।
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग यानी ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग या व्हीकल इंजीनियरिंग चुनौती भरा करियर है जिसमें संभावनाओं की सीमा नहीं है। इंजीनियरिंग की यह शाखा कार, ट्रक, मोटरसाइकिल, स्कूटर जैसे वाहनों के डिजाइन, विकास, निर्माण, परीक्षण और मुरम्मत व सर्विस से जुड़ी होती है। ऑटोमोबाइल के निर्माण व डिजाइनिंग के सम्यक मेल के लिए ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स इंजीनियरिंग की विभिन्न शाखाओं जैसे मैकेनिकल, इलैक्ट्रिकल, इलैक्ट्रॉनिक, साफ्टवेयर तथा सेफ्टी इंजीनियरिंग की मदद से अपने काम को अंजाम देते हैं। एक बेहतरीन ऑटोमोबाइल इंजीनियर बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत होती है और साथ ही एक खास किस्म का जुनून चाहिए जो दृढ़ता, मेहनत व लगन के साथ अपने काम को पूरा करने में किसी दबाव व परेशानी को सामने न आने दे।
ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स किसी भी वाहन के कंप्सैप्ट स्टेज से लेकर प्रोडक्शन स्टेज तक शामिल होते हैं यानी कागज से लेकर सड़क तक वाहन के आने तक उन्हें देखना होता है कि पूरा कंसैप्ट हू-ब-हू असलियत में उतरे। इस इंजीनियरिंग की कई उप-शाखाएं हैं जैसे, इंजन, इलैक्ट्रॉनिक्स, कंट्रोल सिस्टम, थर्मोडायनेमिक्स, एयरोडायनेमिक्स, सप्लाई चेन मैनेजमैंट इत्यादि।
ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स को मुख्यत: तीन धाराओं में विभाजित किया जाता है-प्रोडक्ट या डिजाइन इंजीनियर्स, डिवैल्पमैंट इंजीनियर्स और मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर्स। प्रोडक्ट या डिजाइन इंजीनियर्स वे होते हैं जो ऑटोमोबाइल्स के कम्पोनैंट और सिस्टम्स की डिजाइनिंग व टैस्टिंग करते हैं। वे हर पुर्जे को डिजाइन व टैस्ट करते हैं ताकि वे उनकी जरूरतों को पूरा कर सकें। मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर्स ऑटोमोबाइल्स के सभी पार्ट्स को जोडऩे का काम करते है। उन्हें उपकरणों, मशीन रेट्स और लाइन रेट्स, ऑटोमेशन उपकरण और डिजाइन व ले आऊट रेट्स तय करना होता है जबकि मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर्स ऑटोमोबाइल के सभी हिस्सों को जोड़कर पूरा वाहन तैयार करते हैं। नोएडा स्थित ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग डिवीजन चला रहे रूपक सखूजा के मुताबिक ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में करियर तभी बना सकते हैं जब आपकी इसमें रुचि होगी। वैसे प्रोडक्शन से लेकर डिजाइनिंग, असैम्बलिंग और मैकेनिकल कई तरह के जॉब्स हैं। रिसर्च एंड डिवैल्पमैंट का बहुत बड़ा दायरा है ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में।
पाठ्यक्रम
गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर साइंस में रुचि व अच्छी पकड़ रखने वाले छात्र ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में शानदार करियर बनाने की सोच सकते हैं। इनमें कई पाठ्यक्रम कराए जाते हैं जैसे- बी.ई. ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग-बी. टैक. ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, सर्टीफिकेट प्रोग्राम इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, डिप्लोमा इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, एम.टैक. इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, पी.जी. डिप्लोमा इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग।
शैक्षिक योग्यता
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में बी.ई. या बी.टैक करने के लिए 12वीं या समकक्ष योग्यता होनी चाहिए जिसमें गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर साइंस जैसे विषय हों। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में स्नातक होने के बाद एम.ई.या एम.टैक किया जा सकता है और उसके बाद यदि और विशेषज्ञता हासिल करनी है तो पीएच.डी. भी की जा सकती है। दसवीं के बाद डिप्लोमा किया जा सकता है।
चयन
बी.ई. या बी.टैक. पाठ्यक्रमों में दाखिला 12वीं के अंकों व प्रवेश परीक्षाओं (आई.आई.टी.-जे.ई.ई., ए.आई.ई.ई.ई., बिटसैट इत्यादि) की मैरिट के आधार पर होता है जो अखिल भारतीय व राज्य स्तर पर आयोजित की जाती है। एम.ई. या एम.टैक के लिए गेट यानी ग्रैजुएट एप्टीट्यूट टैस्ट इन इंजीनियरिंग के माध्यम से दाखिला मिलता है। जिन्होंने डिप्लोमा कर रखा है, वे ए.आई.एम.ई. परीक्षा देकर डिग्री धारकों के समकक्ष हो सकते हैं। कुछ संस्थान अपनी परीक्षा लेते हैं। बी.ई. या बी.टैक. कोर्स 4 साल का होता है जबकि एम.ई. या एम.टैक और पी.जी. डिप्लोमा 2 साल का होता है। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स तीन साल के होते हैं।
व्यक्तिगत गुण
विषय की जानकारी होने के साथ-साथ कम्युनिकेशन स्किल, कम्प्यूटर स्किल, एनालिटिकल व प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल होनी चाहिए। किसी भी चीज की बारीकी को पकडऩा आना चाहिए। शारीरिक रूप से स्वस्थ होना भी बहुत जरूरी है क्योंकि काम के घंटे लम्बे हो सकते हैं और भारी मशीनों के साथ भी काम करना होता है।
करियर विकल्प
श्री वैंकटेश्वरा यूनिवर्सिटी के चेयरमैन सुधीर गिरि के मुताबिक ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है, वाहनों की मांग में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ौतरी हो रही है, लिहाजा न सिर्फ निर्माण में बल्कि मैंटीनैंस व सर्विस में भी लोगों की जरूरतें बढ़ रही हैं। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की जितनी शाखाएं हैं उनमें अवसर हैं। जिसे डिजाइन पसंद है वह उसे चुन सकता है और जिसे मैन्युफैक्चरिंग भाता है, वह उसमें जा सकता है। वाहन बनाने वाली कंपनियों से लेकर सर्विस स्टेशन, स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन, प्राइवेट ट्रांसपोर्ट कंपनियों, इंश्योरैंंस कंपनियों जैसी जगहों पर अवसरों की भरमार है। जरूरत है तो कुशल और समर्पित लोगों की जिन्होंने ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में कोई पढ़ाई कर रखी है। सबकी योग्यता के हिसाब से कोई न कोई काम उपलब्ध है। कम्प्यूटर के आ जाने से डिजाइन में क्रांति आ गई है। जो लोग इसमें महारत रखते हैं वे इसे चुन सकते हैं। इसके अलावा, अपना गैरेज, वर्कशॉप या सर्विस सैंटर खोला जा सकता है। जिसके पास मास्टर डिग्री है और ग्रैजुएट लैवल पर पांच साल तक पढ़ाने का अनुभव है, वह लैक्चरार बन सकता है। पीएच.डी. वाले रिसर्च में जा सकते हैं।
कुछ नाम इस प्रकार हैं :
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग टैक्नीशियंस, सेटी इंजीनियरिंग-एमिशन रिसर्च, एनवीएच (नॉयस, वाइब्रेशन एंड हार्शनेस) इंजीनियस,परफॉर्मैंस इंजीनियर, व्हीकल डायनेमिक्स कंट्रोलर, ऑप्रेशंस रिसर्च, डिजाइन
आय
यह उम्मीदवार की योग्यता, अनुभव और उस कंपनी के स्टेटस पर निर्भर करता है कि किसी को क्या वेतन मिलता है लेकिन किसी भी नए ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग को 15,000 से 20,000 का शुरूआती वेतन मिल सकता है। आई.आई.टी. या अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से पढऩे वालों के लिए वेतन की कोई सीमा नहीं है। इसके अलावा जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता जाता है, वेतन में भी बढ़ौतरी होती रहती है जो लाखों रुपए प्रतिमाह तक जा सकता है।
प्रमुख संस्थान
इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी, हैदराबाद
श्री वैंकटेश्वरा यूनिवर्सिटी, वैंकटेश्वरा नगर, अमरोहा, उत्तर प्रदेश
मणिपाल इंस्टीच्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी, मणिपाल, कर्नाटक
गवर्नमैंट इंजीनियरिंग कॉलेज, मोडासा, साबरकांठा, गुजरात
हिन्दुस्तान यूनिवर्सिटी, केलम्बक्कम, तमिलनाडु
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग यानी ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग या व्हीकल इंजीनियरिंग चुनौती भरा करियर है जिसमें संभावनाओं की सीमा नहीं है। इंजीनियरिंग की यह शाखा कार, ट्रक, मोटरसाइकिल, स्कूटर जैसे वाहनों के डिजाइन, विकास, निर्माण, परीक्षण और मुरम्मत व सर्विस से जुड़ी होती है। ऑटोमोबाइल के निर्माण व डिजाइनिंग के सम्यक मेल के लिए ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स इंजीनियरिंग की विभिन्न शाखाओं जैसे मैकेनिकल, इलैक्ट्रिकल, इलैक्ट्रॉनिक, साफ्टवेयर तथा सेफ्टी इंजीनियरिंग की मदद से अपने काम को अंजाम देते हैं। एक बेहतरीन ऑटोमोबाइल इंजीनियर बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत होती है और साथ ही एक खास किस्म का जुनून चाहिए जो दृढ़ता, मेहनत व लगन के साथ अपने काम को पूरा करने में किसी दबाव व परेशानी को सामने न आने दे।
ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स किसी भी वाहन के कंप्सैप्ट स्टेज से लेकर प्रोडक्शन स्टेज तक शामिल होते हैं यानी कागज से लेकर सड़क तक वाहन के आने तक उन्हें देखना होता है कि पूरा कंसैप्ट हू-ब-हू असलियत में उतरे। इस इंजीनियरिंग की कई उप-शाखाएं हैं जैसे, इंजन, इलैक्ट्रॉनिक्स, कंट्रोल सिस्टम, थर्मोडायनेमिक्स, एयरोडायनेमिक्स, सप्लाई चेन मैनेजमैंट इत्यादि।
ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स को मुख्यत: तीन धाराओं में विभाजित किया जाता है-प्रोडक्ट या डिजाइन इंजीनियर्स, डिवैल्पमैंट इंजीनियर्स और मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर्स। प्रोडक्ट या डिजाइन इंजीनियर्स वे होते हैं जो ऑटोमोबाइल्स के कम्पोनैंट और सिस्टम्स की डिजाइनिंग व टैस्टिंग करते हैं। वे हर पुर्जे को डिजाइन व टैस्ट करते हैं ताकि वे उनकी जरूरतों को पूरा कर सकें। मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर्स ऑटोमोबाइल्स के सभी पार्ट्स को जोडऩे का काम करते है। उन्हें उपकरणों, मशीन रेट्स और लाइन रेट्स, ऑटोमेशन उपकरण और डिजाइन व ले आऊट रेट्स तय करना होता है जबकि मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर्स ऑटोमोबाइल के सभी हिस्सों को जोड़कर पूरा वाहन तैयार करते हैं। नोएडा स्थित ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग डिवीजन चला रहे रूपक सखूजा के मुताबिक ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में करियर तभी बना सकते हैं जब आपकी इसमें रुचि होगी। वैसे प्रोडक्शन से लेकर डिजाइनिंग, असैम्बलिंग और मैकेनिकल कई तरह के जॉब्स हैं। रिसर्च एंड डिवैल्पमैंट का बहुत बड़ा दायरा है ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में।
पाठ्यक्रम
गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर साइंस में रुचि व अच्छी पकड़ रखने वाले छात्र ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में शानदार करियर बनाने की सोच सकते हैं। इनमें कई पाठ्यक्रम कराए जाते हैं जैसे- बी.ई. ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग-बी. टैक. ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, सर्टीफिकेट प्रोग्राम इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, डिप्लोमा इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, एम.टैक. इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, पी.जी. डिप्लोमा इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग।
शैक्षिक योग्यता
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में बी.ई. या बी.टैक करने के लिए 12वीं या समकक्ष योग्यता होनी चाहिए जिसमें गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर साइंस जैसे विषय हों। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में स्नातक होने के बाद एम.ई.या एम.टैक किया जा सकता है और उसके बाद यदि और विशेषज्ञता हासिल करनी है तो पीएच.डी. भी की जा सकती है। दसवीं के बाद डिप्लोमा किया जा सकता है।
चयन
बी.ई. या बी.टैक. पाठ्यक्रमों में दाखिला 12वीं के अंकों व प्रवेश परीक्षाओं (आई.आई.टी.-जे.ई.ई., ए.आई.ई.ई.ई., बिटसैट इत्यादि) की मैरिट के आधार पर होता है जो अखिल भारतीय व राज्य स्तर पर आयोजित की जाती है। एम.ई. या एम.टैक के लिए गेट यानी ग्रैजुएट एप्टीट्यूट टैस्ट इन इंजीनियरिंग के माध्यम से दाखिला मिलता है। जिन्होंने डिप्लोमा कर रखा है, वे ए.आई.एम.ई. परीक्षा देकर डिग्री धारकों के समकक्ष हो सकते हैं। कुछ संस्थान अपनी परीक्षा लेते हैं। बी.ई. या बी.टैक. कोर्स 4 साल का होता है जबकि एम.ई. या एम.टैक और पी.जी. डिप्लोमा 2 साल का होता है। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स तीन साल के होते हैं।
व्यक्तिगत गुण
विषय की जानकारी होने के साथ-साथ कम्युनिकेशन स्किल, कम्प्यूटर स्किल, एनालिटिकल व प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल होनी चाहिए। किसी भी चीज की बारीकी को पकडऩा आना चाहिए। शारीरिक रूप से स्वस्थ होना भी बहुत जरूरी है क्योंकि काम के घंटे लम्बे हो सकते हैं और भारी मशीनों के साथ भी काम करना होता है।
करियर विकल्प
श्री वैंकटेश्वरा यूनिवर्सिटी के चेयरमैन सुधीर गिरि के मुताबिक ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है, वाहनों की मांग में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ौतरी हो रही है, लिहाजा न सिर्फ निर्माण में बल्कि मैंटीनैंस व सर्विस में भी लोगों की जरूरतें बढ़ रही हैं। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की जितनी शाखाएं हैं उनमें अवसर हैं। जिसे डिजाइन पसंद है वह उसे चुन सकता है और जिसे मैन्युफैक्चरिंग भाता है, वह उसमें जा सकता है। वाहन बनाने वाली कंपनियों से लेकर सर्विस स्टेशन, स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन, प्राइवेट ट्रांसपोर्ट कंपनियों, इंश्योरैंंस कंपनियों जैसी जगहों पर अवसरों की भरमार है। जरूरत है तो कुशल और समर्पित लोगों की जिन्होंने ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में कोई पढ़ाई कर रखी है। सबकी योग्यता के हिसाब से कोई न कोई काम उपलब्ध है। कम्प्यूटर के आ जाने से डिजाइन में क्रांति आ गई है। जो लोग इसमें महारत रखते हैं वे इसे चुन सकते हैं। इसके अलावा, अपना गैरेज, वर्कशॉप या सर्विस सैंटर खोला जा सकता है। जिसके पास मास्टर डिग्री है और ग्रैजुएट लैवल पर पांच साल तक पढ़ाने का अनुभव है, वह लैक्चरार बन सकता है। पीएच.डी. वाले रिसर्च में जा सकते हैं।
कुछ नाम इस प्रकार हैं :
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग टैक्नीशियंस, सेटी इंजीनियरिंग-एमिशन रिसर्च, एनवीएच (नॉयस, वाइब्रेशन एंड हार्शनेस) इंजीनियस,परफॉर्मैंस इंजीनियर, व्हीकल डायनेमिक्स कंट्रोलर, ऑप्रेशंस रिसर्च, डिजाइन
आय
यह उम्मीदवार की योग्यता, अनुभव और उस कंपनी के स्टेटस पर निर्भर करता है कि किसी को क्या वेतन मिलता है लेकिन किसी भी नए ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग को 15,000 से 20,000 का शुरूआती वेतन मिल सकता है। आई.आई.टी. या अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से पढऩे वालों के लिए वेतन की कोई सीमा नहीं है। इसके अलावा जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता जाता है, वेतन में भी बढ़ौतरी होती रहती है जो लाखों रुपए प्रतिमाह तक जा सकता है।
प्रमुख संस्थान
इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी, हैदराबाद
श्री वैंकटेश्वरा यूनिवर्सिटी, वैंकटेश्वरा नगर, अमरोहा, उत्तर प्रदेश
मणिपाल इंस्टीच्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी, मणिपाल, कर्नाटक
गवर्नमैंट इंजीनियरिंग कॉलेज, मोडासा, साबरकांठा, गुजरात
हिन्दुस्तान यूनिवर्सिटी, केलम्बक्कम, तमिलनाडु