सैटेलाइट चैनलों की बाढ़ ने वीडियोग्राफी के क्षेत्र में युवाओं द्वारा बहुत कुछ कर गुजरने की संभावनाओं का सूत्रपात किया है। आज का दर्शक सरकारी टेलीविजन पर परोसे जा रहे चाहे-अनचाहे कार्यक्रमों को देखने के लिए बाध्य नहीं है। सैटेलाइट चैनल्स के आ जाने से उसके समक्ष ढेर सारे विकल्प मौजूद हैं। आज दर्शक खेल, संगीत, फिल्म, वन्यजीवन, राजनीति, अपराध, ललित कला, विज्ञान व रोमांस संबंधी अपनी रुचि के विषयों को गहराई से देख और समझ सकता है। इन कार्यक्रमों को निर्मित करने वाले लोग 'वीडियोग्राफरÓ कहलाते हैं। इस क्षेत्र में स्वर्णिम भविष्य के अनेक अवसर तथा ग्लैमर व पैसे की भरमार ने युवाओं के कदम इस ओर मोड़ दिए हैं।
टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले विविध कार्यक्रमों के निर्माण का संपूर्ण दारोमदार निर्मार्ताओं, निर्देशकों, वीडियोग्राफरों, साउंड रिकार्डिस्टों, एडीटर्स आदि पर होता है। आज वैज्ञानिक क्रांति का दौर है। पूरी दुनिया में प्रतिपल ऐसा कुछ घटित हो रहा है, जिसे समूचा परिवेश टकटकी लगाकर देख रहा है। पुरानी व बासी तकनीकों को अलविदा कहने के बाद आज नई व बेहतर तकनीकों का बोलबाला है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया के विस्तार के बाद केबल टेलीविजन की दुनिया में एक क्रांति-सी छिड़ गई है। आज हालात यह हैं कि दर्शकों के पास पचास से अधिक हिंदी, अंग्रेजी तथा दूसरी भारतीय भाषाओं के टी.वी. चैनल चुनने का विकल्प मौजूद है। आज जो चैनल अपने कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे हैं उनमें से कई उच्च तकनीकयुक्त डिजिटल चैनल हैं। यही नहीं भारत के प्रख्यात व प्रतिष्ठिïत समूहों द्वारा आगामी पांच साल में लगभग एक दर्जन नए चैनल्स लांच किए जाने की भी योजना है।
सूचना संसार मे ंक्रांति आ जाने के साथ ही इस कार्य के निष्पादन में जुटे लोगों के दिन भी बहुरे हैं। आज इस क्षेत्र में सर्वाधिक मांग वीडियोग्राफरों अथवा कैरामैनों की है। एक अनुमान के मुताबिक आज भी विभिन्न टी.वी. चैनल्स को चार से भी अध्रिाक कैमरा ऑपरेटर्स की आवश्यकता है। इस क्षेत्र में एक ओर जहां दबादबा, नाम, दाम, काम सबकुछ है, वहीं दूसरी ओर रचनात्म्क तथा कुछ नया कर गुजरने की बेशुमार गुंजाइशें भी हैं।
दरअसल, वीडियोग्राफी दृश्यों को स्टीक कोण (एंगिल) तथा उचित प्रकाश समन्वयन के साथ फिल्मांकित करने की कला है। जैसे-जैसे शूटिंग करने का अनुभव बढ़ता जाता है वैसे-वैसे इसमें निखार व पैनापन आता जाता है। वीडियाग्राफी का परिष्कृत स्वरूप ही 'सिनेमेटोग्राफीÓ है। इन दोनों विद्याओं के बीच अंतर केवल कैमरों की गुणवत्ता व प्रकार का है। वीडियोग्राफी का उपयोग टी.वी. या वीडियो के कार्यक्रमों को फिलमांकित करने में होता हे। जबकि सिनेमेटोग्राफी का प्रयोग फीचर फिल्में तथा विज्ञापन फिल्मों के निर्माण में होता है। सिनेमेटोग्राफी एक महंगा माध्यम है जबकि वीडियोग्राफी सहज उपलब्ध तथा सस्ती होती है। इसी कारण आज अधिसंख्य निर्माता-निर्देशक इसी का इस्तेमाल कर रहे हैं।
'यू मैटिकÓ कैमरों के बाद अब वीडियोग्राफी के क्षेत्र में 'बीटा कैमÓ तथा 'डिजिटल बीटा कैमÓ आदि कैमरों की नई खेप के पदार्पण से गुणवता में चमत्कारिक सुधार आया है।
इस क्षेत्र में प्रगति प पदोन्नति की अपार संभावनाएं हैं। वीडियोग्राफर्स आजकल पांच हजार रुपए प्रतिमाह से लेकर पचास हजार रुपए प्रतिमाह तक कमा रहे हैं। देश में अब इस क्षेत्र में आनेवाले युवक-युवितियों के लिए प्रशिक्षण की अनेक व्यवस्थाएं संचालित हैं। अनेक सरकारी व निजी क्षेत्र के संस्थान इस बाबत विभिन्न पाठ्ïयक्रमों में प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं।
नोएडा फिल्म सिटी में स्थित 'एशियन अकादमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजनÓ इस क्षेत्र का एक प्रतिष्ठिïत संस्थान है। यह पिछले कई वर्षों से निरंतर वीडियोग्राफी तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया से संबंधित विभिन्न पाठ्ïयक्रम संचालित कर रहा है। इस संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद आज अनेक युवक-युवतियों अपने-अपने क्षेत्रों के सफलतम हस्ताक्षर हैं। संस्थान के निदेशक श्री संपीप मारवाह हैं, जो अनिल कपूर, बोनी कपूर व श्री देवी के बहनोई भी हैं। श्री मारवाह का कहना है कि उनका संस्थान त्रैमासिक, अद्र्धवार्षिक व अन्य पाठ्ïयक्रमों को चलाता है। उनके संस्थान से अब तक लगभग डेढ़ हजार युवक-युवतियों प्रशिक्षित हो चुके हैं जिनमें से 90 फीसदी प्रतिष्ठिïत प्रॉडक्ïशंस के साथ संबंद्ध भी हो चुके हैं।
प्रशिक्षण संस्थान
एशियन अकादमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, मारवाह स्टूडियो कॉम्पलेक्स, एफ सी-14/15 फिल्म सिटी, सेक्टर-16 ए, नोएडा-201301 (उ.प्र.)
श्री अरविंदो इस्टीट्ïयूट ऑफ कम्युनिकेशन नई दिल्ली
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्ïयूट, चेन्नई
जेवियर इस्टीट्ïयूट ऑफ कम्युनिकेशन, मुंबई
जामिया मास कम्युनिकेशन एंड रिसर्च सेंटर, जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
फिल्म एंड टी.वी. इस्टीट्ïयूट, पूना