व्यवसायिक लाभ के लिए आवश्यक है कि जिस स्थान पर कारोबार करें वहां धन आगमन की अनुकूल स्थितियों का समावेश होता रहे। यह अनुकूलता तभी आती है जब कार्य स्थान का वास्तु अनुकुल हो अन्यथा मेहनत और समय का व्यय करने के उपरांत भी मुनाफे को लेकर मायूसी की काली घटा छाई रहती है।
वास्तु का शाब्दिक अर्थ है निवास करना अर्थात जिस स्थान पर निवास किया जाए उसे वास्तु कहा जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार केवल घर पर ही नहीं बल्कि ऑफिस, दुकान अथवा कार्यस्थान पर भी उसके सिद्धांत एवं नियम लागू होते हैं। अगर जीविका कमाने के स्थान पर ही वास्तु दोष पाएं जाएंगे तो जीवन में सफलता कैसे मिलेगी। कार्यस्थान की किस दिशा में बैठकर आप लेन-देन आदि कार्य करते हैं, इसका सीधा असर आपके व्यापार पर पड़ता है।
वास्तु विद्वानों के मतानुसार चुंबकीय उत्तर क्षेत्र कुबेर का निवास स्थान माना जाता है जो कि धन में बढ़ौतरी के लिए शुभता का संचार करता है। जब भी कोई व्यापारिक वार्ता, परामर्श, लेन-देन,सौदा करें तो आपका मुंह उत्तर की ओर होना चाहिए। इससे व्यापार में दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की होती है।
केवल वास्तु ही नहीं वैज्ञानिक भी इसकी पुष्टी करते हैं कि उत्तर क्षेत्र की तरफ से चुंबकीय तरंगों का समावेश होता है जिससे मस्तिष्क की कोशिकाएं सक्रिय रहती हैं और शुद्ध वायु के कारण भी अधिक ऑक्सीजन प्राप्त होती है। जो मस्तिष्क को सक्रिय करके स्मरण शक्ति में बढ़ौतरी करती हैं। सक्रियता और स्मरण शक्ति व्यापारिक उन्नति और कार्यों को सफलता की बुंलदियों तक ले जाते हैं।
जहां तक संभव हो कार्य स्थान में उत्तर दिशा की ओर अपना मुंह रखें तथा गल्ला और आवश्यक कागजात दाहिनी तरफ रखें। ऐसा करने से धन वृद्धि के साथ साथ समाज में मान-प्रतिष्ठा को भी बढ़ावा मिलता है।
इसके अतिरिक्त कार्यस्थान की दीवारों पर गहरे रंग नहीं पुतवाएं। सफेद, क्रीम एवं दूसरे हल्के रंगों को पुतवाएं। जिससे लाभ वृद्घि होगी।
कार्यस्थान का दरवाजा बाहर की बजाय अंदर की तरफ खुलना चाहिए। ऐसा करने से आय के साथ व्यय में भी बढ़ौतरी होगी।
कार्यस्थान की उत्तर एवं पश्चिम दिशा में शोकेस बनवाएं। इससे ग्राहकों की संख्या में वृद्धि होती है।
धन में बढ़ौतरी के लिए तिजोरी का मुंह उत्तर की तरफ रखें क्योंकि इस दिशा पर देवाताओं के कोषाध्याक्ष कुबेर का साम्राज्य है।
कार्यस्थान में सीढ़ियां बनी हुई है तो उनकी संख्या सम नहीं होनी चाहिए।