अर्न वाइल यू लर्न

अर्न वाइल यू लर्न
भला पढना कौन नहीं चाहता है। आखिर हमारा करियर जो इस पर बेस्ड रहता है, लेकिन हममें से बहुत से ऐसे हैं, जो इकोनॉमिकल प्रॉब्लम के चलते एजुकेशन से दूर रह जाते हैं। उनके सपने प्राइमरी स्टेज में ही दम तोड देते हैं। इस प्रॉब्लम का सॉल्यूशन शायद अब निकलने में देर नहीं है। शुरुआत हो चुकी है। यह शुरुआत हुई है, हरियाणा स्टेट से। यहां एजुकेशन के साथ-साथ अर्निंग की व्यवस्था शुरू की गई है।
एजुकेशन पहले की तुलना में महंगी होती जा रही है। इसके पीछे हमारी सोच भी एक बडा कारण है। सभी अपने बच्चों को बेटर एजुकेशन अच्छे इंस्टीट्यूट्स में दिलाना चाहते हैं। गवर्नमेंट के स्कूलों एवं कॉलेजों की तरफ से लोगों का फोकस हट रहा है। ऐसा नहीं है कि अच्छी एजुकेशन देने वाले गवर्नमेंट स्कूल या कॉलेज नहीं हैं, लेकिन इस तरह के अच्छे इंस्टीट्यूट्स की कमी है। सभी स्टूडेंट्स को इनमें एडमिशन नहीं मिल सकता है। जो स्टूडेंट गवर्नमेंट कॉलेज और स्कूल में एडमिशन नहीं पाते हैं, वे प्राइवेट इंस्टीट्यूट्स की ओर रुख करते हैं। इन इंस्टीट्यूट्स की फीस सामान्यत: गवर्नमेंट कॉलेजों और स्कूलों से अधिक होती है। यहां एक और कारण भी हम लोगों के सामने है। आज अधिकतर स्टूडेंट प्रोफेशनल कोर्स करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि इस तरह के कोर्स के बाद जॉब मिलने में आसानी होती है। इस तरह के कोर्सेज की फीस भी सामान्य कोर्सेज से अधिक है। इन दो कारणों से ही पहले की तुलना में एजुकेशन महंगी हो गई है। लेकिन देश की प्रगति के लिए प्रोफेशनल और टेक्निकल एजुकेशन तो चाहिए ही। ऐसे में अगर एजुकेशन के साथ अर्निंग की फैसेलिटी मिल जाए तो क्या कहने?
क्या है स्कीम
हरियाणा गवर्नमेंट ने साल 2011 में अर्न वाइल यू लर्न की स्कीम शुरू की थी। इसका मकसद स्टूडेंट को कॉलेज लेवल पर ही आने वाले समय के लिए स्किल्स डेवलप करना और काम करने के माहौल में ढालना है। साथ ही इस स्कीम का दूसरा मकसद गरीब स्टूडेंट्स की मदद भी है, ताकि वे एजुकेशन के दौरान ही अपना खर्च निकाल सकें और सेल्फ डिपेंडेंट बन सकें। इसके लिए स्टेट लेवल पर हरियाणा गवर्नमेंट कॉलेजेज को 1.30 करोड रुपये से ज्यादा फंड देती है। यह फंड कॉलेजेज को उनकी स्ट्रेंथ और जरूरत के हिसाब से अलॉट किया जाता है।
क्या हैं रूल्स
इस स्कीम का बेनिफिट लेने के लिए कई रूल्स भी हैं। एक स्टूडेंट इस स्कीम के तहत एक हफ्ते में अधिकतम 6 घंटे ही काम कर सकता है। प्रति घंटे काम करने की एवज में स्टूडेंट को 100 रुपये दिए जाते हैं। इस तरह एक स्टूडेंट एक हफ्ते में 600 रुपये और पूरे महीने में 2400 रुपये तक कमा लेते हैं। स्टूडेंट को काम उस घंटे में करना होगा, जिस दौरान उसका कोई पीरियड न हो, ताकि स्टूडेंट्स की पढाई डिस्टर्ब न हो।
वर्क प्रोफाइल
इस स्कीम के तहत स्टूडेंट्स से किस तरह काम लिया जा सकता है, गवर्नमेंट लेवल पर इसका भी स्टैंडर्ड है। कॉलेज की लाइब्रेरी, कंप्यूटर लैब, सब्जेक्ट लाइब्रेरी या ऑफिस वर्क स्टूडेंट से करवाए जा सकते हैं। आमतौर पर स्टूडेंटस को लैब अरेंजमेंट्स, डाटा ऑनलाइन फीड करना, इवेंट्स अरेंजमेंट जैसे काम करने होते हैं।
फाइनेंशियली वीक
स्टूडेंट्स के लिए वरदान
हरियाणा गवर्नमेंट द्वारा शुरू की गई इस योजना की तारीफ हर जगह हो रही है। एजुकेशन फील्ड में इसे एक बडा क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। जम्मू के तविष कॉलेज ऑफ एजुकेशन के प्रिंसिपल डॉ. राजकुमार कहते हैं कि हरियाणा सरकार का यह प्रयास वाकई सराहनीय है। वरना पिछले कुछ सालों से जो रूल्स बनाए जा रहे हैं, उसने गरीब स्टूडेंट्स के लिए एजुकेशन लेना मुश्किल कर दिया था। हरियाणा सरकार का यह प्रयास उस खामी को दूर कर सकता है। हमारे यहां पुंछ, भद्रवाह, किश्तवाड आदि दूर-दराज इलाकों से जो स्टूडेंट एजुकेशन के लिए आते हैं, उन्हें यहां रहने-खाने पर ही हर माह पांच से सात हजार रुपये खर्च करने पडते हैं। हरियाणा गवर्नमेंट की तरह यदि यहां भी प्रयास किया जाए, तो स्टूडेंट्स को काफी सहूलियत हो जाएगी।
मिलेगी प्रैक्टिकल नॉलेज
ग्रेटर नोएडा के नेहरू स्मारक इंटर कॉलेज, साकीपुर के प्रिंसिपल डॉ. शिव कुमार शर्मा पढाई के साथ कमाई की योजना का समर्थन करते हुए कहते हैं कि एजुकेशन के साथ वर्क एक्सपीरियंस मिलने से स्टूडेंट्स को प्रैक्टिकल नॉलेज भी मिलेगी और इसका लाभ उन्हें जॉब के समय मिलेगा। स्टूडेंट अपनी इनकम से एजुकेशन के साथ ही फैमिली की फाइनेंशियल प्रॉब्लम में भी कुछ सुधार कर सकते हैं।
स्टॉफ के लिए हेल्पफुल
इस स्कीम का स्वागत करते हुए जम्मू के बिश्नाह डिग्री कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो. कल्पना केसर कहती हैं कि वाकई यह एक अच्छा प्रयास है। इस तरह से स्टूडेंट्स में प्रैक्टिकल वर्क करने की समझ पैदा होगी। वे एजुकेशन पीरियड में ही वर्क कल्चर से परिचित हो जाएंगे। लोगों के काम से सीखेंगे। हमारे यहां गाव-कस्बों से कुछ ऐसे स्टूडेंट्स भी आते हैं, जिनके लिए अपनी एजुकेशन का खर्च उठा पाना बहुत मुश्किल है। ऐसी स्कीम को लागू कराने में हमारा नॉन-टीचिंग स्टॉफ हेल्पफुल हो सकता है। वे कहती हैं कि इस तरह की कोई भी योजना अगर जम्मू में आती है, तो हम उसका स्वागत करेंगी।
पूरी होगी स्टॉफ की कमी
ग्रेटर नोएडा के मिहिर भोज इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. भरत सिंह यादव इस प्रोग्राम को काफी फायदे वाला मानते हैं। वे और कहते हैं कि यह स्कीम यहां भी लागू होनी चाहिए। अगर ऐसा होता है तो इसका सबसे ज्यादा एडवांटेज उन स्टूडेंट्स को मिलेगा, जो अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों का मुंह देखने को विवश हैं। वे यह भी बताते हैं कि आज नई भर्ती पर रोक के कारण स्कूल्स में स्टॉफ की कमी है। अगर यह स्कीम यहां होती तो स्टॉफ की कमी हम स्टूडेंट्स से पूरी कर सकते थे।
फायदेमंद है स्टूडेंट्स के लिए
हरियाणा के गुडगांव में इस स्कीम को लागू कर चुके द्रोणाचार्य राजकीय महाविद्यालय के प्रिंसिपल डॉ. आर के यादव इस स्कीम के बारे में बताते हुए कहते हैं कि स्टूडेंट्स को इस स्कीम से फायदा हुआ है। कालेज में एजुकेशन के लिए आने वाले स्टूडेंट्स केवल एजुकेशन को ही अपना काम समझते थे, लेकिन अब वे जिम्मेदारी के साथ न केवल दूसरे कामों को करते हैं, बल्कि आगे उन्हें पैसा कमाने का चांस मिलने की वजह से उसे बेटर तरीके से भी करते हैं।
जल्द शुरू करेंगे स्कीम
फरीदाबाद के सरस्वती महिला महाविद्यालय की प्रेंसिपल डॉ. अलका शर्मा जल्द ही कॉलेज में इसी सत्र से यह स्कीम शुरू करने की बात कह रही हैं। वे इस स्कीम को स्टूडेंट्स के लिए आत्मनिर्भर बनाने वाला बताती हैं। इनका मानना है कि इस स्कीम से स्टूडेंट्स जो सीखेंगे, उससे उन्हें जॉब मिलने में मदद मिलेगी। जिंदगीभर के लिए यह स्कीम उनके लिए यादगार बन जाएगी।
स्टूडेंट्स के लिए हेल्पफुल
फरीदाबाद के ही डीएवी शताब्दी महाविद्यालय के प्रिंसिपल डॉ. सतीश आहूजा इकोनॉमिकली कमजोर स्टूडेंट्स के लिए इसे हेल्पफुल मानते हैं। उनका कहता है कि ऐसे बहुत से स्टूडेंट अपनी कंडीशन के चलते हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं और करियर की रेस में पीछे हो जाते हैं। ऐसे स्टूडेंट्स को अगर इस स्कीेम से इकोनॉमिकल और वर्क क्वॉलिटी को लेकर हेल्प मिलती है, तो उससे बढिया भला और क्या हो सकता है।
एनकरेज करें
पटना यूनिवर्सिटी के स्पो‌र्ट्स बोर्ड के प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर डॉ. सुहेली बताते हैं कि सेंट्रल गवर्नमेंट ने इस तरह के प्रोग्राम्स को एनकरेज करने का आग्रह सभी स्टेट्स से किया है। अभी बिहार सरकार के साइकिल वितरण योजना में मॉनिटरिंग के लिए पटना कॉलेज से भेजे गए एनएसएस के वॉलंटियर्स को सरकारी स्तर से पारिश्रमिक भी दिया गया। एनएसएस में भी कई तरह के कार्यक्रम होते हैं, जिसमें सभी काम अपने स्टूडेंट्स से लिए जाते हैं जैसे फोटोग्राफी, वीडियो रिकॉर्डिंग या साज-सज्जा का काम। इससे स्टूडेंट्स को काम कर सीखने का अवसर मिलता है।
बढ चुके हैं कदम
पटना में मगध महिला कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो. डॉ. डॉली सिन्हा इस प्रोग्राम का फेवर करते हुए बताती हैं कि उनके कॉलेज में डिसीजन लिया गया है कि डिपार्टमेंट के छोटे-छोटे काम जैसे ई-लाइब्ररी बनाना, इवेंट मैनेजमेंट आदि स्टूडेंट्स से ही कराया जाएगा। इससे स्टूडेंट्स की इनकम भी होगी और साथ ही उन्हें इसका एक्सपीरियंस भी मिलेगा और यही एक्सपीरियंस आगे करियर में भी उनकी हेल्प करेगा।
स्टूडेंट्स की डिमांड
स्कॉलरशिप का विकल्प
मगध महिला कॉलेज की स्टूडेंट मनीषा मानुषी कहती हैं कि साधारण घरों से आने वाले स्टूडेंट स्कॉलरशिप के लिए कोशिश करते हैं, लेकिन संख्या कम होने के कारण सभी को यह मिलना असंभव है। लडके तो एजुकेशन के साथ इनकम के लिए बहुत से काम कर सकते हैं, लेकिन हम लोगों के पास ऑप्शन कम होते हैं। मैं स्पो‌र्ट्स से जुडी हूं, इसलिए कॉलेज मैनेजमेंट की तरफ से फाइनेंशियल सपोर्ट मिल जाता है। इस तरह की स्कीम प्रॉयरिटी के साथ महिला कॉलेजों में तो लागू की ही जानी चाहिए।
कारगर स्कीम
गुडगांव के सेक्टर 14 की एक स्टूडेंट  दिव्या इस स्कीम को उन लोगों के लिए कारगर बताती हैं जिनकी इकोनॉमिकल कंडीशन खराब है। वे कहती हैं, पहले हमने यह कल्पना नहीं की थी कि एजुकेशन के साथ-साथ हम इनकम भी कर सकते हैं।
आएगा चेंज
जम्मू की रहने वाली इंजीनियरिंग स्टूडेंट तान्या खजुरिया इस प्रोग्राम को आत्मनिर्भर बनाने वाला बताती हैं। उनका मानना है कि यह स्कीम केवल कमजोर आय वर्ग के लिए ही हेल्पफुल नहीं है, यह सभी के लिए यूजफुल है। सभी पॉकेटमनी निकालकर आत्मनिर्भर बन सकते हैं। हमारे यहां भी इस तरह की योजना लागू करनी चाहिए। यह स्कीम एजुकेशन सेक्टर में भी चेंज लाने का काम करेगी।
सभी जगह हो लागू
ग्रेटर नोएडा के स्टूडेंट अमित योजना की तारीफ करते हुए कहते हैं कि इसे हर कॉलेज में लागू किया जाना चाहिए। बात पैसे की नहीं है। एक्सपीरियंस जरूरी होता है। यह स्कीम हमें वह भी दिला सकती है। जॉब के लिए अप्लॉई करने पर एक्सपीरियंस रखने वालों को ही प्रॉयरिटी दी जाती है। यह प्रॉब्लम भी इस प्रोग्राम से दूर हो जाएगी।
ट्रांसपैरेंसी जरूरी
जम्मू की एमएससी स्टूडेंट डिलाइट सुरक्षा के लिहाज से भी इस स्कीम को बेटर मानती हैं। उन्हें इस स्कीम की सबसे बडी खूबी यह लगती है कि इसमें वर्क करते समय सिक्योरिटी को लेकर कोई प्रॉब्लम नहीं है। इसमें अपने कॉलेज में ही टीचर्स, प्रोफेसर्स के सामने ही वर्क ऑप्शन प्रोवाइड कराए जाते हैं।
अपनी बात को खत्म करने से पहले डिलाइट यह जरूर कहती हैं कि इस तरह के प्रोग्राम्स में पूरी ईमानदारी बरतनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह अच्छी शुरुआत भी कारगर नहीं होगी।
परफेक्ट स्कीम
गुडगांव सेक्टर 14 की ही स्टूडेंट निधि वर्क एक्सपीरियंस मिलने के कारण इस स्कीम को बेहतरीन बताती हैं। उनका कहना है कि इसमें वर्क भी कॉलेज के अंदर करना होगा, जो कि स्टूडेंट्स के लिए सेफ है। कंप्यूटर के काम, डेटा एंट्री आदि में परफेक्शन आएगा। इसका फायदा कंपनियों के इंटरव्यू के समय मिलेगा। कंपनियां जॉब में एक्सपीरियंस को ही प्रॉयरिटी देती हैं। हर लिहाज से यह स्कीम परफेक्ट है।
हो प्रॉपर एडवरटाइजमेंट
हरियाणा में शुरू हुई इस स्कीम को लेकर बहुत सी जगहों पर लोग कंफ्यूज हैं। वे इसके प्रचार में कमी की बात कह रहे हैं। उनका मानना है कि अगर इस स्कीम का प्रचार- प्रसार न किया गया और इसमें ईमानदारी न बरती गई तो इसका असर आने वाले दिनों में खत्म हो सकता है।
फरीदाबाद के पंडित जवाहर लाल नेहरू राजकीय महाविद्यालय के मंगल मिश्रा इसके प्रचार प्रसार में कमी की बात कहते हुए मांग कर रहे हैं कि कॉलेज प्रबंधन इस स्कीम का अधिक से अधिक प्रचार करे, जिससे कि जरूरतमंद स्टूडेंट्स इस शानदार स्कीम का फायदा उठा सकें।
पढा रहे हैं स्टूडेंट्स
पटना के बीएन कॉलेज के प्रिंसिपल
प्रो. डॉ. पी के पोद्दार कहते हैं कि वे जब स्टूेडेंट थे, तब इस तरह की योजनाओं की जरूरत ही नहीं महसूस की जाती थी। उस समय स्टूडेंट्स ट्यूशन पढाकर अपने लिए पॉकेटमनी निकाल लिया करते थे। लेकिन आज इसकी जरूरत है। हम स्टूडेंट्स की इकोनॉमिकल हेल्प करना चाहते हैं, लेकिन सभी को तो स्कॉलरशिप नहीं दे सकते हैं। इसी बात को सोचते हुए हमने अपने कॉलेज में एक दूसरा रास्ता निकाला है। वे कहते हैं कि उन्होंने यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन से परमिशन लेकर उन स्टूडेंट्स को क्लॉस में पढाने का चांस दिया है, जो यूजीसी के मानकों को पूरा करते हैं। स्टूडेंट्स को एक क्लॉस पढाने पर 250 रुपये दिए जा रहे हैं।
आएगा रेस्पॉन्सिबिलिटीज का एहसास
गुडगांव के राजकीय महाविद्यालय सेक्टर-14 में एसोसिएट प्रोफेसर इंदु जैन के मुताबिक यह योजना कालेज स्टूडेंट्स के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रही है। इस योजना के तहत लाभ पाने वाले स्टूडेंट्स पढाई में भी बेहतर कर पा रहे हैं, क्योंकि उनमें जिम्मेदारी का एहसास भी आता है और दूसरे पैसे की समस्या भी काफी हद तक दूर होती है। इस योजना के दोहरे फायदे हैं कि स्टूडेंट्स को पैसा भी मिलता है और अनुभव भी होता है।
अपने स्तर पर शुरुआत
लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर रश्मि मित्तल इसे बढिया स्कीम बताते हुए कहती हैं कि उनकी यूनिवर्सिटी में इस पर पहले से ही अमल हो रहा है। हमारे कैंपस में बहुत से स्टूडेंट नए एडमिशन के समय वर्क में हेल्प करते हैं। वह कहती हैं कि अक्सर एडमिशन का कार्य समर वैकेशन में होता है और इस दौरान स्टूडेंट्स के पास समय भी होता है, तो उनकी ड्यूटी एडमिशन लेने आए लोगों के फॉर्म भरने, उनकी काउंसिलिंग आदि में लगाई जाती है। इससे न केवल उनका सेल्फ कॉन्फिडेंस बढता है, बल्कि लोगों की साइकोलॉजी समझने और अपनी स्पीकिंग एबिलिटी परखने का मौका भी मिलता है। इसके बदले उन्हें पैसा दिया जाता है। वह आगे बताती हैं कि होटल मैनेजमेंट के स्टूडेंट्स हमारी परमिशन के साथ कैंपस के आसपास के प्रतिष्ठित होटल्स में भी शाम के समय अपनी सेवाएं देते हैं। इसी तरह हॉस्टल के सीनियर स्टूडेंट्स जूनियर स्टूडेंट्स की गाइडिंग क्लासेज लेकर भी कुछ कमाई कर पाते हैं। कुछ रिसर्च स्कॉलर्स भी जूनियर स्टूडेंट्स को अपने साथ जोडकर उन्हें कमाई का अवसर देते हैं। इन्हें प्रतिघंटे के हिसाब से पैसे मिलते हैं। इसके अलावा सीनियर स्टूडेंट्स काउंसिलिंग के जरिए 8 से 9 हजार रुपये प्रति माह कमा लेते हैं। इससे उनका मनोबल बढता है और वे सॉफ्ट स्किल्स में भी माहिर हो जाते हैं। हालांकि इस स्कीम को वे डिजर्विंग कैंडिडेट के लिए ही यूजफुल मानती हैं। रश्मि मित्तल स्कीम का सपोर्ट करती हैं लेकिन यह भी अंत में कहती हैं कि इसमें पूरी ट्रांसपैरेंसी होनी चाहिए, ताकि स्टूडेंट्स को एडवांटेज मिले।
मेक एप्स, मेक मनी
कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं और अर्निग चाहते हैं, तो इसमें अर्निग के अच्छे चांस हैं..
मार्केट में डिजिटल डिवाइसेज बढती जा रही हैं और उससे होने वाली इनकम भी। कुछ महीने पहले सोशल नेटवर्किग वेबसाइट फेसबुक ने इंस्टाग्राम को 50 अरब रुपये में खरीद लिया। इंस्टाग्राम को इतनी कीमत में खरीदने की वजह थी कि इसने एपल के आईओएस ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए एक एप्लीकेशन डेवलप की, जिससे यूजर फोटो खींचने के साथ डिजिटल फिल्टर का इस्तेमाल कर सकता है और इन फोटो का कई तरह की सोशल नेटवर्किग साइट्स में यूज किया जा सकता है। ऐसी बहुत सी एप डेवलपमेंट कंपनियां हैं, जिन्होंने एप्स डेवलप करके ही खुद को साबित किया है। स्मार्टफोन की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सभी कंपनियां अपना कारोबार एप्स पर फोकस कर रही हैं, ताकि लोगों तक सीधे पहुंच बनाई जा सके। इस समय एपल के आईट्यूंस स्टोर पर 7.5 लाख से ज्यादा एप्स मौजूद हैं, वहीं गूगल के एंड्रॉयड प्ले स्टोर पर यह संख्या 10 लाख से ऊपर पहुंच चुकी है। स्मार्टफोन का सेल्स ग्राफ बढने के पीछे एप्स ही हैं।
पॉसिबिलिटीज
कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं, तो इस फील्ड में असीम संभावनाएं हैं। आप में लोगों की जरूरतों को पहचानने की क्षमता होनी चाहिए। एक यूजफुल एप्लीकेशन डेवलप करने के लिए क्रिएटिव माइंड होना जरूरी है। देखा जाए तो एप्स के डेवलपमेंट के पीछे कोई वर्चुअल कॉस्ट नहीं आती। एप्स को डेवलप करके आप उसे कंपनियों के एप स्टोर पर इंस्टॉलेशन के लिए रख सकते हैं। चाहें तो आप इसका लिमिटेड वर्जन फ्री और अनलिमिटेड वर्जन को पेड रख सकते हैं। ऐसा नहीं है कि यूजर पेड वर्जन नहीं खरीदते। यह एप की उपयोगिता पर निर्भर करता है। वहीं आप चाहें तो एप को पूरी तरह फ्री रख कर विभिन्न कंपनियों से उस पर विजुअल एड के लिए कॉन्टै्रक्ट कर सकते हैं। इसमें कमाई ग्राहक से न करके सीधे कंपनियों से एड के तौर पर कर सकते हैं। वहीं आप बतौर फ्रीलांस दूसरी कंपनियों के लिए भी एप डेवलप करके अर्निग शुरू कर सकते हैं। अधिकतर मोबाइल प्लैटफॉर्म कंपनियां रजिस्ट्रेशन फीस वसूलती हैं, जहां एपल एप स्टोर की सालाना फीस 99 डॉलर है, तो एंड्रॉयड 25 डॉलर लेता है। ब्लैकबेरी की वन टाइम फीस 100 डॉलर लेता है।
घर बैठे करें मार्केटिंग
इन दिनों ई-कॉमर्स का बूम है। वेब व‌र्ल्ड में करोडों वेबसाइट्स मौजूद हैं। रोज ही हजारों नई साइट्स, ब्लॉग लॉन्च हो रहे हैं। वेबसाइट, पोर्टल या ब्लॉग को लॉन्च करना तो बेहद आसान है, लेकिन सबसे बडी चुनौती है वेबसाइट, पोर्टल या ब्लॉग की मार्केटिंग। ऐसे में ऑनलाइन मार्केटिंग या इंटरनेट मार्केटिंग की भूमिका सामने आती है। अगर आपकी कम्युनिकेशन स्किल अच्छी है, इंग्लिश पर कमांड है और वेब टेक्नोलॉजी जानते हैं तो कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है। घर बैठे ही सेल्समैन बन सकते हैं।
क्या है इंटरनेट मार्केटिंग
सबसे पहले ट्रेडिशनल मार्केटिंग और ऑनलाइन मार्केटिंग के अंतर को समझें। ट्रेडिशनल मार्केटिंग में मार्केटिंग के ट्रेडिशनल तरीकों का इस्तेमाल होता है और ट्रेडिशनल मार्केटिंग न्यूजपेपर, रेडियो-टीवी, मैग्जीन और पंफलेट तक ही लिमिटेड रहती है। इसका दायरा भी सीमित है। इसकी तुलना में ऑनलाइन मार्केटिंग कई सारे ऑप्शन देती है, जो मार्केटिंग के परंपरागत एवं पुराने तरीके उपलब्ध नहीं करा पाते। इंटरनेट मार्केटिंग कंपनियों और कंज्यूमर्स को कनेक्ट करती है। इंटरनेट मार्केटिंग के जरिये वेब व‌र्ल्ड का रास्ता खुलता है, जो एक वेबसाइट या ब्लॉग की प्राइमरी रिक्वॉयरमेंट है।
क्या है एसईओ?
एसईओ यानी सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन। इसमें की-व‌र्ड्स का सहारा लिया जाता है और उन की-व‌र्ड्स को गूगल, याहू, बिंग आदि के सर्च इंजन पर ऑप्टिमाइज्ड किया जाता है। इससे वेबसाइट या ब्लॉग को रैंक मिलती है। यह रैंकिग जितनी ऊपर होगी, साइट पर ट्रैफिक उतना ही ज्यादा मिलेगा। इसमें पे पर क्लिक या पीपीसी का रोल भी अहम होता है।
वॉट इज एसएमएम?
एसएमएम यानी सोशल मीडिया मार्केटिंग, इसमें किसी सर्विस या प्रोडक्ट की सोशल नेटवर्क साइट्स, जैसे- फेसबुक, लिंक्ड-इन, यूट्यूब, ट्विटर और गूगल प्लस के जरिए मार्केटिंग की जाती है। इसमें इन साइट्स पर प्रोडक्ट या सर्विसेज का एक प्रोफाइल बनाया जाता है और कंटेंट को रोजाना अपडेट किया जाता है, ताकि अधिक से अधिक यूजर इसे लाइक करें। अगर आप इस मोड से मार्केटिंग करना चाहते हैं तो आपके लिए बेहतरीन विकल्प है।
डोमेन नेम से अर्रि्नग
डोमेन नेम एक परमानेंट वेब एड्रेस या यूआरएल है, जिसे यूजर ब्राउजर के एड्रेस बार में टाइप करके कोई विशेष वेबसाइट खोलते हैं।
स्टेप-1 : इंफॉर्मेशन इंपॉर्टेट
-पहले जानें कि कौन से डोमेन नेम की मार्केट में डिमांड है।
- क्रेडिट कार्ड, नेट बैंकिंग या डेबिट कार्ड होना जरूरी है।
- डोमेन नेम सेल-परचेज का एक फंडा है सस्ता खरीदें, रेट बढाकर बेच दें।
स्टेप-2 : क्रिएटिविटी जरूरी
सबसे कठिन है अपने मनमुताबिक डोमेन नेम सर्च करना। डिक्शनरी की मदद ले सकते हैं। ऑनलाइन सिनोनिम भी इसमें आपकी मदद कर सकता है। मार्केट में आने वाले नए प्रोडक्ट्स पर नजर रखें।
स्टेप-3 : कॉम या टीवी
सबसे पॉपुलर टीएलडी यानी टॉप-लेवल डोमेन .com,.net,.org, info और tv हैं। कंट्री कोड टीएलडी, जैसे- इंडिया का .in-, यूके का .uk भी चुन सकते हैं। हालांकि सबसे पॉपुलर .com ही है। इसके अलावा कंपनी और प्रोफाइल के मुताबिक coke.cold या bottle.coke जैसे नाम भी रजिस्टर कर सकेंगे। स्टेप-4 : पार्क करें डोमेन अगर आपके पास अच्छा डोमेन नेम है और चाहते हैं कि लोग उस पर विजिट करें तो अपने डोमेन को पार्क कर सकते हैं। इस सर्विस में एक एडवरटाइजर लिंक होगा, जो डोमेन को पॉपुलर करने में मदद करेगा। जैसे ही लोग डोमेन पर विजिट करेंगे और लिंक पर क्लिक करेंगे तो बदले में पार्किंग कंपनी से कुछ पैसे कमा सकते हैं। www.sedo.com और www.fabulous.com जैसी साइट्स पर डोमेन पार्क कर सकते हैं। स्टेप-5 : डेवलप करें डोमेन पार्किंग के अलावा डोमेन डेवलप करना भी अच्छा ऑप्शन है। लॉन्ग रन में आप बेहतर प्रॉफिट ले सकते है। इस स्टेप में आप अपनी एक छोटी वेबसाइट और कंटेंट क्रिएट कर सकते हैं या फ्री ओपनसोर्स सॉफ्टवेयर जैसे वर्डप्रेस के साथ मिलकर ब्लॉग शुरू कर सकते हैं। स्टेप-6 : बेचें डोमेन इंटरनेट पर ऐसी बहुत सी वेबसाइट्स हैं, जहां आप अपना डोमेन सेल के लिए रख सकते हैं। अगर कोई इन्वेस्टर आपका डोमेन नेम परचेज करना चाहता है तो आप उससे मनमुताबिक प्राइस ले सकते हैं। -namepros.com, dnforum.com,sedo.com, afternic.com, greatdomains.com पर जाकर रजिस्टर करा सकते हैं। किंग ऑफ स्टॉक मार्केट फाइनेंस में इंट्रेस्ट है और रिस्क लेने के लिए तैयार हैं तो ऑनलाइन ट्रेडिंग से स्टॉक मार्केट में बेशुमार दौलत कमा सकते हैं। इस मार्केट का एक फंडा है ÒBuy on rumor and sell on news.Ó स्टॉक मार्केट के स्पेशलिस्ट्स के मुताबिक अगर आप कोई स्टॉक खरीदना चाहते हैं, तो पहले अफवाहों पर ध्यान दें और जिस दिन वह पक्की हो जाए उस दिन स्टॉक बेच दें। रुपये की वैल्यू गिरने लगे या डॉलर की बढने लगे या फिर इंटरनेशनल मार्केट में पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के प्राइज बढने लगें अथवा आरबीआई अपनी क्रेडिट पॉलिसी में इंट्रेस्ट रेट बढा या घटा दे, तो इन सभी का असर स्टॉक मार्केट पर पडता है। अगर आइटी कंपनियों के रिजल्ट अच्छे आते हैं तो स्टॉक मार्केट पर प्रभाव पडता है। यहां तक कि बाढ या सूखा या बारिश कम होने के अनुमान पर भी शेयर मार्केट बढ या गिर सकता है।
ऑनलाइन ट्रेडिंग का क्रेज
स्पीड और ट्रांसपेरेंसी के चलते ऑनलाइन ट्रेडिंग का क्रेज बढ रहा है। ट्रेडीशनल ट्रेडिंग में डीलर को फोन करने, ऑर्डर देने और उसे पूरा कराने में लगने वाला टाइम इसमें बचता है। ऑनलाइन ट्रेडिंग में कस्टमर को अपनी इच्छा से मार्केट में एंट्री और एग्जिट की आजादी है। इसमें सौदों पर कंट्रोल मिलता है, प्राइवेसी मिलती है और जब चाहें अपना पोर्टफोलियो देखने की फैसेलिटी।
कुछ टिप्स ट्रेडिंग से पहले
- शेयर मार्केट में सीधे एंट्री न करें।
- पहले बिजनेस न्यूज की समझ डेवलप करें।
- शुरुआत में शेयर खरीदने से पहले उसे ट्रैक करें।
- एनएसई और बीएसई की वेबसाइट पर डेली की डिलीवरीज या सौदों पर नजर रखें।
- जिस शेयर को ट्रैक कर रहे हैं उससे रिलेटेड न्यूज पर नजर रखें।
- अपने प्रॉफिट या लॉस की कैलकुलेशन रखें।
- ज्यादा मार्जिन के पीछे न पडें, ज्यादा लालच कभी-कभी भारी भी पड सकता है।
- एक खास बात और, शुरुआत कम इनवेस्टमेंट से शुरुआत करें। सारा पैसे एक ही स्टॉक पर न लगाएं। शेयरों की वैरायटी रखें।
ऑनलाइन रिसर्च जॉब
ऑनलाइन रिसर्च के लिए राइटिंग या प्रोग्रामिंग जैसी स्किल्स जरूरी नहीं हैं और न ही किसी खास फील्ड या इंफॉर्मेशन की जरूरत है। ऑनलाइन रिसर्च उन लोगों के लिए है, जिनके पास टाइम कम है। असल में ये नॉलेज या इन्फॉर्मेशन बेस्ड सर्विस है, जहां आप अपने स्किल्स या एक्सपीरियंस यूज कर मनी मेकिंग कर सकते हैं।
कैसे करते हैं काम
लोगों की रुचि और विशेषज्ञता अलग-अलग होती है। आप किसी सब्जेक्ट के स्पेशलिस्ट हैं तो उसे ऑफिस वर्क तक सीमित न रखें, उस सब्जेक्ट में दूसरों को एडवाइज दे पैसे कमा सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी क्लाइंट को गोल्फ पर ईबुक लिखनी है, लेकिन उसके पास रिसर्च के लिए टाइम नहीं है, तो वह जॉब ऑनलाइन रिसर्च कंपनी को सौंप देता है। अब आपकी जिम्मेदारी होगी कि क्लाइंट के लिए इन्फॉर्मेशन इंटरनेट पर सर्च करें। कई बार क्लाइंट को मीटिंग से पहले किसी सब्जेक्ट पर प्रेजेंटेशन बनानी होती है, लेकिन टाइम नहीं है तो ऑनलाइन रिसर्च एजेंसी के जरिए यह कर सकते हैं। आपकी जिम्मेदारी होगी कि यह काम तय समय सीमा के भीतर हो और इन्फॉर्मेशन ऑथेंटिक हो। कुछ ऑनलाइन ऑन्सर्स साइट्स में लोग कंप्यूटिंग, शॉपिंग, एंटरटेनमेंट, लीगल या फूड जैसे टॉपिक्स पर क्वैश्चन पूछते हैं, आप अपनी फील्ड से रिलेटेड क्वैश्चन का आंसर देकर पैसे कमा सकते हैं।
शुरुआत कैसे करें
ऑनलाइन रिसर्च एजेंसीज की हेल्प से स्टार्टिग कर सकते हैं। कुछ एजेंसीज अपनी टीम का हिस्सा बनाने के लिए टेस्ट भी लेती हैं, जो प्रोफाइल के मुताबिक होता है। टेस्ट क्वालिफाई करने के बाद टीम का हिस्सा बन सकते हैं। वहीं प्लेसमेंट वेबसाइट्स पर भी ऑनलाइन रिसर्च जॉब्स पर नजर रख सकते हैं।
इनका ध्यान रखें
- इस फील्ड में कमिटमेंट, डेडिकेशन और रेस्पॉन्सिबिलिटी होनी चाहिए।
- जो भी सब्जेक्ट चुनें, उसमें स्पेशलाइजेशन हो।
- रिसर्च वर्क में इन्फॉर्मेशन ठीक-ठीक दें।
यू ट्यूब बनाएं मालामाल
यूट्यूब पार्टनरशिप प्रोग्राम के तहत अपना वीडियो शेयर कर यूट्यूब के साथ बतौर कंटेंट पार्टनर कमाई कर सकते हैं। अगर आप रेग्युलर बेसिस पर ओरिजनल और हाई क्वॉलिटी वीडियो शूट करके उन्हें यूट्यूब पर अपलोड करेंगे, तो कंपनी उस वीडियो पर ऐड्स से होने वाली कमाई में आपको पार्टनर बनाएगी। साथ ही यूट्यूब वीडियोज को ऑनलाइन डिस्ट्रीब्यूट कर उनसे कमाई का मौका भी आपको देगा। इसके लिए यूजर को पहले www.youtube.com/yt/partners पर जाकर यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम के लिए अप्लाई करना होगा। अगर यूट्यूब को आपके वीडियोज पसंद आ गए, तो वह आपको इस प्रोग्राम का हिस्सा बना लेगा।
यूट्यूब चैनल का नाम
इसके लिए यूट्यूब की वेबसाइट पर फ्री अकाउंट में जाकर रजिस्ट्रेशन करें। नाम चुनने में सावधानी बरतें। रेंडम नाम के बजाय ऐसा नाम चुनें, जिसे लोग आसानी से याद कर सकें। नेम वर्क से मैच करना चाहिए। यूट्यूब पर वीडियोज बनाने के दो तरीके हैं। या तो आप प्रोफेशनल कैमरा या हाई मेगापिक्सल वाला कैमरा या फिर एचडी कैमरा यूज कर सकते हैं। आजकल स्मार्टफोन में एचडी रिकॉर्डिग की फैसेलिटी है, जिसके बाद रेग्युलर लाइफ में विडियोज शूट कर सकते हैं। अगर कैमरा नहीं है, तो पीसी पर ही अलग-अलग सॉफ्टवेयर्स के ट्यूटोरियल्स वीडियोज बना सकते हैं।
बनाएं हिट वीडियो
यूट्यूब पर वे वीडियोज अपलोड करें, जिन्हें लोग देखना और सुनना पसंद करते हैं। इसके लिए पहल खुद से करें। आपका वीडियो कोई दूसरा क्यों देखे, उसमें क्या खूबी है। लोगों को हंसाने के लिए आप ह्यूमर वीडियोज शूट कर सकते हैं या फिर डॉक्यूमेंट्री भी अपलोड कर सकते हैं। वीडियो को विंडो मूवी मेकर की मदद से एडिट कर सकते हैं।
टीआरपी कैसे बढाएं
जैसे टीवी पर अच्छा प्रोग्राम क्यों न हो लेकिन अगर दर्शक नहीं हैं तो वह बेकार है, कुछ ऐसा ही यहां पर भी है। इसके लिए फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन या दूसरे सोशल नेटवकर्स पर प्रोफाइल बनाकर उनकी मार्केटिंग कर सकते हैं। वहीं यूट्यूब का फ्री सॉफ्टवेयर Viewet भी है, जो आपकी मार्केटिंग में मदद कर सकता है।
ई-ट्यूटर बनेगा फ्यूचर
अब वक्त ई-ट्यूटर का है, जिसने मनुष्यों द्वारा बनाई सीमाओं को तोड दिया है। घर में बैठे-बैठे दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे स्टूडेंट को ऑनलाइन पढा सकते हैं। ट्यूटर का नया ऑनलाइन अवतार एजुकेशन क्षेत्र में रिवॉल्यूशन है और अब स्टूडेंट्स ऑनलाइन ट्यूशन के लिए रजिस्ट्रेशन करा रहे हैं। ई-ट्यूटरिंग नॉलेज प्रॉसेस आउटसोर्सिंग (केपीओ) का एक हिस्सा है, जो दूर बैठे शिक्षक और छात्र के बीच कांटैक्ट बनाता है।
क्या है ई-ट्यूटरिंग
ई-ट्यूटर ने ट्रेडिशनल एजुकेशन को चेंज किया है। यह स्टूडेंट्स और टीचर के लिए नया एक्सपीरियंस है, जहां स्टूडेंट वर्चुअली टीचर के साथ इंटरैक्शन कर सकते हैं साथ ही कंफर्टेबल होकर पढाई भी करते हैं। ई-ट्यूटरिंग दो तरह की होती है-
लाइव ई-ट्यूटरिंग : यह पूरी तरह से एक वर्चुअल क्लासरूम होता है, जहां वर्चुअल टूल, व्हाइटबोर्ड और चैटिंग सुविधा होती है।
ऑनलाइन राइटिंग लैब :  इसमें स्टूडेंट्स ट्यूटर को अपनी प्रॉब्लम्स ड्राफ्ट करके भेज देते हैं और तय वक्त में ट्यूटर को रेस्पॉन्स करना होता है।
रिक्वॉयरमेंट्स
क्रिएटिव और एक्सपेरिमेंटल लोगों के लिए ऑनलाइन ट्यूशन ऑप्शन बेस्ट है। वहीं परफेक्शन के बाद जरूरी है टीचिंग ऑफ मेथडोलॉजी और गुड कम्युनिकेशन स्किल्स। अगर वर्किंग टाइम में फ्लैक्सिबिलिटी है तो क्रॉस कंट्री स्टूडेंट्स भी इसका बेनिफिट उठा सकते हैं। साथ ही अगर कुछ टीचिंग एक्सपीरियंस है तो यह सोने पर सुहागा होगा। इसे पार्ट टाइम और फुल टाइम दोनों तरह से अपना सकते हैं। एक्सपीरियंस और प्रोफिशियंसी लेवल पर ट्यूटर 15 हजार से 20 हजार तक फुलटाइम अर्न कर सकते हैं, वहीं 150 रुपये से 500 रुपये प्रति घंटे तक पार्ट टाइम कमा भी सकते हैं।
टिप्स
- ट्यूटर बनने के लिए सब्जेक्ट पर कमांड होनी चाहिए। टेक्निकल कंपीटेंसी हो। अपने बॉयोडाटा में वर्क एक्सपीरियंस और कम्यूनिकेशन स्किल्स को शामिल करें।
- टीचिंग एप्टीट्यूड और कंप्यूटर नॉलेज आगे बढाएगा।
- अपनी एक वेबसाइट भी तैयार करा लें।
- स्टूडेंट आपका ट्रायल भी ले सकते हैं। इसके लिए तैयार रहें।
पेड राइटिंग से अर्रि्नग
अगर ब्लॉग को मेनटेन करने में प्रॉब्लम होती है, लेकिन राइटिंग पैशन को बनाए रखना चाहते हैं, तो दूसरे ब्लॉग्स या साइट्स जैसे वेबलॉग्स पर लिखकर मनी अर्न कर सकते हैं। अनएम्प्लॉयड वर्कर्स के लिए पेड राइटिंग जॉब्स मनी अर्निंग का बेस्ट ऑप्शन है, क्योंकि पेड राइटिंग जॉब्स के लिए न तो किसी एक्सपीरियंस हिस्ट्री की जरूरत होती है और न ही डिग्री-डिप्लोमा या स्पेशल ट्रेनिंग की।
क्या है पेड राइटिंग जॉब
पेड राइटिंग फ्रीलांस जॉब है, जिसमें अपनी सहूलियत के मुताबिक काम कर सकते हैं। फ्रीलांस राइटर होने के नाते क्लाइंट की जरूरत के मुताबिक आर्टिकल लिखने होते हैं। फ्रीलांस राइटर के लिए सबसे जरूरी है लैंग्वेज नॉलेज और गुड कंटेंट क्वॉलिटी, क्योंकि कंटेंट इज किंग। क्रिएटिविटी अच्छी होगी तो बेहतर आउटपुट दे पाएंगे।
स्टेप-1 : हाऊ टु स्टार्ट
नए राइटर्स को पहले किसी राइटिंग या पब्लिशिंग वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन कराना होता है। कुछ कंपनियां राइटिंग के सैंपल मांगती हैं तो इसके लिए राइटर को कुछ आर्टिकल लिखकर अपलोड करने होते हैं। वहीं कुछ मामलों में राइटर्स को अपफ्रंट पेमेंट यानी अग्रिम भुगतान भी दिया जाता है। लेकिन यह कंटेंट और राइटिंग क्वॉलिटी पर निर्भर करता है। वहीं कुछ वेबसाइट्स परफॉरमेंस के मुताबिक पे करती हैं। यानी कि अगर आर्टिकल पब्लिश होने के बाद साइट पर व्यूवर बढ जाते हैं तो अच्छी मनी मिल जाती है।
स्टेप-2 : टाइप ऑफ वर्क
असाइनमेंट्स : ये अपफ्रंट पेमेंट वाली जॉब्स हैं। इसमें क्लाइंट के मुताबिक कंटेंट डेवलप करना होता है।
राइटर च्वाइस :  इसमें राइटर को कोई बंदिश नहीं होती, अपनी हॉबी के मुताबिक वह आर्टिकल लिख सकता है।
स्टेप-3 : स्मार्ट टिप्स
- ऐसी साइट्स सलेक्ट करें जिन पर ऐड आता हो।
- पसंद के मुताबिक टॉपिक का सलेक्शन करें।
- इंटरनेट से दूसरों के आर्टिकल्स कॉपी न करें।
- सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन या दूसरे तरीकों से अपने आर्टिकल को प्रमोट करें।
- असाइनमेंट्स को तय वक्त में पूरा करें और राइटिंग स्पीड पर जोर दें।
- पेड राइटिंग साइट के नियमों एवं शतरें को ध्यान से अवश्य पढ लें।
टॉक मोर अर्न मोर
कभी आपने बात करने के लिए किसी कंपनी को कॉल की हो और फोन उठाने वाले पर रिप्रजेंटेटिव से बात हुई हो, हो सकता है कि वह इनबाउंड कॉल सेंटर एजेंट हो।
क्या है होम इनबाउंड कॉल सेंटर एजेंट
कंपनियां इन्क्वायरी या कस्टमर रिलेटेड कॉल्स को अटैंड करने के काम को आउटसोर्स कर देती हैं। यहीं से इनबाउंड कॉल सेंटर एजेंट के काम की शुरुआत होती है।
कैसे बनाएं होम इनबाउंड कॉल सेंटर
आज कंपनियां आउटसोर्सिग को प्रिफरेंस दे रही हैं। अगर घर में ही इनबाउंड कॉल सेंटर खोलना चाहते हैं तो ऐसी कंपनियों की तलाश करें। वहीं इस काम में इंटरनेट पर जॉब सर्च साइट्स की भी मदद ले सकते हैं। इसके अलावा आप बिजनेस का‌र्ड्स बनाकर ऐसी कंपनियों में विजिट करना भी शुरू कर सकते हैं।
रिक्वॉयरमेंट्स
- एक अच्छी कन्फिगरेशन वाला पीसी होना चाहिए।
- इंटरनेट कनेक्शन जरूरी है, क्योंकि अधिकांश कम्यूनिकेशन ईमेल पर होता है।
- टेलीफोन लाइन हो, कंपनियां मोबाइल से ज्यादा फोन को प्रिफरेंस देती हैं।
- टेलीफोन एटिकेट्स रिक्वायरमेंट मस्ट होती है।
- अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड जरूरी है।
- अगर विदेशी भाषा जानते हैं तो बेस्ट है।
- प्रॉब्लम सॉल्विंग कैपिसिटी
करें ब्लॉग से अर्निग
गूगल एडसेंस के लिए सबसे पहले जीमेल एकाउंट बनाएं। एडसेंस सिर्फ जीमेल को सपोर्ट करता है। अगर आपके पास ब्लॉग या वेबसाइट नहीं है तो गूगल ब्लॉग या blogspot.com पर अपना ब्लॉग बना सकते हैं। इसके अलावा वेबसाइट बनाने के लिए weebly.com, webhost.com या adlandpro.com जैसी साइट्स पर जाकर फ्री टूल्स के जरिये वेबपेज क्रिएट कर सकते हैं। गूगल को पिक्चर्स या वीडियोज के मुकाबले कंटेंट पसंद है, क्योंकि सभी एड पिक्चर्स की बजाय शब्दों से संबंधित होते हैं। कीवर्ड सॉॅफ्टवेयर का यूज करें तो बेहतर होगा। ऑरिजनल कंटेंट का इस्तेमाल करें। इस बात का ध्यान रखें कि दूसरी वेबसाइट्स या ब्लॉग से कंटेंट कॉपी न करें। क्वालिटी कंटेंट अगर खरीद सकते हैं, तो बढिया रहेगा। ध्यान रखें कि गूगल पोर्न, कसिनो या गैंबलिंग, ड्रग या हैकिंग साइट्स को सपोर्ट नहीं करता है। एडसेंस सिर्फ इंग्लिश कंटेंट को रजिस्टर करता है। अन्य भाषाओं जैसे हिन्दी पर यह काम नहीं करता।
करें रजिस्ट्रेशन
अब adsense.google.com पर रजिस्ट्रेशन कराएं। सही-सही इनफॉरमेशन भरें।
डोन्ट डू दिस
- अपने ब्लॉग पर लगे एडसेंस पर खुद क्लिक न करें। न ही अपने फ्रेंड्स, फैमिली या पडोसियों को एड पर क्लिक करने के लिए प्रमोट करें।
- ब्लॉग पर एडसेंस के प्रतिस्पर्धी का एड लगाने से बचें।
- पेटू रिव्यू या पीटीआर का यूज न करें।
- एड्स पर क्लिक करने के बदले किसी तरह के इन्सेन्टिव्स का यूज न करें।
- ब्लॉग या वेबपेज पर ट्रैफिक बढाने के लिए किसी सॉफ्टवेयर का यूज न करें।
कैसे करता है काम
गूगल दूसरी कंपनियों के विज्ञापनों को अपने लाखों रजिस्टर्ड मेंबर्स की वेबसाइट्स या ब्लॉग पर पब्लिश कर देता है। जब भी उन विज्ञापनों पर कोई क्लिक करता है तो उस क्लिक के एवज में गूगल को उसके गूगल एडव‌र्ड्स प्रोग्राम के तहत उसके कस्टमर्स से पैसे मिलते हैं। क्लिक के बदले मिली रकम का एक छोटा-सा हिस्सा गूगल अपने उस रजिस्टर्ड मेंबर्स को भी देता है, जिसकी वेबसाइट या ब्लॉग में पब्लिश विज्ञापन पर क्लिक किया गया था।
इनपुट : गुडगांव से प्रियंका दुबे मेहता, ग्रेटर नोएडा से मनीष तिवारी, जम्मू से योगिता यादव, जालंधर से वंदना वालिया बाली, पटना से ठाकुर गौतम कात्यायन, फरीदाबाद से अमित भाटिया।

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