जैनेटिक्स
(आनुवांशिकी) एक ऐसा विज्ञान है जो वंशानुगत संबंध का अध्ययन करता है।
इसमें माता-पिता और उनके बच्चों के बीच समानता तथा भिन्नता जैसे विभिन्न
तथ्यों पर गौर तथा उनका पता लगाया जाता है। जैनेटिक्स के तहत हम पौधों और
जानवरों के वंशानुगत गुणों का भी अध्ययन करते हैं।
जैनेटिक्स पर गंभीर शोध पिछली 2 सदियों के दौरान हुए हैं। 1860 में एक ऑस्ट्रियन पादरी एवं वैज्ञानिक ग्रेगर जॉन मैंडल ने मटर के पौधों पर कई प्रयोग किए और कुछ निष्कर्ष निकाले। इन निष्कर्षों के आधार पर उन्होंने दावा किया कि कुछ गुण वंशानुगत होते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में चले जाते हैं।
डैनिश जीव विज्ञानी विल्हैम जोहन्सन ने इन्हें जींस कहा। अब यह पता चल चुका है कि जींस न सिर्फ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशानुगत गुण पहुंचाते हैं बल्कि साथ ही जीवन की सभी प्रक्रियाओं को नियंत्रित भी ये ही करते हैं। 1910 में एक अमेरिकन जैनेटिसिस्ट थामस हंट मार्गन ने साबित किया कि जींस हमारे क्रोमोसोम्स (गुणसूत्रों) में होते हैं तथा ये क्रोमोसोम्स के साथ ही अगली पीढ़ी के बच्चों में पहुंचते हैं। इसके बाद एडवर्ड टैटम, हरगोबिंद खुराना और अन्य वैज्ञानिकों ने जैनेनिक्स साइंस के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वैज्ञानिकों ने न्यूक्लिक एसिड्स (डी.एन.ए. व आर.एन.ए.) की खोज की जिनसे जीवाणुओं के गुणों का निर्धारण हो सका।
आज अनाजों व पौधों की काफी अच्छी तथा उपजाऊ प्रजाति को जैनेटिक तरीके से उगाया जा रहा है। और तो और जानवरों की बढिय़ा नस्ल को भी इसी तरीके से तैयार किया जा रहा है। इस शोध को ‘जैनेटिक इंजीनियरिंग’ कहते हैं जो जीव विज्ञान की आधुनिक शाखा बन चुकी है।
जैनेटिक इंजीनियरिंग की सहायता से किसी भी जीव की आनुवांशिक संरचना को बदला जा सकता है। आधुनिक जैनेटिक इंजीनियरिंग में जीन्स को हटाना, उनकी खोज तथा उनके स्थानांतरण जैसे विषय भी शामिल हैं। माइक्रो सर्जरी भी इसका ही एक विषय है। वैज्ञानिकों को इस क्षेत्र में कई नई सफलताएं भी मिली हैं।
किसी जानवर की कोशिकाओं में से लिए गए डी.एन.ए. को बैक्टीरिया की कोशिकाओं में से लिए गए डी.एन.ए. से मिला दिया जाए तो उससे इंसुलिन बनाया जा सकता है जिसकी जरूरत डायबिटीज के रोगियों को हमेशा रहती है। इतना ही नहीं जैनेटिक स्क्रीनिंग से कई बीमारियों का पता लगाया जा सकता है। हैमोफीलिया जैसी बीमारियां और खून में कमी आदि का पता गर्भ में ही जैनेटिक काऊंसलर द्वारा लगाया जा सकता है। यदि ऐसी वंशानुगत बीमारियों का जन्म से पहले ही पता चल जाए तो डॉक्टर बच्चे का इलाज अधिक प्रभावी ढंग से कर सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि जन्म के तुरंत बाद ही उसका उपचार शुरू कर दिया जाए।
जैनेटिक्स के जनक ग्रेगर जॉन मैंडल
वह जर्मन भाषी ऑस्ट्रियाई औगस्टेनियन पादरी एवं वैज्ञानिक थे। उन्हें आनुवांशिकी का जनक माना जाता है। उन्होंने मटर के दानों पर प्रयोग कर आनुवांशिकी के मूल नियम निर्धारित किए थे परंतु उनकी खोज तथा इसके महत्व को 20वीं सदी तक पहचान नहीं मिल सकी थी।
मोराविया (अब चैकोस्लोवाकिया में) के एक साधारण परिवार में 20 जुलाई 1822 को जन्मे ग्रेगर एक साधारण किसान परिवार से थे। बचपन से ही पिता के साथ खेतों में जाने वाले ग्रेगर के मन में पौधों के बारे में तरह-तरह की जिज्ञासाएं उठा करती थीं। उनके पिता के पास उनके सवालों के जवाब तो नहीं थे परंतु उन्होंने गरीबी के बावजूद ग्रेगर को कॉलेज की उच्च शिक्षा दिलवाई। 21 वर्ष की उम्र में ग्रेगर एक मठ में दाखिल हो गए। जहां वह धर्म से लेकर विज्ञान तक हर विषय पर चर्चा में हिस्सा लिया करते थे।
पौधों संबंधी उनकी रुचि को देखते हुए उन्हें मठ के बगीचे का प्रधान बना दिया गया। बाद में विज्ञान में उनकी रुचि देख कर मठ ने उन्हें दो वर्ष तक विज्ञान का अध्ययन करने के लिए वेनिस विश्वविद्यालय भेज दिया।
पौधों पर अध्ययन करने के लिए उन्होंने मटर का चुनाव किया क्योंकि ये आसानी से उगते थे जिससे इनकी कई पीढिय़ों का अध्ययन करना सम्भव था। उन्होंने 10 हजार के करीब मटर के पौधों पर प्रयोग करके साबित किया कि मटर के पौधों का आपस में आनुवांशिक संबंध है जिससे आनुवांशिकी की नींव पड़ी।
परंतु 6 जनवरी 1884 में उनकी मृत्यु के बाद उनके प्रयोग तथा खोज को भुला दिया गया। करीब 30 साल बाद उनकी खोज का कुछ वैज्ञानिकों ने दोबारा अध्ययन करने पर पाया कि वे कितनी सटीक हैं और आनुवांशिकी के मूल सिद्धांतों के बारे में दुनिया को पता चला जिन पर आगे चल कर और खोज हुई।
जैनेटिक्स पर गंभीर शोध पिछली 2 सदियों के दौरान हुए हैं। 1860 में एक ऑस्ट्रियन पादरी एवं वैज्ञानिक ग्रेगर जॉन मैंडल ने मटर के पौधों पर कई प्रयोग किए और कुछ निष्कर्ष निकाले। इन निष्कर्षों के आधार पर उन्होंने दावा किया कि कुछ गुण वंशानुगत होते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में चले जाते हैं।
डैनिश जीव विज्ञानी विल्हैम जोहन्सन ने इन्हें जींस कहा। अब यह पता चल चुका है कि जींस न सिर्फ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशानुगत गुण पहुंचाते हैं बल्कि साथ ही जीवन की सभी प्रक्रियाओं को नियंत्रित भी ये ही करते हैं। 1910 में एक अमेरिकन जैनेटिसिस्ट थामस हंट मार्गन ने साबित किया कि जींस हमारे क्रोमोसोम्स (गुणसूत्रों) में होते हैं तथा ये क्रोमोसोम्स के साथ ही अगली पीढ़ी के बच्चों में पहुंचते हैं। इसके बाद एडवर्ड टैटम, हरगोबिंद खुराना और अन्य वैज्ञानिकों ने जैनेनिक्स साइंस के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वैज्ञानिकों ने न्यूक्लिक एसिड्स (डी.एन.ए. व आर.एन.ए.) की खोज की जिनसे जीवाणुओं के गुणों का निर्धारण हो सका।
आज अनाजों व पौधों की काफी अच्छी तथा उपजाऊ प्रजाति को जैनेटिक तरीके से उगाया जा रहा है। और तो और जानवरों की बढिय़ा नस्ल को भी इसी तरीके से तैयार किया जा रहा है। इस शोध को ‘जैनेटिक इंजीनियरिंग’ कहते हैं जो जीव विज्ञान की आधुनिक शाखा बन चुकी है।
जैनेटिक इंजीनियरिंग की सहायता से किसी भी जीव की आनुवांशिक संरचना को बदला जा सकता है। आधुनिक जैनेटिक इंजीनियरिंग में जीन्स को हटाना, उनकी खोज तथा उनके स्थानांतरण जैसे विषय भी शामिल हैं। माइक्रो सर्जरी भी इसका ही एक विषय है। वैज्ञानिकों को इस क्षेत्र में कई नई सफलताएं भी मिली हैं।
किसी जानवर की कोशिकाओं में से लिए गए डी.एन.ए. को बैक्टीरिया की कोशिकाओं में से लिए गए डी.एन.ए. से मिला दिया जाए तो उससे इंसुलिन बनाया जा सकता है जिसकी जरूरत डायबिटीज के रोगियों को हमेशा रहती है। इतना ही नहीं जैनेटिक स्क्रीनिंग से कई बीमारियों का पता लगाया जा सकता है। हैमोफीलिया जैसी बीमारियां और खून में कमी आदि का पता गर्भ में ही जैनेटिक काऊंसलर द्वारा लगाया जा सकता है। यदि ऐसी वंशानुगत बीमारियों का जन्म से पहले ही पता चल जाए तो डॉक्टर बच्चे का इलाज अधिक प्रभावी ढंग से कर सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि जन्म के तुरंत बाद ही उसका उपचार शुरू कर दिया जाए।
जैनेटिक्स के जनक ग्रेगर जॉन मैंडल
वह जर्मन भाषी ऑस्ट्रियाई औगस्टेनियन पादरी एवं वैज्ञानिक थे। उन्हें आनुवांशिकी का जनक माना जाता है। उन्होंने मटर के दानों पर प्रयोग कर आनुवांशिकी के मूल नियम निर्धारित किए थे परंतु उनकी खोज तथा इसके महत्व को 20वीं सदी तक पहचान नहीं मिल सकी थी।
मोराविया (अब चैकोस्लोवाकिया में) के एक साधारण परिवार में 20 जुलाई 1822 को जन्मे ग्रेगर एक साधारण किसान परिवार से थे। बचपन से ही पिता के साथ खेतों में जाने वाले ग्रेगर के मन में पौधों के बारे में तरह-तरह की जिज्ञासाएं उठा करती थीं। उनके पिता के पास उनके सवालों के जवाब तो नहीं थे परंतु उन्होंने गरीबी के बावजूद ग्रेगर को कॉलेज की उच्च शिक्षा दिलवाई। 21 वर्ष की उम्र में ग्रेगर एक मठ में दाखिल हो गए। जहां वह धर्म से लेकर विज्ञान तक हर विषय पर चर्चा में हिस्सा लिया करते थे।
पौधों संबंधी उनकी रुचि को देखते हुए उन्हें मठ के बगीचे का प्रधान बना दिया गया। बाद में विज्ञान में उनकी रुचि देख कर मठ ने उन्हें दो वर्ष तक विज्ञान का अध्ययन करने के लिए वेनिस विश्वविद्यालय भेज दिया।
पौधों पर अध्ययन करने के लिए उन्होंने मटर का चुनाव किया क्योंकि ये आसानी से उगते थे जिससे इनकी कई पीढिय़ों का अध्ययन करना सम्भव था। उन्होंने 10 हजार के करीब मटर के पौधों पर प्रयोग करके साबित किया कि मटर के पौधों का आपस में आनुवांशिक संबंध है जिससे आनुवांशिकी की नींव पड़ी।
परंतु 6 जनवरी 1884 में उनकी मृत्यु के बाद उनके प्रयोग तथा खोज को भुला दिया गया। करीब 30 साल बाद उनकी खोज का कुछ वैज्ञानिकों ने दोबारा अध्ययन करने पर पाया कि वे कितनी सटीक हैं और आनुवांशिकी के मूल सिद्धांतों के बारे में दुनिया को पता चला जिन पर आगे चल कर और खोज हुई।