फीलगुड का मर्म जाननें के अनसुलझे रहस्य

1992 के बार्सीलोना समर ओलिम्पिक संपन्न होने के बाद कार्नेल यूनिवसिर्टी के शोधकर्ताओं ने गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मैडल जीतने वाले खिलाडिय़ों पर अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने की कोशिश की कि मैडल जीतने के बाद इन खिलाडिय़ों पर क्या प्रभाव पड़ा? इसके लिए उन्होंने खिलाडिय़ों के इंटरव्यू के टी.वी. फुटेज का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि गोल्ड मैडल जीतने वाले खिलाड़ी ज्यादा खुश थे।

आप कह सकते हैं कि इसमें नया क्या है? उन्होंने अध्ययन के दौरान एक और चीज देखी जो  हैरान करने वाली थी। ब्रॉन्ज मैडल जीतने वाले सिल्वर मैडल जीतने वालों से ज्यादा खुश थे। यह कैसे हो सकता है कि तीसरे स्थान पर आने वाले खिलाड़ी दूसरे स्थान के खिलाडिय़ों से ज्यादा खुश हो सकते हैं? मनोवैज्ञानिक अपनी भाषा में इसे ‘प्रति तथ्यात्मक सोच’ की संज्ञा देते हैं। आम बोलचाल की भाषा में कहें तो ‘प्रतितथ्यात्मक सोच’ यानी जब हम अपनी तुलना ऐसे व्यक्ति से करते हैं जिसने सफर तो साथ शुरू किया था लेकिन हम उससे आगे निकल गए। प्रतितथ्यात्मक सोच हमें फील गुड कराती है उस तुलना में जहां हम खड़े हैं और आने वाले समय में जहां हम होंगे।

यह हमें बुरा भी अनुभव कराती है। जब हम यह सोचते हैं कि हम कहां थे और कहां पहुंचे? क्या हम वहीं पहुंचे जहां हमें होना चाहिए था? हम कई तरह की तुलना करते हैं कि हम अभी कहां हैं और आने वाले समय में कहां होंगे। दोनों ही रूप में चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक।

सिल्वर मैडल पाने वाले खिलाडिय़ों की बात करें तो उन्होंने अपनी तुलना गोल्ड मैडल पाने वाले खिलाडिय़ों से की। परिणामस्वरूप वे इस निष्कर्ष  पर पहुंचे कि अगर उन्होंने और मेहनत के साथ तैयारी की होती तो वे गोल्ड मैडल जीत सकते थे या उन्होंने थोड़ी और अच्छी शुरुआत की होती तो वे प्रथम आ सकते थे। सिल्वर मैडल पाने वालों ने इस बात पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की उन्होंने जो किया उससे गोल्ड जीत सकते थे। वहीं कांस्य पदक जीतने वाले खिलाडिय़ों ने अपनी तुलना उन लोगों से की जिन्होंने कोई पदक नहीं जीता था। इसलिए वे ज्यादा खुश थे और गोल्ड मैडल पाने वाले इसलिए खुश थे कि उनसे आगे कोई नहीं था।

यही बातें हमारे सामान्य जीवन में भी लागू होती हैं। जब हम अपनी तुलना ऐसे लोगों से करते हैं जो हमसे ज्यादा सफल हैं तो हमें निराशा हाथ लगती है और हम उस सफलता का भी आनंद नहीं उठा पाते जो हमारे पास है।  वहीं, हम अपनी तुलना उन लोगों से करते हैं जिन्होंने सफर की शुरुआत तो हमारे साथ की थी लेकिन वे पीछे रह गए और हम आगे निकल गए। जब भी आप हताश हों, आपको दुख का अनुभव हो तो उनके बारे में सोचें जिनके पास आपकी तुलना में कुछ भी नहीं है फिर भी वे खुश हैं और जिन्दगी  मजे से जी रहे हैं।

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