अपने चमकदार भविष्य की राह में छाए अंधकार को दूर करें

एक बार मैं गाड़ी से सफर कर रहा था कि एक स्टेशन पर छ सिपाही उसी डिब्बे में चढ़े जिसमें मैं बैठा था। उनके साथ तीन व्यक्ति थे जिन्हें हथकड़ियां लगी हुई थी। दो सिपाही मेरे सामने की सीट पर बैठ गए मेरे पूछने पर एक व्यक्ति ने एक अपराधी की ओर संकेत करते हुए कहा कि इस व्यक्ति की एक दिन अपने पड़ोसी से कहा सुनी हो गई। लोगों ने आ कर दोनों को चुप करवाया उस समय तो बात टल गई परंतु उस बात को दिल में रखकर यह हर समय उस से बदला लेने की सोचता रहा।

एक दिन यह व्यक्ति अपने इन तीनों मित्रों के साथ पार्क में बैठा हुआ था कि अकस्मात उसका पड़ोसी भी वहां आ गया। उस समय वह अकेला था। बस फिर क्या था। यह तीनों उस पर टूट पड़े। उसका चिल्लाना सुन कर जब तक लोग उसे छुड़ाने आते इन चारों ने उसे मार मार कर अधमरा कर दिया। कुछ दिनों बाद अस्पताल में उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई। उस अपराध में इन तीनों को तीन तीन साल का कारावास हुआ है। अब इन्हें अमुक जेल में ले जाया जा रहा है।

अब तनिक आप स्वयं विचार करें उन तीनों ने अपना अनमोल जीवन नष्ट किया या नहीं। यदि वह व्यक्ति बदला लेने की भावना मन में न रखता तो आज इस तरह से उसका भविष्य अंधकार में न डूबता। बुराई करने वाले की भी सदा भलाई ही सोचनी चाहिए और भलाई ही करनी चाहिए। ऐसा करने से एक पंथ दो काज होंगे। तुम्हारा तो भला होगा ही साथ ही बुराई करने वाले का जीवन भी सुधर जाएगा।

उपरोक्त वचन सुख शांति से भरपूर जीवन जीने का भरपूर साधन हैं। असली संत पुरूष वह ही है जो अपने प्रति की गई बुराई को भुलाकर बुराई करने वाले के साथ भी सदा भलाई ही करते हैं। अच्छे कर्म का अच्छा फल और बुरे कर्म का बुरा फल। यह सूत्र हमारी नैतिक मान्यताओं तथा अवधारणाओं का आधार बनता है। जब यह धारणा होती है कि बुरे कर्म का बुरा फल होता है तो आदमी को बुराई से बचने का अवसर मिलता है।

 सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥

भावार्थ:- जो भगवान के भक्त होते हैं वह अपनी भूल को सुधार लेते हैं वह अपने दुख और दोषों को मिटाकर निर्मल होकर सभी यश प्रदान करते हैं। कभी-कभी दुष्ट लोग भी अच्छे लोगों की संगति पाकर भलाई किया करते हैं, परन्तु उनका दोषयुक्त स्वभाव कभी नहीं मिटता है।

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