कर्मचारियों को बचाएं काम के बोझ से

क्या आप भी काम के अत्यधिक बोझ से पैदा होने वाले दबाव से त्रस्त हैं या आप उन लोगों में से हैं जो अपनी क्षमता से अधिक काम करते हैं? ऐसा ही है तो आप ऐसे अकेले नहीं हैं क्योंकि भारत में बड़ी संख्या में कर्मचारी खुद पर काम के अत्यधिक बोझ को महसूस करते हैं।
जब भी कर्मचारी खुद पर काम का बहुत अधिक बोझ महसूस करते हैं तो स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं होती। जब काम का बोझ उनके सामर्थ्य से बाहर हो जाता है तो वे अधिक गलतियां करने लगते हैं, अपने नियोक्ताओं से क्रोधित रहने लगते हैं, उन कर्मचारियों के प्रति दिल में वैर पालने लगते हैं जो उनके जितना काम नहीं करते तथा वे वर्तमान नौकरी से उकता कर नई नौकरी की तलाश भी शुरू कर सकते हैं।

जानकारों की राय में ऐच्छिक व्यावसायिक क्षमता तथा उत्पादन का स्तर बनाए रखने हेतु किसी भी संगठन के लिए जरूरी है कि वह अपने कर्मचारियों को ऐसी परिस्थिति से बचा कर रखे।  इसके लिए कर्मचारियों की संख्या तथा कौशल का सही अनुपात में होना आवश्यक है।

ऐसा कर्मचारियों की भूमिका स्पष्ट करके तथा उन्हें उनके कार्यों तथा उनसे उत्पादकता की अपेक्षा के बारे में स्पष्ट रूप से समझा कर किया जा सकता है। इससे संगठन के कामकाज में पारदर्शिता भी आती है। कार्य संबंधी उपयुक्त योजना के बगैर कर्मचारी हमेशा काम के बोझ से दबे रहेंगे जिससे काम करने में उनकी अरुचि तो पैदा होगी ही, नौकरी छोड़ कर जाने वालों की संख्या में भी इजाफा होगा, उत्पादकता में कमी तथा अक्सर काम से गैर-हाजिर रहने या बीमारी की छुट्टी की अधिकता, फैसले लेने में नाकामी एवं रचनात्मकता की कमी जैसी समस्याएं भी अधिक पेश आएंगी।

कभी-कभार काम बढ़ जाना एक आम बात है। ऐसा होने पर अक्सर मैनेजर अतिरिक्त काम को अपने उन विश्वस्त कर्मचारियों को सौंप देते हैं जिन्होंने पूर्व में खुद को साबित करके दिखाया हो परंतु यदि काम का बोझ लगातार बना रहने लगे और अधिक काम सम्भालने वाले कर्मचारियों को इसके बदले में किसी तरह का अतिरिक्त लाभ भी न दिया जा रहा हो तो वे ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं जब वे काम को बोझ महसूस करने लगते हैं।
ऐसी स्थिति पैदा होने का अर्थ है कि संबंधित संगठन में मानव संसाधन की सही योजना काम नहीं कर रही है। ऐसी स्थिति विशेषकर वहां पैदा होती है जहां प्रबंधकीय तंत्र को समग्र रूप में नहीं बल्कि टुकड़ों में तैयार किया जाता है।

वहां विभिन्न विभागों के कामकाज तथा उनकी समीक्षा के नतीजों को आपस में सांझा नहीं किया जाता। ऐसी स्थिति में कर्मचारियों के बीच असंतुष्टि का माहौल पैदा होता है। कई बार लगता है कि अधिक सक्षम मैनेजर कम काम कर रहे हैं जिससे वे अन्यथा ही अन्य कर्मचारियों की ईर्ष्या का लक्ष्य भी बन जाते हैं।

अनेक भारतीय संगठनों में कर्मचारियों को अक्सर अपनी क्षमता से काफी अधिक काम करना पड़ता है। ऐसी स्थितियों में भी अपने कर्मचारियों को प्रेरित रखना तथा उनका उत्साह बनाए रखना उनके अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है। कई स्थितियों में सांझे तौर पर काम को बांट कर बोझ को कम किया जा सकता है।

यदि लम्बे समय के लिए किसी विभाग में काम अधिक रहने लगे तो वहां कर्मचारियों की संख्या को बढ़ाने पर भी ध्यान देना आवश्यक हो जाता है। किसी भी संगठन में प्रतिभाशाली कर्मचारियों में काम के बोझ से जूझने के लक्षणों को देखते ही उनके बोझ को कम कर दिया जाए तो किसी भी संगठन की तरक्की को सुनिश्चित बनाया जा सकता है।

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