Automotive Stylist कारों के Artist

Automotive Stylist कारों के Artist
इंडिया के ग्रोइंग मिडिल क्लास पर कई ऑटोमोबाइल कंपनीज की नजर थी। इनका ड्रीम था, एक ऐसी कार बनाने का जिस पर डेढ लाख रुपये से ज्यादा का खर्च न आए। वह अर्बन एरियाज में अच्छी माइलेज दे और उसमें कुछ कंफ‌र्ट्स भी हों। कंपनीज प्लानिंग में लगी थीं, लेकिन इस कॉन्सेप्ट को साकार कर दिखाया टाटा मोटर्स के गिरीश वाघ ने, जिन्होंने एक लाख के बजट में बेहतरीन कार डिजाइन कर कितने ही लोगों का सस्ती कार का ख्वाब पूरा कर दिया।
मेकिंग ऑफ नैनो
गिरीश वाघ ने जब 1992 में टाटा मोटर्स च्वाइन किया था, तब उन्हें जरा भी आइडिया नहीं था कि वे कंपनी के ड्रीम प्रोजेक्ट लखटकिया कार को डिजाइन करेंगे, लेकिन दिसंबर 2000 में गिरीश वाघ को वह प्रोजेक्ट मिला, जिसने उनकी ही नहीं, आम आदमी की भी जिंदगी को बदलकर रख दिया।
नैनो ऑन ट्रैक
जब गिरीश को ये प्रोजेक्ट मिला, उस पर पहले से ही 18 महीनों तक काम हो चुका था। उस वक्त तक मारुति 800 को ध्यान में रखकर उससे बेहतर कार बनाने की कोशिश चल रही थी। गिरीश वाघ ने प्रोजेक्ट को नए सिरे से आगे बढाया।
टाटा ग्रुप के तत्कालीन चेयरमैन रतन टाटा और एमडी रविकांत दोनों ने गिरीश से कह दिया था कि कार तो बननी ही है, वह भी लाख रुपये की और एवरेज भी कम से कम 25 किलोमीटर प्रति घंटा होनी चाहिए। यही नहीं, कार की बॉडी भी स्टील की ही होनी चाहिए। यानी कार ऐसी हो, जो हर मौसम में काम आए। चार-पांच लोगों की फैमिली के लिए फिट हो और सेफ भी। आखिर एक कार में कैसे होता है ये सब गिरीश को एक ऐसी गाडी बनानी थी, जो अच्छी भी हो और अफोर्डेबल भी। चुनौती बडी थी। उन्हें कार बनाने के लिए बजट का बेस्ट यूटिलाइजेशन करना था, यानी ये काम केवल डिजाइनिंग या इंजीनियरिंग का नहींथा, पेचीदा मैनेजमेंट का भी था।
स्टील ने बढाई मुश्किलें
पहले ये सोचा गया कि कार में दरवाजे और खिडकियों की बजाय प्लास्टिक के पर्दे लगा दिए जाएं, मेटल बॉडी की जगह प्लास्टिक बॉडी लगा दी जाए। लेकिन जब स्टील की कीमतें भी बढती गईं, तो कार की प्राइस एक लाख रुपये तकमें समेटना और भी मुश्किल होने लगा, लेकिन गिरीश वाघ ने सारी मुश्किलें आसान कर दीं। उन्होंने कार की बॉडी स्टील की ही बनाई, लेकिन उसकी थिकनेस थोडी कम कर दी।
स्मॉल साइज, लो बजट
कार पर खर्च कम कैसे हो बडा सवाल था गिरीश के सामने। लेकिन सॉल्यूशन कोई नजर नहीं आ रहा था। गिरीशने दुनिया की तमाम कारों की डिजाइन स्टडी की और फिर समझ आया कि इट्स साइज दैट मैटर्स प्राइस। साइज कम होगा, तो कार के अंदर का मैटेरियल भी कम लगेगा और छोटे और हल्के इंजन से ही काम चल जाएगा।
ऑस्टिन से मिला कॉन्सेप्ट
करीब 50-60 साल पहले मॉरिस माइनर और मॉरिस ऑस्टिन मिनी कारें चला करती थीं।?लोगों ने इन कारों को खूब पसंद किया था। गिरीश वाघ और उनकी टीम ने इस तरह की कई कारों के डिजाइन की बारीकी से स्टडी की। तब जाकर ये बात समझ में आई कि कैसे कम बजट में बेहतरीन कार बनाई जाए। इस तरह बन सकी लाख रुपये की कार नैनो।
यूरोपियन कारों से बेटर कार
स्मार्ट फोर्टवो यूरोप की सबसे सस्ती और मशहूर टू-सीटर कार है, लेकिन इसकी कीमत नैनो से चार-पांच गुना ज्यादा है। दोनों कारों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है, फिर भी प्राइस में इतना बडा डिफरेंस, कहीं न कहीं नैनो के डिजाइनर्स को ग्लोबल लेवल पर भी हिट कर गया। यही नहीं, देश?में बाकी कार मेकर कंपनियां जो नहींकर सकीं, गिरीश वाघ के क्रिएटिव दिमाग ने उसे कर दिखाया।
नैनो के डिजाइनर
ये मेरे लिए बडे गर्व की बात है कि मैं उस टीम का हिस्सा रहा जिसने ये इनोवेटिव प्रोडक्ट बनाया और बडा सैटिस्फैक्शन फील करता हूं कि रतन टाटा के सपने को साकार कर सका। आज नैनो कार लोगों की पसंद बन चुकी है। लोग भी टीम की तारीफ करते हैं। टीम की ओर से तारीफें सुनकर और भी बेहतर करने की इंस्पिरेशन मिलती है। अभी इस फील्ड में बहुत कुछ करना बाकी है।?पूरी दुनिया में हमारी यूनिट्स काम कर रही हैं। लेकिन भारत को अब भी डिजाइनिंग और कॉम्पिटिटिव मार्केट के मामले में विदेशों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। खासकर यूथ के लिए ये बात सीखने की बहुत जरुरत है, क्योंकि उनके लिए ये फील्ड एक बेटर ऑप्शन बनकर उभर रहा है, जिसके जरिए वे अपने हुनर का भरपूर इस्तेमाल कर सकते हैं।
गिरीश वाघ, वाइस प्रेसिडेंट
पैसेंजर्स व्हीकल्स, टाटा मोटर्स
मारुति ए-स्टार
कुछ साल पहले तक इंडियन ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री डिजाइनिंग के मामले में विदेशी डिजाइनर्स पर ही डिपेंड थे। उनकी बनाई कारों को यहां की सडकों, यहां के वातावरण और यहां के माहौल के हिसाब से री-डिजाइन करना पडता था। यह काम कंपनियों के लिए तो खर्चीला होता ही था, साथ ही कस्टमर की उम्मीदों पर खरा उतरने की गारंटी भी नहीं होती थी। भारत की सबसे बडी कार मेकर कंपनी मारुति सुजुकी ने एक ऐसी कार डेवलप करने का प्लान किया, जो यूथ फ्रेंडली हो। इसी समय सामने आए 27 साल के राजेश कुमार गोगू और 31 साल के सौरभ सिंह। गोगू ने जैसे ही आईआईएससी से डिजाइनिंग में मास्टर डिग्री कंपलीट की, मारुति ने उन्हें हायर कर लिया। कुछ ही साल बाद गोगू को उनसे चार साल बडे सौरभ सिंह के साथ सुजुकी की ग्लोबल कार ए-स्टार डिजाइन करने का जिम्मा दे दिया गया।
व‌र्ल्ड मांगे इंडियन डिजाइन
जब आईटी व‌र्ल्ड में इंडियंस अपनी कामयाबी का झंडा गाड रहे थे, उसी समय इंडियन कार इंडस्ट्री बूम कर रही थी। मारुति को ऐसी कार की दरकार थी, जो इंडिया के साथ इंटरनेशनल लेवल पर भी हिट हो। पूरी दुनिया में दिसंबर 2008 को इन दोनों हिंदुस्तानी डिजाइनरों का क्रिएशन ए-स्टार के रूप में लांच हुआ, जिसे विदेश में भी काफी वाहवाही मिली।
एरोप्लेन से हुए इंस्पायर्ड
इंटीरियर डिजाइनर राजेश कुमार गोगू ने ए-स्टार का इंटीरियर डिजाइन बनाने के लिए ऐरोप्लेन पर रिसर्च किया था। एरोप्लेन के कॉकपिट और इसके विंग्स की अच्छी-खासी एनालिसिस करने के बाद गोगू ने कार का फ्रंट पैनल डिजाइन किया। वहीं, कार के हल्के गुलाबी रंग के पीछे भी खास वजह है और वो है दुनिया को हिंदुस्तान के रंग की पहचान कराना।
दुनिया बदलने का नजरिया
एक्सटीरियर डिजाइनर सौरभ सिंह के मुताबिक ए-स्टार इंडियन कार डिजाइनरों के प्रति दुनिया का नजरिया बदलने की कोशिश थी। सौरभ सिंह कहते हैं, हम विदेशी मॉडल्स पर ही काम क्यों करें? क्यों न कुछ ऐसा करें, जो पूरी तरह हिंदुस्तानी हो, जिसमें भारतीय संस्कृति की झलक दिखे। सौरभ कहते हैं, हमने कोशिश की कि दुनिया भर के डिजाइनर्स के सामने कुछ ऐसी नजीर पेश की जाए कि वे भी कार में इंडियन फीचर्स डालने को मजबूर हो जाएं। इस तरह सिल्वर मेटलिक कलर की 996 सीसी पेट्रोल इंजन वाली 3.58 मीटर लंबी ए-स्टार कार यूरोपियन मार्केट को ध्यान में रखकर डिजाइन की गई।
हेडलाइट नहीं, कार्टून की आंखें
सौरभ सिंह एक किस्सा बताते हैं कि एक बार कस्टमर से हम मिलने जा रहे थे, तो उनके बच्चे ने बोला कि अंकल, आपने जो ए-स्टार बनाई है, वह बिल्कुल किसी कार्टून कैरेक्टर जैसी लगती है। वह कहते हैं कि जब हम किसी को बताते हैं कि आप जो गाडी चला रहे हैं, वह मैंने ही डिजाइन की है, तो लोग हैरान हो जाते हैं और बोलते हैं, अरे आपने कैसे बनाई ये कार, कमाल की डिजाइनिंग की है !
जापानी हुए फिदा
गोगू ने बताया कि जब वे इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे, तब इंडिया में कार डिजाइन होना बहुत बडी बात होती थी। हमारी अक्सर बात होती थी जापान की सुजुकी कंपनी से। जब किसी कार के बारे में उन्हें पता लगता था कि ये किसी इंडियन डिजाइनर ने डिजाइन की है, तो उनके मुंह से बस यही निकलता था-वाह ! और ये सुनकर हमारा सीना गर्व से चौडा हो जाता था।
बनना होगा कॉम्पिटेंट
राजेश गोगू को लगता है अब स्टूडेंट्स के लिए ज्यादा टफ कॉम्पिटिशन हो गया है। पहले इंडियन डिजाइनर्स कम थे, लेकिन अब बहुत हो गए हैं। इंडियन डिजाइनर पूरी दुनिया में जाना चाहते हैं और जा भी रहे हैं। पहले कार डिजाइनर्स कम थे। अब उनकी संख्या बढ गई?है। इसलिए खुद को साबित करने के लिए उन्हें ग्लोबली कॉम्पिटेंट बनना होगा। दुनिया भर में क्या ट्रेंड चल रहा है, इससे अवेयर रहना होगा। केवल क्रिएटिविटी से कुछ नहीं होने वाला, मार्केटिंग और ओरिजिनलिटी भी होनी जरूरी है।
ए-स्टार डिजाइनर
कार भी अपने बच्चे जैसी होती है जैसे आपका बच्चा जब किसी मुकाम पर पहुंचता है, तो बडी खुशी मिलती है। कुछ वैसे ही जब हमारी डिजाइन की हुई कार सडक पर उतरती है, तो लगता है जैसे हमारा बच्चा उस मुकाम पर पहुंच गया, जहां वो पहुंचना चाहता था। कार एक कॉम्प्लेक्स मल्टी डाइमेंशनिंग प्रोडक्ट है। उदाहरण के लिए आर्टिस्ट ने वॉल पेंटिग बना दी है। अब कस्टमर को पसंद आती है या नहीं, उसे नहीं पता। उसी तरह कार डिजाइनर भी डिजाइन तो कर देता है, कस्टमर उसे ट्राई करता है। कई बार उसे कार महंगी लगती है, कई बार एक नजर में ही फ‌र्स्ट क्लास लगती है। अलग-अलग कस्टमर्स की अलग-अलग च्वाइस होती है। अब जैसे हम और आप टी-शर्ट और ट्राउजर में कैजुअल फील करते हैं जबकि सूट-बूट टाई में उतना कंफर्टेबल फील नहीं करते, लेकिन वहीं कोई इंडिया इंक. से एमडी या वीपी होगा, तो वो थ्री पीस में ही कम्फर्ट फील करेगा।
सौरभ सिंह
कार डिजाइनर, मारुति सुजुकी
जगजीत राणा ऑल्टो 800
क्रिएटिविटी, पैशन, कॉन्टीन्यू वर्क एंड डिफरेंट थिंकिंग इन सबका ही दूसरा नाम है डिजाइनर।?ऐसे ही कार डिजाइनर हैं मारुति सुजुकी के जगजीत राणा। आईआईटी दिल्ली से डिजाइनिंग में मास्टर जगजीत को डिजाइनिंग का एक्सपर्ट माना जाता है। उन्होंने वैगन-आर को री-डिजाइन करके ब्लू आई बेबी वैगन-आर बनाई, अल्टो को री-डिजाइन कर मारुति ऑल्टो 800 डेवलप की। उनकी दोनों ही कारें सडकों पर काफी पॉपुलर हुईं। हाल ही में उन्होंने कॉन्सेप्ट कार एक्सए अल्फा को भी डिजाइन किया है।
फ्रीज हो जाते हैं लोग
एक डिजाइनर होना कैसा लगता है, पूछे जाने पर जगजीत राणा कहते हैं, मेरे पास भी दो गाडियां हैं, उनमें से एक वैगन आर है। अपनी खुद की डिजाइन की हुई कार चलाते हुए प्राउड फील होता है। काफी कम मौका मिलता है किसी डिजाइनर को कि वह खुद ही कार डिजाइन करे और खुद ही चलाए। सडकों पर जब भी मारुति ऑल्टो 800 और पॉपुलर ब्लू आईबेबी वैगन आर देखता हूं, गर्व से सीना चौडा हो जाता है। मैं किसी से पूछता हूं कि आप कौन सी कार चलाते हैं ? जवाब मिलता है वैगन आर या मारुति ऑल्टो 800। मैं बताता हूं कि ये कार मैंने ही डिजाइन की थी। लोग बोलते हैं कि अरे वाह, हमने ऐसा सोचा ही नहींथा कि हम अपनी कार के डिजाइनर से मिल पाएंगे।
लोगों से सीखते हैं
जगजीत राणा बताते हैं कि हर वाकया कुछ न कुछ सिखाता है, कहीं से हमें ये पता चलता है कि कार का कलर क्या रखा जाए? कहीं से पता चलता है कार की सीट कैसी रखी जाए? स्टेयरिंग कैसी रखी जाए?
राणा बताते हैं, एक बार हम पंजाब गए। पंजाब में एंट्री करने से लेकर अंदर पहुंचने तक हमने जितनी गाडियां रोड पर देखीं सब की सब व्हाइट कलर की थीं। जब मैंने पूछा कि सारी कारें सफेद क्यों हैं, लाल-पीली या नीली क्यों नहीं, तो वहां के लोगों से पता चला कि गुरुद्वारे का कलर भी व्हाइट होता है। सिख धर्म में बडे बुजुर्ग भी व्हाइट कलर की पगडी पहनते हैं। इसीलिए हम भी व्हाइट कलर की कार खरीदते हैं।
ये तो डिवोशनल रीजन था, लेकिन असल वजह यह है कि व्हाइट और न्यूट्रल कलर के कार की रिसेल वैल्यू बडी अच्छी है। इसीलिए ज्यादातर लोग ऐसी ही कलर की कारें खरीदते हैं। अपने एक्सपीरिएंसेस के बारे जगजीत कुछ इस तरह बताते हैं, कार की डिजाइन के बारे में वे लुधियाना में रिसर्च कर रहे थे। इस दौरान एक होटल में गए जहां पर 10-15 लेडीज किट्टी पार्टी कर रही थीं। हमने पूछा, आप कौन सी कार रखती हैं? तो जवाब में केवल ब्रांड का नाम ही सुनने को मिला जैसे किसी के पास होंडा सिटी होती, तो वो बोलीं होंडा है मेरे पास, मारुति सुजुकी की गाडी है, तो बोलीं कि मारुति की गाडी है, किसी ने यह नहीं कहा कि ऑल्टो है या स्विफ्ट है।
ग्रोइंग मार्केट है इंडिया
इंडिया में सारी कंपनियां कार डिजाइन नहीं करती हैं। ज्यादातर डिजाइनिंग फॉरेन में होती है। मारुति सुजुकी और टाटा जैसी गिनी-चुनी कंपनियां ही हैं जिनकी डिजाइनिंग यहां हो रही है। इंडियन मार्केट से जगजीत को काफी उम्मीदें हैं। राणा कहते हैं, इंडिया इज ए ग्रोइंग मार्केट, द होल व‌र्ल्ड इज लुकिंग टुव‌र्ड्स इंडिया। इसीलिए पिछले पांच साल में यहां इस मार्केट का बहुत ग्रोथ हुआ है। बाहर से कंपनियां आकर यहां और सेटअप लगा रही हैं। इंडियन मार्केट की कंडीशन सबसे बेस्ट है, इसलिए सारे बिग ब्रांड्स को यहां आना ही पडेगा।
कम ऑन गॉइज
जगजीत राणा ऑटो डिजाइनिंग के ग्लैमरस फील्ड के लिए एक अट्रैक्शन हैं, जो स्टूडेंट्स को इन फील्ड में आने के लिए एनकरेज करते हैं। जगजीत राणा को जब भी टाइम मिलता है, वह स्टूडेंट्स से मिलते हैं, इंटरैक्शन करते हैं, लेक्चर्स देते हैं, लेकिन वह अभी स्टूडेंट्स को काफी इंप्रूव करने की जरूरत फील करते हैं। राणा बताते हैं, इंडियन स्टूडेंस का स्किल लेवल वह नहीं है जैसा यूरोप, जापान और अमेरिका में है, इसलिए उन्हें अपने आप को स्किलफुली डेवलप करना होगा। स्ट्रक्चर्ड करना होगा और खुद को ग्लोबली कंपीट करने के लिए तैयार करना पडेगा।
रेखा मीणा, कलर डिजाइनर, मारुति सुजुकी
कार कलर डिजाइनर
वैगन आर और स्विफ्ट जैसी कारों की कलर डिजाइनर रेखा मीणा ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइनिंग, अहमदाबाद से टेक्सटाइल डिजाइनिंग में डिप्लोमा किया। शुरू में वे टेक्सटाइल के फील्ड में ही डिजाइनिंग कर रही थीं, लेकिन कार डिजाइनिंग के फील्ड ने उन्हें इतना अट्रैक्ट किया कि उन्होंने टेक्सटाइल छोडकर कार डिजाइनिंग की जॉब ज्वाइन कर ली। शुरुआत में तो रेखा को बहुत परेशानियां झेलनी पडीं। वो इतनी परेशान हो गईं कि उन्होंने ये फील्ड भी छोडने की ठान ली, लेकिन घर वालों ने हिम्मत बंधाई और आज वे एक सक्सेसफुल कलर डिजाइनर हैं। रेखा कहती हैं - बहुत प्राउड फील होता है जब लोगों को अपनी डिजाइन की हुई कार ड्राइव करते देखती हूं।
रेखा मानती हैं कि हर कार का एक पैसिफिक नेचर होता है। डिजाइनर को खुद ही सोचना पडता है कि कुछ ऐसा डिजाइन करें जो 3-4 साल भी हिट रहे, लोगों को पसंद आए, क्योंकि इतना टाइम कम से कम लग ही जाता है। इसलिए सब कुछ एडवांस में सोचकर करना पडता है।
महिन्द्रा XUV 500
ब्रूस ली, ग्लैडिएटर के रसेल क्रो, स्पाइडरमैन, हेलीकॉप्टर और चीता ये सब कहीं से भी एक जैसे नहीं हैं, कॉमिक बुक में भी आपने एक साथ नहीं देखा होगा, लेकिन इन सबकी झलक आपको एक ही कार में देखनी है तो वह है महिन्द्रा एक्सयूवी 500। इस कार को डिजाइन किया है केरल की अनंथन रामकृपा ने।
एम एंड एम को बनाया ग्लोबल
न्यू एक्सयूवी का आइडिया 2006 में तब आया जब महिंद्रा एंड महिंद्रा ने ग्लोबल होने का फैसला किया। स्कॉर्पियो इंडिया में तो मार्केट पकड चुकी थी, लेकिन विदेशों में बात नहीं बन पाई थी। यह विदेशों में बिकती थी, लेकिन एसयूवी नहीं, पिकअप के तौर पर।
कस्टमर्स की उम्मीदों पर खरी
अनंथन को पेरिस ऑटो शो का वह साल भुलाए नहीं भूलता, जब वह दूसरी कार मेकर्स कंपनीज के स्टॉल्स पर गई थीं, कस्टमर्स से मिलीं और सीधे ग्राहकों से पूछा कि वे एक्सयूवी में क्या चाहते हैं ? महिंद्रा एंड महिंद्रा ने नई कार के डिजाइन से पहले इटली, स्पेन, साउथ अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और भारत के 1500 कस्टमर्स के बीच सर्वे कर उनकी रिक्वॉयरमेंट के बारे में जाना।
चीता से आया कॉन्सेप्ट
नतीजा सामने आया, कस्टमर अग्रेसिव स्टाइल और पावर वाली कार चाहते थे। बस फिर क्या था कंपनी ने तय कर लिया कि चीता बनाना है और चीता बनाने का काम दिया गया अनंथन रामकृपा को। अनंथन और उनकी टीम ने कार के इंटीरियर और एक्सटीरियर डिजाइन तैयार लिए पहले पेपर पर स्केचेज के जरिए और फिर फुल स्केल क्ले मॉडल बनाया। ये मॉडल्स टीनएजर्स, फैशन डिजाइनर्स और ऑटो एक्सप‌र्ट्स को दिखाए गए।
सीक्रेट प्रोजेक्ट ऑफ डिजाइनिंग
डिजाइनिंग के इस काम में सीक्रेसी का पूरा ख्याल रखा गया, यहां तक कि कंपनी के सीनियर अफसर भी डिजाइन लैब में कैमरे और सेलफोन लेकर नहीं जा सकते थे। सीनियर्स ऑफिसर्स के अलावा जूनियर स्टाफ को भी इस नई कार की कानों-कान खबर तक नहीं थी। कई महीनों बाद लोगों को इसके बारे में पता चला।
एक्सपेरिमेंट्स विद SUV
मैक्स हेल्थकेयर के पूर्व चीफ एग्जिक्यूटिव नोनी चावला को महिंद्रा कंपनी ने कार दिखाने के लिए बुलाया। उसी महीने महिंद्रा ने पुणे में अपने डीलर्स को एसयूवी को दिखाने का फैसला किया। एसयूवी को एक कंटेनर में रखकर होटल ले जाया गया, जहां 150 गेस्ट थे, लेकिन वहां से सिंगल फोटो या स्केच भी लीक नहीं हुई। अगले महीने एसयूवी को कंटेनर में भर कर सेल्स एंड मार्केटिंग टीम को दिखाने गोवा ले जाया गया, फिर कुछ सामने नहीं आया। महिंद्रा एंड महिंद्रा के वाइस चेयरमैन और एमडी आनंद महिंद्रा डिजाइन टीम के साथ इटली भी गए ताकि कार की स्टाइल को और बेहतर तरीके से एनालिसिस कर सकें। करीब दो साल तक 125 लोग अपनी फैमिली से दूर होटलों में रहकर एसयूवी की ड्राइविंग करके टेस्टिंग करते रहे।
यूं बनी XUV 500
बोलेरो, स्कॉर्पियो या जाइलो की बजाय उनकी डिजाइनिंग टीम ने इसका अल्फान्यूमेरिक नाम देना बेहतर समझा एक्सयूवी 500। इसे वे फाइव ओ ओ कहते हैं क्योंकि नाम के आखिर में ओ लेटर अब तक उनके लिए लकी साबित हुआ था, और वाकई फाइव ओ अनंथन रामकृपा के लिए लकी ही साबित हुआ।
मिथिलेश श्रीवास्तव, रेवा डिजाइनर
इंडियन्स बहुत क्रिएटिव हैं, बहुत पोटेंशियल है उनमें, लेकिन हम उनको नोटिस नहींकरते। गांव-गांव, गली-गली हर जगह क्रिएटिव लोग हैं, डिजाइनर्स हैं इंडिया में। आइडियाज भी बहुत हैं अपने देश में, लेकिन उन्हें एक्जिक्यूट करने की खामी है। हमने बहुत इम्प्रूव किया है, पहले की गाडियों में दरवाजे हिलते रहते थे, लेकिन अब नहीं हिलते। इंडियन्स की सबसे बडी कमी है वे रिस्क नहीं लेते। वे यही सोचते हैं कि कैसे भी निबटा दो जुगाड से, पैसे आने दो पहले फिर देखेंगे और यही कमी हमारे देश के आर्टिस्ट्स को पीछे ले जाती है, वरना हुनर और क्रिएटिविटी में हम दूसरे देशों से कहींआगे हैं। इंडिया में लोग पैसे के पीछे भागते हैं। सोचते हैं कि किसी भी तरह चलने लायक कार बना दो, पैसे आएंगे फिर अच्छा बनाएंगे, परफेक्शन पर ध्यान नहीं देते। रिस्क नहींलेना चाहते, जबकि दूसरे देश रिस्क लेते हैं और गेन करते हैं।
संघमित्रा दत्ता
डिजाइनर-रेवा, फाउंडर एंड एमडी,
स्टाइल ऑटोमोटिव

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