खेलोगे-कूदोगे मिलेगा Admission

खेलोगे-कूदोगे मिलेगा Admission
कहते हैं कि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग का वास होता है। बात छोटी सी है, लेकिन सोचने वाली है। स्वस्थ दिमाग है कहां। किताबें पढ-पढ कर कभी किसी का दिमाग स्वस्थ हुआ है। सालों से बचपन में खेल के चक्कर में हमेशा डांट पडती रही है और आज भी खानी पडती हैं। बचपन से ही सिखाया जाता है कि खेलोगे-कूदोगे तो होगे खराब, पढोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब। ये नहीं खेलो, वह मत खेलो, घर में खेलो, होमवर्क करना है, नहीं तो स्कूल में डांट पडेगी। शाम को बाहर मत खेलना, पापा ऑफिस से आएंगे तो गुस्सा करेंगे। पापा को भी घर में हाथों में किताब लिया बच्चा अच्छा लगता है।
जिस बचपन को केवल खेल सूझता है, किताबें बोरिंग लगती हैं, अचानक कुछ साल बाद सब कुछ पलट जाता है। हमेशा खेल में रहने वाला मन किताबों में उलझ जाता है। इतना कि खेल के लिए वक्त ही नहीं मिलता। सोसायटी भी पढाकुओं और मोटे-मोटे लेंस वाले फ्रेम लगाए बच्चों की इज्जत करती है न कि क्रिकेट की बॉलों से घरों की खिडकियों के कांच तोडने वाले बच्चों की। किसी को उनमें सचिन या धौनी दिखाई नहीं पडते, वे शरारतियों की कैटेगरी में डाल दिए जाते हैं। स्पो‌र्ट्स नेचुरल है, जबकि बुक्स ऑर्टिफिशियल। कम मा‌र्क्स आते हैं, तो खेल को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। मा‌र्क्स के प्रेशर में खेल छूट जाता है। पेरेंट्स हों या टीचर, सभी का एक सूत्र वाक्य, मा‌र्क्स कम आए तो एडमिशन नहीं मिलेगा। आज के वक्त में कौन सा पढ कर एडमिशन मिलना है, जब पहली कट ऑफ ही 98 परसेंट पर बंद होती है। अगर 90 परसेंट ले भी आए कौन सा पहाड उखाड लेने हैं, क्योंकि सारा खेल तो कटऑफ का है। कटऑफ नहीं पहुंची 90 परसेंट तक तो च्वाइस का कॉलेज नहीं मिलता या च्वाइस का कोर्स नहीं मिलता। आलम यह कि पढाकुओं की कतार तो बेहद लंबी होती जा रही है, लेकिन स्पो‌र्ट्स स्टूडेंट्स की कतार बेहद छोटी। उन्हें एडमिशन आसानी से मिल रहा है, यहां तक कि स्पो‌र्ट्स कोटा भी कई बार खाली रह जा रहा है। कॉलेजेज में भी स्पो‌र्ट्स के स्टूडेंट्स खोजे नहीं मिल रहे। राजधानी दिल्ली के कई कॉलेजों में तो हॉकी बुरी दुर्दशा से जूझ रही है। दिल्ली यूनिवसिर्टी के दो प्रॉमिनेंट कॉलेज हिंदू और हंसराज कॉलेजों ने तो इस साल हॉकी के ट्रॉयल्स पर ही रोक लगा दी है। 1970 और 80 के दशक में कॉलेज स्टूडेंट्स में हॉकी का जो क्रेज बन कर उभरा था, वह अब दिखाई नहीं देता। कॉलेजेज की हॉकी टीम्स नदारद हो गई हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में स्पो‌र्ट्स और दूसरी एक्सट्रा करिकुलर एक्टीविटीज में 5 फीसदी का रिजर्वेशन है, लेकिन कॉलेजेज का कहना है कि टीम बनाने के लिए सीटें काफी कम हैं। कॉलेजेज की 43 स्पो‌र्ट्स लिस्ट में शामिल खो-खो का भी यही हाल है। अनदेखी और करियर ओरिएंटेड स्पो‌र्ट्स न होने की वजह से खो-खो को खिलाडी ही नहीं मिल पा रहे हैं।
क्या कहते हैं स्पो‌र्ट्स स्टूडेंट्स..
नहीं हैं करियर ऑप्शंस
पटना यूनिवर्सिटी के स्पो‌र्ट्स स्टूडेंट राजीव आर्यन  कहते हैं कि वे फुटबाल खेलते हैं, तो अपने लिए बडी सफलताएं ही चाहते हैं। उन्हें अपने करियर को ऊंचाई तक ले जाने में कुछ मुश्किलें सामने दिखती हैं। कॉलेज के स्तर पर प्रोत्साहन नाम मात्र का होता है। घर वाले हौसला अफजाई करते हैं, तो साहस बढता है। स्टूडेंट्स खेलों में रुचि लें और उसमें करियर बनाने की सोचें, तो सबसे पहले खेल के मैदानों के लिए हर मुहल्ले में जगह छोडनी होगी। खेल कोटे से कॉलेज में एडमिशन पारदर्शी हों और निजी व सरकारी संस्थान नियमित रूप से खिलाडियों को नौकरी पर रखें।
बढा कॉन्फिडेंस
मेरठ के आरजी कॉलेज की एमए फ‌र्स्ट ईयर की स्टूडेंट व बास्केटबाल की खिलाडी मेधा ढिल्लन कहती हैं, बास्केटबाल ने उनके करियर में चार चांद लगा दिया, तीन इंटरयूनिवर्सिटी खेलने के साथ सीनियर स्टेट तक पहुंची, जिससे आत्मविश्वास बढा। साथ ही करियर को एक दिशा मिली। वह कहती हैं कि स्पो‌र्ट्स में स्टूडेंट्स आगे आएं इसके लिए बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर सुधरना चाहिए।
खो-खो ने बदली लाइफ
भले ही दिल्ली के कई कॉलेजेज को खो-खो खेलने वाले स्पो‌र्ट्स स्टूडेंट्स नहीं मिल रहे हैं, लेकिन अभी कई ऐसे स्टूडेंट्स हैं, जिन्हें इसमें फ्यूचर दिखाई देता है। मेरठ कॉलेज से बीए फ‌र्स्ट ईयर के स्टूडेंट अंकित शर्मा कहते हैं कि खो-खो उनका फेवरेट गेम है और इस खेल ने उनकी लाइफ ही बदल दी। वह कहते हैं कि खो-खो में स्टेट लेबल तक पहुंचने के बाद अब उनकी इच्छा इंटरनेशनल लेवल पर खेलने की है।
ताइक्वांडो में है फ्यूचर
कई स्टूडेंट्स को स्पो‌र्ट्स में कोई फ्यूचर नहीं दिखता है, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जो नेशनल-इंटरनेशनल लेवल पर खेल कर अपने ड्रीम्स पूरा करना चाहते हैं। ताइक्वांडो में कई नेशनल-इंटरनेशनल कॉम्पिटिशंस में ढेरों पदक जीतने वाले ग्रेटर नोएडा के गुलशन कहते हैं कि वह पिछले 8 सालों से ताइक्वांडो खेल रहे हैं, जिससे आत्मविश्वास बढा है। वह कहते हैं कि करियर के लिहाज से भी यह खेल बढिया है और अच्छा खिलाडी ओलंपिक तक जा सकता है, साथ ही राष्ट्रीय स्तर तक कॉम्पिटिशंस में हिस्सा लेने वाले कई प्लेयर्स को गवर्नमेंट जॉब्स में मौका मिलता है, चाहें तो कोच और फिजियोथेरेपिस्ट के रूप में भी फ्यूचर बना सकते हैं।
स्कूल्स करते हैं निग्लेक्ट
गुलशन बताते हैं कि काठमाडूं में एक कॉम्पिटिशन में हिस्सा लेने के दौरान वे घायल हो गए और स्कूल नहीं जा पाए। नोएडा के एक नामी-गिरामी स्कूल में पढने वाले गुलशन को स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन ने सीनियर सेकंडरी में नहीं जाने दिया। वह कहते हैं कि स्कूल अपना रिजल्ट बेहतर करने के लिए सिर्फ पढाई का दबाव बनाते हैं। नेशनल लेवल के कॉम्पिटिशंस में पहुंचने में मदद करने में कोताही करते हैं। साथ ही खेल की सुविधाओं को विकसित करने पर ध्यान नहीं देते हैं। अपने स्तर से मेहनत करने पर भी मदद नहीं मिलती है। नेशनल लेवल के कॉम्पिटिशंस को भी स्कूलों के बीच का ही कॉम्पिटिशन समझते हैं। वह कहते हैं कि खेलों के प्रति युवाओं की रुचि पैदा करने के लिए सबसे ज्यादा जोर आधारभूत संरचना पर दिया जाना चाहिए। सुविधाएं होने पर ही युवा उस खेल की ओर आगे बढेंगे।
पोलियो के बावजूद हाई जंप
देखने में आता है कि शारीरिक रूप से कमजोर स्टूडेंट्स ज्यादा एकेडमिक होते हैं, लेकिन कुछ अपवाद भी हैं। हाई जंप स्पेशलिस्ट और नेशनल लेवल पर गोल्ड मेडलिस्ट नोएडा के वरुण भाटी का एक पैर पोलियो के चलते थोडा कमजोर है, बावजूद इसके वे ऊंची छलांग लगाना पसंद करते हैं। वरुण कहते हैं कि हर किसी की अपनी क्षमता होती है। मैं एथलेटिक्स के लिए खुद को सक्षम मानता हूं, इसी में मेहनत करता हूं। करियर के रूप में भी यह बढिया है। ओलंपिक तक पहुंचा जा सकता है। वे कहते हैं कि स्कूल का सपोर्ट खेल योग्यता को निखारने में सबसे जरूरी होता है। स्कूल से सहयोग नहीं मिलता, तो राष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंच पाता।
लगातार हों कॉम्पिटिशंस
वरुण कहते हैं कि देश में कुछ एक खेलों पर ही ध्यान दिया जाता है। शेष को लोग उतना महत्व नहीं देते हैं। हर किसी की अलग-अलग योग्यता होती है। बहुत से लोग किसी खेल का हुनर होने के बावजूद, अनदेखी के चलते आगे नहीं बढ पाते हैं। ऐसे खेलों की लगातार प्रतियोगिताएं कराकर ही इनके प्रति रुचि पैदा की जा सकती है।
घर से नहीं मिलता सहयोग
वे बहुत लकी होते हैं, जिनके उनकी च्वाइस को प्रिफरेंस देते हैं। लेकिन नोएडा के वॉलीबॉल प्लेयर अंकित बैसोया इतने लकी नहीं रहे। अंकित बताते हैं कि उन्हें इस खेल में करियर बनाने के लिए कभी घर वालों से सहयोग नहीं मिला। घर वालों के अनुसार खेलना समय की बर्बादी है, वे हमेशा पढने के लिए ही दबाव बनाते रहे। अंकित बताते हैं कि आज वे खेल और करियर के बीच फंस कर रह गए हैं और यही वजह है कि आज उन्हें नंबर कम होने के चलते एडमिशन नहीं मिल पा रहा है।
वह कहते हैं अवेयरनेस और सुविधाएं न होने से वे इसमें करियर बनाने के बारे में सोच ही नहीं पाए। यहां तक कि स्पो‌र्ट्स कोटे से मिलने वाले बेनिफिट्स के बारे में न तो घर वालों ने बताया और न ही स्कूल में इसके बारे में बताया गया।
जूडो में बेस्ट करना है
जूडो की राष्ट्रीय स्तर की खिलाडी लखनऊ की सानिया मुन्नवर कहती हैं कि जूडो से उन्हें इसलिए लगाव है क्योंकि इससे वे खुद को महफूज रख सकती हैं। साथ ही वे इसमें बेस्ट करना चाहती हैं, ताकि उनका करियर भी किसी डॉक्टर और इंजीनियर से कहीं ज्यादा अच्छा हो और अच्छी जॉब भी मिल सके। वह कहती हैं कि पेरेंटस ने हमेशा मेरा साथ दिया फिर चाहे वो सर्दी में प्रैक्टिस के लिए कहीं जाना हो या फिर घर में तैयारी करनी हो।
कबड्डी में उदासीन रवैया
रांची यूनिवर्सिटी की स्पो‌र्ट्स स्टूडेंट रीता कुमारी बताती हैं कि उनका फेवरेट गेम कबड्डी है, लेकिन सरकार की उदासीनता के चलते वे इसमें करियर बनाने से डरती हैं। वह कहती हैं कि लडकी होते हुए भी कबड्डी में उनके घर और कॉलेज में सभी ने सपोर्ट किया। वह कहती हैं कि स्पो‌र्ट्स में रुचि पैदा करने के लिए रोजगार के नए अवसर तलाशने होंगे।
भविष्य अच्छा होने के कारण बैडमिंटन में करियर बना रही हूं। फैमिली के साथ ही टीचर्स का भी भरपूर सहयोग मिला है।
अंजलि यादव, बैडमिंटन प्लेयर
पढाई के साथ खेल भी जरूरी है, फिट हैं तो हिट हैं। कॉलेज और यूनिवर्सिटी लेवल खिलाडियों को फाइनेंशियली हेल्प मिलनी चाहिए।
प्रज्ञा गौतम, प्लेयर
खेलो अपने दम पर
क्रिकेटर वीरेन्द्र सहवाग के कोच अमरनाथ शर्मा कहते हैं कि स्पो‌र्ट्स में करियर उन्हीं बच्चों को ब्राइट है, जो अपने टैलेंट से वाकिफ हैं। जिन्हें पता है कि उन्हें केवल स्पो‌र्ट्स में ही जाना है। वे अपनी खास स्टाइल को जानते हैं और उस पर कडी मेहनत करते हैं। सहवाग का उदाहरण देते हुए वह कहते हैं कि वे उसे जो कुछ सिखाते थे, वह उसे हूबहू नहीं अपनाता था। खुद भी देखता था कि वह उसे कर सकता है कि नहीं। उस खास टेक्निक की क्या खामी है या खूबी है? वह कहते हैं कि स्टूडेंट्स खेल में करियर के बारे में सोच तो लेते हैं, पर दूसरे ही दिन पीछे हट जाते हैं। बाहरी चमक-दमक देखकर करियर बनाने की बात वे न सोंचे। स्टूडेंट क्या पेरेंट्स भी जिम्मेदार हैं। बहुत निराशा होती है जब पेरेंट्स बच्चे को लेकर मेरे पास आते हैं और दूसरे ही दिन उसका इंप्रूवमेंट भी पूछने लगते हैं। उन्हें इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या वे अपनी महात्वाकांक्षा बच्चों पर लाद कर उनका भविष्य संवारने के बजाय बिगाड तो नहीं रहे। कुल मिलाकर, हम सब जिम्मेदार हैं यदि बच्चा स्पो‌र्ट्स में करियर बनाने की बात सोचता है, पर उसे आगे कंटीन्यू नहीं कर पाता। सरकार भी दोषी है। बढिया इंफ्रास्ट्रक्चर की बात छोडिए, महंगाई भी बहुत है। पहले बॉल 20 रुपये की आती थी अब 200 या 250 की आती है। डाइट नहीं मिलती, जबकि फिटनेस बहुत जरूरी है। पर केवल सरकार को कोसने के बजाय हम सब को मिलकर इस दिशा में पहल करनी होगी। थोडा धैर्य रखना होगा। बच्चे में डेडिकेशन पैदा करनी पडेगी, तभी सही दिशा मिल पाएगी।
अमरनाथ शर्मा, सहवाग के कोच
इंटरैक्शन : सीमा झा
क्या कहना है नॉन-स्पोर्ट्स स्टूडेंट्स का..
नहीं मिलता प्रोत्साहन
पटना कॉलेज के स्टूडेंट तुषार अनल चंद्रा कहते हैं कि क्रिकेट के शौक के बावजूद उन्होंने इसमें करियर बनाने की नहीं सोची। वह कहते हैं कि राज्य में इस खेल को सही प्रकार से प्रोत्साहित नहीं किया जाता। कॉलेज में भी खेल कोटा से एडमिशन के नाम पर बस औपचारिकता निभाई जाती है। उनके अनुसार पेरेंट्स भी कहते हैं कि जो वक्त खेल-कूद में लगाओगे, उतना वक्त पढने में लगाओ तो डाक्टर-इंजीनियर या बडे अफसर बन सकते हो। जॉब तो बहुत अच्छे प्लेयर्स को मिलते हैं। साथ ही राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर अच्छे प्रदर्शन के लिए यहां सुविधाएं नहीं हैं।
सक्सेस परमानेंट नहीं
मेरठ कॉलेज में बीएससी पार्ट वन की स्टूडेंट आइमन के मुताबिक वे बास्केट बॉल में ही करियर बनाने की सोचती थीं, जिसे बाद में ड्रॉप कर दिया। अब वे मेडिकल की तैयारी करके डॉक्टर बनने का सपना देख रही हैं। वह कहती हैं कि खेलों में कॉम्पिटिशन ज्यादा है, सक्सेस के बाद भी स्थिरता नहीं है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी
रांची के लाल मनीष नाथ कहते हैं कि वे फुटबॉल में करियर बनाना चाहते थे, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को देखते हुए उन्होंने इसे ड्रॉप कर कर दिया। वे कहते हैं कि उन्हें लगा कि शायद कम संसाधन में वे अच्छा नहीं कर पाएंगे। हालांकि वे भी इससे इंकार नहीं करते कि स्पो‌र्ट्स कोटे से एडमिशन और जॉब मिलना आसान हो जाता है।
स्पो‌र्ट्स कोटा लागू हो
कॉलेजों में खेल की सुविधा नहीं है, इसलिए खेल में कभी ध्यान ही नहीं दिया, कॉलेजों में स्पो‌र्ट्स कोटा लागू होगा और स्पो‌र्ट्स को प्रमोट किया जाएगा तो छात्रों का रुझान इसकी ओर बढेगा। अच्छे खिलाडी भी सामने आएंगे।
शबीना असलम, स्टूडेंट
नहीं है जॉब सिक्योरिटी और ट्रेनिंग फैसिलिटी
भारतीय फुटबाल के पोस्टर ब्वाय सुनील छेत्री के मुताबिक पांडिचेरी, अंडमान निकोबार जैसे दूरदराज के बच्चे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में खेलने का सपना नहीं देख सकते। उनका कहना है कि देश में प्रतिभा की कमी नहीं है। छोटी जगहों पर भी प्रतिभावान खिलाडी हैं। कमी सिर्फ संसाधनों की है। खेल का उचित मैदान, कोच व प्रोत्साहन देने वाले नहीं हैं। वह कहते हैं कि पांडिचेरी, अंडमान जैसे दूर दराज के बच्चे आईलीग (फुटबॉल का भारतीय टूर्नामेंट) में खेलने का सपना देखते हैं, तो वह कभी पूरा नहीं होगा। क्योंकि वहां सुविधाएं नहीं हैं। खेल को प्रोत्साहन देने के लिए छोटी-बडी सभी जगहों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का मैदान, ट्रेनिंग, डाइट आदि मिलना चाहिए।
वह कहते हैं कि माता-पिता व बच्चों को यह समझना चाहिए कि पढाई व खेल दोनों जरूरी है। खेलने से बच्चे दिमागी तौर पर और मजबूत बनते हैं। करियर को लेकर माता-पिता व बच्चे आशंका ग्रस्त रहते हैं। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि आईआईटी की तैयारी करने वाले सभी बच्चे इंजीनियर नहीं बन जाते।
पेरेंट्स स्पीक्स
बच्चों को करें प्रोत्साहित
पटना के अजीमचक में सहायक शिक्षक अविनाश कुमार एक पेरेंट्स और टीचर दोनों का रोल निभा रहे हैं। वह कहते हैं कि अगर बच्चे को खेल में रुचि है, तो उसे खेल में जाने दें। वे अच्छा करेंगे तो आगे बढने के मौके कम नहीं हैं। उनका कहना है कि स्टूडेंट भी दो तरह के होते हैं। एक बस पढाई से वास्ता रखते हैं, तो दूसरे खेल, कला आदि कई चीजों में रुचि रखते हैं। कोई बच्चा महेन्द्र सिंह धौनी, साइना नेहवाल, विश्वनाथ आनंद एक दिन में नहीं बनता, उसे अपने अभिभावक, समाज और सरकार सबसे सहयोग और प्रशंसा चाहिए।
जॉब मिले, तो सोचें
मेरठ के जमाल अख्तर ने कभी अपने बच्चों को खेलने से मना नहीं किया, लेकिन यह भी सच है कि कभी प्रोत्साहित भी नहीं किया कि स्पो‌र्ट्स में करियर बनाए। वह कहते हैं कि सरकार अगर खिलाडियों को रोजगार दिलाए, तो खेल और खिलाडियों की दशा व दिशा जरूर बदलेगी। बच्चों के मेडल धूल नहीं फांकेंगे।
भारी बस्ते के लिए पेरेंट्स जिम्मेदार
रांची के कृष्णा साव इस बात को खुले दिल से स्वीकारते हैं कि पेरेंट्स की बढती उम्मीद के चलते बच्चों का बस्ता भारी हो रहा है। बच्चों को खेल के प्रति प्रोत्साहित करने की पहली जिम्मेदारी पेरेंट्स, सरकार और फिर टीचर की है। वह कहते हैं कि सरकारी स्कूलों में खेल की कोई व्यवस्था नहीं है। रांची यूनिवर्सिटी में ही 1986 के बाद स्पो‌र्ट्स टीचर की नियुक्ति नहीं हुई है। खेल सामग्री नहीं है। ऐसे में सचिन और धौनी कहां, कैसे बनेंगे?
टीचर्स स्पीक्स: इंफ्रास्ट्रक्चर को करें मजबूत
वेटेज के बावजूद नहीं मिलते स्टूडेंट्स
मेरठ कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. एनपी सिंह कहते हैं कि कॉलेजेज में एडमिशन के समय नेशनल, स्टेट लेवल के खिलाडियों को चार फीसदी का वेटेज दिया जाता है, लेकिन फिर भी खिलाडी नहीं मिलते हैं। स्पो‌र्ट्स में सुरक्षित करियर रहेगा या नहीं, इसके चलते युवाओं में रुझान कम हो रहा है। वह कहते हैं कि बच्चों में खेल के प्रति रुचि कम होने के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। वह कहते हैं कि चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी से जुडे नौ जिलों गाजियाबाद, मेरठ, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, सहारनपुर, हापुड, शामली, बागपत, मुजफ्फरनगर में 550 से अधिक कॉलेज होंगे, लेकिन इंटर यूनिवर्सिटी स्पो‌र्ट्स में मुश्किल से 20 कॉलेज ही हिस्सा लेते हैं। कॉलेज इस पर ध्यान ही नहीं देते। वह कहते हैं कि स्पो‌र्ट्स कोटे से स्टूडेंट्स नहीं मिलने से उन सीटों को सामान्य वर्ग के छात्रों से भरा जाता है। वह जोर देकर कहते हैं कि स्कूल-कॉलेज में खेल नीति बनाने की गंभीरता से जरूरत है। कॉलेज स्पो‌र्ट्स फीस लेते हैं, लेकिन इसका खर्च खिलाडियों पर नहीं करते। यूनिवर्सिटीज को तय करना होगा कि स्पो‌र्ट्स फीस का उपयोग खेल को बढावा देने में किया जाए। साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर में भी सुधार की जरूरत है।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर दें जोर
पटना यूनिवर्सिटी के वाणिज्य डिग्री कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. उमेश मिश्र के मुताबिक उनके यहां स्पो‌र्ट्स कोटे की सीटें पिछले तीन सालों से खाली नहीं रही हैं। वह कहते हैं कि ज्यादा करियर ओरिएंटेड होने, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और समुचित प्रोत्साहन न मिलने की वजह से स्टूडेंट्स में स्पो‌र्ट्स के प्रति रुझान कम हो रहा है। वह कहते हैं कि यूनिवर्सिटी में हर खेल के लिए कोटा निर्धारित नहीं है।
दोषपूर्ण खेल नीति जिम्मेदार
पटना के संप्रति कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. शिवचन्द्र सिंह का कहना है कि दोषपूर्ण खेल नीति के चलते युवाओं में खेल के प्रति रुझान कम हो रहा है। बच्चों के लिए खेलने के साधन नहीं हैं। पेरेंट्स खेलने नहीं देते और सरकार सुरक्षित फ्यूचर का भरोसा दे नहीं सकती, तो इस परिस्थिति में कौन रिस्क लेना चाहेगा? खुद एथलीट रह चुके डॉ. शिवेन्द्र सिंह के मुताबिक 90 प्रतिशत सरकार, 09 प्रतिशत सोसायटी और मात्र 01 प्रतिशत पेरेंट्स इसके लिए जिम्मेदार हैं। वह कहते हैं कि घरों के आसपास पाकरें में बुजुर्ग और कपल्स का कब्जा होता है। खेलना संभव नहीं होता। आज ग्रामीण क्षेत्र में मैदान, नदी तट, चांवड, छावर, बाग-बागीचा रहे नहीं। ऐसे में बच्चे खेलें कहां और पेरेंट्स उन्हें कहां भेजें?
कंपल्सरी हो स्पो‌र्ट्स
बाल निकुंज इंटरकॉलेज, लखनऊ के प्रिंसिपल हृदय नारायण अग्रवाल कहते हैं कि हर स्कूल और कॉलेज में स्पो‌र्ट्स को कंपल्सरी कर देना चाहिए। वहां एक स्पो‌र्ट्स टीचर होना चाहिए ताकि बच्चे एक घंटा जरूर खेलें। स्कूल और कॉलेज में ही कॉम्पिटिशन करवाना चाहिए ताकि बच्चे अच्छे से तैयारी करें। साथ ही सरकार को चाहिए कि वो दूसरे देशों की तर्ज पर हमारे देश में खेल के लिए समय पर कुछ न कुछ नया करती रहे। वह कहते हैं कि कॉम्पिटिशन की वजह से पेरेंटस आईआईटी और पीएमटी में लगे रहते हैं। उनको सोच बदलनी चाहिए।
पहले पेरेंट्स जिम्मेदार
रांची कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. विश्वरूप मुखर्जी मानते हैं कि यूथ में स्पो‌र्ट्स के प्रति रूझान में कमी आई है। वे साफ-साफ कहते हैं कि बच्चों की स्पो‌र्ट्स के प्रति घटती रुचि के लिए सबसे पहले पेरेंट्स जिम्मेदार हैं, और इसके बाद सरकार फिर शिक्षक।
वह कहते हैं कि पेरेंट्स हमेशा पढने की बात करते हैं। सभी को खेल-कूद के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। पेरेंट्स अपनी महत्पूर्ण भूमिका से पीछे नहीं हटें, साथ ही तो सरकार भी खेलों के लिए फंड की उचित व्यवस्था करे।
स्पो‌र्ट्स कोटा नहीं है फिर भी एडमिशन के दौरान खिलाडियों को वेटेज के अंक देते हैं। एडमिशन प्रोसेस के बाद शिक्षकों की समिति स्टूडेंट्स की काउंसलिंग करती है, जिससे हर साल 100 खिलाडी तक तैयार करते हैं।
डॉ. मीता जमाल, प्रिंसिपल, डीजी कॉलेज, कानपुर
राष्ट्रीय स्तर के खिलाडी को एडमिशन के दौरान 10 अंक एवं राज्य स्तरीय खिलाडी को 5 अंक का वेटेज देते हैं। खेल को बढावा देने के लिए यूनिवर्सिटी ने फिजिकल एजुकेशन जैसा विषय ग्रेजुएशन लेवल पर लागू किया है।
डॉ. प्रमिला अवस्थी, प्रिंसिपल, पीपीएन कॉलेज, कानपुर कानपुर के सीएसजेएमयू में नहीं है स्पो‌र्ट्स कोटा कानपुर की छत्रपति शाहू जी महाराज यूनिवर्सिटी अब तक स्पो‌र्ट्स कोटे से महरूम है। इतना जरूर है कि एडमिशन के दौरान मेरिट लिस्ट में प्लेयर्स को वेटेज नंबर दिए जाते हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण टीम इंडिया के तेज गेंदबाज आरपी सिंह का है। रायबरेली के कॉलेज सीएसजेएमयू से संबंद्ध हैं, लेकिन स्पो‌र्ट्स कोटा न होने के कारण उन्हें लखनऊ यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेना पडा। इस बारे में सीएसजेएमयू के वाइस चांसलर प्रो. अशोक कुमार कहते हैं कि यूनिवर्सिटी के अध्यादेश में स्पो‌र्ट्स कोटा नहीं है, इस मामले को कार्य परिषद में ले जाएंगे, फिर राजभवन से अनुमति दिलाकर यूनिवर्सिटी में स्पो‌र्ट्स कोटा लागू कराया जाएगा।
स्पो‌र्ट्स के लिए कोई विशेष सीट नहीं लखनऊ यूनिवर्सिटी के नवीन खरे बताते हैं कि यूनिवर्सिटी में स्पो‌र्ट्स कोटे के लिए कोई विशेष सीट नहीं है। हां, जो खिलाडी स्टेट और राष्ट्रीय स्तर के होते हैं उनको जरूर प्राथमिकता मिलती है।
जूनियर स्तर पर हो चयन प्रक्रिया
ओलंपिक पदक विजेता सुशील के कोच व द्रोणाचार्य अवार्डी कोच यशवीर सिंह के मुताबिक भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना के बाद खेल को बढावा देने के लिए सभी खेलों में अंडर-12 स्तर पर चयन प्रक्रिया शुरू हुई थी। पहले राज्य फिर राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबले होते थे। उस मुकाबले से बेस्ट चार बच्चों का चयन कर प्राधिकरण के सेंटर्स में ट्रेनिंग दी जाती थी। यह प्रक्रिया खत्म हो गई, जबकि इसकी सख्त जरूरत है। खेलों में राजनीति व प्रशासनिक कमियां भी हैं। इसके चलते कई बार योग्य प्लेयर्स को मौका नहीं मिलता। इसके अलावा प्लेयर्स में करियर को लेकर इनसिक्योरिटी का भाव भी है, जो दूसरे देशों में नहीं है।
इनपुट : पटना से मनीष शर्मा, लखनऊ से दीपा श्रीवास्तव, मेरठ से विवेक राव, ग्रेटर नोएडा से प्रदीप सिंह, कानपुर से ओपी वाजपेयी, दिल्ली से रणविजय सिंह और रांची से प्रणय कुमार सिंह।

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