उछलती फुदकती चली जा रही थी
मचलती लुढ़कती हंसी जा रही थी .
बिखरी जो खुशियां छूटी गलियों में
उस गलियों की रौनक यह विस्मित निगाहें
समेटे समेटे लूटे जा रही थी .
वह काली मिट्टी वो पीली मिट्टी
पिता की मेहनतों की खुशबू सुनघे जा रही थी .
वह पीली सरसों वह अरहर की डालें
नीले पुहुप से भरी मिली अलसी .
वह पूरब का सूरज वह सायन का चंदा
मुझे मेरा गांव हमेशा लुभाता .
वह आम की मंजरिया हमें याद आता
बारिश का छम छम हमेशा बुलाता . भूली बिसरी यादें हमेशा सताता
मुझे मेरा गांव हमेशा लुभाता .
खुद ही बहलना वो खुद ही बहलाना
चॉकलेट का स्वाद और बताशो का गाना
मुझे मेरा गांव हमेशा लुभाता .
अब सबकी निगाहों से छुप छुप के बचना
गांव की यादों को पन्नों में समेटना . हमेशा चिधाता हमेशा डराता
मुझे मेरा गांव हमेशा लुभाता .
यह उम्र का पड़ाव वह सोंधी सुगंध
हो रही दोनों ही अब मंद .
फिर भी छुप छुप के लिखना और शब्दों में बधना ..
बहुत ही जटिलता बहुत ही जटिल ता
मुझे मेरा गांव हमेशा लुभाता
मुझे मेरा गांव हमेशा लुभाता ........
रंजना राय
बलिया
