कभी गिराना कभी उठना फिसलना याद आता है l
कभी अlमो कभी जामो पर चढ़ना याद आता हैl
कभी गांव की गलियोंकी
रज धूल में हम खेले l
कभी लड़ना कभी रूठ ना वह मिलना याद आता है l
कभी स्कूल में जाकर वह भगना याद आता है l
कभी पुस्तक के पन्ने को उड़ाना याद आता है l
कवि गुरु जी के हाथों छड़ी से छड़ी मार खाई थीl
कभी प्यार से उनका पढ़ाना याद आता है l
कभी रेत में खेल कर
हम ने घरौंदा बनाए थेl
उन्हीं घरौंदा में बैठकर
जीवन सपने सजाए थे
कभी खेतों की मेड़ों पर
खट्टे बेर खाए थे
कभी बागों में तितलियों को पकड़ना याद आता है l
कभी भंवरों के साथ गुंजन करना याद आता है l
कभी गांव की गलियों में खेलते छुपन छुपाई थे
कोई जाति न कोई पाती सब आपस में भाई भाई थे l
कभी पैरों से पानी को उड़ाना याद आता हैl
कभी जुगनू के पीछे भागना याद आता हैl
अभी मेंढक बनकर हम बचपन में उछलते थे
कभी चुप चुप की आवाज
वह रेल बनना याद आता हैl
उम्र हो गई आज पचपन की
पर वह बचपन याद आता हैl
दिलीप कुमार शर्मा "दीप"
देवास मध्य प्रदेश
