जीवन में अहंकारी नही परोपकारी बने



अजय नायर, कोच्चि, केरला

हम सभी भली भांति जानते है। जिस किसी ने इस सृष्टि में जन्म लिया है उसका अंत  निश्चय तय  किया गया है।  हम बात करेंगे मनुष्य जीवन की । हर मनुष्य 

अपने जन्म के साथ कुछ भी लेकर नही आता। सिर्फ खाली हाथ नग्न देह के साथ धरती पर जन्म लेता है।

अपने परिवेश में पला बड़ा होता है। समय के साथ  रंग रूप बदल कर एक युवा वर्ग में प्रस्थान करता है।

सोचने समझने, की स्थिति में आकर मानव के मस्तिक में लोभ, मोह माया ,अहंकार का विराजमान होने लगता है। बात करते है अहंकार की, तो अहंकार हमे अलग अलग  कारणों से जीवन में होने लगता है।जैसे अगर आप के पास धन दौलत बेशुमार है।तो आपको धन दौलत का अहंकार सदा लगा रहेगा। आप सिर्फ अपने  हैसियत के लोगो को ही अपना समझते रहेंगे।

ये जरूरी नहीं है सभी धनवान एक जैसे अहंकारी होते है।   हमने देखा है की कुछ अमीर लोग  गरीबों को पता नही क्या सोचते है।उनके सामने खड़े होने या उनसे बात करने  से भी कतराने लगते है।उन्हे लगता है गरीबों से बात करने से उनके  दम में कोई दाग लग जायेगा।  कुछ लोगो को अपनी सुन्दरता पर बहुत अभिमान होता है।सोचते रहते है की दुनिया में उनसे खूबसूरत कोई नही है। अपनी खूबसूरती का ढिंढोरा पीटते रहते है। उन्हें  रंग भेद का अहंकार इतना चढ़ जाता है की पूछो ही मत।किसी सावले इंसान के साथ बैठना,उनसे दोस्ती करना उन्हे  शोभा नही देता।  किसी को अपने ताकत पर अहंकार होता है।और वह सोचता है की दुनिया में वही एक सर्वश्रेष्ठ योद्धा है।बाकी सभी तुच्छ है। खुद को सर्वश्रेष्ठ ताकतवर समझकर को लोगों पर जुल्म करने लगता है। अधिकार लोगो पर चलाने की कोशिश करने लगता है।  किसी को अपने पद का अहंकार तो किसी को अपने कलाकारी पर।सोचने वाली बात यह है की अहंकार  आखिर किस लिए और किस के लिए।

आज नही तो कल हमारे इस माटी के तन को इसी माटी में मिल जाना है। खाली हाथ  हम सभी इस धरती पर आए थे ।और खाली हाथ ही हमे इस जहां से जाना है।तो फिर घमंड किस बात का।  जब महान पंडित,महाज्ञानी, सर्वशक्तिमान रावण का  घमंड इस धरा पर नही रहा।तो हम किस खेत की मूली है।  सोने की लंका में रहने वाला। धन दौलत से परिपूर्ण ,जिसके समक्ष भगवान भी घुटने टेक देते थे। उस रावण का घमंड पल भर में चकनाचूर हो गया। हम सभी जानते जानते है।फिर भी हमारे मस्तिष्क में बात घुसती नही।

दिनो दिन हम अहंकारी बनते जाते है।

अहंकारी बनकर जीवन जीने से जीवन में कभी सुख शांति का वास नही होता।सिर्फ सर्वनाश ही होता है।

असहाय लोगो की मदद करना, उनसे  साथ मिलजुलकर रहना।  अपनी थोड़ी सी खुशी लोगो को देना।  यही एक परोपकारी कार्य है।जो आपको दुनिया  के समक्ष  सर्वश्रेष्ठ बनाने में योगदान करता है

आपके पास करोड़ों रुपए है।लेकिन एक असहाय को  आप दो वक्त की रोटी दे नही सकते तो आपका जीवन  आपकी दौलत फूटी कवड़ी  के तुल्य है। आप जिस सभा समाज में रहते हो।  और उस समाज लोगो  के प्रति  आपके मन में प्रेम दया भाव तनिक भी नही है। तो आपका जीवन व्यथ है।

आपका कमाया धमाया सभी यही रह जायेगा।और आप पल भर में इसी धरती विलीन हो जाएंगे। तो बताइए आपका अहंकार तब कहा होगा। तो फिर अहंकार किस लिए बोलो।  अपनी सुन्दरता पर घमंड करने वाले तेरी सुंदरता भी।वक्त के साथ काम होती जाएंगी। जैसे जैसे उम्र बड़ती जाएंगी तेरी सुंदरता भी अपना रंग फीका कर  इसी जमी  पर बिखर जायेगी।

तो फिर किस लिए ये अहंकार अपने भीतर रखते हो।


अगर आपका जीवन रंगीन है।तो आप किसी एक की जिंदगी में कुछ खुशियों के रंग डाल कर उसका जीवन रंगमय बनाने कार्य करे। क्योंकि उस असहाय की दुवा ही आपकी जिंदगी में खुशियों की बहार लाएगी।

 अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगा। अहंकारी जीवन से जीवन में कभी कोई खुशियां  नहीं मिलती। ना ही उसका जीवन सार्थक होता है।

ऊंच-नीच, रंगभेद सभी को भूल कर हमे जीवन में

प्रेम भाव के साथ जीवन व्यापन  करना है।जहा प्रेम भाव नहीं वहां सटीक जीवन ही नही।

हम दर दर भटकते फिरते है। चंद खुशी पाने के लिए

लेकिन वास्तविक खुशी हमारे भीतर ही होती है।क्योंकि हम अहंकार की चादर लपेट कर अपना जीवन व्यतीत करते है।जिस कारण हमे मिलने वाली खुशी अहंकार के प्रभाव से हमारे जीवन से लुप्त हो जाती है। और हम खुशियों के लिए दर-दर घूमते फिरते हैं। एक भूखे इंसान को दो वक्त का खाना खिला कर  देखिए। एक असहाय को थोड़ी सी मदद करके देखिए। अपने से छोटे लोगों के साथ दो पल बैठ कर देखिए। किसी के दुख में अपना हाथ उस पर रख कर देखिए। दुनिया की सारी खुशी आपकी आपके पास है।ऐसा जरूर आपको प्रतीत होगा।

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