ज्यादातर स्कूलों में उन्हें तोता-रटन्त शिक्षा ही दी जाती है और जब कोई बच्चा बहुत-कुछ रट लेता है, तो दूसरों के सामने उसका प्रदर्शन कराकर गार्जियन खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। पर क्या उन्होंने और स्कूल-टीचर्स ने कभी यह सोचा है कि इससे उस बच्चे के नेचुरल टैलेंट का कितना भला हो रहा है? कितने पेरेंट्स और टीचर्स ऐसे होंगे, जो बच्चों की पसंद-नापसंद जानने और फिर उसके मुताबिक उन्हें निखारने-संवारने की कोशिश करते हैं? खोजने पर ऐसे गिने-चुने ही मिलेंगे, जो वास्तव में उनके इंट्रेस्ट को समझकर उसके मुताबिक उन्हें सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं। ज्यादातर पेरेंट्स तो पड़ोसी या किसी रिश्तेदार की संतान की कामयाबी का हवाला देते हुए अपने बच्चे को भी उसी की राह पर चलने का प्रेशर डालते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि या तो बच्चा अपने भविष्य को लेकर कन्फ्यूज हो जाता है या फिर कोई उल्टा-सीधा कदम उठाकर बिखर जाता है। चाहे माता-पिता हों या टीचर, सभी को यह समझना चाहिए कि कोई भी बच्चा उसी क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकता है, जिसमें उसकी स्वाभाविक रुचि होगी। जरूरत उसकी इसी रुचि को पहचानने और समझने की है। अगर आपका बच्चा अपनी पसंद के किसी खेल, म्यूजिक, आर्ट, डांस, राइटिंग में लाजवाब प्रदर्शन करता है, तो क्या इससे आपका नाम रोशन नहीं होगा? तो फिर क्यों बच्चे पर अपनी पसंद थोपकर या दूसरों की तरह बनने का दबाव डालकर खुद उसके बचपन को खत्म करने पर आमादा हैं। उसकी खुशी को समझ कर ही कदम बढ़ाएं, ताकि आप भी हमेशा खुश रह सकें...
ज्यादातर स्कूलों में उन्हें तोता-रटन्त शिक्षा ही दी जाती है और जब कोई बच्चा बहुत-कुछ रट लेता है, तो दूसरों के सामने उसका प्रदर्शन कराकर गार्जियन खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। पर क्या उन्होंने और स्कूल-टीचर्स ने कभी यह सोचा है कि इससे उस बच्चे के नेचुरल टैलेंट का कितना भला हो रहा है? कितने पेरेंट्स और टीचर्स ऐसे होंगे, जो बच्चों की पसंद-नापसंद जानने और फिर उसके मुताबिक उन्हें निखारने-संवारने की कोशिश करते हैं? खोजने पर ऐसे गिने-चुने ही मिलेंगे, जो वास्तव में उनके इंट्रेस्ट को समझकर उसके मुताबिक उन्हें सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं। ज्यादातर पेरेंट्स तो पड़ोसी या किसी रिश्तेदार की संतान की कामयाबी का हवाला देते हुए अपने बच्चे को भी उसी की राह पर चलने का प्रेशर डालते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि या तो बच्चा अपने भविष्य को लेकर कन्फ्यूज हो जाता है या फिर कोई उल्टा-सीधा कदम उठाकर बिखर जाता है। चाहे माता-पिता हों या टीचर, सभी को यह समझना चाहिए कि कोई भी बच्चा उसी क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकता है, जिसमें उसकी स्वाभाविक रुचि होगी। जरूरत उसकी इसी रुचि को पहचानने और समझने की है। अगर आपका बच्चा अपनी पसंद के किसी खेल, म्यूजिक, आर्ट, डांस, राइटिंग में लाजवाब प्रदर्शन करता है, तो क्या इससे आपका नाम रोशन नहीं होगा? तो फिर क्यों बच्चे पर अपनी पसंद थोपकर या दूसरों की तरह बनने का दबाव डालकर खुद उसके बचपन को खत्म करने पर आमादा हैं। उसकी खुशी को समझ कर ही कदम बढ़ाएं, ताकि आप भी हमेशा खुश रह सकें...