विलेज इकोनॉमी के अंतर्गत ऐसे कई क्षेत्र आते हैं, जहां कोशिशें परवान चढे तो सोना बरस सकता है..
इस क्षेत्र में ऐसे क्षेत्रों को शामिल किया जाता है, जिनका संबध कृषि व संबंधित क्षेत्रों से है। आज ये चीजें पूरी तरह प्रोफेशनल हो चुकी हैं। इनमें कामयाबी के लिए जरूरी है थोडा धर्य व पूरा समर्पण। अगर आप चाहें तो आपके लिए अवसर के कई दरवाजे खुले हैं।
ग्राम स्वराज की मेरी कल्पना हैकि यहां हर व्यक्ति अपने आप में आत्मनिर्भर होगा और यह तंत्र अपनी सभी जरूरतें स्वयं पूरा कर सकेगा।
महात्मा गांधी
रूरल मैनेजमेंट से मिली है नई तस्वीर
देश की इकोनॉमी में गांवों का योगदान कोई रहस्य नहीं रह गया है। खुद भारत जैसे देश में जहां बहुसंख्य आबादी गांवों मे रहती हो, रूरल मैनेजमेट की अवधारणा और पुख्ता हो जाती है। दरअसल प्रोफशनल रूरल मैनेजर्स का काम ग्रामीणों की विकास परक गतिविधियों में सहयोग व सलाह देना होता है। इन सलाहों में फसल उत्पादन, फसलों के व्यवसायिक प्रबंधन, जल संचयन, मृदा सुधार, उद्यमशीलता जैसी चीजें होती हैं। वैसे भी विकास के चक्के को तेज करने के लिए रूरल मैनेजर्सकी भूमिका अहम मानी जा रही है। मांग और हालात को देखते हुए ज्यादातर प्रबंधन कॉलेज रूरल मैनेजमेंट को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना रहे हैं।
माइक्रोफाइनेंस हैकारगर
बांग्लादेश ग्रामीण बैंक के पूर्व प्रमुख यूनिस खान के माइक्रोफाइनेसिंग के सफल प्रयोग के बाद पूरी दुनिया ने इसके महत्व को समझा है। दरअसल में माइक्रोफाइनेसिंग वे छोटे लोन होते हैं, जिनका इस्तेमाल दुकानदारों, फेरीवालों, डेयरी, पोल्ट्री समेत दूसरे कम पूंजी वाले व्यवसाइयोंकी वित्तीय जरूरतें पूरी करने में होता है। एक अनुमान के मुताबिक आज देश के करीब 10 करोड परिवारों को माइक्रोफाइनेंसिंग सुविधाओं की दरकार है। ऐसे में इस क्षेत्र में आज जॉब्स की जोरदार संभावनाएं हैं।
डेयरी ने सच किए सपने
डेयरी, पशु पालन हमेशा से ही कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ रहे हैं। पर पहले जहां डेयरी प्रोडेक्ट्स के उत्पादन का लक्ष्य निजी जरूरतें पूरी करना हुआ करता था, आज इसने व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा का रूप ले लिया है। नेशनल सैंपल सर्वे के एक अध्ययन के मुताबिक यह सेक्टर देश में 9.8 मिलियन लोगों को सीधा व करीब इतने ही लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दे रहा है। उत्पादन की दृष्टि से आज भारत, दुनिया का सबसे बडा दूध उत्पादक देश है जहां विश्व के 13 फीसदी दूध का उत्पादन होता है। माना जा रहा है कि बढती मांग के बीच भविष्य में योग्य लोगों की काफी जरूरत होगी।
रूरल मार्केट ने बदली जमीन
आज रूरल कंज्यूमर मार्केट देश के सबसे तेजी से बढते सेक्टर्स में एक है। इसकी ग्रोथ रेट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2004-05 की तुलना में आज इस क्षेत्र का विस्तार दोगुना हो चुका है। वहीं भारत में रूरल कंज्यूमर मार्केट का कुल बाजार 425 बिलियन डॅालर के आंकडे को छू रहा है। इसका यह विस्तार इन दिनों ग्रामीण युवाओं के सपनों को भी विस्तार दे रहा है।
सेरीकल्चर का रेशमी कॅरियर
भारत की जलवायु रेशम कीट पालन के लिए आदर्श है। देश में सिल्क की पांच तरह की किस्मों का उत्पादन होता है। रेशम उत्पादों की बढी मांग के बीच आज यहां भारी निवेश के साथ कार्यदक्ष लोगों की जरूरत है। ऐसे में वे लोग जो इस फील्ड में कार्य करना चाहते हैं, उनके लिए तरक्की के दरवाजे खुले हैं।
फिशरीज ने बढाए विकल्प
देश का विशाल समुद्र तट, नदियां, असंख्य तालाब जैसी प्राकृतिक परिस्थितियां देश में मत्स्य पालन की असीम संभावनाएं पैदा करती हैं। आज देश में 1 करोड से ज्यादा लोग प्रत्यक्ष, व अप्रत्यक्ष रूप से मत्स्य पालन से जुडे हैं, वहीं मत्स्य निर्यात के मामले में भारत की गिनती शीर्ष दस देशों में होती है।
हस्तशिल्प से मिलेगी पहचान
आज दुनिया में हस्तशिल्प का बाजार 400 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। पर अभी इसमें भारत की हिस्सेदारी मात्र 2 प्रतिशत की ही है। पर देश की विविधता,प्राचीन इतिहास को देखते हुए भारतीय हस्तशिल्प खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में विकास की ढेरों संभावनाएं मौजूद हैं। कई सरकारी, गैर सरकारी प्रयास आज इसी दिशा मे हो रहे हैं। जिसके चलते पिछले कुछ सालों में यहां 15 फीसदी की विकास दर दर्जकी गई है।
पॉल्ट्री फार्मिग
ग्रामीण क्षेत्रों में पॉल्ट्री फार्मिग यानि मुर्गीपालन भी रोजगार का एक अहम जरिया बन उभरा है। देश में पॉल्ट्री उत्पादों की बढी मांग के बीच यहां करने को बहुत कुछ है। कई सरकारी बैंकें, सहकारी संगठन इस क्षेत्र में युवाओं को प्रशिक्षण के साथ वित्तीय मदद भी मुहैया कराते हैं।
ऑर्गेनिक फार्मिग
आर्गेनिक फार्मिग तेजी से बढता सेक्टर है। खासतौर पर उन क्षेत्रों में जहां रासायनिक प्रभाव से जमीनें बंजर होती जा रही हैं, ऑर्गेनिक फार्मिग एक सही विकल्प है। शहरों में तेजी से लोकप्रिय हो रही ऑर्गेनिक सब्जियां, फ्रूट्स आउटलेट्स इसकी संभावनाओं को बढत दिला रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ऑर्गेनिक फार्मिग के विकास के लिए नाबार्ड समेत कई सरकारी व गैर सरकारी संस्थान कार्यरत हैं।
बी कीपिंग से उपजती कॅरियर की मिठास
मधुमक्खी पालन आज ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ अर्धशहरी, कस्बों, शहरों में भी फायदे का सबब बन रहे हैं। मोम व शहद का मुख्य श्चोत मधुमक्खी पालन यद्यपि लघु उद्योगों की ही श्रेणी में आता है, लेकिन इसके फायदों को देखते हुए इसमें प्ाूजी विस्तार व रोजगार की उजली संभावनाएं हैं।
हार्टीकल्चर में हरा भरा भविष्य
बागवानी का क्षेत्र वैसे तो कृषि से जुडा हुआ है, लेकिन बागवानी उत्पादों का बढा चलन, निर्यात संभावनाएं इसे पृथक पहचान दे रही हैं। बागबानी के अंतर्गत सभी प्रकार के फल व सब्जी उत्पादन, कीटों की रोकथाम, उत्पादन बढोत्तरी जैसी चीजें आती हैं। इस क्षेत्र में आप बतौर विशेषज्ञ, सुपरवाइजर, हॉर्टीकल्चर स्पेशलिस्ट, फ्रूट वेजीटेबल इंस्पेक्टर काम कर सकते हैं।
मशरूम से उपजेगी खुशहाली
पिछले कुछ एक सालों में लोगों मेंपोषण के बारे में आई जागरूकता के चलते पूरे देश मे मशरूम की मांग में वृद्धि देखी जा सकती है। आज इसका उत्पादन बढाने के लिए सरकार, ग्राम स्तर पर मशरूम की खेती को बढावा दे रही है। इन कार्यक्रमों के तहत बीज, लोन के साथ उत्पादन जागरूक ता जैसी चीजें भी अंजाम दी जा रही हैं।
महिलाओं के लिए भी है अवसर
महिलाओं को भी कृषि से जुडा यह सेक्टर उपयोगी अवसर देता है। सहकारी उद्यम, स्वयं सहायता समूह, सस्ते ऋण, तकनीकी सहायता जैसे प्रयास इस क्षेत्र में महिलाओं को नई व आत्मनिर्भर पहचान दे रहे हैं। स्थानीय व ग्राम स्तर पर मसाला, कपास छंटाई, फूड प्रोसेसिंग, पॉल्ट्री, जूट, गन्ना, राइस मिल्स जैसे काम इन्हीं में शुमार होते हैं।
ग्राम: आत्मनिर्भरता की ओर
ग्राम स्वराज महात्मा गांधी की ग्रामीण आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करती एक ऐसी ही परिकल्पना है, जिसकी आखिरी मंजिल राम राज्य है। इसके अनुसार ग्रामों में पंचायतें ही विकास के लिए जिम्मेदारी होंगी। यहां न कोई बाहरी दखल होगा, न ही किसी प्रकार की परनिर्भरता। महात्मा गांधी के ही शब्दों में संतुलित विकास की महत्वपूर्ण शर्त गांव का विकास है और ग्रामोद्योग इस शर्त को पूरा करने का माध्यम। अब सरकारें भी यह मानने लगी हैं कि इस तरक्की का आधार गांव की घसियाली मिट्टी ही है, जिससे उपजते सोने से ही देश की तकदीर बनती बिगडती है। खुद भारत पर नजर डालें तो आज देश की करीब 70 फीसदी आबादी ग्रामीण है जो देश के जीडीपी में एक चौथाई की ताकतवर हैसियत रखती है। हमारी खाद्य आत्मनिर्भरता गांवों की ही देन है। इन्हीं सबको देखते हुए आज सरकार प्रधानमंत्री ग्राम सडक योजना, रूरल हाउसिंग स्कीम, संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, स्वर्ण जंयती ग्राम स्वरोजगार योजना, मनरेगा, प्रधानमंत्री ग्रामोदय जैसी कई ग्रामोन्मुख योजनाएं चला रही है। इसके तहत देश के समग्र आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास का व्यापक खाका खींच रही है। कई निजी प्रयास भी इस क्षेत्र को रोजगार की उर्वर जमीन में तब्दील कर कर रहे हैं।
जरूरत ने बढाया गांव का महत्व
आजादी के बाद से अब तक औद्योगिकीकरण के मायने काफी कुछ बदल गए हैं। पहले जहां औद्योगिकीकरण का महत्व अपनी खुद की जरूरतें पूरी करने से था, वहीं अब औद्योगिकीकरण, विकास दर की रफ्तार का सबब बन चुका है। इस दरम्यान देश में बाजारवादी संस्कृति बढी, नए अवसर पैदा हुए हैं, तो लोगों के पास धन की आमद में गुणात्मक वृद्धि हुई, जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर हुई। पर ज्यादा फायदा उन शहरों को मिला, जो इस दौरान तेजी से पूंजीगत गतिविधियों के गढ बनें। विकास की यही रफ्तार गांवों से लोगों के शहरों की ओर पलायन का भी कारण बनी। एक अनुमान के मुताबिक आने वाले 10 सालों में देश में करीब 150 मिलियन लोग शहरों की ओर पलायन करेंगे। इसलिए यह आज की जरूरत है कि लोगों को उनके गांवों में ही रोजगार मुहैया करायाजाए। इन्हीं सबकेकारण आज ग्राम आत्मनिर्भरता एक महत्वपूर्ण मसला बनकर उभरा है। यहां कृषि से लेकर कुटीर उद्योगों तक अवसरों का संजाल बिछा है। जो युवा अच्छे कॅरियर के लिए शहरों की बांट जोहते थे, आज अपने दर पर नौकरियों की आहट पा रहे हैं।
तरक्की से बदली चमक
इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में इंडस्ट्री तेजी से पांव पसार रही है। एसोचैम के एक अध्ययन के मुताबिक, आज रूरल रिटेल मार्केट का आक ार 113 बिलियन डॉलर का हो चुका है जो देश के कुल रिटेल मार्केट का 40 प्रतिशत है।
इस बडे मार्केट के अपार फायदों को पाने के लिए देश के कई कॉरपोरेट गु्रप्स गांवों का रुख कर रहे हैं। यही नहीं 425 बिलियन डॉलर का रूरल कंज्यूमर मार्केट भी आज नेशनल मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए आकर्षण का विषय है। इसके साथ रूरल सर्विसेज इंडस्ट्री व रूरल हेल्थ केयर इंडस्ट्री भी तेजी से अपने पांव गांव की ओर बढा रहे हैं।
एग्रो इकोनॉमी से पुराना नाता
चरखा एक यंत्र भर नहीं बल्कि हिदुस्तान की कंगालियत मिटाने का एक अस्त्र है, बताने की आवश्यकता नहीं कि जिस रास्ते से भुखमरी मिटेगी, स्वराज भी उसी रास्ते आएगा।
प्रांरभ से ही ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अपनी खाद्य जरूरतों से लेकर वस्त्र, मकान, रोजमर्रा की चीजों का उत्पादन स्थानीय स्तर पर करते थे। इसके कई फायदे थे। एक तो गांववासियों की जीवनोपयोगी चीजों के लिए बाहर पर निर्भरता कम थी, वहीं इससे गांव के लोगों को रोजगार भी मुहैया हो जाता था। लेकिन इस दौरान ग्रामवासी, उत्पादन के व्यवसायिक लाभ से दूर रहते थे। इसी को देखते हुए आज सरकार ग्रामवासियों को उत्पादन का पूरा फायदा देने के लिए प्रतिबद्ध है। कईग्रामीण केंद्रित योजनाओं, ग्रामीण क्षेत्रों में किए भारी निवेश के चलतेआज विलेज इकोनॉमी, देश की अर्थव्यवस्था का पेसमेकर बन रही है। यहां तक कि जीडीपी से लेकर कॉरपारेट जगत के तिमाही, छमाही नतीजों तक पर यह असर डालती है। लिहाजा इस क्षेत्र को देश के विकास का पाथ फांइडर कहा जा रहा है।