बदली सोच, बदला कॅरियर
पिछले कुछ समय में देश में खेलों की गंगा में काफी पानी बहा है। वह भारत जो कभी ओलंपिक में जीत से ज्यादा हिस्सेदारी अहम के दर्शन पर भरोसा करता था, आज पदकों के गंभीर दावेदारों में से है। स्थितियां कितनी बदली है?इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यदि लंदन में हम शूटिंग, बॉक्सिंग, रेसलिंग, बैडमिंटन, टेनिस, तीरंदाजी जैसे खेलों में पदक से चूक जाते हैं, तो ये उलटफेर कहा जाएगा। खुद लंदन ओलंपिंक की पूर्व संध्या पर आयोजित गोल्ड मैन सैसे का सर्वे भी भारत को 3 स्वर्ण समेत 5 पदकों का दावेदार बता रहा है। ये सभी चीजें इस बात की तस्दीक करने के लिए काफी है कि देश में खेलों का मदान अब पहले जैसा नहीं रहा। इसमें उगे घास के ताजा मुलायम अंकुर अब तक का इतिहास बदलने पर आमादा है। पिछले दशकों में देश में आए सामाजिक आर्थिक परिवर्तनों के साथ सरकारी योजनाएं, कॉरपोरेट जगत का सहयोग इसके लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं।
खेलोगे-कूदोगे बनोगे नवाब
आज पढोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे तो होगे खराब जैसी कहावत के मायने उलट गए हैं। पिछले कुछ दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था में आई तेजी के चलते खेलों पर हावी ये मान्यताएं अब उलट चुकी हैं। देश की इकोनॉमी में आई तेजी ने खेलों के अर्थशास्त्र पर भी असर डाला है। यहां बेशुमार पैसा, शोहरत का जादू युवाओं के सिर कुछ ऐसे चढ रहा है कि खेल अब मेन स्ट्रीम कॅरियर का हिस्सा बन चुके हैं। सरकार की रुचि, औद्योगिक घरानों का बढा रुझान, बदली जन मानसिकता के चलते आज भारत खेलों की उर्वर जमीन बन रहा है, जहां हर साल धुरंधर खिलाडी पदकों की फसल काट रहे हैं।
क्यों बना खेल सबका चहेता
आज खेल मनोरंजन या टाइमपास के साथ कॅरियर के भी जोरदार विकल्प बन गए हैं। वे मां-बाप जो अब तक अपने बच्चों को गर्मियों की छुट्टियों में शौकिया स्विमिंग, टेनिस, क्रिकेट, बैडमिंटन जैसे खेलों की क ोचिंग दिलाया करते थे, आज अपने बच्चों में कल के सायना, भूपति, विंजेदर का अक्स देखते हैं। लिहाजावे हर स्तर पर अपने बच्चों को हर संभव सहूलियतें देकर उनक प्रतिभा तराश रहे हैं।
मीडिया ने बनाए स्ट्रॉन्ग मूव
पहले के उलट मीडिया आज खेलों को लेकर जागरुक हुआ है। केवल क्रिकेट ही नहीं बल्कि बाकी खेलों व उससे जुडे खिलाडी भी आज मीडिया के जरिए घर-घर पहचाने जाने लगे हैं। देश के दूरदरारज अंचलों/देहातों में छिपी प्रतिभा की पहचान में भी मीडिया ने कारगर भूमिका अदा की है। खेलों में रुचि जगाने में लाइव टेलीकास्ट का महत्वपूर्ण रोल रहा है।
सरकारी प्रयास ने दी ऊंची हिट
आज खेलों केप्रति सरकारी रवैये में सुखद बदलाव देखे जा सकते हैं। आज की सरकार भी यह नहीं चाहती कि बाकी क्षेत्रों में कुलाचें भरता भारत खेलों में फिसड्डी साबित हो। लिहाजा सरकार इन दिनों खेलों के विकास, प्रोत्साहन के लिए अच्छी खासी वित्तीय मदद मुहैया करा रही है। इसमें लॉन्ग टर्म डेवलेपमेट प्लान (एलटीडीपी) के अंतर्गत विदेशी कोच/विशेषज्ञों, विदेशों में प्रशिक्षण, खेल उपकरणआयात शुल्क में कमी, इंफ्रास्ट्रक्चर की बेहतरी, गवर्नमेंट जॉब जैसे उपाय खास हैं।
औद्योगिक घरानों से मिला स्टेमिना
खेलों में ज्यादा से ज्यादा युवाओं को लाने और ग्रूम करने में निजी औद्योगिक समूहों ने प्रशंसनीय कार्य किया है। बीते सालों में स्पोर्ट्स स्पॉन्सरशिप से लेकर प्रशिक्षण, प्रतिभाओं की खोज में इन समूहों का अच्छा खासा योगदान रहा है। जेआरडी टाटा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, सहारा, महिंद्रा आदि इस क्षेत्र में कुछ जाने पहचाने नाम हैं। आज खेल प्रशासकों को यह बात अच्छी तरह समझ आ चुकी है कि बगैर पक्का प्रोफेशनल रवैया अपनाए पदक नहीं मिलने वाला। विदेशी कोच, विदेशों में मिलने वाला प्रशिक्षण, फीजियोथेरेपिस्ट,री-हैब, एक्लीमेटाइजेशन कैंप, स्पोर्ट्स सायकोलॉजिस्ट के परामर्श भारतीय खेलों के बदलते नक्शे की खास निशानियां हैं।
कॅरियर से संबंधित कोर्स
सच पूछें तो बीजिंग ओलंपिक में मिली कामयाबी और कॉमनवेल्थ गेम्स के सफल आयोजन ने हमें बताया कि क्रिकेट के अलावा भी देश में खेलों की बडी दुनिया है, जिन्हें अपनाकर शोहरत की ऊंचाइयां पाई?जा सकती हैं। यही कारण है कि आज युवा क्रिकेट के इतर भी न केवल दूसरे खेलों में रुचि ले रहे हैं बल्कि कामयाबी के लिए पसीना भी बहा रहे हैं। भारतीय खेल प्राधिकरण के तहत चलने वाले तमाम तरह के कोर्स व स्पेशलाइजेशन खेलों में कॅरियर देखने वालों के लिए वरदान सरीखे हैं-
क्या हैं कोर्सेस- देश के कई मान्यता प्राप्त संस्थान आज खेलों में अंडर ग्रेजुएट, ग्रेजुएट, सर्टिफिकेट, डिप्लोमा स्तर के कोर्स ऑफर करते हैं। आप रुझान रखते हैं तो स्नातक बाद एथेलेटिक्स, फुटबॉल, हॉकी, बास्केटबॉल, वॉलीबॉल जैसे खेलों में द्विवर्षीय मास्टर डिग्री या फिर एक साल के पीजी डिप्लोमा की राह चुन सकते हैं। कुछ इंस्टीट्यूट चुनिंदा छात्रों के लिए स्पोर्ट्स साइंस/कोचिंग में एम-फिल, पीएचडी जैसे स्तरीय कोर्स आयोजित करते हैं।
स्पोर्ट्स मेडिसिन में अवसर-खेलों में चोट लगना कोई नई बात नहीं है। स्पोर्ट्स मेडिसन के तहत इन खिलाडियों की लंबी अवधि तक चलने वाले इलाज व रीहैबिलिटेशन प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है। आज देश के क ई संस्थान इस क्षेत्र में कोर्स चला रहे हैं। इसके अंतर्गत एमबीबीएस स्टूडेंट्स को 2 साल के डिप्लोमा इन स्पोर्ट्स मेडिसिन (डीएसएम) करने का मौका मिलता है।
मौकों का मैदान
आज खेलकूद को वक्त की बर्बादी नहीं अवसरों का मैदान कहा जाता है। अब यह आप पर है कि कैसे इन अवसरों को कैश कराते हैं..
यदि आप से पूछें कि हर्षा भोगले, चारू शर्मा, डॉ.नरोत्तम पुरी, गौतम भिमानी में क्या समानता है? मुमकिन है आप असमंजस में पड जाएं। खेलों की दुनिया के ये चंद ऐसे नाम हैं, जो बतौर खिलाडी मैदान पर तो कभी जलवा नहीं दिखा सके। बावजूद इसके खेलों की दुनिया में इनका रुआब देखने लायक है। यदि आप भी खेलों में रुचि रखते हैं तो जरूरी नहीं कि आप पेशवर खिलाडी बनकर ही नाम कमाएं। आज तो खेलों की व्यापक होती परिधि ने खेलों में रुझान वाले युवाओं को कई कॅरियर विकल्प दिए हैं। यहां तक कि पूर्व खिलाडियों के लिए इस क्षेत्र में दूसरी पारी खेलने के पूरे मौके हैं-
फीजियोथेरेपिस्ट है जरूरत- फीजियोथेरेपिस्ट आधुनिक खेलों की जरूरत हैं। खेल कोई भी हो, इनका रोल एक ही होता है खिलाडियों को चोटों (इंटर्नल मसल्स इंजरी,स्ट्रेस आदि) से बचाना। व्यस्त कैलेंडर, खिलाडियों पर पडते दबाव के बीच स्कूल से लेकर नेशनल लेवल तक फीजियो की अच्छी मांग है। आप संबंधित कोर्स करके इस क्षेत्र से जुड सकते हैं।
कोच बन करो कमाल-खेलों में कोच की क्या भूमिका होती है कोई ओलंपिक में भाग ले रहे भारतीय कुश्ती दल से पूछे। जहां गुरू सतपाल ने अपने असाधारण कौशल से कम वक्त में खेल को नई?ऊचांइयां बख्शी हैं। इस फील्ड में पूर्व खिलाडियों, खेल का जबर्दस्त ज्ञान रखने वाले प्रशिक्षित लोगों को हाथों-हाथ लिया जाता है। कमेंट्रेटर/प्रेजेंटर बने गेम चेंजर-आजकल खेलों का लाइव प्रसारण कोई नई बात नहीं रह गया है ,लेकिन उसकी लोकप्रियता बहुत कुछ प्रेजेंटर व कमेंट्रेटर पर भी निर्भर करती है। आखिर सुशील दोषी, हर्षा भोगले, जसदेव सिंह, सुरेश सरैय्या के नामों को कैसे नजरंदाज किया जा सकता है। यदि आपकी भी आवाज में दम है, तो देश के कई जाने माने स्पोर्ट्स चैनल, न्यूज चैनल आपकी मंजिल बन सकते हैं।
स्पोर्ट्स?सायकोलॉजिस्ट माने, मुश्किलों का हल-खेलों में बढते प्रोफेशनलिज्म का प्रभाव खिलाडियों पर पडना स्वाभाविक है। ऐसे में कई?बार खिलाडी का आउट ऑफ फॉर्म चले जाना, आत्मविश्वासहीनता का शिकार हो जाना आम है। स्पोर्ट्स सायकोलॉजिस्ट खिलाडियों को इन्हीं समस्याओं से उबारते हैं। इन दिनों ज्यादातर प्रोफेशनल खिलाडी व टीमें समय-समय पर स्पोर्ट्स सायकोलॉजिस्ट से परामर्श लेती रहती हैं। स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेटर बन लगाओ हिट- खेल ख्ेालना और उसे चलाना दो अलग चीजें हैं। शायद इसी तथ्य में स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन या खेल प्रशासन की महत्ता छिपी है। किसी भी खेल को ऊपर लाने और नीचे गिराने दोनों में इनकी बडी भूमिका होती है। खेल के साथ उसके बेहतर प्रबंधन का ज्ञान रखने वाले लोग इस क्षेत्र की बडी मांग हैं। देखा गया है ज्यादातर संबंधित खेल के पूर्व खिलाडियों को बतौर प्रशासक जगह मिलती है।