आज के विवेकानंद

नेशनल यूथ डे स्पेशल (12 जनवरी): आज के विवेकानंद
यूएन हैबिटैट और आइआरएसएस नॉलेज फाउंडेशन की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार, आज इंडिया के प्रत्येक शहर का तीन में से एक शख्स युवा है। वहीं, 2020 तक इंडिया दुनिया का सबसे युवा देश बन जाएगा, जहां नौजवानों की आबादी करीब 64 परसेंट हो जाएगी। जाहिर है, इस पीढी से अपेक्षाएं भी होंगी कि वह स्वामी विवेकानंद सरीखे शख्सियतों की तरह राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे। वैसे, आज भी ऐसे युवाओं की कमी नहीं है जो अपने मन की आवाज सुनकर जाने-अनजाने स्वामी विवेकानंद के बताए मार्ग पर चल रहे हैं। फिर चाहे वे मैनुअल स्कैवेंजिंग (सिर पर मैला ढोने) के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चलाने वाले कर्नाटक के बेजवाडा विल्सन हों या फिर शिक्षा की लौ जलाते क्षितिज मेहरा, नीमा पाठक या महाराष्ट्र के किसानों को टेक्नोलॉजी की मदद से सशक्त बनाते रिकिन गांधी। ऐसे कई लोग हैं जो मिशन की तरह नि:स्वार्थ भाव से अपना कर्म कर रहे हैं।
सामाजिक सरोकारों से जुडाव
सामाजिक सरोकारों से गहरे जुडाव के चलते ही देश के तमाम युवा स्टेबल जॉब छोडकर सामाजिक कायरें में दिलचस्पी ले रहे हैं। इसके कई उदाहरण हैं। जॉयलिटा सलदान्हा यूएस की मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब कर रही थीं। लेकिन जनाग्रह संस्था के कामकाज ने इन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने जॉब छोडने में देर नहीं की। जनाग्रह के साथ प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में जुड गईं। लोगों को उनके मूलभूत अधिकारों के प्रति सचेत करना, आज उनकी प्रॉयरिटी है। इस तरह से कई युवा हैं जो अपने स्तर से सामाजिक जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्हें न तो किसी से शिकायत है, न ही सरकार या किसी और से मदद की कोई अपेक्षा। इस काम से उन्हें पर्सनल सैटिस्फैक्शन मिलता है।
शिक्षा से जुडे युवा
किसी भी देश की प्रगति में शिक्षा का बडा रोल होता है। आज इंडियन यूथ टेलीकम्युनिकेशन, आइटी, स्पेस, मेडिकल साइंस, इंजीनियरिंग और दूसरे सेक्टर्स में अपना डंका बजा रहे हैं। क्षितिज मेहरा एमबीए करने के बाद मार्केटिंग फील्ड में काम कर रहे थे। लेकिन बाद में उन्होंने हिमाचल प्रदेश में गांवों के सरकारी स्कूलों के बच्चों को करियर गाइडेंस देने का फैसला किया। क्षितिज कहते हैं कि अगर उनके प्रयास से किसी बच्चे का भविष्य संवर सकता है, तो इससे बडा अचीवमेंट मेरे लिए और क्या होगा।
बदलाव में हिस्सेदारी
स्वामी विवेकानंद कहते थे कि अगर आपकी पहल से किसी की मदद हो सकती है, तो जरूर करें। यूपी के बहराइच की एक निर्धन महिला ने समाज के सामने एक मिसाल पेश की जब उन्होंने अपनी इकलौती भूमि ग्राम सभा को शौचालय बनाने के लिए दान कर दी। समाज में इन जैसे बहुत से उदाहरण हैं जो दूसरों के लिए काम कर रहे हैं। यही वजह है कि आज सोशल सेक्टर में करियर बनाने को लेकर युवाओं का रुझान बढा है। वे सोशल एंटरप्रेन्योरशिप के जरिए भी नई पहल की कोशिश कर रहे हैं।
स्वामी विवेकानंद
-जन्म : 12 जनवरी 1863, कलकत्ता
-पिता : विश्वनाथ दत्त
-1884 में पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी संभालनी पडी।
-खराब आर्थिक हालत में खुद भूखे रहकर भी अतिथियों का सत्कार किया।
-1879 में 16 साल की उम्र में उन्होंने कलकत्ता से एंट्रेंस पास करके ग्रेजुएशन की और बाद में ब्रह्म समाज में शामिल हुए।
-अपने गुरु से प्रेरित होकर नरेंद्रनाथ ने संन्यासी जीवन बिताने की दीक्षा ली और स्वामी विवेकानंद के रूप में जाने गए।
-पैदल ही पूरे भारत की यात्रा की।
-1893 में शिकागो धर्म संसद में गए और 1896 तक अमेरिका में रहे।
-9 दिसंबर 1898 को कलकत्ता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की।
-निधन : 04 जुलाई, 1902
-विवेकानंद ने योग, राजयोग तथा ज्ञानयोग जैसे ग्रंथों की रचना की।
-भारत में हर साल 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद का जन्म दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत सरकार ने इसकी घोषणा 1984 में की थी।
गरिमा के लिए संघर्ष
आमिर खान के मशहूर टीवी शो सत्यमेव जयते के जरिए देश भर ने कर्नाटक के कोलार गोल्ड फील्ड एरिया से ताल्लुक रखने वाले बेजवाडा विल्सन के बारे में जाना था। विल्सन 21वीं सदी में भी मैनुअल स्कैवेंजिंग (सिर पर मैला ढोना) जैसी कुप्रथा के जारी रहने के खिलाफ देश भर में अभियान चला रहे हैं। साथ ही इस पेशे से जुडे लोगों को गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनके प्रयासों का ही नतीजा है कि बीते सालों में हजारों की संख्या में ड्राई टॉयलेट्स को ध्वस्त कर दिया गया है। वहीं, बहुत सारे लोग मैनुअल स्कैवेंजिंग छोड दूसरे रोजगारों से जुडने लगे हैं।
सच का सामना
कहते हैं कि सच कडवा होता है। एक दिन विल्सन का सामना भी जब इस सच से हुआ कि उनके माता-पिता मैनुअल स्कैवेंजर (मैला ढोने) का काम करते हैं। यही नहीं, कोलार गोल्ड फील्ड के मडिगा समुदाय के बहुत सारे लोग इस अमानवीय पेशे से जुडे हैं और पोस्टग्रेजुएट होने के बावजूद उन्हें भी यही काम करना होगा। यह बात विल्सन से बिल्कुल सहन नहींहुई और उनके मन में खुदकुशी करने का ख्याल तक आ गया। लेकिन फिर एक दृढ संकल्प लिया कि वे इस समस्या से भागेंगे नहीं, बल्कि उसे जड से खत्म करने में अपना पूरा दम खम लगा देंगे।
आंदोलन का आगाज
विल्सन ने बताया कि मैनुअल स्कैवेंजिंग में लगे ज्यादातर लोग नशा करते थे। इसके अलावा गंदगी के बीच काम करने की वजह से उन्हें कई तरह की बीमारियां भी हो रही थीं, लेकिन रोजगार का दूसरा कोई विकल्प न होने के कारण उन्हें मजबूरी में यह काम करना पड रहा था। इसलिए उन्होंने समुदाय के लोगों को जागरूक करना शुरू किया। देखते ही देखते इलाके के तमाम ड्राई टॉयलेट्स को ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद आगाज हुआ एक आंदोलन का। नई पीढी ने इस पेशे को अपनाने से इंकार करना शुरू कर दिया। आंदोलन जोर पकडता गया। धीरे-धीरे देश के दूसरे राज्यों में भी असर दिखाई देने लगा। सिर पर मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने को लेकर आवाज तेज होने लगी। सिविल सोसायटी भी इस मुद्दे को लेकर कांशस हुई। उनका नजरियां बदलने लगा।
जागरूकता का असर
देश में एम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स ऐंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राई लैट्रिंस (प्रोहिबिशन) एक्ट 1993 के तहत मैनुअल स्कैवेंजिंग पर प्रतिबंध लगा हुआ है। इसके बावजूद कई राज्यों में यह काम बदस्तूर जारी है। यहां तक कि रेलवे और आर्मी कैनटोनमेंट तक में इनकी सेवाएं ली जाती रही हैं। विल्सन कहते हैं कि शुरू में सरकार यह सच मानने को ही राजी नहीं थी, लेकिन सामाजिक परिवर्तन यात्राओं और कम्युनिटी वर्करों के जन-जागरण अभियान से जागरूकता लाई गई। इसके बाद साल 2003 में सफाई कर्मचारी आंदोलन संस्था द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल किया गया। कोर्ट ने राज्य सरकारों से एफिडेविट देने को कहा कि उनके यहां कितने मैनुअल स्कैवेंजर्स हैं। कई सरकारों ने तो सीधे इंकार कर दिया कि उनके यहां ऐसी कोई गतिविधि होती है। लेकिन संस्था द्वारा मैनुअल स्कैवेंजर्स की मौजूदगी का सबूत देने के बाद सरकारें इस मामले को लेकर गंभीर हुर्इं। हाल ही में प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऐज मैनुअल स्कैवेंजर्स ऐंड देयर रिहैबिलिटेशन बिल 2013 भी पास किया गया है जिससे पुनर्वास के काम को रफ्तार मिलने की उम्मीद है। फिलहाल, विल्सन और उनका संगठन अपने स्तर से मैनुअल स्कैवेंजर्स को दूसरे पेशे से जोडने और उनके बच्चों को शिक्षा दिलाने में मदद कर रहा है। वे लोग खुद भी ऑटो ड्राइविंग, रिक्शा चलाने या खुद का व्यवसाय करने की कोशिश करने लगे हैं।
मंजिल है पाना
फिलहाल तमिलनाडु, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक समेज 18 राच्यों में मैनुअल स्कैवेंजर्स की पहचान कर उन्हें गरिमा और स्वाभिमान के साथ जीने की राह दिखाई जा रही है। लेकिन विल्सन के मुताबिक अभी भी देश में दो लाख से ज्यादा लोग सिर पर मैला ढोने के पेशे से जुडे हैं, जिनका पुनर्वास करना है। इसके लिए सर्वे के अलावा सरकार से वित्तीय मदद और मुआवजे की जरूरत होगी। विल्सन कहते हैं कि जिस दिन देश में एक भी मैनुअल स्कैवेंजर नहीं होगा, उस दिन वह अपने मकसद को पूरा समझेंगे।
स्वामी विवेकानंद के संदेश
-कायर और कमजोर लोग ही पाप कर्म करते और झूठ बोलते हैं। इसलिए साहस के साथ नैतिकता का पालन करें।
-खुद पर विश्वास रखें। किसी की आलोचना से भयभीत न हों। कैसा भी तूफान आए, अपनी बात और लक्ष्य के प्रति अडिग रहें।
-जब तक लोग साक्षर नहींहोंगे,कोई भी निधि भारत के गांवों की तस्वीर नहींबदल सकती है। -तब तक कर्म करना चाहिए, जब तक कि आपको अपनी मंजिल न मिल जाए।
-छोटी शुरुआत करने से न डरें। इसके बाद ही कुछ बडा हासिल होता है।
-हर इंसान में ईश्वर का प्रतिबिंब होता है, फिर चाहे वह पुरुष हो या महिला।
-अगर आपके पास साधन हैं, आप साक्षर हैं तो नि:स्वार्थ भाव से गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा करें। जो लोग ऐसा नहींकरते हैं, उन्हें देशद्रोही माना जाए।
-सात्विक विचार, धैर्य और दृढता के जरिए ही मिलती है सफलता।
बचपन संवारते युवा
स्वामी विवेकानंद दृढ विश्वास के बिना कभी कोई काम नहीं करते थे। बात चाहे छोटी हो या बडी, खुद पर उसे आजमाने के बाद ही वह किसी और को सलाह देते थे। चंडीगढ के क्षितिज मेहरा ने भी विवेकानंद के इसी सिद्धांत को अपनाकर हिमाचल प्रदेश से युवाशाला की शुरुआत की। इसके जरिए क्षितिज स्कूली बच्चों को करियर गाइडेंस देते हैं, ताकि वे अपने भविष्य को समय रहते संवार सकें।
ऐसे बदली राह
एमबीए करने के बाद क्षितिज का जॉब के सिलसिले में हिमाचल प्रदेश के गवर्नमेंट स्कूलों में आना-जाना हुआ। तभी उन्हें मालूम पडा कि तमाम इंफ्रास्ट्रक्चर होने के बावजूद बच्चों को देश-दुनिया की घटनाओं की जानकारी ही नहीं थी। शहरों में जहां बहुत सारे बच्चे दसवीं के बाद से ही करियर प्लान करने लगते हैं, गांवों के बच्चे 12वीं के बाद भी डिसाइड नहीं कर पाते थे कि कौन सी फील्ड में जाना है। उनमें इंफॉर्मेशन के अलावा कॉन्फिडेंस की भी कमी थी। इन्हीं सारी बातों ने क्षितिज पर गहरा असर डाला और उन्होंने जॉब छोडकर ऐसे बच्चों को करियर काउंसलिंग देने का फैसला किया। क्षितिज का मानना है कि अगर वह एक बच्चे को भी सही दिशा दे सकें, तो वह मेरी लाइफ का सबसे बडा अचीवमेंट होगा।
भविष्य की नींव
क्षितिज कहते हैं, युवाशाला की टीम का जोर पैसे पर नहीं,नॉलेज शेयरिंग पर होता है। इसलिए वे सरकारी और प्राइवेट स्कूलों की मदद से वर्कशॉप करते हैं। इसमें बच्चों को दस रुपये की मामूली फीस या फिर नि:शुल्क गाइडेंस दी जाती है। बच्चों के साथ-साथ पैरेंट्स की काउंसलिंग भी की जाती है।
वर्क फॉर फार्मर्स
स्वामी विवेकानंद की गिनती दुनिया के विद्वान लोगों और समाज के प्रति उनके द्वारा किए गए कायरें के लिए की जाती है। समय बदल गया है। 21वीं सेंचुरी में विवेकानंद के आदशरें पर चलने वाले युवाओं की तस्वीर भी बदल गई, लेकिन मकसद वही है जो विवेकानंद का था। ऐसे ही एक युवा हैं रिकिन गांधी जिन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग से एरोनॉटिकल ऐंड एस्ट्रोनॉटिक्स में मास्टर डिग्री, मिलान यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में बैचलर डिग्री ली और ऑरेकल जैसी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर काम भी किया, लेकिन बाद में महाराष्ट्र के किसानों के लिए काम करना जीवन का उद्देश्य बना लिया।
डिजिटल ग्रीन की शुरुआत
रिकिन न्यूजर्सी में पले-बढे। पायलट का लाइसेंस मिलने के बाद उन्होंने यूएस नेवी में भी जॉब के लिए अप्लाई किया, लेकिन फिर उनकी प्लानिंग चेंज हो गई। माइक्रोसॉफ्ट की एक रिसर्च लैब बेंगलुरु में थी। उन्हें एक ऐसी टेक्नोलॉजी की जरूरत महसूस हुई जो किसानों की उपज बढा सके। यहीं से डिजिटल ग्रीन की शुरुआत हुई। वीडियो फुटेज के जरिये किसानों को फार्मिंग की नई-नई तकनीक डिजिटल ग्रीन द्वारा सिखाई जाती है। आज एक हजार से ज्यादा गांव डिजिटल ग्रीन संस्था के टच में हैं।
दूसरे राज्यों में मिशन का सपना
डिजिटल ग्रीन संस्था भारत सरकार की नेशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन (एनआरएलएम) के साथ काम कर रही है। इसके अंतर्गत संस्था का लक्ष्य 2015 तक आंध्र प्रदेश और बिहार के दस हजार गावों तक पहुंचना है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में मां और नवजात शिशुओं के लिए प्रोग्राम फॉर अप्रोप्रिएट टेक्नोलॉजी इन हेल्थ (पाथ) के पायलट प्रोग्राम पर भी काम किया जा रहा है। डिजिटल ग्रीन इथोपिया में इंटरनेशनल डेवलपमेंट एंटरप्राइजेज के साथ किसानों को टेक्नोलॉजी का यूज कर कम लागत में कृषि पैदावार को बेहतर करने का काम कर रही है। संस्था घाना में व‌र्ल्ड कोको फाउंडेशन (डब्ल्यूसीएफ) के साथ कोको खेती को बढावा देने का भी काम कर रही है।
चैलेंजेज
रिकिन के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में काम करना काफी चैलेंजिंग है। किसानों को खेती की बेहतर तकनीक के बारे में मालूम नहीं था। गांव में बिजली न होने और पॉलिटिकल लीडरशिप में स्थायित्व न होने से किसानों के सामने कई तरह की प्रॉब्लम्स आ रही थीं। इसके बाद उन्होंने अपने हैंडीकैम से किसानों की समस्याएं, उनके सॉल्यूशन और सक्सेस स्टोरीज रिकॉर्ड करना शुरू किया। तैयार वीडियो को उन्होंने गवर्नमेंट अथॉरिटीज तक पहुंचाया। यही नही, रिकिन ने किसानों को प्रशिक्षित भी किया। आज किसान खुद वीडियो तैयार कर अपनी समस्या लेकर सीधे गवर्नमेंट अथॉरिटीज के पास जाते हैं।
स्लम में बदलाव
इंडिया की मेट्रो सिटीज तेजी से डेवलप हो रही हैं। हाइरेज बिल्डिंग्स बन रही हैं, लेकिन डेवलपिंग इंडिया की एक बडी आबादी आज भी स्लम में रहती है। स्लम में रहने वालों की जिंदगी से हम सभी वाकिफ हैं, लेकिन इनकी प्रॉब्लम्स को सॉल्व करने की दिलचस्पी कम लोगों में ही दिखाई देती है। ऐसे ही लोगों की जिंदगी सुधारने का बीडा उठाया सोशल वर्कर प्रतिमा जोशी ने। प्रतिमा जोशी अपनी संस्था शेल्टर एसोसिएट्स की मदद से लगभग बीस सालों से स्लम में रहने वालों की सैनिटेशन और आवास की समस्या दूर करने के लिए काम कर रही हैं। प्रतिमा ने महाराष्ट्र के तीन जिलों में स्थित स्लम्स में पब्लिक और इंडिविजुअल टॉयलेट की व्यवस्था कराई। हेल्थ और एजुकेशन के प्रति लोगों को जागरूक किया।
चैलेंजिंग टास्क
प्रतिमा जोशी कहती हैं कि स्लम एरिया में काम करने में शुरुआत में कई सारी दिक्कतें आईं, लेकिन धीरे-धीरे समझ में आ गया कि किसी भी स्लम में काम शुरू करने से पहले उसका पूरा सर्वे कराना चाहिए। इससे एक्चुअल स्थिति का पता चल जाता है। वर्कशॉप के जरिये लोगों को जागरूक भी किया जाता है।
सर्वे के बाद काम
शेल्टर एसोसिएट्स गवर्नमेंट अथॉरिटीज के साथ काम तो करती है, लेकिन सरकार से किसी भी तरह का अनुदान नहीं लेती है। प्रतिमा कहती हैं कि वह गवर्नमेंट अथॉरिटीज को बताती हैं कि सैनिटेशन संबंधी प्रोजेक्ट किस एरिया में शुरू करना है। वह सर्वे, मैपिंग आदि से संबंधित रिपोर्ट गवर्नमेंट के साथ शेयर करते हैं। इससे स्लम में जरूरत के मुताबिक काम होता है। संस्था ज्योग्रॉफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) की मदद से भी काफी काम करती है।
वर्किंग एरिया
शेल्टर एसोसिएट्स महाराष्ट्र के पुणे, सांगली और मिराज जिले में काम कर रही है। इन शहरों के स्लम में रहने वाले लोगों के लिए हाउसिंग, सैनिटेशन और हेल्थ से जुडी काफी प्रॉब्लम्स शेल्टर एसोसिएट्स के जरिए दूर हुई हैं।
सोसायटी में अवेयरनेस
सोसायटी में आज जो भी चेंजेज सामने आ रहे हैं, उनमें युवाओं का रोल अहम है। आज युवाओं को साथ लेकर सोसायटी बदलने की कोशिश की जा रही है। बेंगलुरु स्थित संस्था जनाग्रह ने 2001 में सोशल सेक्टर में काम करना शुरू किया।
संस्था ने लोकल इशूज को एडमिनिस्ट्रेशन के सामने हाइलाइट किया। इसके लिए उन्हें सोसायटी से काफी सपोर्ट भी मिला। धीरे-धीरे संस्था से नए लोग जुडते गए। यूएस की एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब कर रहीं जॉयलिटा सालदान्हा की भी जनाग्रह में दिलचस्पी बढी और 2012 में उन्होंने जॉब छोडकर संस्था च्वाइन कर ली और सोसायटी को एक नई राह दिखाने में जुट गईं। जॉयलिटा ने सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल ऐंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री लेने के बाद साउदर्न यूनिवर्सिटी कैलिफोर्निया से इंडस्ट्रियल ऐंड सिस्टम इंजीनियरिंग में मास्टर किया है।
हक का कराया अहसास
जनाग्रह आज आम लोगों को साथ लेकर उनकी जरूरत के मुताबिक काम कर रही है। जॉयलिटा कहती हैं कि आमतौर पर देखा जाता है कि लोग वोट देने के बाद अपने काउंसलर या एमएलए से सवाल करना बंद कर देते हैं, जबकि यह उनका हक है कि वे अपनी प्रॉब्लम्स लेकर उनके पास जाएं और उन्हें सॉल्व कराने की कोशिश करें। जनाग्रह ने इस गैप को भरने की कोशिश की। आज लोग बेझिझक अपनी प्रॉब्लम्स लेकर सीधे संपर्क कर रहे हैं।
सिविक प्रॉब्लम्स पर फोकस
संस्था ने कामकाज में सोशल मीडिया का जमकर सहारा लिया। लोगों को टेक्नोलॉजी के जरिए जोडने की कोशिश की। वे अपनी प्रॉब्लम्स जनाग्रह से शेयर करने लगे। जनाग्रह उनकी प्रॉब्लम्स लेकर गवर्नमेंट अथॉरिटीज के पास जाती है और उन्हें सॉल्व कराने की कोशिश करती है। संस्था की कोशिश है कि दूसरी मेट्रो सिटीज में भी लोगों को अपने कैंपेन में शामिल किया जाए, ताकि पब्लिक और एडमिनिस्ट्रेशन के बीच के गैप को कम किया जा सके।
गांव में बीपीओ क्रांति
सलोनी मल्होत्रा इंजीनियर बनकर देश या विदेश की किसी बडी फर्म में काम कर सकती थीं, लेकिन 2004 में आइआइटी मद्रास के प्रोफेसर अशोक झुनझुनवाला के एक इंस्पायरिंग लेक्चर से उनकी लाइफ में ऐसा यू-टर्न आया कि उन्होंने शहर नहीं, बल्कि गांव में बीपीओ स्टार्ट करने का फैसला कर लिया। आज देसी क्रू बीपीओ के तमिलनाडु के अलावा कर्नाटक में चार सेंटर्स हैं। इनमें से तीन सेंटर गांव में चल रहे हैं, जिससे सैकडों नौजवानों को रोजगार के लिए शहर जाने की जरूरत नहीं पड रही है।
रूरल बीपीओ की शुरुआत
2004-05 में बीपीओ इंडस्ट्री इंडिया में काफी तेजी से ग्रो कर रही थी। खासकर अर्बन एरियाज में कई मल्टीनेशनल कंपनीज ने अपने बीपीओ स्टैब्लिश कर लिए थे, लेकिन सलोनी ने धारा के विपरीत जाकर 2007 में चेन्नई के एक गांव में बीपीओ शुरू किया। शुरुआत में आइआइटी मद्रास के रूरल टेक्नोलॉजी ऐंड बिजनेस इनक्यूबेटर ने फाइनेंशियल और इंफ्रास्ट्रक्चर लेवल पर मदद की। सलोनी के मुताबिक, छोटे स्केल पर शुरू किया गया टेक्नोलॉजी ड्रिवेन और प्रॉफिट मेकिंग बिजनेस मॉडल धीरे-धीरे बडा होता गया और आज यह कॉमर्शियली सक्सेसफुल वेंचर बन चुका है।
बिजनेस विद सोशल मिशन
देसी क्रू के बिजनेस हेड अश्वांथ ने बताया कि बीपीओ सेक्टर में हर साल रूरल एरियाज से काफी टैलेंटेड यूथ आते थे, लेकिन कॉम्पिटिशन बढने के साथ ही नौकरी जाने का खतरा भी बढ रहा था। दूसरी ओर गांव में रोजगार के अवसर नहीं थे। इसीलिए सलोनी ने अपने बीपीओ का बेस गांव में बनाया। लोगों को समझाया कि कैसे उनके बच्चे गांव में रहकर ही काम कर सकेंगे। यही नहीं, गांव का पैसा बाहर नहीं जाएगा, बल्कि कम्युनिटी के बीच ही वेल्थ क्रिएट हो सकेगा। इसके बाद टीम ने पीछे मुडकर नहीं देखा। उन्होंने युवाओं को क्लाइंट से डील करने की ट्रेनिंग देने के साथ ही कंप्यूटर और दूसरे स्किल्स भी सिखाए। आज 300 से ज्यादा युवाओं को देसी क्रू में रोजगार मिल चुका है। इनमें करीब 75 परसेंट लडकियां हैं, जो आज आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।
जीना सीख गई
उत्तिष्ठ जाग्र प्राप्य वरान्निबोधत
उठो जागो और तब तक काम करते रहो जब तक तुम्हें तुम्हारा लक्ष्य न मिल जाए। स्वामी विवेकानंद ने यह गुरुमंत्र यूं तो 150 वर्र्षो पहले दिया था लेकिन जाने-अनजाने में भी यह मंत्र हर युवा के सिर चढकर बोल रहा है।
शिक्षा की प्रेरणा
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि शिक्षा वही उत्तम है, जो बच्चों को देश का सच्चा नागरिक बनाए, क्लर्क न बनाए। शायद इसी बात ने दिल्ली की रहने वाली नीमा भट्ट को प्रेरणा दी कि वह भी उनके बताए रास्ते पर चलें। कहते हैं कि सीखने और सिखाने वाले की उम्र नहीं देखी जाती। नीमा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
बेटे ने दिखाई राह
नीमा की जिंदगी में नई रोशनी उनके अपने बेटे के जरिए आई। शादी से पहले भी वह सोचा करती थीं कुछ अलग करने की, लेकिन उन्हें कुछ सूझता नहींथा। उनके बेटे के स्कूल में बच्चों को विवेकानंद केंद्र के कैंप ले जाया जाता था और उनके बताए तरीके से शिक्षा दी जाती थी। नीमा को यह बहुत अच्छा लगा। धीरे-धीरे उनकी रुचि विवेकानंद के सिद्धांतों और मूल्यों में बढती गई।
जो पढा, वही पढाती गई
वह स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं को पढती गईं। जो पढा, वह छोटे-छोटे बच्चों को पढाती गईं। स्वामी विवेकानंद की यह बात भी उनके मन में गहरे बैठ गई थी कि देश का भविष्य इन नन्हे-मुन्ने बच्चों और किशोरों के हाथ में है, अगर देश का उत्थान करना है, तो उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाना होगा। उन्हें यह बात समझ में आ गई।
सही मायनों में शिक्षा
स्कूल में बच्चों को पढाने के अलावा नीमा ने विवेकानंद केंद्र भी ज्वाइन कर लिया। वहां वे देश ही नहीं, विदेश के भी उन तमाम लोगों से मिली-जुलीं, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के आदर्र्शो को आत्मसात किया था।
टाइम मैनेजमेंट सीखा
पहले उन्हें लगता था कि कैसे करेंगी ये सब। जब वह सिर्फ हाउफ वाइफ थीं, तो पूरा दिन यूं ही गुजर जाता था। जब उन्होंने यह काम करने की ठानी, तो वह इस बात को लेकर बहुत परेशान थीं कि कैसे मैनेज करेंगी, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने सब कुछ टाइमली मैनेज कर लिया। पहले से ज्यादा काम करने के बावजूद वह बहुत सुकून महसूस करती हैं। इसकी वजह वह पर्सनल नहीं है। नीमा बताती हैं कि बच्चों को सही मायनों में शिक्षित करके उन्हें देश का सच्चा नागरिक बनाना ही उनके जीवन का एकमात्र मकसद है और यह काम करते हुए बहुत गर्व होता है। इसीलिए सारी थकान और सारी टेंशन उडनछू हो जाती है।
युवाओं को राह
मुझे युवाओं पर बहुत भरोसा है, वे शेर की तरह काम करते हैं, स्वामी विवेकानंद के इसी भरोसे पर भरोसा करके ओडिशा के मनोज दास ने अच्छी-खासी अपनी वकालत छोड दी और लग गए स्वामी विवेकानंद के विचारों का प्रचार-प्रसार करने में।
सुकून के लिए छोडी वकालत
अमूमन हर युवक के कुछ न कुछ सपने होते हैं। कोई डॉक्टर बनना चाहता है, कोई इंजीनियर बनना चाहता है तो कोई आइएएस, तो कोई वकील। मनोज दास इनमें से एक बन चुके थे, उनकी वकालत अच्छी-खासी चल रही थी, लेकिन मन में कहीं सुकून नहीं था। कहीं कुछ ऐसी कमी थी जो लगता था कि देश के लिए, समाज के लिए कुछ करना चाहिए। बस इसी राह की खोज उन्हें ले गई कन्याकुमारी के विवेकानंद केंद्र की ओर।
मिल गया जिंदगी का मकसद
मनोज ने 2005 में विवेकानंद केंद्र च्वाइन कर लिया। कन्याकुमारी में उन्होंने बाकायदा ट्रेनिंग ली। इसके बाद वह महाराष्ट्र के नागपुर में स्वयंसेवक के रूप में काम करने लगे। काम था, युवाओं को सही और सच्ची राह दिखाना। मनोज ने महसूस किया कि युवाओं में जोश बहुत है, लेकिन वे अपनी प्रतिभा का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। ज्यादातर युवक-युवतियों को उन्होंने दिग्भ्रमित पाया। बारहवीं या ग्रेजुएशन करने के बाद ज्यादातर युवाओं को यह नहीं पता होता कि आगे क्या करें? क्या नौकरी करना ही उनकी जिंदगी का लक्ष्य है? उन्हें क्या करना चाहिए? उनकी जिंदगी का मकसद क्या है? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशते युवाओं को मनोज ने विवेकानंद की शिक्षा के जरिए राह दिखाई। पिछले तीन साल से वह दिल्ली-एनसीआर में विवेकानंद केंद्र के प्रांत प्रचारक हैं। मनोज बताते हैं, अध्यात्म जिंदगी की राह दिखाता है। खासकर युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद की शिक्षा आज भी बेहद प्रासंगिक है।
आज भी हैं विवेकानंद
इरादे नेक हों, हौसले बुलंद हों तो बडे काम करने के लिए जगह और पैसा कभी आडे नहीं आता। पिछडी जगहों में भी बडे-बडे काम किए जा सकते हैं.कुछ ऐसा ही साबित कर दिखाया है उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर के मनोज सिंह ने। खुद जितनी परेशानियां उठाकर उन्होंने पढाई की, वह नहीं चाहते थे कि उनके गांव और जिले की आने वाली पीढी भी वही सब परेशानियां उठाए।
मिला जीने का मकसद
1995 की बात है अंबेडकर नगर के अकबरपुर के स्वामी विवेकानंद संस्थान में एक व्याख्यान हुआ। इस व्याख्यान को सुनने के लिए अपने कुछ साथियों के साथ रामपुर गांव का एक सीधा-सादा नौजवान भी पहुंचा। दलित कौन होते हैं, मजलूम कौन होते हैं, देश सेवा और समाज-सेवा क्या होती है, ये सारी बातें इस नौजवान के लिए बडी थीं। इस व्याख्यान ने उसकी जिंदगी बदल दी। अभी तक वह बस पढाई कर रहा था। गांव के दूसरे लडकों की तरह वह भी या तो खेती करता या फिर नौकरी करता, लेकिन इस व्याख्यान से उसे जीने का एक मकसद मिल गया। वह नौजवान था मनोज सिंह।
मनोज ने फिर ठान लिया कि उनके जीवन का मकसद गरीबों, मजलूमों, बेसहारों की सेवा ही है।
मानवाधिकार के लिए जंग
2003 में मनोज की इलाहाबाद में मुलाकात कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से हुई। इंसान का हक क्या हैं, उन्हें जानने का मौका मिला। फिर शुरू हो गई मानवाधिकारों के लिए जंग। उनके अपने जिले और आस-पास के इलाकों में भूख से मौतें होती थीं। बच्चे कुपोषण के शिकार थे, स्कूल नहीं जा पाते थे, क्योंकि उनके पास फीस के पैसे नहीं थे। इन सारी समस्याओं को दूर करने के लिए मनोज ने ग्राउंड लेवल पर काम करना शुरू किया। लोगों की हालत में सुधार हुआ। सरकार से भी उन्हें अनुदान मिलने लगा। आज मनोज अपने साथियों के साथ गांव-गांव जाकर पुलिस उत्पीडन, बच्चों की पढाई जैसे मसलों पर लोगों को जगाने का काम बखूबी कर रहे हैं, वह भी चुपचाप!
संतुष्टि और सम्मान
करियर चुनते समय हमारा ध्यान जॉब सैटिस्फैक्शन, आगे बढने के चांस और सैलरी पर अधिक रहता है। इन तीनों कसौटियों पर जो फील्ड खरी उतरती है, हम उसका ही चयन करते हैं। सोशल सेक्टर का दायरा असीमित है। यहां सैलरी और सम्मान जैसा चार्मिग फैक्टर भी है। साथ ही समाज में अपनी अलग पहचान बनाने का मौका भी हमेशा बना रहता है।
ऑप्शन असीमित
सोशल सेक्टर के साथ आप किसी भी रूप में जुड सकते हैं। महिला सशक्तीकरण, बालश्रम, एड्स, सूखा, ग्रामीण शिक्षा, नशा मुक्ति, प्रौढ शिक्षा, ग्रामीण चिकित्सा या बाल पुनर्वास केंद्र आदि में तो अवसर हैं ही, साथ ही अगर आपकी रुचि पर्यावरण और ऊर्जा के क्षेत्र में है तो भी इस सेक्टर में एंट्री करके उद्योगों से निकलने वाले कचरे की रीसाइकिलिंग, ऊर्जा संरक्षण, जहरीले पदार्थो के निस्तारण में लगी संस्थाओं के साथ काम कर सकते हैं। बच्चों के बीच काम करना चाहते हैं, तो बाल सुधार और अधिकार, शिक्षा, काउंसलिंग, स्पेशल एजुकेशन के सेक्टर में काम कर रही संस्थाओं को अपना साथी बना सकते हैं। यहां डिजास्टर मैनेजमेंट, कम्युनिटी ऐंड सोसायटी डेवलपमेंट, हेल्थ केयर ऐंड वेलबिंग, चाइल्ड वेलफेयर ऐंड स्कूलिंग, वूमन वेलफेयर ऐंड एंपॉवरमेंट, कंजर्वेशन ऐंड हैरिटेज, रिसर्च ऐंड पॉलिसी, पब्लिक रिलेशन ऐंड मीडिया, फंड रिलीजिंग गाइडेंस ऐंड काउंसलिंग का काम भी किया जा सकता है।
सीएसआर से बढी डिमांड
कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के अंतर्गत कंपनियां अपने मुनाफे का 2 प्रतिशत खर्च करती हैं। वे सीएसआर बजट को उस काम में लगाती हैं, जिसका फायदा समाज के अधिक से अधिक लोगों को मिले। ऐसी एक्टिविटीज से कंपनियां लोगों को यह संदेश देती हैं कि वे सिर्फ प्रोडक्ट के जरिए ही आपसे नहीं जुडी हैं, बल्कि आपकी समस्याओं के समाधान के लिए भी प्रयासरत हैं। ऐसे कामों से कंपनियों की ब्रांड वैल्यू बढती है। अपनी सोशल एक्टिविटीज को चलाने के लिए कंपनियों को इस फील्ड के अच्छे प्रोफेशनल्स की काफी जरूरत रहती है।
जॉब कैसे पाएं
कंपनियों के सीएसआर डिपार्टमेंट से आप परमानेंट और प्रोजेक्ट बेस पर जुड सकते हैं। अगर आप किसी प्रॉब्लम पर रिसर्च करके कंपनी के बजट को ध्यान में रखते हुए प्रोजेक्ट बनाते हैं और अपने प्रोजेक्ट से उसे सैटिस्फाई कर देते हैं, तो कंपनियां आपके प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता दे देती हैं। यहां वरीयता उन्हें दी जाती है, जिसके पास सोशल सेक्टर से रिलेटेड प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन और फील्ड में वर्क करने का एक्सपीरियंस होता है।
यूथ पॉवर इन इंडिया
- सन 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की 70 परसेंट जनसंख्या 35 साल से कम उम्र की है।
- भारत में युवाओं और किशोरों की कुल आबादी तकरीबन 550 मिलियन है।
- भारतीय युवाओं में लगभग 73 प्रतिशत से अधिक साक्षर हैं।
- संयुक्त राष्ट्र संघ 15 से 24 वर्ष के बीच के लोगों को युवा वर्ग में शामिल करता है।
- भारत की नेशनल यूथ पॉलिसी-2003 के अनुसार, 13 से 35 वर्ष के लोगों को इस वर्ग में शामिल किया गया है।
यूथ के लिए संभावनाएं
-आइटी : कन्फिडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आइटी-बिजनेस प्रॉसेस आउटसोर्सिग इंडस्ट्री सन 2020 तक 225 बिलियन यूएस डॉलर से अधिक हो जाएगी। वहीं, नैसकॉम के अनुसार, सन 2020 तक इंडियन आइटी सेक्टर में काम करने वालों की संख्या तीन करोड तक होने की संभावना है।
- हॉस्पिटैलिटी : ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन, बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप और सीआइआइ की रिपोर्ट, इंडियाज न्यू अपॉच्र्युनिटीज 2020 के अनुसार हेल्थकेयर सेक्टर में 2020 तक 4 करोड लोगों को नौकरियां मिल सकती हैं।
- एयरलाइन इंडस्ट्री : 2020 तक भारत एविएशन का तीसरा सबसे बडा मार्केट बन सकता है। ऐसे में लाखों नए जॉब भारतीय युवाओं के सामने होंगे।
- टेलीकॉम : ट्राई ने 2014 तक ब्रॉडबैंड उपभोक्ताओं की संख्या में कई गुना वृद्धि का अनुमान लगाया है। ऐसे में इस क्षेत्र में जॉब के अवसर बडी संख्या में सामने आएंगे।
- फैशन इंडस्ट्री : एसोचैम के अनुसार, इंडियन डिजाइनर वियर मार्केट 9.5 प्रतिशत की दर से बढ रहा है। यह ग्रोथ इंडियन यूथ को इस फील्ड में काफी जॉब दिलाने का काम करेगी।
स्कोप फॉर वर्किग प्रोफेशनल्स
इस फील्ड में उन लोगों के लिए भी दरवाजे खुले हैं जो किसी दूसरे क्षेत्र में काम कर रहे हैं, लेकिन अपनी जॉब से सैटिस्फाइड नहीं हैं या फिर लोगों की समस्याएं हल करना चाहते हैं। वर्किग प्रोफेशनल्स इस फील्ड से जुडे स्पेशल कोर्स करके सोशल सेक्टर में काम कर रही संस्थाओं से जुड सकते हैं।
इंटरनेशनल लेवल पर चांस
यूनाइटेड नेशंस, व‌र्ल्ड बैंक, डब्ल्यूएचओ, एमनेस्टी इंटरनेशनल, नाटो, यूनीसेफ, रेडक्रॉस जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन सोशल सेक्टर में काम कर रहे लोगों को प्रमोट करते हैं। ये ऑर्गेनाइजेशंस उन लोगों को अपने साथ जोडने में वरीयता देती हैं, जिनके पास फील्ड रिलेटेड एक्सपीरियंस और प्रोफेशनल डिग्री या डिप्लोमा है।
वैरायटी ऑफ कोर्स
सोशल सेक्टर फील्ड से संबंधित कई सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिग्री कार्यक्रम शुरू किए जा चुके हैं। इसमें सर्टिफिकेट प्रोग्राम इन सोशल सेक्टर डेवलपमेंट, रूरल एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम, एंटरप्राइज ट्रेनिंग फॉर वूमन साइंस, डिप्लोमा इन मैनेजमेंट ऑफ वॉलंट्री ऑर्गेनाइजेशंस, पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम इन पब्लिक मैनेजमेंट ऐंड पॉलिसी, पोस्ट ग्रेजुएट सर्टिफिकेट प्रोग्राम इन डेवलपमेंट मैनेजमेंट, बैचलर ऑफ सोशल वर्क, एमए इन डेवलपमेंट स्टडी, एमए इन वूमन स्टडी आदि कोर्स मौजूद हैं।
स्किल्स
कोर्स के हिसाब से न्यूनतम शैक्षिक योग्यता तय की जाती है। अधिकतर कोर्सेज के लिए मिनिमम क्वालिफिकेशन ग्रेजुएशन मांगी जाती है। इस फील्ड में आपको लोगों की समस्याओं को सुनना और समझना होता है। चुनौतियों से लडते हुए आगे बढना होता है, इसलिए आपके पास चीजों को समझने की काबिलियत, वास्तविकता को जानने की ललक, अच्छी कम्युनिकेशन स्किल, लोगों की मदद का जज्बा, आशावादी व्यक्तित्व, रिस्क लेने का गुण, लीडरशिप क्वालिटी, टीमवर्क में काम करने की क्षमता, विकास संबंधी सरकारी नीतियों की जानकारी होना जरूरी है।
सैलरी
यहां सैलरी इस बात पर निर्भर करती है कि आप किस फील्ड में और किस ऑर्गेनाइजेशन के साथ जुडकर काम कर रहे हैं। इंटरनेशनल लेवल की ऑर्गेनाइजेशंस अपने साथ काम करने वालों को शुरुआत में तकरीबन एक लाख रुपये प्रतिमाह या इससे भी अधिक वेतन देती हैं। नेशनल लेवल पर काम करने वाले संगठन भी नए लोगों को 20 से 25 हजार रुपये प्रति माह तक सैलरी देते हैं। इस फील्ड में वेतन दो-तीन साल में ही 40 से 50 परसेंट तक बढ जाता है।
प्रोत्साहन की जरूरत
देश के विकास के लिए जरूरी है कि बडी संख्या में शिक्षित युवा सोशल सेक्टर से जुडें और उन समस्याओं को हल करने का प्रयास करें जो देश के विकास को प्रभावित कर रही हैं। सोशल सेक्टर में काम करने वालों की संख्या बढ रही है, लेकिन यहां प्रशिक्षित लोगों की काफी कमी महसूस की जा रही है। इस कमी को पूरा करने के लिए सोशल सेक्टर से रिलेटेड कोर्सेज को बडे पैमाने पर शुरू किए जाने की जरूरत है। गवर्नमेंट और प्राइवेट दोनों सेक्टर इस काम में मदद कर सकते हैं।
आदर्श स्थिति के लिए हर एक हजार की जनसंख्या पर कम से कम एक ऐसे व्यक्ति को इस फील्ड से जुडा होना चाहिए ,जिसके पास इस क्षेत्र से संबंधित कोई प्रोफेशनल नॉलेज हो।
संजीव सीवेश
सीईओ, इंडियन स्कूल फॉर एंटरप्रेन्योर्स ऐंड एंटरप्राइजेज डेवलपमेंट, गुडगांव
इंस्टीट्यूट्स
देश के बहुत से इंस्टीट्यूट्स में इस तरह के कोर्स चलाए जा रहे हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से भी सोशल सेक्टर से रिलेटेड कोर्स आप कर सकते हैं। कोर्स कराने वाले कुछ प्रमुख संस्थान हैं :
-टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस, मुंबई www.tiss.edu
-स्कूल ऑफ सोशल वर्क, इग्नू, नई दिल्ली www.ignou.ac.in
-आइएफएमआर, चेन्नई, www.ifmr.ac.in
-एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, गांधीनगर www.ediindia.org
-एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ऐंड रिसर्च, मुंबई www.spjimr.org

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