रिमोट सेंसिग : धरती की संपदा व रहस्य खोजता कैरियर


आकाश में घूमते उपग्रहों के जरिये धरती की संपदा और उसके परिवर्तन पर नजर रखी जाती है। इस विधि में माइक्रोवेव, इन्फोरेड तथा प्रकाश की किरणें की सहायता ली जाती है। दूर बैठे-बैठे ही धरती सागर के व्यवहार को समझा जाता है। इसी को रिमोट सेंसिंग या दूर संवेदन कहा जाता है।
धरती पर जल और थल दो महत्वपूर्ण तत्व मानव के लिए विशेष महत्व रखते हैं। थल मानव की वनस्पति और खाद्यान्न उपलब्ध कराता है, तो जल भी कई प्रकार के खनिज और संपदा को अपने में समेटे रखता है। जल और थल से कई प्रकार की औषधियां, जड़ी-बूटियां ओर खाद्य पदार्थ प्राप्त होते हैं। परिणामत: मानव सदियों में इस ओर आकर्षित होता रहा है। कई चुनौतियों का समाना करते हुए भी मनुष्य ने धरती और सागर के गर्त में छिपे इन खजानों को ढूंढना संभव कर दिया है। वास्तव में यह एक कठिन और रोमांचक कार्य है। धरती का बदलता व्यवहार, खोज कार्यों को और कठिन बना देता है। धरती के इन रहस्यों को जानने के लिए विज्ञान ने काफी मदद की है। विज्ञान की प्रगति से पहले यह कार्य असंम्भव था। दरअसल आकाश में घूमते उपग्रहों के जरिये धरती की संपदा और उसके परिवर्तन पर नजर रखी जाती है। इस विधि में माइक्रोवेव, इन्फोरेड तथा प्रकाश की किरणें की सहायता ली जाती है। दूर बैठे-बैठे ही धरती सागर के व्यवहार को समझा जाता है। इसी को रिमोट सेंसिंग या दूर संवेदन कहा जाता है।
आज के वैज्ञानिक प्रगति के युग में भौगोलिक सूचना तंत्र, एक महत्वपूर्ण विषय-क्षेत्र बनकर सामने आया है। इसके अंतर्गत भू-गर्भ वैज्ञानिक, भू-भौतिक वैज्ञानिक कार्य करते हैं। कुछ क्षेत्रों में ओशियानोग्राफर भी पृथ्वी की संपदा व स्रोतों को खोजने का कार्य करते हैं। इस विशेष पाठ्ïयक्रम के रूप में जाना जाता रहा है। हालांकि यह पाठ्ïयक्रम अभी विकासशील स्थिति में है, फिर भी अतिशीघ्र ही एक नये रोजगार के रूप में विकसित होगा।
आकाश में विचरते उपग्रह धरती से निकलने वाली प्रत्येक विद्युतीय तरंग का अध्ययन करते हैं और उन्हें धरती पर  स्थापित विभिन्न केन्द्रों को भेजते हैं। हालिाकि उसकी अपनी कुछ सीमाएं और बाधाएं हैं, जिसके चलते सही जानकारी प्राप्त करने में समय लगता है। प्रकाश तरंगों के माध्यम से किया जाने वाला दूर-संवेदन एक तरफ केवल दिन में ही संभव हो सकता है, तो दूसरी ओर कई बार मौसम की खराब स्थिति भी इसमें आधाएं उत्पन्न होती हैं। प्रकाशीय किरणों के माध्यम से किये जाने वालेदूर-संवेदन से धरती की वनस्पति, खनिजों का ज्ञान होता है, क्योकि इससे अलग-अलग रंगों के माध्यम से अलग-अलग पदार्थों की स्थित का पता चलता है। जैसे कि सागर पर तैरने वाली अति अति सूक्ष्म वनस्पति हरा रंग प्रत्यावर्तित करती है तो, पीला रंग जैविक चीजों का आभास कराता है। सही रंगों को आधार बनाकर सागर में उपलब्ध किसी भी वस्तु का अनुमान जाता है।
रिमोट सेंसिग खनिज संपदा को ज्ञात करने के साथ-साथ सागर से उठने वाली डष्मीय लहरों को निरंतर मापकर सागर और मौसम के बदलते तापमान को भी रिमोट सेंसिग के द्वारा पता किया जाता है। इसी आधार पर मौसम में होने वाले बदलावों को जाना जाता है।
इस विषय में उपयुक्त शिक्षा के बाद मौसम विभाग, समुद्र विकास विभाग और भौगोलिक तथा भूेार्भिक विकीााग में रोजगार मिलने की संभावनाएं रहती हैं। इन विभागों में  वैज्ञानिक, तकनीकी सहायक जैसे कई पदों पर समय-समय पर रिक्तयां प्राकाशित होती रहती हैं।
आज देश में कई विश्वविद्यालय व संस्थान रिमोट सेंसिंग या भौगोलक सूचना तंत्र विषय में शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। इस विषय की शिक्षा केवल स्नातकोत्तर स्तर पर किसी एक विशेष विषय पर ही दी जाती है। किसी भी संस्थान से रिमोट सेंसिंग पाठ्ïयक्रम करने के लिए प्रवेश हेतु योग्यताओं का होना जरूरीर है। 'रिमोट सेंसिगÓ से संबंधित पाठ्ïयक्रम कई संस्थानों में संचालित किये जा रहे हैं। कुछ मुख्य संस्थानों के पते :
कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, आंध्र विश्वविद्यालय, वाल्टेयर विशाखापट्टïनम।
अन्ना विश्वविद्यालय, सरदार पटेल रोड, गुंडी चेन्नई।
बिरला इंस्टीटृयूट ऑफ टेक्रोलॉजी, मेसरा, रांची।
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय होशगाबाद रोड, भोपाल।
भारती सदन विश्वविद्यालय पलकई पेरूर, तिरुचिरापल्ली।

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