Disaster Management सेफ, सिक्योर इंडिया

Disaster Management सेफ, सिक्योर इंडिया
पहले ही होनी चाहिए थी पहल
डिजास्टर मैनेजमेंट को कोर्स में शामिल करने की पहल बहुत पहले होनी चाहिए थी। इसे छोटी क्लासेज से पढाया जाए, तो यह हैबिट में आ जाएगा। देश में वॉलंटियर्स की फौज खडी हो जाएगी।
लवराज धर्मशक्तू, माउंटेनियर
सब्जेक्ट नहीं, इंफॉर्मेशन बढाएं
डिजास्टर मैनेजमेंट को पर्यावरण अध्ययन में जोड दिया जाना चाहिए। बच्चों को बताएं पहाड और नदियों के दोहन से किस तरह के खतरे हो सकते हैं। इन खतरों से कैसे बचा जा सकता है।
विनोद रैना, एजुकेशनिस्ट
प्राइमरी लेवल से हो शुरुआत
डिजास्टर मैनेजमेंट को प्राइमरी स्कूल से ही शुरू करना उचित रहेगा। इससे बच्चे आपदा आने पर प्राइमरी लेवल पर अपना का बचाव कर सकेंगे। अनिवार्य शिक्षा के अंतर्गत इसे रखें, प्रैक्टिकल पर फोकस हो।
राजेन्द्र सिंह, जलपुरुष
मॉक ड्रिल कंपल्सरी हो
कॉलेजेज में डिजास्टर मैनेजमेंट की पढाई प्रेक्टिकल हो और कॉलेज लेवल पर रेगुलर मॉक ड्रिल की व्यवस्था हो। हायर एजुकेशन में भी कंपल्सरी हो।
डॉ. जावेद अहमद, पूर्व प्रिंसिपल, मारवाडी कालेज, रांची
बचपन से दें ट्रेनिंग
विदेश में बचपन से ही ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है कि वो खुद और दूसरों को सुरक्षित रख सकें। क्लास वन से ही बच्चों को आपदा से निपटने के बारे में बताना चाहिए।
डॉ. ज्योति मिश्रा, जिला मुख्यालय आयुक्त, स्काउट, लखनऊ
समाज सेवा का बोध जरूरी
समाज के बदलते परिवेश में नैतिकता का हृास हो रहा है। भरसक कोशिश होनी चाहिए कि इसे हर स्कूली बच्चे के लिए अनिवार्य कर दिया जाए।
डॉ. अशोक कुमार द्विवेदी, प्रिंसिपल, अमीचंद इंटर कॉलेज, नोएडा
उत्तराखंड में आई आपदा के दौरान जब सेना राहत कायरें में जुटी थी, उन दिनों कई एसएमएस भी मोबाइल स्क्रीन पर तैर रहे थे। कुछ सरकार और ईश्वर दोनों को कोस रहे थे, तो कुछ आपदा से प्रभावित लोगों के प्रति संवेदनाओं से भरे थे। उन दिनों अक्सर आने वाले जोक्स भी चाह कर भी हंसी नहीं ला पा रहे थे। अचानक उन्ही दिनों एक एसएमएस आया, भूकंप? सेना बुलाओ! बाढ? सेना बुलाओ! सुनामी? सेना बुलाओ! टेरर अटैक? सेना बुलाओ! बोरवेल में बच्चा फंस गया? सेना बुलाओ! पे-कमीशन? सेना को भूल जाओ! एसएमएस पढ कर लगा कि क्या इस देश के लिए सेना ही आखिरी उम्मीद है। वह बॉर्डर भी संभाले और सिविक एजेंसियों के काम भी। सेना रक्षा की आखिरी कडी है, लेकिन जब भी कोई आपदा या विपदा आती है, सेना ही पहला और आखिरी विकल्प होती है। एसएमएस पढ कर हंसी तो नहीं आई, लेकिन सवाल जरूर खडे हो गए। हर देश में आपदाएं आती हैं, लेकिन वे सभी सेना का इस्तेमाल नहीं करते। आखिर कमी कहां हैं? क्यों हम माल के साथ जान भी गवां देते हैं? कमी हमारे आसपास ही है, जरूरत है उसे समझने की। जरूरत है डिजास्टर मैनेजमेंट को एजुकेशन में कंपल्सरी बना दिया जाए।
ज्यादातर एजुकेशनिस्ट, डिजास्टर एक्सप‌र्ट्स और स्टूडेंट्स भी यही चाहते हैं।
प्वाइंट, पोजीशन और परफेक्शन
डिजास्टर मैनेजमेंट की सक्सेस प्वाइंट, पोजीशन और परफेक्शन की थीम पर ही टिकी है। इसे अगर मेन सब्जेक्ट बना दिया जाए तो कम से कम नेचुरल डिजास्टर की आशंका वाले क्षेत्रों के बारे में सभी को पता चल जाएगा। लोग जान जाएंगे कि हमारे किन कामों से नेचर को नुकसान पहुंच रहा है। इसकी एजुकेशन लोगों को जगाने का काम करेगी और हो सकता है कि हम प्रकृति को नुकसान पहुंचाने की जगह उसे फिर से सहेजने की शानदार मुहिम शुरू कर दें। सेकेंड स्टेप है पोजीशन का। इसमें हमें बिना समय गंवाए रेस्क्यू वर्क शुरू करना है। डिजास्टर मैनेजमेंट के कोर्स में जो प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दी जाएगी वह इस काम में हेल्प करेगी। अब तीसरे स्टेप परफेक्शन की बात करते हैं। किसी भी काम में परफेक्शन तभी संभव है जब हम बीच-बीच में उसकी प्रैक्टिस करते रहेंगे। सिविल डिफेंस के लोग इसमें हेल्पफुल हो सकते हैं। यह तीसरा स्टेप मैनमेड डिजास्टर में भी कारगर साबित होगा।
सब्जेक्ट की थीम
डिजास्टर मैनेजमेंट का कोर्स अगर छोटी क्लासों से मेन सब्जेक्ट के रुप में शुरू किया जाए तो इसका स्वरूप क्या हो? इस पर अधिकतर लोगों में सहमति बनती दिखाई दे रही है। जलपुरुष राजेन्द्र सिंह की इस बात से एजुकेशनिस्ट भी सहमत हैं और वालियंटर्स भी कि बहुत छोटी क्लास में अधिक जोर इंफॉर्मेशन पर दिया जाना चाहिए वहीं बडी क्लासों में मेन फोकस फिजिकल एक्सरसाइज पर होना चाहिए। नॉलेज उसके बाद प्रैक्टिस का फॉर्मूला इस सब्जेक्ट की थीम होनी चाहिए।
देखें और सीखें
डिजास्टर कंट्रोल में हेल्पफुल बहुत सी चीजें डिस्कवरी जैसे चैनल्स के प्रोग्रॉम्स से भी सीख सकते हैं। आपदा के समय किस तरह पीने का पानी खोजना है, उसे कैसे सुरक्षित रखना है और अपनी खबर संकेतों से कैसे वालियंटर्स तक पहुंचानी है। इनसे आसानी से सीखा जा सकता है। ये प्रोग्राम्स थ्योरेटिकल और प्रैक्टिकल दोनों ही बेस पर खरे उतरते हैं।
इनपुट : जोश टीम से शरद अग्निहोत्री, नोएडा से अभिषेक सिंह, रांची से विनय कुमार पाण्डेय, हल्द्वानी से गणेश जोशी, जम्मू से योगिता यादव और सतनाम सिंह, लखनऊ से दीपा श्रीवास्तव।
क्या कहते हैं स्टूडेंट्स..
नहीं होती मॉक ड्रिल
आपदाएं आने के बावजूद हम उससे कुछ नहीं सीखते। कई स्कूल-कॉलेजेज में डिजास्टर मैनेजमेंट के बेसिक्स तो दूर, बल्कि मॉक ड्रिल तक नहीं कराई जाती है। लखनऊ के एक कॉलेज की स्टूडेंट कविता शर्मा के मुताबिक उन्हें कभी किसी मॉक ड्रिल का हिस्सा बनने का मौका तक नहीं मिला। उनका कहना है कि कॉलेज और ऑफिस में मॉक ड्रिल करायी जानी चाहिए ताकि लोग अवेयर रहें और सुरक्षित भी। वह कहती हैं कि हर बच्चे को बचपन से ही प्राकृतिक आपदा से निपटने की सलाह और शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि वो अपने साथ दूसरों की भी मदद कर सकें। प्रोफेशनल स्तर पर गडबडी हमारे सिस्टम में है। जब कोई हादसा होता है , तब हम सब सजग हो जाते हैं मगर चंद दिनों बाद सब भूल जाते हैं। लखनऊ के ही एक कॉलेज स्टूडेंट दिशांत श्रीवास्तव का भी यही कहना है कि ऑफिस और हाउस सोसायटी में मॉक ड्रिल न देखा न सुना, मगर ऐसा होना बहुत जरूरी है। वह कहते हैं कि प्रशासन को स्कूल स्तर पर ही इसे अनिवार्य करना चाहिए हर स्टूडेंट को इससे निपटने की कला मालूम हो।
यूथ संवेदनहीन
झारखंड की सेंट्रल यूनिवर्सिटी के युवा छात्र अभ्युदय अनुराग कहते हैं कि सबसे बडी विडंबना तो यह है कि युवा वर्ग में संवेदना की भी कमी होती जा रही है। ऐसा देखा जाता है कि कोई दुर्घटनाग्रस्त होकर गिरा होता है, लेकिन लोग उसको देखते हुए आगे बढ जाते हैं। हमें अपदाग्रस्त लोगों के प्रति संवेदनशील तो होना ही पडेगा। अगर कालेज स्तर पर डिजास्टर मैनेजमेंट के प्रशिक्षण की व्यवस्था रहती तो हो सकता था कि उत्तराखंड में हुए हादसे में भी जानमाल की रक्षा काफी हद तक हो जाती। मेरा मानना है कि हर स्कूल और कॉलेज में डिजास्टर मैनेजमेंट की प्रैक्टिकल पढाई हो। साथ ही साल में दो या तीन बार मॉक ड्रिल की व्यवस्था हो।
समाज सेवा बाद
यूपी बोर्ड 12वीं के जिला टॉपर नोएडा के कृष्ण नागर का कहना है कि कॉम्पिटिशन बढ गया है। पेरेंट्स चाहते हैं कि बेटा या बेटी बेहतर शिक्षा प्राप्त कर अपना भविष्य संवारे। ऐसे में एनसीसी-एनएसएस जैसी गतिविधियों को वक्त की बरबादी समझ ली जाती है। यह वजह है कि वे एनसीसी, एनएसएस और स्काउट-गाइड की गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले पाए।
सेवा भाव जरूरी
नोएडा में आईआईटी की कोचिंग कर रहे स्टूडेंट चंद्रवीर का कहना है कि सेवा भाव के लिए प्रशिक्षण नहीं, संवेदना की जरूरत होती है। स्कूलों में डिजास्टर मैनेजमेंट के विषय दिया ज्ञान तब तक अधूरा है जब तक माता-पिता भी अपने बच्चों सेवा भाव के लिए जागरूक न करें। कुछ लोगों में यह भाव कुदरती होते हैं। हां, यह बात सही है कि एनसीसी-एनएसएस आदि के माध्यम से इस प्रतिभा को निखारा जा सकता है।
लडकियों की हो एनसीसी विंग
नोएडा की स्टूडेंट निशा चावडा का कहना है कि प्रत्येक कॉलेज में एनसीसी और एनएसएस की लडकियों की अलग से विंग होनी चाहिए। इसमें प्रतिभागिता डिजास्टर मैनेजमेंट ही नहीं, व्यक्तिगत स्तर पर भी काम आ सकती है। इससे आत्मबल प्राप्त होता है।
लडकियों को करें एक्टिव
यूपी बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा में जिले की दूसरी टॉपर नोएडा की डॉली चौधरी का कहना है कि लडकियां-महिलाएं भी आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी का निर्वहन बेहतर ढंग से कर सकती हैं। लडकियों के लिए बेहतर होगा कि डिजास्टर मैनेजमेंट का करिकुलम स्कूल और कॉलेजेज में कंपल्सरी कर दिया जाए।
डिजास्टर मैनेजमेंट को बनाएं प्रोफेशनल
जम्मू यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कालर एग्जीक्यूटिव एसोसिएशन के प्रधान राकेश चिब के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर बनी आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को ज्यादा सक्रिय व प्रोफेशनल बनाने की जरूरत है।
स्कूलों व कॉलेजों में आपदा प्रबंधन का अतिरिक्त विषय पढाया जाए, साथ ही स्टूडेंट्स को यह बताया जाए कि उसे किसी भी तरह की आपदा के समय सबसे पहले अपना जीवन किस तरह से सुरक्षित करना है और फिर लोगों को कैसे बचाना है।
हों कैंप और कार्यक्रम
जम्मू यूनिवसिर्टी में स्टैटिस्टिक्स की स्कॉलर पूजा चौधरी कहती हैं स्कूलों व कालेजों में आपदा प्रबंधन के प्रति स्टूडेंट्स को जागरूक करने के लिए कैंप या कार्यक्रम होने चाहिए।
एनसीसी-एनएसएस के जरिए ऐसे स्टूडेंट्स को सलेक्ट किया जा सकता है, जिन्हें सोशल सर्विस में रुचि हो।
डॉ. शिवकुमार शर्मा, प्रिंसिपल नेहरू स्मारक इंटर कॉलेज, नोएडा
डिजास्टर मैनेजमेंट प्रोफेशनल बनाने की जरूरत है, तभी बात बनेगी।
अनामिका जम्वाल, टीचर, आर्मी स्कूल कालूचक, जम्मू
नहीं होती मॉक ड्रिल
आपदाएं आने के बावजूद हम उससे कुछ नहीं सीखते। कई स्कूल-कॉलेजेज में डिजास्टर मैनेजमेंट के बेसिक्स तो दूर, बल्कि मॉक ड्रिल तक नहीं कराई जाती है। लखनऊ के एक कॉलेज की स्टूडेंट कविता शर्मा के मुताबिक उन्हें कभी किसी मॉक ड्रिल का हिस्सा बनने का मौका तक नहीं मिला। उनका कहना है कि कॉलेज और ऑफिस में मॉक ड्रिल करायी जानी चाहिए ताकि लोग अवेयर रहें और सुरक्षित भी। वह कहती हैं कि हर बच्चे को बचपन से ही प्राकृतिक आपदा से निपटने की सलाह और शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि वो अपने साथ दूसरों की भी मदद कर सकें। प्रोफेशनल स्तर पर गडबडी हमारे सिस्टम में है।
जब कोई हादसा होता है , तब हम सब सजग हो जाते हैं मगर चंद दिनों बाद सब भूल जाते हैं। लखनऊ के ही एक कॉलेज स्टूडेंट दिशांत श्रीवास्तव का भी यही कहना है कि ऑफिस और हाउस सोसायटी में मॉक ड्रिल न देखा न सुना, मगर ऐसा होना बहुत जरूरी है। वह कहते हैं कि प्रशासन को स्कूल स्तर पर ही इसे अनिवार्य करना चाहिए हर स्टूडेंट को इससे निपटने की कला मालूम हो।
यूथ संवेदनहीन
झारखंड की सेंट्रल यूनिवर्सिटी के युवा छात्र अभ्युदय अनुराग कहते हैं कि सबसे बडी विडंबना तो यह है कि युवा वर्ग में संवेदना की भी कमी होती जा रही है। ऐसा देखा जाता है कि कोई दुर्घटनाग्रस्त होकर गिरा होता है, लेकिन लोग उसको देखते हुए आगे बढ जाते हैं। हमें अपदाग्रस्त लोगों के प्रति संवेदनशील तो होना ही पडेगा। अगर कालेज स्तर पर डिजास्टर मैनेजमेंट के प्रशिक्षण की व्यवस्था रहती तो हो सकता था कि उत्तराखंड में हुए हादसे में भी जानमाल की रक्षा काफी हद तक हो जाती। मेरा मानना है कि हर स्कूल और कॉलेज में डिजास्टर मैनेजमेंट की प्रैक्टिकल पढाई हो। साथ ही साल में दो या तीन बार मॉक ड्रिल की व्यवस्था हो।
समाज सेवा बाद
यूपी बोर्ड 12वीं के जिला टॉपर नोएडा के कृष्ण नागर का कहना है कि कॉम्पिटिशन बढ गया है। पेरेंट्स चाहते हैं कि बेटा या बेटी बेहतर शिक्षा प्राप्त कर अपना भविष्य संवारे। ऐसे में एनसीसी-एनएसएस जैसी गतिविधियों को वक्त की बरबादी समझ ली जाती है। यह वजह है कि वे एनसीसी, एनएसएस और स्काउट-गाइड की गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले पाए।
सेवा भाव जरूरी
नोएडा में आईआईटी की कोचिंग कर रहे स्टूडेंट चंद्रवीर का कहना है कि सेवा भाव के लिए प्रशिक्षण नहीं, संवेदना की जरूरत होती है। स्कूलों में डिजास्टर मैनेजमेंट के विषय दिया ज्ञान तब तक अधूरा है जब तक माता-पिता भी अपने बच्चों सेवा भाव के लिए जागरूक न करें। कुछ लोगों में यह भाव कुदरती होते हैं। हां, यह बात सही है कि एनसीसी-एनएसएस आदि के माध्यम से इस प्रतिभा को निखारा जा सकता है।
लडकियों की हो एनसीसी विंग
नोएडा की स्टूडेंट निशा चावडा का कहना है कि प्रत्येक कॉलेज में एनसीसी और एनएसएस की लडकियों की अलग से विंग होनी चाहिए। इसमें प्रतिभागिता डिजास्टर मैनेजमेंट ही नहीं, व्यक्तिगत स्तर पर भी काम आ सकती है। इससे आत्मबल प्राप्त होता है।
लडकियों को करें एक्टिव
यूपी बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा में जिले की दूसरी टॉपर नोएडा की डॉली चौधरी का कहना है कि लडकियां-महिलाएं भी आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी का निर्वहन बेहतर ढंग से कर सकती हैं। लडकियों के लिए बेहतर होगा कि डिजास्टर मैनेजमेंट का करिकुलम स्कूल और कॉलेजेज में कंपल्सरी कर दिया जाए।
डिजास्टर मैनेजमेंट को बनाएं प्रोफेशनल
जम्मू यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कालर एग्जीक्यूटिव एसोसिएशन के प्रधान राकेश चिब के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर बनी आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को ज्यादा सक्रिय व प्रोफेशनल बनाने की जरूरत है।
स्कूलों व कॉलेजों में आपदा प्रबंधन का अतिरिक्त विषय पढाया जाए, साथ ही स्टूडेंट्स को यह बताया जाए कि उसे किसी भी तरह की आपदा के समय सबसे पहले अपना जीवन किस तरह से सुरक्षित करना है और फिर लोगों को कैसे बचाना है।
हों कैंप और कार्यक्रम
जम्मू यूनिवसिर्टी में स्टैटिस्टिक्स की स्कॉलर पूजा चौधरी कहती हैं स्कूलों व कालेजों में आपदा प्रबंधन के प्रति स्टूडेंट्स को जागरूक करने के लिए कैंप या कार्यक्रम होने चाहिए।
भूले नहीं भूलता तबाही का मंजर
हल्द्वानी के एमबीपीजी कालेज के कुमार हर्षित उत्तराखंड आपदा के दौरान गोविन्दघाट में ही थे। उन्होंने उन खतरनाक क्षणों को झेला है। हर्षित कहते हैं कि हमारे पास हिम्मत तो थी पर संसाधन नहीं थे। हम दूसरों को भी बचाना चाहते थे लेकिन बचा न सके। वह बताते हैं कि 15 जून को भारत के विभिन्न प्रान्तों के 70 रोवर रेंजर्स भारत स्काउट एवं गाइडस के तत्वावधान में आयोजित 10 दिवसीय ट्रेकिंग व पर्यावरण अध्ययन हेतु जोशीमठ से प्रकृति का अध्ययन करते हुए पैदल गोविन्दघाट पहुंचे। अगले दिन सुबह हमें हेमकुण्ड के लिए बढना था। कैम्प निर्देशक ने मुझे और मेरे साथी गोविन्द पाण्डे को उत्तराखण्डी होने के कारण दल की सुरक्षा तथा मार्गदर्शन का दायित्व सौंपा था। अलकनन्दा नदी पूरे उफान पर थी। मार्ग में पहला भूस्खलन हुआ। बादल फटने से हम आगे नहीं बढ सके और गुरुद्वारे में ही रूके रहना पडा। रात में अलकनन्दा का स्तर लगातार बढने लगा। रात 3.15 पर पानी गुरुद्वारे के पिछले हिस्से से अंदर आने लगा। औरतें तथा लडकियां लगातार रो रही थीं फिर भी हमारी साथी रेंजर्स ने उनको दिलासा देते हुए सुरक्षित पहुंचाने में मदद की। इसी बीच पर घाघरिया जाने वाला लोहे का भारी भरकम पुल भी नदी के वेग को नहीं सह सका और बह गया।
ग्राउंड जीरो के हीरो
17 जून की रात जब बादल फटने से उत्तराखंड में भारी तबाही शुरू हुई थी, सारे रिसोर्सेज, ट्रांसपोर्टेशन, कम्युनिकेशन एक ही झटके में ध्वस्त हो गए। रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए एक-एक कदम आगे बढाना मुश्किल हो रहा था, ऐसे वक्त में उत्तराकाशी के नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग के प्रिंसिपल कर्नल अजय कोठियाल ने डिजास्टर मैनेजमेंट में एक नई मिसाल कायम की। आपदा की विभीषिका को अपने पैशन और डिजास्टर मैनेजमेंट की कला में एक्सपर्ट होने के चलते इन्होंने परास्त कर दिया। 18 जून को जब राज्य और केन्द्र सरकार केदारनाथ से रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करने की रणनीति बना रही थी, ऐसे में नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (निम) के प्रिंसिपल कर्नल अजय कोठियाल ने एक टीम बनाई और उत्तरकाशी के आगे मनेरी, भटवाडी, सुक्खी टॉप, हर्षिल और गंगोत्री में फंसे 46 विदेशियों समेत 6,500 से ज्यादा तीर्थयात्रियों को पहाड के रास्ते उनके मुकाम तक पहुंचाया। यह वो वक्त था, जब पूरे देश का ध्यान केदारनाथ तक ही सीमित था और मार्ग बेहद संकरा होने के चलते हेलीकॉप्टर उतरने की भी जगह नहीं थी। विशिष्ट सेवा मेडल, शौर्य चक्र और कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशन में अतुलनीय वीरता प्रदर्शन के लिए देश का दूसरा सबसे बडा वीरता पुरस्कार पाने वाले कर्नल अजय कोठियाल उस वक्त को याद करते हुए बताते हैं कि जैसे ही बादल फटने की खबर मिली आपदा की खबर मिली उन्होंने 109 लोगों का एक ग्रुप बनाया, जिसमें इंस्टीट्यूट से ट्रेनिंग पाए लोकल ब्वॉयज, इंस्ट्रक्टर्स, इंस्टीट्यूट पोर्टर्स और ग‌र्ल्स शामिल थे, उन्हें 5 टीमों में बांटा और एक चेन बनाई। सभी में तीन से चार इंस्ट्रक्टर, 10 लोकल यूथ, एक नर्सिंग असिस्टेंट ओर 5 पोटर्स शामिल थे। इन लोगों के पास आवश्यक उपकरण, रोप्स, टेंपरेरी स्ट्रेचर, मेडिसिन, वायरलेस सेट जैसी जरूरी चीजें थीं। वह बताते हैं कि लोकल ब्वॉयज को पहाडी रास्ते पता थे और उन्होंने पैदल ही 100 किमी से ज्यादा सफर 3 दिन में तय किया और 21 जून को हर्षिल पहुंचे। अभियान के समय एक 22 वर्षीय प्रेगनेंट महिला दर्द से कराह रही थी, तो निम टीम ने उसे फ‌र्स्ट एड दी। मेंबर्स ने उसे टेंपरेरी स्ट्रेचर से 10 किमी. दूर स्थित मेडिकल सेंटर में पहुंचाया। कर्नल कोठियाल बताते हैं कि मेंबर्स के प्रयासों से वहां के ग्रामीणों ने कम्युनिटी किचेन जैसी सुविधाएं अगले ही दिन से शुरू कर दीं।
आपदा को देंगे चुनौती!
कर्नल अजय कोठियाल के मुताबिक उत्तराखंड में आपदाओं से बचने के लिए लोकल यूथ को तैयार करना बेहद जरूरी है। वह कहते हैं कि अगर लोकल यूथ अवेयर होता था, तो इस त्रासदी में 30 फीसदी जानें बच सकती थीं। कर्नल अजय कोठियाल की आगे की योजना ऐसी आपदाओं को चुनौती देने की है। आगे की रणनीति का खुलासा करते हुए वह बताते हैं कि जल्द ही आसपास के स्कूल-कॉलेजों के प्रिंसिपल्स को लिख कर वहां के स्टूडेंट्स को ट्रेनिंग देने की योजना बना रहे हैं। साथ ही रेगुलर मॉक ड्रिल्स भी आयोजित करेंगे ताकि स्टूडेंट्स ट्रेनिंग लेकर सेल्फ हेल्प ग्रुप्स के जरिए लोगों को ट्रेनिंग देंगे।

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